सोमवार, 27 दिसंबर 2021

आइये आज तरही मुशायरा आगे बढ़ाते हैं तीन रचनाकारों कंचन सिंह चौहान, नकुल गौतम और आशीष 'रोशन' के साथ।

सोचा तो यह था कि ठंड का तरही मुशायरा क्रिसमस पर समापन कर दिया जाएगा, लेकिन रचनाओं के आने का सिलसिला जारी है और उधर ठंड भी जारी है, तो तरही का आयोजन भी जारी है। कोई भी मंच असल में उसके लेखकों का ही तो होता है, लेखकों से ही यह साहित्य संसार बना है, इसलिए लेखकों का फ़ैसला ही अंतिम फ़ैसला होना चाहिए। तो हम इस मुशायरे को जारी रखे हुए हैं। पिछले अंक में मैंने कुछ बातें की थीं, जिन पर आप लोगों की राय जानने की इच्छा थी, हो सके तो इस अंक में अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा।
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
आइये आज तरही मुशायरा आगे बढ़ाते हैं तीन रचनाकारों कंचन सिंह चौहान, नकुल गौतम और आशीष 'रोशन' के साथ। कंचन के लिए सर्दियों का मौसम बहुत संघर्ष का होता है, सर्दियों का मौसम कंचन के लिए गुलाबी नहीं होता कविताओं की तरह। इसीलिए कंचन को निर्धारित तरही के मिसरे से छूट देते हुए, सर्दी के मौसम पर जो ग़ज़ल कंचन ने कही है उसे शामिल किया जा रहा है।

कंचन सिंह चौहान
लैला, मीरा, हीर, सोहनी से हट कर हैं मेरे काम,
दीवानों का नाम लिखो तो आगे लिखना मेरा नाम।

उखड़ी साँसे, डूबी नब्ज़ें, गुमहोशी से ठंडी देह,
तुम होते तो कुछ सिंक जाती सर्दी की ये ठंडी शाम।
सुना तुम्हारे यहाँ दिसम्बर उजला-उजला रहता है,
मेरे ठिठुरे कोहरे को क्या भेज सकोगे थोड़ी घाम ?

जब भी आना, ले कर आना सीने में सुलगा कोयला,
ठंडी आहें गले लगें तो मिले गुनगुना सा आराम।
अँगड़ाई ले कर आँगन में पसर गयी है उजली धूप,
सर्द हवा तू दुष्ट सहेली, लेने दे, दो पल आराम

नदी किनारे बाड़ लगा कर, बँसवारी की हरियल सी
छोटी सी इक क़ब्र बनाना, जिस पर लिखना मेरा नाम

कंचन की रचनाएँ हमेशा एक सन्नाटे में डूबी होती हैं। एक उदास से सन्नाटे में। जो लोग कंचन से मिल चुके हैं वे जानते हैं असल में कंचन ऐसी नहीं है, वह हँसती, खिलखिलाती ज़िंदगी से भरी हुई है। लेकिन रचनाओं में एकदम दूसरा रूप कंचन का सामने आता है। इस ग़ज़ल के मतले में वही उदासी अलग रूप रख कर सामने आई है। अगले ही शेर में हिज्र का एकदम नया रूप, किसी के होने से सर्दी की शामों का सिंक जाना,, वाह क्या कमाल का बिम्ब रचा है। और फिर किसी के उजले-उजले दिसम्बर से अपने ठिठुरे कोहरे के लिए घाम मँगवाना, क्या ग़ज़ब प्रतीक है, प्रेम का एकदम नया रूप। यह सिलसिला अगले शेर में भी जारी है, जहाँ किसी के सीने में सुलगते कोयले से गुनगुना आराम पाने की ख़्वाहिश कमाल तरीक़े से सामने आई है। उजली धूप और सर्द हवा के द्वंद्व को अगले शेर में बहुत सुंदरता से लिया गया है। अंतिम शेर पीड़ा का चरम है, यहाँ पलायन नहीं है बल्कि प्रेम में मिटने की चाह है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।

 नकुल गौतम
जमी घास पर दोपहर तक है शबनम
कोई कर गया आँच सूरज की मद्धम
हरी पत्तियाँ क्यों मनाएँगी मातम
ये गिरने से पहले सुनायेंगी सरगम

है जादू पहाड़ों की ताज़ा हवा का
कि मीलों चलें फिर भी घुटता नहीं दम
कभी धूप आये कभी छाये कोहरा
ये मौसम कहीं ख़ुश्क है तो कहीं नम

जो बादल अभी सुस्त से दिख रहे हैं
ये सब जनवरी में दिखाएंगे दम खम
बहाना मिले आप मिलने जो आएं
मेरी आजकल चाय होती है कुछ कम

निकलते नहीं दिन ढले आप बाहर
सो छत पर नहीं दिख रहे शाम को हम
हिमाचल में हूँ इस बरस इत्तफाकन
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम

अभी वक़्त है बर्फ़ गिरने में थोड़ा
यहाँ जल्द होगा सफेदी का परचम

नकुल गौतम के यहाँ प्रकृति का बहुत अद्भुत चित्रण होता है। ऐसा चित्रण इससे पहले गौतम राजऋषि की ग़ज़लों में देखा है। मतले में ही सूरज की आँच को मद्धम कर जाने वाली बात बहुत सुंदर है। हरी पत्तियों का शेर ग़ज़ब की समारात्मकता लिए हुए है। पहाड़ों की ताज़ा हवा के बारे में बहुत अच्छे से अगले शेर में बात कही गई है। बादलों के सुस्त होने और जनवरी में दमखम दिखाने की बात बहुत ही सुंदर है, हमारे यहाँ इसे मावठे की वर्षा कहते हैं। और प्रेम का प्रयोग चाय के माध्यम से बहुत सुंदरता से हुआ है। प्रेम जब प्रतीकों पर सवार होकर आता है, तो उसकी सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। किसी के घर से नहीं निकलने से हमारा भी  छत पर नहीं निकलना, आने वाली पीढ़ियाँ इस प्रेम से मोहताज रहेंगी हमेशा। हिमाचल वाले शेर में इत्तफाकन शब्द क्या कमाल तरीक़े से आया है। और उतनी ही सुंदर गिरह। और अंतिम शेर में बर्फ़ गिरने की प्रतीक्षा तथा सफ़ेदी का परचम लहराने का प्रयोग बहुत सुंदर है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।

आशीष 'रोशन'
पहाड़ों की चोटी पे बर्फीले परचम,
हवा रोकने को ये चोगे की रेशम,
वो महफ़िल पुरानी रहेगी अगरचे,
नये होंगे फाहे, नयी होगी सरगम,

अभी इश्क़ ने रब का दर्ज़ा दिया है,
थे कुछ रोज़ पहले ये दोनों भी आदम,
कई दिन लड़ाई खुदा से चलेगी,
जुदाई का तेरी हुआ है ये आलम,
हवा को है चूमा लबो से जो तुमने,

"यहां सर्दियों का गुलाबी है मौसम"
ठहर जाओ कुछ देर तुम भी यहीं पर
रुकी जैसे सर्दी में फूलों पे शबनम,
भला क्यों मुहब्बत पे इल्जाम आये,
बंधा है जो किस्मत के धागे में संगम,

तेरी याद तन्हा मुझे कर रही हैं,
नहीं खोलना था ये कॉलेज का अल्बम,
ये गर्मी से बारिश का तर्के तअल्लुक,
लगे सर्दियां बस हैं गर्मी का मातम,

बहुत जोर से आज हंसना हुआ है,
मैं इतना हंसा की हुई आंख भी नम,
पहाड़ो से हैं हम, शराबी नहीं हैं,
पियाला मुहब्बत का भर के पियें हम।

न पिज़्ज़ा कभी मैंने महँगा सुना है,
सुना है कि मण्डी में महँगे हैं शलगम।।

आशीष का हमारी तरही में यह प्रथम प्रयास है, और बहुत शानदार प्रयास है यह। मतले में ही बर्फ़ीले परचम तथा चोगे की रेशम जैसे प्रयोग बहुत सुंदर बने हैं। अभी इश्क़ ने रब का दर्जा दिया है में मिसरा सानी बहुत सुंदरता के साथ सामने आता है। और फिर हिज्र में ख़ुदा से लड़ाई चलने वाला शेर बहुत अच्छा बना है। किसी ने हवा को लबों से चूम लिया और गुलाबी मौसम हो गया, बहुत ही सुंदर गिरह। किसी से रुकने का मनुहार जैसे शबनम रुकती है, बहुत ही सुंदर बिम्ब है यह। और कॉलेज की अल्बम खोलने वाला शेर तो एकदम कलेजे में धँसने वाला शेर है। गर्मी और बारिश का सर्दियों से जो रिश्ता जोड़ा है तथा उसमें सर्दियों को गर्मी का मातम बताया है, वह बहुत नई बात है। बहुत ज़ोर से हँसने पर अंदर की पीड़ा का बाहर आ जाना और उसके कारण आँखों का नम हो जाना बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है। पहाड़ों सा होना और पियाला प्रेम का पीना बहुत अच्छे से व्यक्त हुआ है। और अंतिम शेर में पिज्जा तथा शलगम की तुलना बहुत सुंदर से की है। बहुत सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।

आज तो तीनों शायरों ने मिलकर सर्दियों के कई सारे चित्र खींच दिए हैं। ऐसा लग रहा है कि यह ग़ज़लें नहीं हैं बल्कि तस्वीरें हैं मौसम की। तो आप भी इन शानदार ग़ज़लों पर दाद दीजिए और प्रतीक्षा कीजिए अगेल अंक की।

20 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी ग़ज़ल की कोशिश कामयाब हुई।
    इसे पढ़कर आपको गौतम राजऋषि जी याद आ गये, इससे अधिक खुशकिस्मत कभी feel नहीं किया।
    मुझे तरही में शामिल करने के लिए सादर धन्यवाद

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  2. कंचन जी की ग़ज़ल जैसे सन्नाटे को आवाज़ दे रही है। नकुल जी ने हिमाचल का चित्र खींच दिया है जिसे पढ़कर मुझे अपने वो दस साल याद आ गये जो मैंने हिमाचल में गुजारे थे। आशीष जी पहली बार आये हैं पर कहीं से ऐसा लग नहीं रहा है। बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है उन्होंने। तीनों शायरों को बहुत बहुत बधाई।

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  3. तीनों गजलें बहुत सुन्‍दर हैं, ठंड के मौसम में गर्मी का अहसास कराती हैं

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  4. आशीष भाई मेरे छोटे भाई जैसे हैं।
    इनकी हाज़िरी मुझे गौरवान्वित कर रही है।
    शेर तो अच्छे कहे ही हैं।
    स्वागत है

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    1. भैया सब आपका सिखाया हुआ है, प्रेम बनाये रखें।।

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  5. अलग अलग फ्लेवर लिए तीनों गजलें कमाल कर रही हैं ...
    कंचन की गज़ल व्सके व्यवहार से विपरीत है ... सच अकः है आपने बहुत कुछ समेटे हुए एक बेहतरीन अदायगी है ..
    गौतम ने तो सबको जैसे प्राकृति में समेट लिया ... हर शेर सर्द है ... औत ठिठुरा रहा है ... बहुत लाजवाब ...
    आशीष जी का स्वागत है इस मंच पर ... धमाकेदार एंट्री है उनकी इस बज़्म में ... हर शेर कसा हुवा, नए बिम्ब समेटे, कमाल कर रहा है ...
    तीनों शायरों को बहुत बहुत बधाई और ढेरों शुभकामनायें ...

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  6. सबसे पहले स्वागत है आशीष रोशन जी का. इश्क़ और मौसम से ताल्लुक रखने वाले कई शेर अद्भुत हैं. बहुत बहुत बधाई। 
    नकुल गौतम जी आपसे तरही में लगातार मिलना हो रहा है. यह सुखदायी है. इत्तफाकन हम भी दार्जिलिंग पहुँच गए, जहां बचपन की ढेर सारी यादें जुडी हैं. सूरज की मद्धम, सफेदी का परचम वाले शेर सुन्दर बन पड़े हैं. 

    कंचन दी का साथ पिछले 12 -13  वर्षों से है. उनकी हर रचना (लेख संस्मरण, कविता , ग़ज़ल) संवेदनाओं से भरी होती है. बहुत बहुत बधाई। 

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  7. कंचन सिंह चौहान:
    ग़ज़ब लिख दिया है आपने कंचन जी। आपकी निर्भीकता पर हैरत में हूँ।

    (नाम तो हमरा 'नीरज भैय्या'* ने झण्डे पे चढ़ाया है
    आप भी दौर में# है शामिल तो मेडम लो हमरा प्रणाम)
    *गोस्वामी
    # दीवानेपन की

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  8. कंचन का लेखन कोई भी शैली हो, सदा निर्भीक और असरदार होता है जिसका प्रभाव उसकी प्रत्येक रचना को बार बार पढ़ने को प्रेरित करता है.
    नकुल की अदायगी प्रत्येक वार एक नया प्रयोग और एक नयी सोच को उजागर करती है.
    आशीष के सभी शेर प्रभाव छॉडते हैं.

    तीनों रचनाकारों को बधाई

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  9. # नकुल गौतम:
    जमी घास पर दोपहर तक है शबनम
    कोई कर गया आँच सूरज की मद्धम
    हरी पत्तियाँ क्यों मनाएँगी मातम
    ये गिरने से पहले सुनायेंगी सरगम
    है जादू पहाड़ों की ताज़ा हवा का
    कि मीलों चलें फिर भी घुटता नहीं दम
    कभी धूप आये कभी छाये कोहरा
    ये मौसम कहीं ख़ुश्क है तो कहीं नम
    प्रकृति का सहज, सुंदर चित्रण अंग्रेज़ी के अज़ीम शायर विलियम वर्डसवर्थ याद आये। बधाई कमयाब ग़ज़ल के लिये।
    ( है सर्दी से हम भी मुतास्सिर यहां
    ठिठुरते-ठिठुरते ही कर पाये रक़म।)

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    1. बहुत शुक्रिया हाशमी sir
      आपकी टिप्पणी हिम्मत बढ़ाती है।।

      अगली तरही में और बेहतर करने का प्रयास होगा

      हटाएं
  10. सुबीर sir, आपका बहुत आभार मेरी नयी कलम को इस पृष्ठ पर स्थान देने के लिए, साथ ही नकुल भैया का आभार इस पेज से अवगत कराने के लिए और मौका देने के लिए।।
    हार्दिक अभिनंदन।।

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  11. जमी घास पर दोपहर तक है शबनम
    कोई कर गया आँच सूरज की मद्धम
    वाह वाह , नकुल गौतम जी क्या कहने । इस बार के मुशायरे का अब तक का ये मेरा फेवरेट शेर हो गया है। बहुत ही खूबसूरत गजल कही आपने।
    कंचन सिंह चौहान और आशीष रौशन जी ने भी बहुत अच्छी गजलें कही हैं। बहुत खूब शेर कहे हैं

    नदी किनारे बाड़ लगा कर, बँसवारी की हरियल सी
    छोटी सी इक क़ब्र बनाना, जिस पर लिखना मेरा नाम

    अभी इश्क़ ने रब का दर्ज़ा दिया है,
    थे कुछ रोज़ पहले ये दोनों भी आदम

    वाह वाह बहुत खूबसूरत शायरी

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    1. शुक्रिया गुरप्रीत जी
      आपको मतला पसंद आया
      ग़ज़ल का प्रयास सफल हुआ

      हटाएं

  12. कंचन जी की प्रस्तुति पर क्या कहूँ। शब्द कैसे संजोए जाते हैं, इनका उदाहरण हैं विशेषकर ये पंक्तियां कि दीवानों का नाम लिखो तो आगे लिखना मेरा नाम, उखड़ी साँसे, डूबी नब्ज़ें, गुमहोशी से ठंडी देह, मेरे ठिठुरे कोहरे को क्या भेज सकोगे थोड़ी घाम, जब भी आना, ले कर आना सीने में सुलगा कोयला, अँगड़ाई ले कर आँगन में पसर गयी है उजली धूप, छोटी सी इक क़ब्र बनाना, जिस पर लिखना मेरा नाम। कुछ ऐसा कि कहीं कुछ है जो फूटना चाहता है, चीत्कार को आतुर है लेकिन मर्यादाओं से बंधा हुआ। मेरा मानना है कि जो हमेशा खिलखिलाते रहते हैं वो कहीं गहरे में कुछ बहुत पैना दर्द दबाए होते हैं जो अभिव्यक्ति के अवसर की तलाश में होता है।
    शब्दविहीन हूँ इस अभिव्यक्ति पर।

    अपने आस-पास जो कुछ घट रहा है, जो अपेक्षित है उसे अनुभव कर उसे बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया है नकुल गौतम ने और इस सशक्त प्रस्तुति के लिये बधाई के पात्र हैं।

    बहाना मिले आप मिलने जो आएं
    मेरी आजकल चाय होती है कुछ कम

    निकलते नहीं दिन ढले आप बाहर
    सो छत पर नहीं दिख रहे शाम को हम
    की सादादिली विशेष रूप से मोहक है।

    आशीष 'रोशन' जी की यहां प्रथम उपस्थिति अवश्य है लेकिन

    अभी इश्क़ ने रब का दर्ज़ा दिया है,
    थे कुछ रोज़ पहले ये दोनों भी आदम
    और
    तेरी याद तन्हा मुझे कर रही हैं,
    नहीं खोलना था ये कॉलेज का अल्बम,

    जैसे शेर इतना तो कहते हैं कि आशीष पर माँ सरस्वती का आशीष है।
    इन प्रस्तुतियों के लिये सभी को बधाई।

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