मंगलवार, 20 जुलाई 2021

विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 22, त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2021

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 22, त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2021अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय, मित्रनामा, विस्मृति के द्वार- शिब्बन लाल की बहन, रोती नहीं, उषा प्रियम्वदा, कथा कहानी- जूठा सेब- प्रज्ञा पाण्डेय, उसकी मौत- विकेश निझावन, अँधेरों के बीच- अरुणा सब्बरवाल, कौन सुने ?- कादम्बरी मेहरा, मिशन - एन.पी.ए.- डॉ. रमेश यादव, सेहरे का सगुन- कामेश्वर, स्वाभिमान- सेवक नैयर, देवता- अरुण अर्णव खरे, सन्नाटा- छाया श्रीवास्तव। भाषांतर- यथार्थ के क्रूर चक्र (मलयालम कहानी), लेखिका - कमला दास, अनुवादक - अनामिका अनु। शंख घोष की कविताएँ- अनुवादक - रोहित प्रसाद पथिक। व्यंग्य- लोकार्पण- श्रीकांत आप्टे। संस्मरण- हम भी कमीने, तुम भी कमीने, ज़ेबा अल्वी, रामरतन अवस्थी जी मेरे पहले साहित्यिक गुरु- वीरेन्द्र जैन। यादों के झरोखे से- रेडियो का देशी इलाज करते पिता, गोविन्द सेन, जन्माष्टमी- शोभा रस्तोगी। समाचार- विष्णु प्रभाकर राष्ट्रीय प्रोत्साहन सम्मान, पहली कहानी- आख़िरी ख़त- अदिति सिंह भदौरिया। लघुकथा- खेती- डॉ. वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज। लिप्यांतरण- ग़ालिब अंड गोएटे, मूल रचना – हाजी लक़ लक़, अनुवाद – अखतर अली। कविताएँ- खेमकरण 'सोमन', एकता कानूनगो बक्षी, प्रकाश मनु, प्रतिभा चौहान, चंचला प्रियदर्शिनी, दीपक शर्मा 'दीप'। ग़ज़ल- दौलतराम प्रजापति, धर्मेन्द्र गुप्त, सुभाष पाठक 'ज़िया'। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- राजेंद्र शर्मा, रेखाचित्र - मार्टिन जॉन, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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सोमवार, 12 अप्रैल 2021

शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 21, त्रैमासिक : अप्रैल-जून 2021 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी, संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक, शहरयार, सह संपादक शैलेन्द्र शरण, पारुल सिंह के संपादन में शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 21, त्रैमासिक : अप्रैल-जून 2021 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता / मदन कश्यप। आवरण चित्र / राजेन्द्र शर्मा। संपादकीय / शहरयार। व्यंग्य चित्र / काजल कुमार।
पुस्तक समीक्षा-
अपेक्षाओं के बियाबान (कहानी संग्रह) दीपक गिरकर / डॉ. निधि अग्रवाल, मीडिया का मायाजाल (पत्रकारिता) प्रेम कुमार / डॉ. मुकेश कुमार, मेरी प्रिय कविताएँ (कविता संकलन) प्रो. अवध किशोर प्रसाद / अनिरुद्ध प्रसाद विमल, अब ख्वाब नए हैं (कविता संग्रह) डॉ. नीलोत्पल रमेश / अनिता रश्मि, कठपुतलियाँ जाग रही हैं (कविता संग्रह) मनीष वैद्य / श्रीराम दवे, प्रेम (कहानी संग्रह) प्रो. अवध किशोर प्रसाद / पंकज सुबीर, ठौर (कहानी संग्रह) विजय पुष्पम / दिव्या शुक्ला, खारा पानी (कहानी संग्रह) गोविंद सेन / आशा पांडेय, गली हसनपुरा (उपन्यास) हरिराम मीणा / रजनी मोरवाल, अँगूठे पर वसीयत (उपन्यास) रमेश शर्मा / शोभनाथ शुक्ल, माफ करना यार (संस्मरण) राकेश शर्मा / बलराम, बिना मतलब (कहानी संग्रह) संदीप वर्मा / राजासिंह, वे रचना कुमारी को नहीं जानते (व्यंग्य संग्रह) कमलेश पाण्डेय / शांति लाल जैन, तीस पार की नदियाँ (कविता संग्रह) डॉ. नीलोत्पल रमेश / सत्या शर्मा 'कीर्ति', धूप में नंगे पाँव (संस्मरण) योगेन्द्र शर्मा / स्वयं प्रकाश, सुरंग में लड़की (कविता संग्रह) , हरिराम मीणा / राजेन्द्र नागदेव, जूता ज़िंदाबाद (कविता संग्रह) डॉ. मक्खन मुरादाबादी / अशोक अंजुम, फाँसी बाग (उपन्यास) राकेश भारतीय / नरेन्द्र नागदेव, सुन रहा हूँ इस वक्त  (कविता संग्रह) अश्विनीकुमार दुबे / सतीश कुमार सिंह, चाय की विश्व यात्रा (निबंध), आराधना झा श्रीवास्तव / कादंबरी मेहरा, दस कुंवारियों का दृष्टांत (नाटक संग्रह)
माटिन जॉन / कुमार संजय, खुलती रस्सियों के सपने (कविता संग्रह) अमरेंद्र मिश्र / राग रंजन।
केंद्र में पुस्तक-
खिड़कियों से झाँकती आँखें (कहानी संग्रह) अशोक प्रियदर्शी, डॉ. मधु संधु
सुधा ओम ढींगरा, रिश्ते (कहानी संग्रह) दीपक गिरकर, प्रो. अवध किशोर प्रसाद
पंकज सुबीर।
नई पुस्तक दृश्य से अदृश्य का सफ़र (उपन्यास) / सुधा ओम ढींगरा, गीली पाँक (कहानी संग्रह) / उषाकिरण खान, बर्फ़ के फूल (जया जादवानी की प्रेम कहानियाँ) संपादक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, कहिये मंज़िल से इंतज़ार करे (उपन्यास)/ गजेन्द्र सिंह वर्धमान, ओ मारिया पिताशे (यात्रा संस्मरण) / प्रतिभा अधिकारी, इक्कीस फेरों का फ़रेब (उपन्यास) / सुनीता पाठक, यही तो इश्क़ है (ग़ज़ल संग्रह) / पंकज सुबीर, मन कस्तूरी रे (उपन्यास) / अंजू शर्मा, सरहदों के पार दरख़्तों के साये में (कविता संग्रह)/रेखा भाटिया, कुहासा छँट गया (कहानी संग्रह) / ममता त्यागी, फ़ैमिली बिज़नेस की सच्चाइयाँ (​प्रबंधन) लेखक : हेनरी हॅचेसन / अनुवाद : इंज़ी. राजेन्द्र जैन, कोई ख़ुशबू उदास करती है (कहानी संग्रह) / नीलिमा शर्मा, अपनी सी रंग दीन्हीं रे (कहानी संग्रह) / सपना सिंह, शह और मात (कहानी संग्रह) / मंजुश्री, कुम्हलाई कलियाँ (कहानी संकलन) / सीमा शर्मा, हाशिये का हक़ (साझा उपन्यास) / नीलिमा शर्मा, डॉ. रंजना जायसवाल,  डॉ. गीता द्विवेदी, डॉ. जया आनंद, बहती हो तुम नदी निरंतर (गीत संग्रह) / श्याम सुंदर तिवारी, हरे स्कर्ट वाले पेड़ों के तले (कहानी संग्रह) / नीलम कुलश्रेष्ठ, कब तक माफ़ करेगी अम्मा (कविता संग्रह) / नीरज पाराशर, द= देह, दरद और दिल (कहानी संग्रह) / विभा रानी।
उपन्यास अंश - सीतायन (बांग्ला उपन्यास) मल्लिका सेनगुप्ता, अनुवाद : सुशील कान्ति डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
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वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 21, अप्रैल-जून 2021 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 21, अप्रैल-जून 2021 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय, विस्मृति के द्वार - धीरे-रे खुलें किवाड़, उषा प्रियम्वदा, कथा कहानी- भ्रम- कविता वर्मा, पानी की परत- चौधरी मदन मोहन समर, छतरी- सुमन कुमार घई, मास्टरनी का जादूमंतर- इला सिंह, चिन्ना वीदू- विनीता शुक्ला, अनछुआ- अंशु जौहरी, फटा हुआ बस्ता- डॉ. रमाकांत शर्मा। लघुकथा - पाव रोटी- किसलय पंचोली, जुण- उपहार- सुनील गज्जाणी। भाषांतर- क़ब्ज़ा कर लिया गया मकान - लातिन अमेरिकी कहानी, जूलियो कोर्टाज़ार- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय। लिप्यांतरण- लघुकथाएँ - मूल : डॉ. अशफाक़ अहमद, अनुवाद: सेवक नैयर। आलेख- जनसंचार का बदलता परिदृश्य- नंद भारद्वाज। व्यंग्य- ख़ाली स्थान की सुरंगों से- धर्मपाल महेंद्र जैन, शादी-ब्याह की नेटवर्किंग में जनवासा क्वारिण्टीन - डॉ. रंजना जायसवाल। पहली कहानी- मेरा नाम सुहानी है...- जुगेश कुमार गुप्ता। शहरों की रूह- मन के कैमरे में कैद बीजिंग (चीन) - शशि पाधा। संस्मरण- 'भिट्ट' जाने का वह सुख- कृष्णकुमार 'आशु'। यादों के झरोखे से- चश्मे की खोज- डॉ. अफ़रोज़ ताज। दोहे- जय चक्रवर्ती। ग़ज़ल- अशोक अंजुम। कविताएँ- अरुण सातले, नरेश अग्रवाल, शैलेन्द्र चौहान, अनुजीत इकबाल, कमलेश कमल, रश्मि प्रभा। आख़िरी पन्ना 82 आवरण चित्र- राजेंद्र शर्मा, रेखाचित्र - रोहित प्रसाद, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

 होली का त्योहार आकर बीत भी गया। कोरोना के कारण हर तरफ़ एक प्रकार का डर फैला हुआ है। मगर फिर भी होली का आयोजन यहाँ ब्लॉग पर पूर्व की तरह हो पाया है तो उन रचनाकारों के कारण जो ब्लॉगिंग के इस कठिन समय में भी ब्लॉग की इस देहरी पर अपनी रचनाओं के दीप रखने आ जाते हैं। बासी होली की परंपरा भी ब्लॉग पर रही है, तो आज हम बासी होली मनाते हैं। होली के सात दिन बाद तक, मतलब शीतला सप्तमी तक यह परंपरा चलती है।
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

अभिनव शुक्ल
चिरकुटों ने भांग घोली, आ गई होली,
दोस्ती है, दुश्मनी थी, आ गई होली।
बस गले मिल कर गिरीं बूँदें टपर टप टप,
मैं न बोला, तू न बोली, आ गई होली।
तितलियाँ हर दिन परखती हैं बगीचे को,
फूल ने तितली टटोली, आ गई होली।
सुबह उठ कर ये लगा मौसम नशीला है,
हमने फिर तारीख़ देखी आ गई होली।
रंग यूँ बिखरे कि सारी बंदिशें टूटीं,
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली।

होली के तमाम रंगों को समेटे हुए हुए है यह ग़ज़ल। होली के त्योहार के सामने आते ही जो चीज़ें याद आती हैं उनतें भांग, रंग, बंदिशों का टूटना जैसी बातें होती हैँ। अभिनव ने भी इन सब का ही उपयोग कर के बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है। मतले में अपने नाम का उपयोग ठीक पहले ही शब्द में बहुत अच्छे से किया है। बहुत सुंदर ग़ज़ल।

गिरीश पंकज
''फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली''
जिंदगी का राग सहसा गा गई होली
बूढ़े, बच्चे, नौजवां सब बावरे दिखते
सबके जेहन में यहाँ पे छा गई होली
ज़िंदगी सहसा लगे रंगीन लोगों को
इस कदर हर शख्स को ही भा गई होली
रंग मस्ताने हुए कुछ चोलियां भींगी
देख गोरी को बहुत शरमा गई होली
देख कर के बावरा सबको हुआ ऐसा
बिन पिये ही भंग कुछ बौरा गई होली
भूल कर अलगाव सारे एकरस देखो
प्यार के रंगों  से यूँ नहला गई होली
चढ़ गई थी भंग फिर उतरी नहीं पंकज
होली तो 'हो ली' बहुत दिन ना गई होली

गिरीश जी की यह दूसरी ग़ज़ल है, उनकी पहली ग़ज़ल हम होली के दिन सुन चुके हैं। हाँ ये बात अलग है कि यह ग़ज़ल उन्होंने भांग चढ़ाने के बाद लिखी है, क्योंकि इसमें क़ाफिया सरक गया है, सरक गया है मतलब ई की मात्रा से आ की मात्रा हो गया है। इस बार क़ाफिये को लेकर जो दो विकल्प थे उनमें दोनों में ई की मात्रा थी, मगर शिवबूटी पीकर सब उल्टा पुल्टा हो जाता है। मगर ग़ज़ल बहुत अच्छी कही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि जहाँ लोग एक ही नहीं कह पा रहे थे, वहाँ गिरीश जी ने दो ग़ज़लें कह दी हैं। सुंदर ग़ज़ल।

राकेश खंडेलवाल
खुल गए एकाकियत के बंद दरवाजे
ठण्ड  से जकड़े बदन में हलचलें जागीं
रात की फैली हुई चादर ज़रा सिकुड़ी
धूप ने गुदड़ी उठा कर ताक पर टांगी
खोल प्राची का बगीचा एक गौरैय्या
आ फुदकती नाचती हो सुरमयी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

हाथ सरसों के किये हैं खेत ने पीले
अब बिखरते रंग सूखे और कुछ गीले
आ गई अंगनाई में सारी पड़ोसन आज
भाभियों के साथ मिल कर के मटर छीले
इक हिनाई हाथ की थपकी पडी तो फिर
बन्नियों के गीत गाती  ढोलकी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

कह रहा है जेठ, भाभी आओ मैं रंग दूँ
गाल की रंगत गुलाबी और कुछ कर दूँ  
चंग पर बजते बिरज के जो सरस रसिये
उन मिठासो के शहद को होंठ पर धर  दूँ
तो कहे नटखट ग्वालिन नैन मटका कर
खा गयी देवर बुढाउ भंग की गोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

राकेश जी के गीत सचमुच ऐसे होते हैं कि उन पर कोई टिप्पणी करने की जगह बस सुनते रहने की इच्छा होती है। यह गीत भी ऐसा ही है। कैसे-कैसे चित्र बना देते हैं वे अपने शब्दों से। ऐसा लगता है जैसे हम गीत नहीं सुन रहे हैं, बल्कि स्मृतियों के गलियारों में टँगे हुए चित्रों को देख रहे हैं। पूरा गीत होली के समूचे माहौल को सजीव करता हुआ गुज़र जाता है। बहुत ही सुंदर गीत।

आप सबको होली तथा रंगपंचमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। आनंद से रहिये और दाद देते रहिये।

शनिवार, 27 मार्च 2021

"फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली" आइये आज मनाते हैं होली का त्यौहार गीतों और ग़ज़लों के साथ और करते हैं कुछ हँसी-ठिठौली अपने रचनाकारों के साथ।


होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बाँसुरिया, आख़िर एक साल का सफ़र तय करने के बाद होली आ ही गई है। आप सब लोग लुगाइन को तो पतो ही है कि हम होली पर हर बरस भाँग की कुछ अतिरिक्त मात्रा लेकर सटक जाते हैं। बैसे तो जे बात सब कहते हेंगे कि जा में भाँग को कोई दोस नहीं है, हम तो बैसे ही सटके सटकाए हेंगे। पर जे बात झाँ पे केने की कोई जरूरत नहीं हेगी। तो हम का के रए हते ? हाँ हम जे बात के रए हते कि होली पे जा बार बस बातन से ही काम चलानो पड़ेगो। और हाँ जे बात भी है कि होली खेलने के लिए अब आप सब लोग-लुगाइन की उमर भी नहीं हेगी। तो सांति से बेठ के झंई पे मुसायरा सुनो।

सब लोग लुगाइन खों सूचित किया जाता हेगा कि होली को मुसायरो, जो कि जा बार कछु देर से मिसरा देने के कारण कुछ कम सायरों के साथ हो रओ है। जा बार हमने मिसरो दो प्रकार को दओ हतो। मिसरो तो एक ही हतो, पर दो इस्टाइल से बा में काम करबे की कही हती।
मिसरो हतो - फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
जा मिसरा के बारे में कोउ ने कमेंट करो हतो कि जा मिसरा पे एक भोत ही फेमस गानो बनो हतो, बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ, आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ। जे गानो हमने नहीं बताओ है, जिनने बताओ है उनसे ही पूछो कि कोउ दूसरो गानो नहीं मिलो उनको ? पर हमें का करनो है। चलो हम तो अपनो मुसायरो सुरू करते हैं।

राकेश खंडेलवाल  
ऐ मुन्ना जे का कर रए हो ? का तुमें पता नहीं है कि कोरोना चल रओ है ? जे का हात में झुनझुना ले के सड़क पे निकल पड़े हो ? जे बात हमने पेले ही बता दी थी कि जा बार को मुसायरो सोसल डिस्टेंपिंग के साथ होयगो। जा में कोउ को भी किसी की भी गजल पे कोउ दाद-फाद देने की झरूरत नहीं है। ऐ दद्दा तुम तो नाच गा के दाद दे रए हो। का बोले ? कोउ दूसरे की रचना पे दाद नहीं दे रए हो, अपने ही गीत पे दे रए हो। तब तो ठीक है, जा में सोसल डिस्टेंपिंग टूटने को कोउ भी खतरो नहीं हेगो। देते रओ मुन्ना अपने गीत पे दाद। कोउ नहीं रोकबे बालो तुमखों।

आज है सम्वाद सेवा का नया जलवा
बन रहा हर ओर केवल गाजरी हलवा
श्वेत वर्णी पंकजों के मुख हुए नीले
जामुनी कत्थई गुलाबी और कुछ पीले
ताल में भोपाल के शिव बूटियाँ घोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली

पाई रहे गुरमीत बस स्काट की गंगा
अश्विनी के नाम है हर एक हुड़दंगा
हाशमी ने पान का बीड़ा चबा कर के
और फिर वसुदेव  को रसिए सुना कर के
है ग़ज़ल पंसेरियों के भाव पर तोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

कह रहे नीरज, सिखाऊँ मैं ग़ज़ल कहना
ओढ़ कर बासंतिया अब शायरी करना
छोड़ कर बहरो वजन की मुश्किली बंदिश
क़ाफ़ियों को नाँद में दे फेंक औ फिर लिख
खा रहे खुद रसमलाई बंद कर खोली
फागुनो मस्ती में डूबी आ गयी होली

एक पाखी कह रहा है पंख फैलाकर
धर तिलक, हो जा तियागी रंग में रंग कर
ढूँढ ले सौरभ छुपा है जो गुलालों में
अब नहीं ग़िरिईश रहता है शिवालों में
दे दिगम्बर को कोई लंहगों कोई चोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली

घाट पर विश्राम के बैठे हुए हैं द्विज
देखते सिल बट्टियों पर। क्या रहा है पिस
कोई लेकर आएगा पूए मलाई के
थाल भर रबड़ी, इनरसे भी कढ़ाई के
देह पर चंदन उँडेला शीश पर रोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

छोड़ करके लुम्बिनी आ तो गया गौतम
पर सताती सालियों की याद हर पल क्षण
रचे नुसरत हाथ पर बूते जिंसों के
लिख रहा राजीव कुछ अब अल्पनाओं पे
इस तरह से आज तरही झूम कर बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

ओरे मोरे दद्दा जो को सुनाओ तुमने ? मूड़ को नाम कपाल ? हाय मोरी मैया, जो करो का है तुमने। कछु पतो भी है कित्ती ख़राब बात कर दी हेगी तुमने। इते सारे सरोता बेहोस पड़े हैं। कछु ने तो अपने मुँह पे से मास्क हेड़-हेड़ के फेंक दए हेंगे कि जा गीत से अच्छो तो जे है कि कोरोना ही हो जाए। इत्ती बुरी बात केने की का झरूरत हती ? इते लोग-लुगाइन को सँभालबो ही मुस्किल पड़ रओ हेगो। तुमने इत्तो बुरो काम करो हेगो कि सब लोग लुगाइन चिल्ला रए हैं कि देस का नेता कैसा हो राकेश भैया जैसा हो। समझ नहीं आई जे बात ? नहीं समझ आएगी, काय के तुम अमरीका में रेते हो, भाँ पे ट्रम्प चलो गओ, पर झाँ पे ..... छोड़ो दद्दा पर जे बात सच्ची में ऐसी हो गई है कि हम बस झाँ बैठ के गालियाँ बक सके हैं और किछु नाय कर सकत।
सूचना- जा बारी भोत से सायर नहीं आए हेंगे। मोगरे की वेणी पहनने वाले गुलाबी जगह के शायर के बारे में कोउ ने बताई हेगी कि उनने गजल को टीका गजलीशील्ड लगबा लओ हेगा। लगबाने के बाद से उनके अंदर गजल के वायरस पैदा होने बंद हो गए हैं। सूचना समापत भई। ताकि तिट धिन धिन ना।


गिरीश पंकज
आपखों सादी की भोत-भोत सुभकामनाएँ। पर जे का बात भई कि इते सादी हो रही हेगी और उते आप गजल भी लिखने लगीं। एक बात सच्ची बताएँ आपको। असल में सादी और गजल में कोई अंतर नहीं हेगा। बा में भी पहले एक मतला हेता है जिसमें काफिये से दोनों मिसरे जुड़े रहते हैं, सादी में भी पहले पति-पत्नी मतले की तरह एक दूसरे से जुड़े रहते हैं काफिये से। कछु दिन बाद पत्नी ऊला हो जाती है और पति सानी हो जाता है। ऊ ला ला, ऊ लाला.... । आख़िरी में मकता होता है, जिसमें पत्नी तख़ल्लुस बन कर बैठ जाती है और पति ..... छोड़िये हम ने कुछ भी नहीं कही। आपको सादी की मुबारक बाद हो। भेनजी, कोरोना चल रओ है, आपसे नरम निवेदन है कि मास्क लगा लेतीं। ओ..... लिपिस्टक.....
लोग करते हैं ठिठोली आ गई होली
''फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली''
बच के रहना ये मुहल्ले के हैं हुरियारे
फिर से निकली है वो टोली आ गई होली
कब तलक रंगों से बच के रह सकोगे तुम
रँग दिया भोजाई बोली आ गई होली
कौन ऐसा है न भींगेगा यहां अब तो
रंग की सरिता बहाती आ गई होली
ऐसी आंधी-सी चली सब बंध टूटे हैं
धूल रंगों की  उड़ाती आ गई होली
जिंदगी में  रंग खुशियों के भरे इसने
रौशनी-सी जगमगाती आ गई होली
अब कहां मनहूसियत का काम है पंकज
देख लो न खिलखिलाती आ गई होली

एकदम मारूँ घुटना फूटे आँख टाइप की बात की हेगी आपने। आपके गले की कसम के रए हैं कि हमें जा में एक भी मिसरो... समज में नहीं पड़ो हेगो। काय के हम भौजाई बाले मिसरे को समझने की कोसिस किए थे, पर दो बार कोसिस करने के बाद हमाए अंदर कछु-कछु होने लगो। हमें पेले तो समझ में नहीं आई कि का हो रओ है, पर बाद में पतो चलो कि कोई भी भोत बुरी बात पे हमाए अंदर एकदम सिलबिलाहट सी होने लगती हेगी। जे हमें बचपन से ही होतो हेगो। भिल्कुल बैसी ही फीलिंग आ रही हती जेसी बचपन में चंकी पांडे की पिक्चर देखते समय आती हती। हम आपको कम्परीजन चंकी पांडे से नहीं कर रहेग हेंगे, बुरो मत मानियो दद्दा आपकी जे गजल तो चंकी की पिक्चर से भी बुरी है। आपकी गजल सुनने के बाद तो हम चंकी को आस्कर दे सकत हैं।
सूचना – सीहोर के प्रधानमंत्री श्री भभ्भड़ कवि भौंचक्के बताय रहे कि कोरोना के लिए कोई बैक्सीन-फैक्सीन की झरूरत नहीं हेगी। बस उनकी गजलें लाउड सपीकर पे झोर-झोर से बजाई जाएँ, कोरोना का भायरस सुन के ही खतम हो जाएगो। सूचना एकदम खल्लास भई। धागी नाकि तक धिन....

तिलकराज कपूर
पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में। भोत ही सानदार टाइप की लग रही हो आप जा डिरेस में। सब एक बात हम जो बचपन से जाना चाय रहे हेंगे, बो बात हमको बता दो कि जा गाने में जो बार-बार बोलते हेंगे हिल्लोरी, हिलो री, हिलो, हिलो री, बा को मतलब का हेगो। काय के बचपन में पेले तो हम जा समझत रय कि जा को मतलब गिल्लोरी है, पान की गिल्लोरी। पर बाद में हमाए मूढ़ में जा बात आई कि गिल्लौरी तक तो ठीक है, पर बाद में गिलो, गिलो री का का मतलब हो सकते हैं। फिर हमें लगा कि कोई दही बिलोने बाली लडक़ी बिल्लोरी है जिससे कोई कह रओ है कि बिल्लोरी, बिलो री, बिलो बिलो री। आप सच्ची बता दो कि असल बात क्या है। और हाँ सुनो एक बात, कल तलक जिसे मैदान पर एक तिनका भी नहीं दिख रओ हतो, भाँ पे जे सुनहरी घास कहाँ से लहलहा गई। चलो छोड़ो सब बातें और पेलो अपनी गज़ल
याद है क्या आज तुमको भी वही होली
वो छुअन पहली लिये, मस्ती भरी होली।
पूछ मत क्या हाल था उस पल मेरे दिल का
जब सजी तेरे बदन रंगों भरी होली।
जानता था कौन ऐसे दिन भी आएंगे
बंद कमरों में मनाएंगे सभी होली।
दर्द गहरा और मेरा वायदा तुमसे
तुम नहीं तो हो नहीं सकती मेरी होली।
दीप से पूछो नहीं क्या आग है दिल में
खुद करो महसूस इक जलती हुई होली।
उत्सवी उल्लास का हक़ है इसे लेकिन
काश् मेरे दिल के अंदर झांकती होली।
राह में आंखें बिछी हैं, तुम नहीं आये
"फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली"

ओ मोरे दद्दा जो का कर दओ तुमने ? जे होली है कि मोहर्रम है ? इत्ती रोने धोने बाली गजल। सबसे से पहले सब लोग-लुगाइन को सूचीत करो जातो है कि सब टिसू पेपर साथ में लेकर जा गजल को पढ़ें। काय कि बाद में हमाई कोई जिम्मेदारी नहीं है कि अगर कोई ने बोलो कि आँसुअन से हमारी साड़ी खराब हो गई जा गजल को सुन के। सुनो दद्दा जा उमर में तो हम पेली बार सुन रए हैं कि कोउ का जा उमर में भी दिल टूट सकत है। अभी तक तो हमने जवानी को ही सुनो है कि टूटने-फूटने को सारो काम जवानी में ही होत है। और तुम पे तो जवानी देस के आझाद होने से दस साल पेले आई थी और ता करके चली गई थी। सच्ची बताओ जे ऐसी गजल लिखबे के पीछे को असली कारण का हेगो। दर्द, काश, बंद, जे सब जो तुमने सबद लिए हैं न जे होली के दिन परतिबंधित होते हैंगे। भोत बुरी गजल।
सूचना- सड़ीमान राकेस खंड-खंडबाल जी, जो हर साल में दो ही बार नहाते हेंगे, होली पर और दीवाली पर, उनकी दीवाली के बाद से नहीं उतारी गई बनियान के मास्क बनाए जा रहे हेंगे। जे मास्क से कोरोना, सुवाइन फ़्लू, सबके भाईरस सौ मीटर दूर ही मर जाते हेंगे। एक बनियान में बस बीस मास्क बन रए हैं, जा कारण भोत महँगे हैं मास्क। सूचना एकदम्मे समापत हो चुकी हेगी। निकल लो सब। धा धिन धिन धा। 

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
सबसे पेले तो जे बताओ कि जे कोन सी डिरेस पेनी है तुमने। नीचे से आदमी और ऊपर से महिला। जे बात बिलकुल भी बरदास्त नहीं की जाएगी। और एक बात तो जे भी पूछनी हती कि हमने तो देखों तो कि एकदम सपाट मैदान हतो, फिर जे तुमाए माथे पर एकदम से इत्ते काली घनी जुल्फें टाइप की काँ से आ गईं। और सबसे बड़ी बात जे हेगी कि जे रंग जो तुमने चुनरी के नाम पे हाथ में ले रखो है, जे रंग अब पोल्टीक्स को रंग हेगो। झाँ पे कोऊ को भी पोल्टीक्स करनो अलाउ नहीं हेगो। बस हम चाय जित्ती पोल्टीकस कर सकते हैं। और तुमने अपनी उमर देखी है ? जा उमर में नाचने गाने से कमर को कोउ गुरिया सरक गओ, तो बैठे-बैठे मंदिर में माला को गुरिया सरकनो पड़ेगो। जो ठुमका लगानी की उमर नहीं हेगी, आराम से बैठो और गजल सुनाओ।
पर्वों में सब से सुहानी आ गयी होली,
फागुनी रस में नहाई आ गयी होली।
टेसुओं की ले के लाली आ गयी होली,
रंग बिखराती बसंती आ गयी होली।
देखिए अमराइयों में कोयलों के संग,
मंजरी की ओढ़ चुनरी आ गयी होली।
चंग की थापों से गुंजित फाग की धुन में,
होलियारों की ले टोली आ गयी होली।
दूर जो परदेश में हैं उनके भावों में,
याद अपनों की जगाती आ गयी होली।
होलिका के संग सारे हम जला कर भेद,
भंग पी लें देश-हित की आ गयी होली।
एकता के सूत्र में बँध हम 'नमन' झूमें,
प्रीत की अनुभूति देती आ गयी होली।

अभी हमने जे कुछ जो अपने सुनाओ है, जे हमने अमित आह अंकल को भेज दओ हेगो, कि जे दद्दा भी हर किछु के रए हेंगे, इनकी सरकार गिरा दो। काय कि कछु तो समझ में पड़े कि धोती है कि पजामा है। जा में तो कछु भी नहीं हेगा। हमें तो जे ही बात सिमझ में नहीं आ रही हेगी कि जे मंजरी, गुंजित, सूत्र, बसंती, जे सब को मतलब का हेगो ? सुनो दद्दा गजल केनी हती, कोउ मौसम को हाल नहीं सुनानो हतो, कि आज फलाँ जगे पे बरसात होगी, ने फलाँ जगे पे ओले पड़ेंगे। सुनो दद्दा एक काम करो, सबसे पेले तो तुम किसी टीवी पे चले जाओ, भाँ पे मौसम को हाल सुनाते रहियो। भाँ पे बोलना जा के कि आज दिल्ली में मौसम मंजरी की ओढ़ चुनरी रहबे बालो है और मुम्बई में किछु-किछु प्रीत की अनुभूति रहबे बाली है। सच्ची के रए हैं दद्दा तुमाई खुपरिया के एक-एक बाल सरोता उखाड़ के ले जाएँगे। का ...? बाल हैं ही नहीं खुपरिया पे ? बच गए फिर तो तुम।
सूचना- जा बार होलीका दहन के लिए कोई भी पूर्णिमा के चाँद को इंतेजार नहीं करे। काय के जा बारी सरकार ने कोरोना के कारण अलग से भ्यभस्था की हेगी। भोत ही कुख्यात सायर तिलकराज कपूर की खुपरिया को लाइव दिखाया जायगा, देख के सब लोग होलिका दहन कर सकते हैं। अब जे बात अलग से केनी पड़ेगी कि सूचना एकदम फिनिस हो चुकी है। निकल्लो सब। धा तिरकिट धा।

मन्सूर अली हाश्मी
ओ रे मोरे राम जी, जे क्या हाल बना रखो है तुमने ? तुमाई तो खूबइ घनेरी सुफेद कलर दाढ़ी हती, काँ गई । का मोई जी को दे दई तुमने अपनी दाढ़ी? काय के रंग तो एकदम तुमाई दाढ़ी जैसो ही है मोई जी की दाढ़ा को भी। कित्ते में दी दाढ़ी तुमने ? हमें झल्दी से बताओ नहीं तो हम सबको बता देंगे कि मोई ने हसमिया की दाढ़ी के बाल खरीद के इस्टाइल बनाई है। और बदले में हसमिया को असमिया का मुखमनन्तरी बनाबे को कोई अंदर ही अंदर समझौता कर लओ है। एक दद्दा जे करने से पेले तुमने जरा भी नहीं सोची कि बिना दाढ़ी के तुम केसे लगोगे। सही करो है तुमने जो अब भाभीजी की रिदा पेन ली है, काय के तुम अब इसी के ही लायक बचे हो। का के रए हो ? मोई जी बंगाल के बाद भापस कर देंगे तुमाई दाढ़ी ? काय मजाक कर रए हो, मोई जी और वापस करेंगे ? भोत बड़ी ग़लतफैमिली हो रही है तुमको। चलो हमें क्या है, गजल सुनाओ तुम तो।
'कोरोना' के हमक़दम ही चल रही होली
गुज़रे बारह मास लो फिर आ गयी होली
रंज पर, ग़म पर अलम पर छा गयी होली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली
ऑनलाइन ले के पिचकारी खड़े बालम
बिन गुलालो रंग यह कैसी सखी होली
लकड़ी जल कोयला भयी, न ही उससे राख
इस तरह भी मन रही वर्च्युअली होली!
नफ़रतों को छोड़ अब हो जाओं इक रंग में
दिल मिलाने के लिये अब आ गयी होली
थे गधे बदनाम अबकि बार यह देखा
गाली की बौछार में खेली गधी होली* (*सियासी मैदान में )
'हाश्मी' लिखता रहा है तू हज़ल हर दम
चुप है क्युं हंगामा करती आ गयी होली
चार लाईना:
पूछा जब क़ाज़ी ने उसने झट से हाँ कर दी
मैं तो उसका था ही अब वह भी मेरी हो ली
चुलबुलापन, शौख़ी, मस्ती सब हुए काफ़ूर
लाज का मतलब जो समझाया बड़ी हो ली!

सुनो पेले तो एक बात हमारी, जे तुम केते हो न कि हमने जे हजल लिखी है, तो सबसे पेले तो अपनी ये वाली गलतफैमिली भी दूर कर लो कि जा के एक मिसरे पर भी किसी को हँसी तो छोड़ो छोटी सी तबस्सुम भी आई हो। हाँ जे बात एकदम पक्की है कि एक-एक मिसरे पर सब लोग-लुगाइन फूट-फूट के रोबे लगे थे। कछु तो इत्ते इमोसनल हो गए कि उनको इमोशनल कंट्रोल करबे के लाने अलग से टीको लगबानो पड़ो। अब सुनो हमाई एक बात, तुम आगे से जा को नाम हजल मत रखियो, जा को नाम रखियो रुअल। और सुनो एक बात कान में, कोउ से जे मत कहियो कि जे हमने हँसी की गजल लिखी है, सबसे कहियो कि जे रुअल है, जो भी सुनेगो बो फूट-फूट के रोबे लगेगो। अब जे बात तो तुम्को और हमको पता है न कि असल में तो हँसने के लिए लिखी थी। लोग-लुगाइन को कौन पतो है। लोग रोएँगे और तुमको पक्की में जा बार को खाँसकर पुरस्कार मिल जाएगो।
सूचना- जा बार को होली को #@##@ पुरस्कार अगर आपको प्रापत करनो है, तो आपको ऊपर दी गई हजल को पढ़ कर हँस कर आभश्यक रूप से दिखाना है। जो भी हँसने की कोसिस करेगा उसको हशमिया हासपीटल में एकदम्मे फ्री में टीका लगवाया जाएगा। अब क्या लिख के दें कि सूचना समाप्त हो चुकी है, चलो भाई काम करने दो। अटक-अटक झटपट पनघट पर।

निर्मल सिद्धू
ओरी मोरी मैया, जो का कर रही आप ? सच्ची बात हेगी कि जा माइक बोई माइक है जिससे कल रात को राकेश खंड-खंडबाल ने पूरी रात गीत पेल-पेल के सारे सरोता मार डाले और आप अकेली इसलिए बच गईं कि आप बहरी हतीं। पर जा बात पर इत्तो डिपरेशन करने की का झरूरत हेगी। हो जातो है ऐसो कभी-कभी। इसमें सूसाइड करने की कोनो बात नहीं है। आप सुन नहीं पाईं जा कारणे से आप बच गईं, जो सुन सकते थे, बे सब निकल लिये। आप बिलकुल भी इस बात को अपने हिरदय पर मत लीजिए, हम अगली बार आपके लिए भी पूरी भ्यभस्था कर रहे हेंगे, अगली बार होली पर खंड-खंडबाल जी साइन लैंगुएज मतलब मूक-बधिरों वाली भाषा में पूरी रात अपने गीत सुनाएँगे। मल्लब जे कि अगली बार आपके भी पूरे चाँस है, सुअर्ग के दरसन करने के। एक साल इंतेजार कर लीजिए और आप तो गजल सुनाइये अपनी पेले।
गीत ख़ुशियों के सुनाती आ गई होली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
हर अदा हो ली रंगीली आ गई होली
भींगे कुर्ता भींगे चोली आ गई होली
बिन पिये मदहोशियों का दौर है यारा
हो चले सारे शराबी आ गई होली
रंग सपनों में भरे उसने मुहब्बत के
हाथ पे धर हाथ बोली आ गई होली
चाल मद्धम हो चली है ज़िन्दगी की अब
जोश उसमे फिर जगाती आ गई होली
दौर ये कुछ ख़ास 'निर्मल' हो भले ना पर
प्यार के मोती लुटाती आ गई होली

एक बात सुनो दद्दा, सबसे पेले तो हमाई एक बात को अपनी सर्ट में गठान बाँध के रख लो। जब भी कभी ग़जल लिखो तो सिर पर टोपी पहन कर लिखा करो। हमाई पूरी बात तो सुनो बाद में घुस्सा हो लेना गाली बक देना। हम जे कहना चाह रहे हैं कि जे तुमाई गजलों में जो भाव की कमी पड़ जाती है न उसके लिए भोत जरूरी है कि सिर पर टोपी लगा कर गजल लिखी जाए। काय ? उसके पीछे कारण जे हेगा कि भाव तो भोत आते हैं, पर एकदम सिलपट्टी खुपरिया पे से खिसल जाते हैं और गजल तक पहुँच ही नहीं पाते हैं, जा के लाने ही हमने तुमसे कही है कि जब भी गजल लिखो तो सबसे पहले सिर पर टोपी पेन लो। बा से का होगा कि जब भिचार आएगा, भाव आएगा तो चिकनी जगे पे खिसलेगा नहीं, और टोपी के कारण हिलग जाएगा, जैसे कटी पतंग पेड़ पर हिलगी रहती है। बस भहीं से भिचार को उठा के अपनी गजल में पेल देना। लाख टके की बात मुफत में बता दी है तुमको।
सूचना- पिछौती वाली बीड़ के परसोत्तम को छोटो लड़को छोटोमल अपने पास के खेत में सिर के बल खड़ो पाओ गओ है, गुपत सूचना से पराप्त जानकारी के अनुसार बाने कोई डाली मोगरे की नाम की किताब पूरी पड़ ली थी, जा के कारण बाकी खुपरिया फिर गई और बाको सब किछु उल्टो दिखाई दे रहो है। फूलिस ने किताब जपत कर ली हेगी। और.... ? का पूरा दिन सूचना ही सुनाते रेंगे हम ? चलो भाई पच्चीस झूठ हमसे बुलवा रहे हो। ता थैया, ता थैया हो।

संजय दानी
दिल चीज क्या है आप ज़रा पान लीजिए। हमें सबसे पेले तो जे बात बताई जाए कि जब सारी तरफ कोरोना हो रओ है तो आप जे का कर रही हेंगी। इत्ता सज धज के बैठने पर 27 मार्च की रात बारह बजे से रोक लग गई है। रोक लगने को कारण जे हेगा कि कोरोना को भाइरस भोत ही अलग तरे को हेगो। जा को कोई भरोसो नहीं है। इत्तो सारो सोनो-चाँदी देख के बाको दिल भी खराब हो सके है। और दूसरी बात जे हेगी कि आप जैसी इत्ती ज्यादा सुंदर सन्नारियों को इत्ता सारा मेकअप करने पर एकदम परतिबंध ही लग चुका है। काय कि कोरोना का दिल गहने पर न आ के आप पे ही आ गया तो भोत गजब हो जाएगा। फिर तो उसको धरती से भगाना एकदम्मे असंभव हो जाएगा। तो हमाई बात सुनिये कोरोना के भाइरस से दो गज की दूरी बनाए रखिये, बाकी तो आप की बुद्धि के बारे में दुनिया को सब पता ही हेगा।
सखियों स्वागत करना घर आई है हमजोली
फ़ागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
डूबी मस्ती में वतन की हर फ़िज़ा ऐसी
मेरे वाली ने भी बोली प्यार की बोली
इस तरह का है नशा त्यौहार का दानी
आज वह बेदर्द लड़की भी मेरी हो ली
ना चली गोली न दहशत गर्दी हो पायी
हिन्द में मानवता ने अपनी ज़ुबां तौली
जात मज़हब की रिवायत टूटने को है,
हिन्दू मुस्लिम नाचेंगे यारो बना टोली
दुश्मनी की बात सारी ख़त्म हो मौला
प्यार से सरहद की भर दे आज हर झोली

सुनो तो दद्दा, जा जो आपकी गजल है, जे एकदम ऐसी लग रइ है, जैसे किचिन में रखा हुआ मसाले का डिब्बा हो। बा में सब तरे के मसाले छोटी-छोटी कटोरियन में रखे रेते हैं न, बैसे ही आपने भी भोत सारे मिसरों को एक गजल के डब्बे में बंद कर दिया है। कोई मिसरा एकदम धनिये जैसा है तो कोई एकदम हल्दी जैसा, कोई मिर्ची जैसा। पर दद्दा एक बात तो बताओ आप डाकटर हो तो क्या आपको मिसरे में काफिया सरकाने की कला भी आती है ऑपरेशन कर के। काय के हमने तो काफिया दो इंच पीछे दिया था, आपने उसका ऑपरेशन कर उसे खिसका कर एकदम अंत में कर दिया। और एक बात हम आपको बता रय हैं, आप डाकटर हो सो हमाई बात को धियान से सुन लो। आपके पास वो हुनर है कि आप मरीज को बिना दवाई के बस अपनी गजल सुना कर ही ठीक कर सकते हो। कैसे ? वो ऐसे कि मरीज को बिसवास हो जाएगा कि उसकी बीमारी से भी भयानक कोई चीज है दुनिया में और वो कानफीडेनस में ही ठीक हो जाएगा। नहीं डाकसाब ये गाली तो आपने पिछली होली पर दी थी, इस बार तो कोई नई दो।
सूचना- भभ्भड़ कवि भौंचक्के ने घोसना की है कि जो लोग-लुगाइन इस बार मुसायरे में नहीं आए हेंगे, उनके नाम से बुरी-बुरी गजलें वो खुद लिख कर लगाएँगे। कौन बोला कि भभ्भड़ को अलग से बुरी लिखने की झरूरत नहीं है ? अच्छा ? जो बोला उसके नाम से इस्पेसल लिखेंगे। सूचना समापत भई, झिगिटाटा, थो थुडंग धिग धा।


अब हमाओ कपाल बुरी तरे से पिरा रओ है। कोउ भी हमसे कछु भी बात न करे। इत्ती बुरी-बुरी चीजें झेली हैं हमने कि हमाई होली तो एकदम डिस्पीरीन हो गई है। आप सब लोग लुगाइन के बस की हो तो आप दाद दे लो इन पे, हमाए तो बस की भिलकुल नहीं हेगी। तो आपसे बन पड़ तो दाद दे लो नहीं तो चुपचाप से साँस खींच के बैठे रहो, काय कि जे जो ऊपर सब किछु है जे तो कोरोना से भी भोत ज्यादा खतरनाक है। काय कि कोरोना का तो टीका आ भी गया है पर इन सब का कोई टीका नहीं है। आप सब से हाथ जोड़कर पिरारथना है कि आप अपनी-अपनी जान की रक्षा खुद ही करें। जो लोग एकाध रचना सुन लें वो दिल पर तो बिलकुल ही नहीं लें इन सबको। कभी-कभी हो जाता है ऐसा। एकदम साँस रोक के पड़े रहें जैसे जंगल में रीछ आने पर करते हैँ। बाकी हमने तो सलाह दे दी मानना नहीं मानना तो आपके हाथ में है। जै राम जी की। और हाँ होली की सुभकामनाएँ आप सब लोग लुगाइयन को।
बाक़ी बची हुई गजलें बासी होली में प्रस्तुत की जाएँगी।




बुधवार, 17 मार्च 2021

होली में बस अब कुछ ही दिन रह गए हैं तो आइये आज होली के तरही मुशायरे का मिसरा जानते हैं और उस पर बात करते हैं।

दोस्तो, ये सच है कि पिछला साल बहुत कठिन गुज़रा और अभी यह साल भी  उन्हीं परेशानियों से भरा हुआ है। कोरोना का ख़तरा एक बार फिर से मंडरा रहा है। गर्मी आते ही यह और बढ़ेगा। ऐसे में बहुत सावधानी रखिये और सेनेटाइज़र तथा मास्क का उपयोग करते रहिए। लापरवाही मत बरतिये।

होली के अवसर पर तरही मुशायरे का मिसरा देने में इस बार कुछ देर हो गई है। हालाँकि अभी भी दस दिन बचे हैं और इतने दिन में तो आप सब कमाल कर ही सकते हैं।

तो आइये जानते हैं इस बार के तरही मिसरे के बारे में।

फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

2122-2122-2122-2

फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फा

बहुत आसान सी बहर है।

इस बार इस मिसरे में आपके पास दो च्वाइस हैं क़ाफ़िया को लेकर। आप दो प्रकार से इस मिसरे को बाँध सकते हैं।

1 या तो आप रदीफ़ ले सकते हैं ‘आ गयी होली’ इस स्थिति में क़ाफ़िया होगा ‘डूबी’ में आई हुई ‘ई’ की मात्रा।

2 या आप रदीफ़ ले सकते हैं केवल ‘होली’ मतलब क़ाफ़िया रहेगा तो वही ‘ई’ की मात्रा, मगर वह ‘डूबी’ के स्थान पर ‘गयी’ का होगा।

यह केवल आपकी सुविधा के लिए है। कई बार ऐसा होता है कि हम थोड़ा उलझ जाते हैं। हम चाहते हैं कि क़ाफ़िया 22 के स्थान 12 होता तो कैसा अच्छा होता। बस इसीलिए आपके पास दोनों सुविधा हैं चाहे तो आप 22 ‘डूबी’  का उपयोग करें या फिर 12 ‘गयी’  का उपयोग करेँ। 

पहला उदाहरण ‘फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली’ पर एक मतले के रूप में, रदीफ़- ‘आ गयी होली’, क़ाफ़िया- ‘डूबी’ में आई हुई ‘ई’

रंग के बादल (उड़ाती) (आ गयी होली)

ले के हुरियारों की (टोली) (आ गयी होली)

क़ाफ़िया – टोली, बोली, बैठी, सच्ची, उड़ाती, बहाती, जगमगाती, खिलखिलाती, शादमानी, आसमानी

मतलब यह कि आपके पास 22, 122, 2122, आदि वज़न के शब्द लेने का ऑप्शन है।

दूसरा उदाहरण ‘फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली’ पर एक मतले के रूप में, रदीफ़- ‘होली’, क़ाफ़िया- ‘गयी’ में आई हुई ‘ई’  

रंग और ख़ुशबू की है जैसे (नदी) (होली)

सबके चेहरे खिल उठे लाई (हँसी) (होली)

क़ाफ़िया – नदी, हँसी, ख़ुशी, चाँदनी, रौशनी, मिली, खिली,

मतलब यह कि आपके पास 12, 212, 2212 जैसे क़ाफ़िये लेने का ऑप्शन है।

तो इंतज़ार किस बात का ? शुरू कर दीजिए ग़ज़ल पर काम और भेज दीजिए लिख कर।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 5, अंक : 20, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2021 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी, संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक, शहरयार, सह संपादक शैलेन्द्र शरण, पारुल सिंह के संपादन में शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 5, अंक : 20, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2021 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता / भगवत रावत, आवरण चित्र / पंकज सुबीर, संपादकीय / शहरयार,  व्यंग्य चित्र / काजल कुमार । पुस्तक समीक्षा- निमुँहा गाँव (कहानी संग्रह), डॉ. नीलोत्पल रमेश / जयनंदन, डांग (उपन्यास), नंद भारद्वाज / हरिराम मीणा, वैश्विक प्रेम कहानियाँ (कहानी संकलन)- दीपक गिरकर / सुधा ओम ढींगरा, भूरी आँखें घुँघराले बाल (कहानी संग्रह)- रमेश शर्मा / अनुपमा तिवाड़ी, स्ट्राइक 2.0 (व्यंग्य संग्रह)- कैलाश मण्डलेकर / राजशेखर चौबे, कोरोना काल की दंश कथाएँ (निबंध संग्रह)- दीपक गिरकर / अजय बोकिल, साक्षात्कारों के आईने में (साक्षात्कार संग्रह)- दीपक गिरकर / डॉ. रेनू यादव, हिन्दी साहित्य और सिनेमा : रूपांतरण के आयाम (आलोचना)- अनिल गोयल / डॉ. विजय कुमार मिश्र, खिड़कियों से झाँकती आँखें (कहानी संग्रह)- भारती पाठक / सुधा ओम ढींगरा, मेरे गाँव का पोखरा (कविता संग्रह)- नीरज नीर / डॉ. नीलोत्पल रमेश, माँ के लिये (कविता संग्रह)- पूनम मनु / हेमधर शर्मा, सच कुछ और था (कहानी संग्रह)- मधूलिका श्रीवास्तव / सुधा ओम ढींगरा, समस्या का पंजीकरण व अन्य व्यंग्य (व्यंग्य संग्रह)- कैलाश मंडलेकर / विवेक रंजन श्रीवास्तव, प्रेम में पड़े रहना (कविता संग्रह)- डॉ. नीलोत्पल रमेश / रंजीता सिंह फलक, कविता का जनपक्ष (आलोचना)- रमेश खत्री  / शैलेंद्र चौहान, सिर्फ़ स्थगित होते हैं युद्ध (कविता संग्रह)- डॉ. शशिप्रभा / प्रभा मुजुमदार। केन्द्र में पुस्तक- अटकन-चटकन (उपन्यास)- डॉ. ज्योतिष जोशी, राजीव तनेजा, सलिल वर्मा, डॉ. अभिलाषा द्विवेदी / वंदना अवस्थी दुबे, प्रेम (कहानी संग्रह)- दीपक गिरकर, डॉ. सीमा शर्मा, मीरा गोयल / पंकज सुबीर 51। पुस्तक चर्चा- वो 17 दिन (पत्रकारिता)- राजेश बादल / ब्रजेश राजपूत, शब्द गूँज (कविता संग्रह)- रमाकांत नीलकंठ / अरुण सातले, मैं किन सपनों की बात करूँ (नवगीत संग्रह)- श्रीराम परिहार / श्याम सुन्दर तिवारी, काग भुसण्ड (व्यंग्य उपन्यास)- अंजू शर्मा / राजीव तनेजा, नज़रबट्टू (कहानी संग्रह)- निधि प्रीतेश जैन / ज्योति जैन,
कासे कहूँ (कविता संग्रह)- पंकज त्रिवेदी / विश्व मोहन, पंचामृत (संस्मरण)- अमिताभ मिश्र / अश्विनी कुमार दुबे, नक्कारख़ाने की उम्मीदें (कविता संग्रह)- पुरुषोत्तम दुबे / संतोष सुपेकर, जाएँ तो जाएँ कहाँ (कहानी संग्रह)- डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव / सागर सियालकोटी। नई पुस्तक - पंकज सुबीर की कहानियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन (शोध)- दिनेश कुमार पाल, अपराजिता (उपन्यास)- श्रद्धा जोशी, समकालीनों से संवाद (साक्षात्कार, संस्मरण)- विजय बहादुर सिंह, एक कम साठ राजुरकर राज (जीवनी)- रामराव वामनकर, मीडिया का मायाजाल (पत्रकारिता)- लेखक : डॉ. मुकेश कुमार, रिश्ते (कहानी संग्रह)- पंकज सुबीर। शोध- सारांश- स्त्री पाठ : दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता- (पंकज सुबीर की कहानी 'दो एकांत')- दिनेश कुमार पाल। एकाग्र- नैसर्गिक करुणा, आक्रोश, इंकार और मनुष्यतापूर्ण ज़िद की कलम: राकेश कबीर- भरत प्रसाद। डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
ऑन लाइन पढ़ें-    
https://www.slideshare.net/shivnaprakashan/shivna-sahityiki-january-march-2021
https://issuu.com/shivnaprakashan/docs/shivna_sahityiki_january_march_2021
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सोमवार, 18 जनवरी 2021

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका के वर्ष : 5, अंक : 20, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2021 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका के वर्ष : 5, अंक : 20, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2021 अंक का वेब संस्करण अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं-  संपादकीय, कथा कहानी - जहाँ हवाओं की पीठ पर छाले हैं!! - अनघ शर्मा, सपने का वादा - पुष्पा सक्सेना, देहरी छुड़ाई - रमेश खत्री, अनकहा कुछ - अरुणा सब्बरवाल, मन का कोना - नीलिमा शर्मा, मुझे विपुला नहीं बनना - अभिज्ञात, महकती मुहब्बतों के मौसम - डॉ. गरिमा संजय दुबे, घायल पंखों की उड़ान - अर्चना मिश्र, चन्नर के बहाने से - विनय कुमार, यही ठीक होगा - डॉ. अनिता चौहान, फूलों के आलते में रेत की दीवार - डॉ. उपमा शर्मा। लघुकथाएँ - मधुर मिलन - डॉ. पुष्पलता, महिलाओं का जुगाड़
मीरा गोयल, इतिहास - डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज। भाषांतर - कैडिटे मकल  (जंगल की बेटी) - मलयालम कहानी - डॉ. अम्बिकासुतन मंडाग, अनुवाद-डॉ. षीणा ईप्पन। आलेख - रचना और आलोचना का आपसी रिश्ता- नंद भारद्वाज, हम शब्दों के ऋणी हैं- डॉ.शोभा जैन। व्यंग्य- एक भेंट मंत्री जी से - डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, कैसे हो - बढ़िया हूँ- अखतर अली। शहरों की रूह - कलकत्ता उर्फ़ कोलकाता - पल्लवी त्रिवेदी, शार्लोट एक घरेलू मेट्रो सिटी - रेखा भाटिया। निबंध- आधी रात का चिंतन- डॉ. वंदना मुकेश। लिप्यांतरण - भूबल (उर्दू लघुकथा), नीलम अहमद बशीर, लिप्यांतरण- डॉ. अफ़रोज़ ताज। कविताएँ - वसंत सकरगाए, श्रीविलास सिंह, नरेंद्र नागदेव, अनामिका अनु, नमिता गुप्ता "मनसी"। ग़ज़ल- दीपक शर्मा 'दीप'। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- वेदांश मिश्रा, रेखाचित्र - रोहित प्रसाद , डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी,  शहरयार अमजद ख़ान,  सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
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