मंगलवार, 8 नवंबर 2022

आज भभ्भड़ कवि 'भौंचक्के'की एक मुसलसल घटिया ग़ज़ल के साथ हम समापन करते हैं दीपावली 2022 के तरही मुशायरे का।

तो दोस्तो आज हम  तरही मुशायरे के आख़िरी पड़ाव पर आ गए हैं। आज कार्तिक पूर्णिमा है आज प्रकाश पर्व है, आज गुरुनानक जयंती है, तो आज हम पन्द्रह दिवसीय प्रकाश पर्व का समापन करने जा रहे हैं। दीपावली से आज पूर्णिमा तक पूरा पखवाड़ा प्रकाश को समर्पित रहा है। बहुत अच्छा मुशायरा रहा और बहुत सुंदर रचनाएँ पढ़ने को मिली हैं। 

क़ुमकुमे यूँ जल उठेंगे, नूर के त्यौहार में
आज भभ्भड़ कवि 'भौंचक्के'की एक मुसलसल घटिया ग़ज़ल के साथ हम समापन करते हैं दीपावली 2022 के तरही मुशायरे का।

भभ्भड़ कवि 'भौंचक्के'
कल घटा था दिन-दहाड़े और कुछ बाज़ार में
पर छपा है और ही कुछ आज के अख़बार में
कुछ नहीं रक्खा सुनो ! इस व्यर्थ हाहाकार में
स्वर्ग का आनंद है राजा की जय-जयकार में

हो गया अपराध कितना ही बड़ा तो क्या हुआ
सर झुका कर बैठ जाओ शाह के दरबार में
हम ही बहरे हैं जो हमको कुछ सुनाता ही नहीं
कह रहे हैं लोग डंका बज रहा संसार में

भूख, बेकारी, ग़रीबी, कुछ नहीं आता नज़र
आजकल खोए हैं सारे कलयुगी अवतार में
सीधी, तिरछी, ढाई घर, हर चाल चल लेता है वो
गुण हैं राजा से अधिक उसके सिपहसालार में

जो मुख़ालिफ़ आपके हैं, मूर्ख हैं कमबख़्त सब
इन दीवानों को है सुख मिलता रसन और दार में
ख़ानदान अपने को अब के कैसा ये मुखिया मिला
आग लगवा दी है जिसने पुरखों के कोठार में

आप से पहले हुकूमत थी ही कब कोई यहाँ
जाने किसने लिख दिया इतिहास सब बेकार में
उफ़! ये राजा, उफ़! ये मंत्री, क्या छटा दरबार की
"क़ुमक़ुमे ज्यों जल रहे हों नूर के त्योहार में"

कुछ घृणा की नागफनियाँ, केक्टस अलगाव के
आपके स्वागत में गूँथे हैं ये बंदनवार में
सीबीआई, ईवीएम, ईडी, ज्यूडिशरी, आईटी
जान हर तोते की है महाराज के अधिकार में

जब क़बीले से कहा सरदार ने- 'आभार हो'
बिछ गई सारी प्रजा कालीन बन आभार में
वो ही हैं अब पक्ष भी और वो ही हैं प्रतिपक्ष भी
अब नहीं है भेद कुछ भी जीत में और हार में

फिर 'सुबीर' इस शह्र में बाग़ी नहीं होगा कोई
गोलियाँ पड़ जाएँगी जिस दिन यहाँ दो-चार में
 
तो यह है भभ्भड़ कवि की ग़ज़ल, आप कह सकते हैं कि यह तो पन्द्रह दिन से खाए जा रहे सुस्वादु भोजन के बाद कंकर वाली दाल की तरह है। ख़ैर झेल लीजिए इसे और गालियाँ भभ्भड़ को व्हाट्सएप से भेज दीजिए। मिलते हैं अगले मुशायरे में, तब तक, जय जय।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

आइए आज बासी दीपावली का आयोजन करते हैं दो गुणी रचनाकारों राकेश खंडेलवाल जी और रेखा भाटिया जी की बहुत सुंदर रचनाओं के साथ।

बासी दीपावली जारी है, बीच में स्वास्थ्य की गड़बड़ी के कारण के अंक लगने में कुछ विलंब हुआ हालाँकि बस दो ही रचनाएँ बाक़ी रह गई थीं। लेकिन हमारे यहाँ तो इस ब्लॉग पर परंपरा रही है कि हम धनतेरस से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक दीपावली का त्योहार मनाते हैं। आज देव प्रबोधिनी एकादशी है तो आइए आज हम दो रचनाकारों के साथ यह एकादशी पर्व मनाते हैं। इसके बाद शायद संभव हुआ तो कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भभ्भड़ कवि भौंचक्के आ सकते हैं।
क़ुमकुमे यूँ जल उठेंगे, नूर के त्यौहार में
आइए आज बासी दीपावली का आयोजन करते हैं दो गुणी रचनाकारों राकेश खंडेलवाल जी और रेखा भाटिया जी की बहुत सुंदर रचनाओं के साथ।



राकेश खंडेलवाल

फिर दुशासन ने हरा है चीर भोली द्रोपदी का
और पूतिन हो रहा हिटलर सदी इक्कीसवीं का
बढ़ रही है नारियों पर बंदिशें ईरान में यूँ
कह ख़ुदा का हुक्म है लिक्खा हुआ कुरआन में ज्यूँ
उठ रही संकीर्णता की लहर अमरीकी गली में
भूल कर डालर सिमटते जा रहे इक पावली में
प्रश्न करता मन, खबर पढ़ आज के अख़बार में
कुमकुमे कैसे जलेंगे नूर के त्योहार में


धैर्य तज कर हो रहा वातावरण पूरा प्रकोपित
पंचवटियों से जहां थे वन रहे होकर सुशोभित
आज की इस सभ्यता के नाम ने सब ही मिटाए
भूमि, जल, आकाश के सब संतुलन खुद ही हटाए
क़हर ढाते हैं समंदर में उठे तूफ़ान नित ही
खा रहे ठोकर बदलते आचरण ना किंतु फिर भी
क्रांति आएगी कभी जब आपके व्यवहार में
कुमकमे तब ही जलेंगे नूर के त्योहार में

द्वार पर जब एक दीपक तुम जला कर के धरो
इक किरण यूक्रेन के भी नाम की शामिल करो
इक किरण पर नाम हो महसा अमीनो का लिखा
इक किरण जिसने सदा सम्मान नारी का करा
ज्योति जागेगी यहाँ वैचारिकी आचार में
और गति आ जाएगी जब मानवी सत्कार में
तब सही होगी दीवाली पूर्ण इस संसार में
कुमकुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में

अपने समय पर नज़र रखना ही किसी रचनाकार का सबसे बड़ा दायित्व होता है तथा इस गीत में पुतिन तथा हिटलर की तुलना करते हुए राकेश जी ने उसी दायित्व निर्वाह का संकेत दिया है। दुनिया भर में जो सवाल इस समय परेशान किए हुए हैं उन सब को जगह देते हुए पूछा है कि क़ुमक़ुमे कैसे जलेंगे नूर के त्योहार में। और उसके बाद अगले ही बंद में पर्यावरण को लेकर रचनाकार एकदम सचेत दिखाई दे रहा है और कड़े प्रश्न अपने समय और समाज से पूछ रहा है। सच में यह सारे प्रश्न आज ही पूछा जाना बहुत ज़रूरी है। और उसके बाद अंत के बंद में एक समाधान के साथ रचना समाप्त हो रही है, सवाल अकेले ज़रूरी नहीं हैं, समाधान भी ज़रूरी है और बंद समाप्त होता है उस प्रश्न का यह उत्तर देते हुए कि क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में। बहुत ही सुंदर गीत, वाह वाह वाह। 


रेखा भाटिया 

आसमान सितारों से भर रहा और धरती खाली हो रही
जगमगाते सितारे धरती के असमय चल दिए आसमान में

कर्तव्य निभाते जैसे कुमकुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहारों में
कभी जगमगाते थे धरती पर अमन कायम इनके कर्मों से  
बीमार अख़बार बार-बार शोर मचाते राम राज्य का सपना
सत्ताओं की आतिशबाज़ी खेली इंसानों ने विधवा हुई इंसानियत
मानता नहीं इंसान सोचता वह अमरत्व की घुट्टी पीकर आया
खेल चुकने के बाद बाज़ी क़िस्मत ने पत्ता फेंका है अपना
कहीं जल रहा है बेबस बेचारा कुमकुम आसुँओं के हवन में
कहीं जल रही चंदन की चिता फूलों की सुगंध थी कर्मों में
कभी चल रहा था अकेला सड़कों पर मन में मनाता दिवाली
छोड़ घर की दिवाली चौकन्ना पहरा देता सत्ता का फ़ैसला
बंदनवार द्वार पर बँधे हैं और डर भीतर तक समाया हुआ है
यही किस्मत खुद लिखी है इंसान ने बाज़ारवाद की दुनिया में
देह और मन को, ईमान और वतन को व्यापार बना सत्ता चाहता
अमावस का अन्धकार सदा छाया रहेगा भविष्य के उजियारे में
जो आज न बदला आचरण वीरों की चिताएँ कब तक जलेगीं
देश के भीतर तक और सरहदों पर बलिदान यह देते आए
प्रण करो इस दिवाली इंसानियत के दीप बुझने न पाए !

यह रचना भी हमारे समय के सवालों से जूझती हुई रचना है। यहाँ प्रतीकों के माध्यम से रचनाकार ने कुछ ज़रूरी सवाल उठाए हैं। कुछ दृश्य दिखाए हैं और पूछा है कि यह सब कुछ तो आज भी चल रहा है तो फिर हम कैसे मानें कि सब कुछ बदल रहा है। अंतिम पंक्ति में खड़े हुए आदमी के साथ यह कविता खड़ी हुई नज़र आ रही है। और उस आदमी के साथ खड़े होकर उसकी बात कर रही है। सत्ता की आतिशबाज़ी के बीच इंसानियत की बात कर रही है। हर समय में कवि को ही विपक्ष की भूमिका में रहना होता है, जो सत्ता के पक्ष में खड़ा होता है वह और कुछ भी हो जाए कवि नहीं हो सकता है। सत्ता के पक्ष में चारण खड़े होते हैं, और जनता के पक्ष में कवि खड़ा होता है। दुनिया की कोई भी सत्ता कभी भी जनपक्षीय नहीं होती, जनपक्षीय हमेशा कवि होता है इसीलिए वह विपक्ष होता है। वाह वाह वाह बहुत सुंदर कविता।

आज दोनो ही रचनाकारों ने बासी दीपावली का रंग जमा दिया है। आप भी दिल खोल कर दीजिए दाद और इंतज़ार कीजिए कार्तिक पूर्णिमा के अंक का जिसमें शायद भभ्भड़ कवि अपनी रचना लेकर आ जाएँ... शायद। 


गुरुवार, 27 अक्तूबर 2022

आइए आज बासी दीपावली का आयोजन करते हैं दो गुणी रचनाकारों तिलकराज कपूर जी और इस्मत ज़ैदी जी की बहुत सुंदर ग़ज़लों के साथ।

 

बासी दीपावली की अपनी एक परंपरा रही है और हमारे ब्लॉग पर तो सारे ही बासी त्योहार धूमधाम से मनाए जाते हैं। कई बार तो बासी त्योहार में ताज़ा त्योहार से अधिक धूमधाम हो जाती है। इस बार भी कुछ रचनाकारों ने दौड़ते भागते, अगले स्टेशन पर गाड़ी पकड़ी है तरही की। इसका भी अपना ही आनंद है कि जिस स्टेशन पर आपको ट्रेन पकड़नी थी आप उस स्टेशन पर पकड़ नहीं पाए तो गाड़ी लेकर अगले स्टेशन की तरफ़ दौड़ पड़े और अगले स्टेशन पर आप ट्रेन में चढ़ते हैं। कई बार इन्हीं सब एडवेंचर्स में जीवन का आनंद छिपा होता है। तो इस बार भी हमारे दो प्रतिभावान रचनाकार तरही के बासी स्टेशन पर अपनी बहुत सुंदर रचनाओं के साथ तरही की गाड़ी पकड़ रहे हैं। 

क़ुमकुमे यूँ जल उठेंगे, नूर के त्योहार में  

आइए आज बासी दीपावली का आयोजन करते हैं दो गुणी रचनाकारों तिलकराज कपूर जी और इस्मत ज़ैदी जी की बहुत सुंदर ग़ज़लों के साथ।


तिलकराज कपूर

पूछते हो हुस्न क्या दिखता है नूर-ए-यार में
देख लो, दिखता है वो ही, दीप के त्योहार में।

देखकर सबको गुमां होगा कि सब है खुशनुमा
क़ुमकुमे यूँ जल उठेंगे, नूर के त्यौहार में।
शेर उसके इस कदर पैने कि दिल तक चीर दें
धार ये मिलती नहीं है तीर में तलवार में।
जब तलक छाई है चेहरों पर उदासी की परत
क्या करूँ ये रौनकें बिखरी हुईं बाज़ार में।
जानकर कोई खबर करना नहीं जब कुछ तुम्हें
छानते फिरते हो फिर क्या रात दिन अखबार में।
स्वप्न से दूरी रखे देखी हक़ीक़त जागती
आपको दिखती नहीं जो बैठकर सरकार में।
ऐ हुकूमत बच के रहना भूख के इस रूप से
हड्डियों सा जिस्म है बदला हुआ अंगार में।
ख़्वाब में सोया हुआ इस शह्र में हर शख़्स था
जागती आंखें लिया पहुंचा नहीं दरबार में।
वायदे जितने किये थे याद उसको अब नहीं
जब से शामिल हो गया है मतलबी सरकार में।
रोज हो जिसको कमाना पेट भरने के लिए
फ़र्क क्या उसको दिखे कहिये भला इतवार में।
अब किसी की बात पर इसको यकीं होता नहीं
चोट ऐसी खा चुका दिल प्यार के व्यापार में।
देर आयद दुरुस्त आयद शायद इसी को कहते हैं। मतले में ही इश्क़ का रोशन रूप कितना खिल कर सामने आया है। नूर-ए-यार की तुलना दीप के त्योहार से ग़ज़ब। और फिर उसके बाद का गिरह का शेर गहरे व्यंग्य के साथ गूँथा गया है। सच कहा है कि जो काम एक शेर कर जाता है वह तीर और तलवार से कहाँ संभव है भला। और फिर ये कि जब तक एक भी चहेरे पर उदासी है तब तक हम कैसे बाज़ार के उत्सव में डूब सकते हैं। ख़बर से कोई मतलब नहीं फिर भी ऐसे कई हैं जो अख़बार के पहले पेज से अंतिम तक पूरा छानते हैं उसे। अगले दो शेर एक बार फिर व्यंग्य और चुनौती के रूप में सामने आते हैं। और ख़्वाब में सोया शहर तथा उसके बाद सरकार में शामिल होने वाला शेर बहुत कमाल का है- यथा राजा तथा प्रजा को चरितार्थ करते हैं यह दोनो शेर। और अंत का शेर एक बार फिर से मुड़ता है इश्क़ की तरफ़ और चोट खाए दिल का फ़साना कहता है जिसे किसी पर यक़ीं नहीं। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है, वाह, वाह, वाह। 


इस्मत ज़ैदी 

आप ने क्यों ला के छोड़ा है हमें मँजधार में
हम ने तो कोई कमी रक्खी नहीं ईसार में

हक़ को समझेगा भला अब कौन इस बाज़ार में
जबकि सिक्का चल रहा हो झूट का व्यापार में
रोज़ो शब जो मेरी फ़िक्रों में रहा था मुब्तला
आज शामिल हो गया वो भी मेरे अग़यार में
क्यों खड़ी कर लीं फ़सीलें तुम ने अपने इर्द गिर्द
आओ इक रौज़न बना लें हम किसी दीवार में
जिस तरह से हाथ में हों हाथ और विश्वास भी
"क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्यौहार में"
इस तरह हालात ने करवट पे करवट ली कि बस
मुज़्तरिब गोशे निकल आए मेरे अफ़कार में
आप ने तो कर लिया तर्क ए ताल्लुक़ बरमला
डाल दी हैं क्यों दरारें प्रेम के आधार में
जीत लेना चाहती हो ज़ह्नो दिल को तुम अगर
ऐ शिफ़ा बस कर लो शामिल हुस्न ए ज़न किरदार  में

जिनके लिए हम अपने हितों तक का बलिदान करने से गुरेज़ नहीं करते, वे ही हमें छोड़ कर मंजधार में चले जाते हैं, बहुत बड़ा दर्शन छिपा है इस मतले में। और अगले ही शेर में सच और हक़ की सिमटती दुनिया तथा झूट का बढ़ते साम्राज्य पर गहरी चोट की गई है। कितना पीड़ादायी होता है उन लोगों का अचानक अजनबी हो जाना जो कल तक दिन रात हमारे मन का हिस्सा बने हुए थे। अगला शेर बहुत कमाल का शेर है हम सब अपने बीच में जो दीवारें उठाते जा रहे हैं अब समय है कि उनमें छोटे-छोटे रोशनदान, झरोखे, दरारें, सूराख़ बनाए जाएँ ताकि हम एक-दूसरे को देख सकें। हाथ में हाथ और एक-दूसरे पर विश्वास हो, तभी तो नूर के क़ुमक़ुमे जलते हैं बहुत ही सुंदर गिरह का शेर। और अगला शेर कितना सच्चा शेर है कि भले ही संबंध विच्छेद हो जाएँ, टूट जाएँ, लेकिन प्रेम के आधार में दरारें नहीं आना चा​हिए। और दर्शन शास्त्र की सुंदरता से रोशन उतना ही सुंदर मकते का शेर। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।  

आज के दोनो ही रचनाकारों ने तरही का पूरा रंग जमा दिया है। शानदार ग़ज़लों से एकदम समाँ बाँध दिया है। आप भी दाद दीजिए इन दोनों ग़ज़लों पर और इंतज़ार कीजिए तरही के अगले बासी अंक का। 



सोमवार, 24 अक्तूबर 2022

आइए आज दीपावली के तरही मुशायरे में सुनते हैं धर्मेन्द्र कुमार सिंह, दिगम्बर नासवा, रजनी मल्होत्रा नैयर, अश्विनी रमेश, रेखा भाटिया तथा राकेश खण्डेलवाल जी को।

रोशनी से जगमगाते हुए दीप-पर्व की मंगल कामनाएँ
दीपावली पर्व की आप सभी को शुभकामनाएँ। दीपावली का यह पर्व आप सभी की जीवन में सुख शांति और समृद्धि लाए यही प्रार्थना है। आप सब ख़ूब रचनात्मकता के प्रकाश से जगमगाते रहें, आपके जीवन में सुख शांति और समृद्धि का उजास बना रहे। 
आइए आज दीपावली के तरही मुशायरे में सुनते हैं धर्मेन्द्र कुमार सिंह, दिगम्बर नासवा, रजनी मल्होत्रा नैयर, अश्विनी रमेश, रेखा भाटिया तथा राकेश खण्डेलवाल जी को। 
क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
वो दलालों के मसीहा वो निपुण व्यापार में
देखिए कितने हुनर हैं आजकल सरकार में

थरथरायेंगे सभी चमचे भरे दरबार में
आज भी इतना असर है आपकी हुंकार में
फ़ायदा ही फ़ायदा नफ़रत के कारोबार में
है अगर दम ये ख़बर दे दो जरा अख़बार में
बाँटता है देश को वो धर्म, भाषा, जाति से
ये कला पाई ही जाती है सदा गद्दार में
हाथ में बंदूक देकर सरहदों पर भेजिए
मन लगे है ख़ूब जिनका देश के विस्तार में
देर तक मुट्ठी में रख पाये नहीं तो क्रुद्ध हो
नाम लिख डाला उन्होंने बर्फ़ का अंगार में
कुछ कबूतर शांति के बैठें झरोखों में सदा
छेद कम से कम रहें इतने तो हर दीवार में
बात अब करने लगा है देश, भाषा, धर्म की
ये हुनर भी आ गया है आजकल बाज़ार में
सोचिएगा बात क्या है या कहीं कुछ कष्ट है
हाँ कभी मत ढूँढिएगा यार के इंकार में
जिंदगी चलती रहेगी मस्त यूँ ही सर्वदा
बस कमी मत कीजिएगा प्यार में आभार में
पीत हल्दी श्वेत चूने से गले मिल जाएगी
कुमकुमे यूं खिल उठेंगे नूर के त्योहार में
बक रहा सज्जन बहुत वाही तबाही किसलिए
फ़र्क़ कुछ पड़ना नहीं है सत्य से संसार में
मौसम-ए-बारिश में बचकर घूमना सज्जन ज़रा
इश्क़ ने गर डस लिया मर जाओगे बेकार में

बहुत ही अच्छा मतला है, राजनीति पर गहरा कटाक्ष करता हुआ मतला। और उसके बाद का हुस्ने मतला भी उसी कटाक्ष के प्रवाह को आगे बढ़ा रहा है। देर तक मुट्ठी में रख नहीं पाए शेर में भी बहुत गहरा तंज़ है वर्तमान राजनीति पर, जिसको अपने पक्ष में करना संभव नहीं है उसे देशद्रोही घोषित कर दिया जाए। और शांति के कबूतरों के लिए दीवारों में छेद होने की बात भी बहुत सुंदर है। बाज़ार आजकल भाषा और धर्म की बात करने लगा है यह एकदम सच है। पीत हल्दी और श्वेत चूने के मिलने से नूर के त्योहार के सजने की बात बहुत ही सुंदर बनी है। और अंत में दोनो मकते के शेर भी सुंदर बने हैं। वाह वाह वाह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।

दिगम्बर नासवा
 
हम भले ही ज़िन्दगी में हों किसी किरदार में
पर मिलेंगे दोस्तों की जीत में हर हार में

एक दिन हम भी लगेंगे तुमको शुभ-चिंतक सनम
जब कभी बदलाव होगा आपके व्यवहार में
सुरमई हो रात जब, पट खोलना पलकों के तब
क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में
वक़्त, मजबूरी, ज़रूरत, हादसे, कमबख़्त दिल
उम्र भर तो रह नहीं सकते किसी के प्यार में
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा तो खोज लेंगे मिल के हम
इस विषय पर बात जब होगी कभी विस्तार में
लोग जो अच्छे हैं सब सुखमय करेंगे ज़िन्दगी
और हैं अपने भी ग़म दे जाएँगे जो प्यार में
कुछ शरद की सुग-बुगाहट, और कम कम ताप कुछ
मौसमों का खेल है सब वक़्त की तकरार में 

मतले में ही दोस्ती को बहुत अच्छे से परिभाषित किया गया है। सच्चा दोस्त अपने दोस्त की जीत और हार दोनों में शामिल होता है। बदलाव के बाद ही हम समझ पाते हैं कि जिनको हम अपना दुश्मन समझ रहे थे, वे तो हमारे शुभचिंतक थे। और किसी की आँखों के पट खुलने से कुमकुमों के जल उठने का प्रतीक बहुत ही सुंदर है बहुत ही सुंदर गिरह लगाई है। जीवन में बहुत सी परेशानियाँ होती हैं इसलिए हम किसी के प्यार में उम्र भर नहीं रह सकते। बातचीत से नए रास्तों के निकलने का शेर भी बहुत सुंदर बना है। शरद की सुगबुगाहट का शेर मौसम का सुंदर चित्रण लिए हुए है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर
 
सब तरफ है छाई मंदी आजकल व्यापार में
हैं नहीं पहले सी अब तो रौनकें बाजार में

कुछ ज़रा बदलाव आए, दाम शेयर के गिरें
ढूँढ़ने लग जाते हैं जी ऐब हम सरकार में
आप भी कुछ हल निकालें बात बन ही जाएगी
क्यों भड़क कर दोष देते वक्त को बेकार में
चाटुकारी, बेईमानी मिलती बेग़ैरत में है
दोष ये मिलता नहीं है आदमी ख़ुद्दार में
हर तरफ होगा उजाला होगी रोशन रात ये
क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में



मतले के साथ ही हमारे समय का कड़वा सच सामने आ रहा है, व्यापार पर मंदी और त्योहार पर रौनकों की कमी, यही हमारा समय है। और वक्त को दोष देने वाला शेर भी बहुत सुंदर है, सच है हम जो कुछ सामने है उसका हल तलाशने के बजाया वक्त को ही दोष देने लगते हैं। चाटुकारी और बेईमानी जैसे दोष उस में नहीं होंगे जो अंदर से ख़ुद्दारी का नूर लिए हुए होगा। और अंत में गिरह का शेर भी बहुत सुंदरता के साथ बनाया गया है। एक अँधेरी रात को रोशनी के फूलों से भर देना ही तो दीपावली का नाम है। हर तरफ़ जब होता है केवल उजाला ही उजाला तो उसी को हम दीवाली कहते हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह। 

 
अश्विनी रमेश

काम हो सकता नहीं कुछ व्यर्थ की तकरार में
हर सफलता है छुपी बस इक मृदुल व्यवहार में

राह तकने की तड़प में है छिपा आनंद जो
वो मज़ा आखिर कहाँ है आपके दीदार में
थाम तुमने जब लिया है हाथ मेरा यार तो
छोड़ना फिर अब न मुझको तुम कहीं मझधार में
कब गुज़रते रात और दिन इससे हम अनजान हैं
खो गए जिस दिन से हैं हम आपके इस प्यार में
आम जन के दर्द से अनजान हैं जो लोग वो
कर नहीं पाएँगे कुछ भी बैठ कर सरकार में
इससे बढ़कर और कुछ मैं दे सकूँगा तुमको क्या
ये ग़ज़ल तौहफ़ा मेरा दीपावली त्योहार में

मतले में ही एक बड़ी सीख छिपी है कि यदि काम को सफल करना है तो तकरार से काम नहीं चलने वाला एक दूसरे के साथ व्यवहार ठीक करने से ही काम बनेगा। और एक प्रेम का सत्य यह भी है कि किसी का रास्ता देखने में जो आनंद आता है वह आनंद उसके मिल जाने में नहीं है। और फिर यह भी सत्य ही है कि जब हम किसी के प्यार में खो जाते हैं तब हमें इस बात का पता ही नहीं चलता है कि रात और दिन कब और किस प्रकार से गुज़र रहे हैं। राजनीति में वही लोग शामिल हो रहे हैं जो आम जनता के दुख दर्द से बिलकुल नावाक़िफ़ हैं इनके सरकार में आने से क्या होगा भला। और अंत में रचनाकार की रचना ही तोहफ़ा होती है। वाह वाह वाह बहुत सुंदर ग़ज़ल।

 रेखा भाटिया
 
अप्रितम, अतुल्यनीय, अलौकिक पल उतरा ख़ुशी का
थका सूरज दे रहा था न्यौता, नर्म पड़ी किरणें पल में

भावविभोर आनंदित बहारों ने किया आलिंगन मौसम का
रंग बदला पत्तियों ने अभिभूत हो ऋतुओं ने ओढ़ लिया घूँघट
फूलों संग पत्तियाँ भी सजसँवर पतझड़ का उत्सव मना रही
भरमाता है दृश्य अपलक,  मानो धुँधला हो बसंत बहारों से
आ लिपटा है नए रूप में लाल, पीले, नारंगी, बैंगनी रंगों में
शीत की नीरसता से पहले वसुधा सज रही, विनती कर रही
दरख़्तों से, मौन धारण करने से पहले खूब मनाओ उत्सव
आई है दिवाली, सजधज रहे घर-आँगन रंगोली की छाप से
फूलों की लड़ियों से दरवाज़ों, खिड़कियों ने नया रूप धरा
नए-नए वस्त्र, आभूषणों में जन-जन सँवर कर खिल  रहा
मिष्ठानों की महक, उपहारों के ढेर से बाज़ार अब दोहरे हुए
रंगबिरंगी टिमटिमाती रौशनी की मालाएँ स्वागत में अधीर
पूजा की थालियों में दीप कर चुके प्रण अंतिम साँस तक
जलते रहेंगे फैलाएँगे  उजियारा अमावस दूर कर जीवन से
हम भी बन कर कुमकुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में
अज्ञान का तिमिर मिटाकर जगमगाएँ जन-जन के मन में

रेखा जी ने दीपावली के मौसम का पूरा का पूरा शब्दचित्र ही बना दिया है अपनी इस कविता में। सच में दीपावली के समय जो मौसम होता है वह अपने आप में ही एक उत्सव होता है। लाल, पीले, नारंगी और बैंगनी रंग के फूलों और पत्तों से पूरी वसुधा सज जाती है, और उसी बीच सूरज की किरणें भी नर्म पड़ जाती हैं।इन्हीं सब के बीच में घर आँगन सज-धज कर रंगोली और फूलों की लड़ियों से तैयार होकी दीपावली का स्वागत करते हैं। बाज़ार में मिष्ठान्नों की महक और उपहारों के ढेर तथा रंगबिरंगी रौशनी की मालाएँ सज जाती हैं। मगर इन सब के बीच एक संकल्प कि हम भी अज्ञान के अंधकार को हटाने के लिए ज्ञान के क़ुमक़ुमे बन कर जल उठेंगे। वाह वाह वाह बहुत सुंदर कविता।

राकेश खंडेलवाल

एक सन्नाटा छाया हुआ आजकल,
अपने ब्लागिंग के अनुराग संसार में
फ़ेसबुकिया हुई मित्रता अब सभी
प्रीत के रंग से वंचिता प्यार में


व्हाट्सअप की बढ़ी संस्कृति इस तरह
कोई टिकता नहीं दो घड़ी से अधिक
क़िसमें धीरज कहे इक मुकम्मल ग़ज़ल
नूर के कुमकुमों के भी त्योहार में

आज पंकज के आदेश को मानकर
चल पड़ी ये कलम शेर इक कह सके
वरना कुव्वत कहाँ कि ग़ज़ल पढ़ सके
इस दफ़ा आज की महफ़िले यार में

अब जले तो जलें कुमकुमें इस कदर.
तीरगी का न कोई निशा भी रहे
आओ मिलकर करें अब दुआएँ सभी
नूर के आज रंगीन त्योहार में

पाँच दिन के लिए पाँच रचना लिखी,
सोच कर एक कोई पसंद आ सके
कल न जाने कहीं मौन रह ले कलम
और कह न सकूँ लफ़्ज़ दो चार मैं
 

हमारे समय के बदलते हुए रूपों को बहुत सुंदरता के साथ अपनी रचना में पिरोया है राकेश जी ने। सच कहा कि अब ब्लागिंग का दौर बात चुका है और अब तो फ़ेसबुक तथा व्हाट्सएप का ही ज़माना चल रहा है। जहाँ कोई दो घड़ी टिकता ही नहीं है, वहाँ कैसे कोई कुछ कह सकता है। क़ुमक़ुमे इस कदर जलना चाहिए कि तीरगी का कोई निशाँ ही शेष न रहे। यही दुआ इस बार नूर के इस त्यौहार पर की जा सकती है। राकेश जी आप पाँच क्या पचास रचनाएँ एक ही रंग में लिख सकते हैं, आपकी क्षमता तो अपरंपार है। और जहाँ तक कलम के मौन रह जाने की बात है, वह आप पर लागू ही नहीं होती है। बहुत ही सुंदर रचना वाह वाह वाह। 

 

आप सभी को दीपपर्व की शुभकामनाएँ। स्वस्थ रहें प्रसन्न रहें तथा हमेशा जमगमगाते रहें झिलमिलाते रहें। भले ही देर से पकड़ें, दौड़ते हुए पकड़ें लेकिन तरही की ट्रेन को इसी प्रकार पकड़ते रहें। कुछ रचनाएँ अभी भी बाक़ी हैं, जिनको हम बासी मुशायरे में सुनेंगे।