बुधवार, 27 मार्च 2024

आइए आज मनाते हैं बासी होली डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर और तिलक राज कपूर जी के साथ।

हर बार की तरह इस बार भी हम बासी होली मना रहे हैं। पिछले अंक में आपने देखा कि किस प्रकार से सारे रचनाकारों ने आदरणीय राकेश जी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। राकेश जी की स्मृति में ही हमने इस बार का मुशायरा आयोजित किया है। उनकी कमी हमेशा इस ब्लॉग परिवार में बनी रहेगी। आइए आज की बासी होली में क्रम को आगे बढ़ाते हैं।

"रंग इतने कभी नहीं होते”
आइए आज मनाते हैं बासी होली डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर और तिलक राज कपूर जी के साथ।

डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर

लोग यूँ पारखी नहीं होते
आप जैसे सभी नहीं होते
इश्क़ होता नहीं तो ग़ज़लों में
रंग इतने कभी नहीं होते
ज़िंदगी होती जब बहुत आसाँ
कायदे लाज़िमी नहीं होते
चूक होती है खुदा से भी तो
फैसले सब सही नहीं होते
 
मतले में बहुत अच्छे से तुलनात्मक बात कही है। सच है कि दुनिया में पारखी नज़रों वाले बहुत कम होते हैं। और यह भी सच है कि गीतों में ग़ज़लों में जो कुछ भी रंग होते हैं, प्रेम के कारण होते हैं। ज़िंदगी जब बहुत आसान होती है तब क़ायदों की ज़रूरत सच में नहीं होती है। और अंत में यह भी यही है कि फ़ैसले सब सही कभी नहीं हो सकते, ग़ल​तियाँ सभी से होती हैं। बहुत ही शानदार ग़ज़ल वाह वाह वाह।

तिलक राज कपूर

हम अगर आरसी नहीं होते
आंख की किरकिरी नहीं होते।
तेरी रुसवाई भूल जाते तो
बेबसी में कभी नहीं होते।
वक्त लेते हैं ये सुलझने में
मस्अले दिल-लगी नहीं होते।
होश रखिए ख़राब मौसम में
इस कदर आतिशी नहीं होते।
कर्ज़ से छूट पा ही जाता गर
झूठ खाता बही नहीं होते।
कुछ हक़ीक़त भी देख लेते गर
वायदे कागज़ी नहीं होते।
लब हमारे गुनाह क्यों करते
तुम अगर शरबती नहीं होते।
मान भी लो कि तुम न होते तो
हम न होते अजी नहीं होते।
गीत में रंग जो दिए तुमने
“रंग इतने कभी नहीं होते”।
मतला ही इतना शानदार है कि आज के समय की पूरी कहानी कह रहा है। जो आरसी होते हैं वे ही किरकिरी हो जाते हैं। मस्अले सच में दिल्लगी नहीं होते है, बहुत अच्छे से इस बात को शेर में पिरोया गया है। मौसम जब ख़राब हो रहा हो तो हमें अपने आप को तो संभालना ही पड़ेगा, क्योंकि उसके बाद ही अच्छा मौसम है। और एक शेर तो एकदम जानलेवा टाइप का बन पड़ा है- जिसमें गुनाह का दोष किसी के होंठों के शरबती होने को दिया जा रहा है। कमाल। अगले ही शेर में मिसरा सानी में दोहराव से सौंदर्य पैदा करने का प्रयास बहुत सुंदर है। अंत में गिरह का शेर राकेश जी को समर्पित है, बहुत ही सुंदर गिरह है। वाह वाह वाह सुंदर ग़ज़ल।

आज के दोनों शायरों ने रंग जमा दिया है। दाद देते रहिए और इंतज़ार कीजिए कि बासी होली का एक अंक और आ जाये शायद।

शनिवार, 23 मार्च 2024

आइए मनाते हैं होली राकेश खण्डेलवाल जी, धर्मेंद्र कुमार सिंह, सुधीर त्यागी, संजय दानी, दिनेश नायडू, मंसूर अली हाशमी और रेखा भाटिया के साथ।

दोस्तों इस बार का तरही मुशायरा आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी की स्मृति में आयोजित किया जा रहा है। इस बार होली का रंग कुछ फीका है क्योंकि इस बार राकेश जी इस होली में शामिल नहीं हैं। राकेश जी के गीतों से अब हमारे मुशायरों में छंदों का जादू नहीं जगेगा। होली क्या वे तो हर मुशायरे में एक माह पहले से उत्साहित होकर अपने संदेश भेजना प्रारंभ कर देते थे। इस बार यह हुआ है कि होली तो है पर अंदर उनके जाने का सूनापन बसा हुआ है। आइए आज होली के तरही मुशायरे को प्रारंभ करते हैं।
इस बार मुशायरे के लिए मिसरा देते समय मन इतना उदास था कि मैं रदीफ़ और क़ाफ़िये के बारे में बताना ही भूल गया कि क़ाफ़िया है 'कभी' शब्द में आ रही 'ई' की मात्रा और रदीफ़ है 'नहीं होते'। ख़ैर अब सब ने अपने हिसाब से रदीफ़ काफ़िया लेकर ग़ज़लें भेज दी हैं। 
"रंग इतने कभी नहीं होते”
आइए आज मनाते हैं होली राकेश खण्डेलवाल जी, धर्मेंद्र कुमार सिंह, सुधीर त्यागी, संजय दानी, दिनेश नायडू, मंसूर अली हाशमी और रेखा भाटिया के साथ।

शुरुआत करते हैं राकेश जी के एक गीत से जो उन्होंने दीपावली के मुशायरे के लिए भेजा था तथा उस समय यह लग नहीं पाया था। शायद आज के लिए ही छूट गया था।

राकेश खंडेलवाल
संस्कृतियों का एक बीज था जन्मभूमि ने किया अंकुरित
कर्मभूमि ने देखभाल की और। नया कुछ रूप निखारा
अनुभवों की इक कसौटी ने उन्हें जाँचा, परख कर
इक अनूठे शिल्प की अनमोल कृति देकर संवारा

यह पथिक विश्वास वह लेकर चला अपनी डगर पर
साथ में जिसको लिए दीपक तमस से लड़ रहा है

ज़िंदगी के इस सफ़र में मंज़िलें निश्चित नहीं थी
एक था संकल्प पथ में हर निमिष गतिमान रहना
जाल तो अवरोध फैलाये हुए हर मोड़ पर थे
संयमित रहते हुए बस लक्ष्य को था केंद्र रखना

कर्म का प्रतिफल मिला इस भूमि पर हर इक दिशा से
सूर्य का पथ पालता कर्तव्य अपना बढ़ रहा है

चिह्न जितने सफलता के देखते अपने सफ़र में
छोड कर वे हैं गए निर्माण जो करते दिशा का
चीर पर्वत घाटियों को, लांघ कर नदिया, वनों को
रास्ता करते गए आसान पथ की यात्रा का

सामने देखो क्षितिज के पार भी बिखरे गगन पर
धनक उनके चित्र में ही रंग अद्भुत भर रहा है

अनुसरण करना किसी की पग तली की छाप का या
आप अपने पाँव के ही चिह्न सिकता पर बनाना
पृष्ठ खोले ज़िंदगी में नित किसी अन्वेषणा के
या घटे इतिहास की गाथाओं को ही दोहराना

आज चुनना है विकल्पों में इसी बस एक को ही
सामने फ़ैला हुआ यह पथ, प्रतीक्षा कर रहा है
क्या कहा जाए इस गीत को लेकर, यह गीत नहीं है, यह तो मानों उस पूर्वाभास से उपजा हुआ संदेश है, जो शायद उनको हो चुका था। गीत की अंतिम पंक्ति में सामने फैला हुआ पथ जो प्रतीक्षा कर रहा है, शायद उस प्रतीक्षा में यही भाव है। राकेश जी को एहसास हो गया था कि अब कहीं कोई पथ प्रतीक्षा कर रहा है, उनको एक और लंबी यात्रा पर जाना है। इसीलिए यह गीत उन्होंने बहुत पहले ही भेज दिया था। यह गीत जैसे उनका प्रयाण गीत है। क्या कहूँ, बस मौन हूँ।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह
गीत यूँ कुदरती नहीं होते
गर जो राकेश जी नहीं होते
हम भी यूँ कीमती नहीं होते
वो अगर पारखी नहीं होते
गीत बनकर हमारे बीच हैं वो
इसलिए हम दुखी नहीं होते
वो तो लाखों में एक थे साहब
उन के जैसे कई नहीं होते
हम से छोटों को मानते थे बहुत
वो थे जैसे, सभी नहीं होते
वो जो होते न गर तो गीतों में
रंग इतने कभी नहीं होते
स्नेह उनका अगर नहीं मिलता
‘सज्जन’ इतने धनी नहीं होते
राकेश जी का नाम मतले में ही बहुत सुंदरता के साथ गूँथा गया है। और उसके बाद हुस्ने-मतला भी उतना ही सुंदर बन पड़ा है, क्या बात है। यह भी सच है कि राकेश जी के गीत हमारे साथ हैं, हम कैसे मान लें कि वे हमारे साथ नहीं हैं, दुखी होने की कोई बात ही नहीं है। और इस बात को भी शत प्रतिशत सच माना जाये कि वे लाखों में एक ही थे, उनके जैसे कई नहीं हो सकते। अपने से छोटों को भी मान-सम्मान देना, दुलार देना यह उनके जैसे बड़े लेखक ही कर सकते हैं। और तरही का शेर बहुत ही सुंदर तरीक़े से गूँथा गया ह। अंत में मकता भी बहुत कमाल है। इस मुसलसल ग़ज़ल ने समाँ बाँध दिया है। वाह वाह वाह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।

डॉ. सुधीर त्यागी
काफ़िए हम सलीके से ढोते,
और सृजन के बीज भी बोते।
खास महफिल उरूज पर होती,
साथ में काश आप भी होते।
आप रौनके बहार थे वरना,
रंग इतने कभी नहीं होते।
याद आते हैं आप गीतों को,
आप के गीत आप बिन रोते।
चलता तो है सुबीर जी का ब्लॉग,
सब मगर आप की कमी ढोते।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि इस बार पोस्ट में मैं लिख नहीं पाया कि रदीफ़ और क़ाफ़िया क्या रहेगा, तो इसलिए सभी ने अपने हिसाब से रदीफ़ क़ाफ़िया ले लिया है। सुधीर जी ने बिना रदीफ़ की ग़ज़ल कही है और बहुत अच्छे से कठिन क़ाफ़िया को निभा लिया है। विशेषकर गिरह का शेर बहुत अच्छा बना है। सबसे अच्छा शेर है जिसमें कहा गया है कि आपके गीत भी आपके बिना रोते हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

डॉ संजय दानी दुर्ग
आप गर सारथी नहीँ होते,
रंग इतने कभी नहीं होते।
छोड़ हमको न जल्द तुम जाते,
तो यूँ हम आंसू ना बहाते।
माना इक दिन सभी को जाना है,
सबका अंतिम वही ठिकाना है।
वक़्त से पहले जाना ठीक नहीं,
अपनों का दिल दुखाना ठीक नहीं।
होली अब कैसे हम मनायेंगे,
रंगों से दूरियां बढ़ायेंगे।
संजय जी ने अपने ही तरीक़े से राकेश जी को याद किया है। तरही मिसरे को अच्छे से पहली दो पंक्तियों में बांध कर आगे स्वतंत्र दो दो पंक्तियों में बात कही है। यह भी सच है कि किसी एक के बिना सच में होली जैसा पर्व एकदम अधूरा हो जाता है। रंगों से दूरियाँ सी हो जाती हैं। बहुत ही अच्छे से संजय जी ने याद किया है राकेश जी को। बहुत ही सुंदर रचना वाह वाह वाह।

दिनेश नायडू
हैं मगर.. वाक़ई नहीं होते
सारे मंज़र सही नहीं होते !
वो भी तो रौशनी नहीं होते
हम अगर तीरगी नहीं होते
उसकी तस्वीर कैसे हो पूरी
रंग इतने कभी नहीं होते
आह मेरी सदा नहीं बनती
अश्क मेरे नदी नहीं होते
मैं तेरी बात मान लेता हूँ
इतने अच्छे सभी नहीं होते
शेर मेरे बहुत ही सादे हैं
मायने फ़लसफ़ी नहीं होते
वो जो सच में ख़ुदा के बन्दे हैं
वो कभी मज़हबी नहीं होते
एक बहुत ही सधी हुई ग़ज़ल, एकदम उस्तादाना रंग लिए हुए है यह ग़ज़ल। मतला ही इतना ग़ज़ब बनाया है कि उफ़्फ़। और उसके बाद का हुस्ने मतला तो एकदम कमाल है हम अगर तीरगी नहीं होते तो वे रौशनी कैसे होते। और अगले शेर में गिरह भी एकदम ग़ज़ब है। मैं तेरी बात मान लेता हूँ में मिसरा ए सानी तो एकदम कमाल को बना है। और ख़ुदा के बंदों का मज़हबी न होना, एक बड़ा ​अर्थ लिए हुए शेर है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

मंसूर अली हाश्मी
कैसे खेलेंगे दोस्तो होली
भाई राकेश अब नहीं होंगे
तरही सूनी रहेगी अब उन बिन
रंग इतने तो अब नहीं होंगे!

वो नहीं पास जब कभी होते
फिर भी होते हैं, बस वही होते।
भर के 'राशी चुनावी' छ्प जाते
काश इतने तो हम 'लकी' होते!
(इलेक्टोरल बांड की)
उनकी तासीर दूध से मिलती
फट भी जाए तो हैं दही होते।
वो चतुर्वेदी भी कहे जाते
पुस्तकें चार गर पढ़ी होते।
हम को भी गुनगुनाया जाता ही
गर किसी गीत की लड़ी होते।
कैसे दावा करें हमी सब कुछ
हम ग़लत तो कभी सही होते।
ज़िन्दगी बे मज़ा नहीं होती
आप भुजिया जो हम कढ़ी होते
हो के शाइर तुझे मिला क्या है?
काम करते तो आदमी होते
कर दिया है दही दिमागों का!
अच्छा होता न गर कवि होते !!
मंसूर जी ने पहली राकेश जी को बहुत सुंदर शेरों के द्वारा श्रद्धांजलि प्रदान की है उसके बाद थोड़ा बदले हुए रदीफ़ काफ़िया के साथ ग़ज़ल कही है। मतला ही बहुत सुंदर है कि जब वे नहीं होते तब भी वही होते हैं। इलेक्टोरल बांड का शेर और उसके बाद दूध और दही का शेर भी सुंदर बना है। चतुर्वेदी होने का और किसी गीत की लड़ी होने का अंदाज़ भी गुदगुदाता है। भुजिया और कढ़ी के साथ शाइर के बदले आदमी होने का शेर भी बहुत अच्छा है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

रेखा भाटिया
वो भी एक रंग था जीवन में

वो भी एक रंग था जीवन में
गुज़र गया तो फिर क्या हुआ
साँझ-सवेरे खिलता चमन में
आज छोड़ इस चमन वो चला

वो भी एक रंग था जीवन में
खूब हँसता, खूब रुलाता
प्यार वो भरपूर लुटाता
अँधियारों को रोशन करता

वो भी एक रंग था जीवन में
गई दिवाली परदेस चला था
बाबुल का अँगना सूना था
सोचा आएगा वो फिर से

खिल जाएगी बगिया फिर से
होली के रंगों में डूबो कर मन
हँसी ठिठोली में मगन करेगा
साँझ ढली अब वो नहीं आया

जाने किस दिशा डाला डेरा
महफ़िल अब सज न पाएगी
जहाँ भी होगा झूम रहा होगा
वो भी एक रंग था जीवन में

दुआएँ लेकर जा रे मितवा
हँसते खिलते हर पल बीते
गुज़रा रंग गुलाल कर गया
गुज़र गया तो फिर क्या हुआ

साथ रंग इतने कभी नहीं होते
घुलता था हर रंग में नादान
वो भी एक रंग था जीवन में
हर मर्ज़ की वो दवा दे गया !
बहुत ही सुंदर कविता के साथ दार्शनिक अंदाज़ में रेखा भाटिया जी ने राकेश खंडेलवाल जी को अपनी भावांजलि प्रदान की है। एक रंग जीवन में जब कम हो जाता है तो हमें ऐसा लगता है कि सब कुछ तो वैसा ही है, लेकिन उस एक रंग की कमी हर बार महसूस होती है।यह पूरा गीत इसी भाव से भरा हुआ है। एक रंग को कवयित्री का मन कहाँ-कहाँ नहीं तलाश कर रहा है। पूरा गीत एकदम भावों से भरा हुआ है। बहुत ही सुंदर, वाह वाह वाह।
होली है भाई होली है रंगों वाली होली है। आप सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आज के रचनाकारों ने होली का रंग जमा दिया है। आप भी दाद दीजिए। और यदि आगे रचनाएँ आती हैं, तो हम होली के बासी मुशायरे का भी आनंद लेंगे।



सोमवार, 4 मार्च 2024

होली का यह तरही मुशायरा

दोस्तो, इस बार जब हम होली का यह तरही मुशायरा आयोजित करने जा रहे हैं तो एक दुख के साथ करने जा रहे हैं। दुख यह है कि वर्ष 2007 में जब हम सब ने मिलकर यह यात्रा प्रारंभ की तथा एक परिवार बनाया, तब से ही हमारे साथ लगातार पूरी सक्रियता से जुड़े रहने वाले आदरणीय राकेश खण्डेलवाल जी इस बार हमारे साथ नहीं होंगे। इस बार उनके गीतों की बस यादें ही हमारे साथ होंगी। हर बार तरही का मिसरा देने में यदि देर हो जाती थी तो राकेश जी का संदेश आ जाता था कि इस बार तरही मुशायरा नहीं आयोजित होने वाला है क्या। और बस तरही की भूमिका बन जाती थी। अधिकांशत: यही होता था कि राकेश जी के स्मरण दिलाने पर ही ऐसा होता था कि हाँ इस बार देर हो गयी है। इस बार याद दिलाने वाला कोई नहीं था इसलिए देर हो गयी। राकेश जी की तरही में भूमिका ऐसी रहती थी कि वे केवल एक रचना भेजने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि तीन या चार सुंदर गीत उनकी तरफ़ से प्राप्त होते थे। उनके गीतों में हमारे परिवार के पूरे सदस्यों के नाम भी होते थे। अभी दीवाली पर उनके गीत प्राप्त हुए थे, जब एक गीत में कुछ टाइपो-एरर के बारे में मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य में ख़राबी के कारण लिखने में परेशानी हो रही है। तब से ही मुझे चिंता थी कि ऐसा क्या हो गया है स्वास्थ्य में। और पुस्तक मेले में ही सूचना प्राप्त हुई कि गीतों का राजकुमार चिर निद्रा में सो गया है। हमारे इस ब्लॉग परिवार का एक बड़ा स्तंभ ढह गया। इस ब्लॉग को निरंतर गतिमान रखने में प्रेरणा देने वाले राकेश जी अब नहीं होंगे हमारे साथ। मगर उनके गीत हमारे सा​थ हमेशा रहेंगे। एक गीत जो उनके संदेश के साथ दीवाली के मुशायरे के कुछ पहले प्राप्त हुआ था, वह अप्रकाशित है, हम उसे ही शामिल करेंगे और मानेंगे कि राकेश जी हमारे साथ हैं। 


पूरे ब्लाग परिवार की तरफ़ से विनम्र श्रद्धांजलि
होली के तरही मुशायरा का मिसरा, यह मिसरा इस बार केवल राकेश खण्डेलवाल जी को ही समर्पित है। इसलिए इस बार गिरह का शेर हमको राकेश जी के लिए ही कहने की कोशिश करना है। मिसरा सानी इसी प्रकार का है कि इसके मिसरा ऊला में आप आसानी से राकेश जी के कृतित्व और व्यक्तित्व को जोड़ सकते हैं।
“रंग इतने कभी नहीं होते”

2122-1212-22 फाएलातुन (फएलातुन) – मफाएलुन – फालुन (फएलुन, फालान, फएलान)

क़ाफ़िया - शब्द 'कभी' में ई की मात्रा, रदीफ़ 'नहीं होते'
यह बहरे ख़फ़ीफ़ की एक बहर है, बहुत ही लचीली बहर है, इसमें पहले रुक्न में फाएलातुन 2122 की जगह पर फएलातुन 1122 भी कर सकते हैं, उसे भी मान्य किया जाता है। इसी प्रकार अंतिम रुक्न फालुन 22 के स्थान पर फएलुन 112, फालान 221 तथा फएलान 1121 भी कर सकते हैं।
इस बहर पर एक बहुत ही प्रचलित ग़ज़ल है – दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है। ग़ालिब की इस ग़ज़ल की आप तकतीई करेंगे तो बहुत मज़ा आयेगा और आपको पता चलेगा कि किस प्रकार से बहरों में मात्राओं का सुंदर प्रयोग होता है। आप ग़ालिब की इस पूरी ग़ज़ल को देखिए और देखिए कि अंतिम रुक्न किस प्रकार परिवर्तित हो रहा है, लगभग चारों मात्रिक रूपों में। तो अपनी ग़ज़ल भेजिए होली के तरही मुशायरे के लिए, और हाँ इस बहर की परिवर्तनशीलता का आनंद लीजिए ग़ालिब की इस ग़ज़ल में जो पूरी यहाँ दी जा रही है-

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हाँ भला कर तिरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है


सोमवार, 15 जनवरी 2024

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 8, अंक : 32 जनवरी-मार्च 2024 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 8, अंक : 32 जनवरी-मार्च 2024 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता / दिनेश कुशवाह, संपादकीय- शहरयार, व्यंग्य चित्र- काजल कुमार । शोध आलोचना- जल, जंगल और जमीन / उमाशंकर सिंह परमार, प्रतिभा चौहान। केंद्र में पुस्तक- रूदादे-सफ़र- भालचंद्र जोशी, रमेश शर्मा, जसविंदर कौर बिन्द्रा, पंकज सुबीर। पुस्तक समीक्षा - कुरजाँ के देश में- रणविजय राव, टीना रावल, काला सोना- रेखा भाटिया, रेनू यादव, प्रार्थनाएँ कुछ इस तरह से करो- निर्देश निधि, मुकेश निर्विकार, मौन मुखर था- ज्योति जैन, डॉ. अंजना मिश्र। नई पुस्तक- कुछ उदास कहानियाँ, पंकज सुबीर, मुझे सूरज चाहिए- आकाश माथुर, पंख से छूटा- प्रज्ञा पांडेय, डोर अंजानी सी- ममता त्यागी, चलो फिर से शुरू करें- सुधा ओम ढींगरा, ज़ोया देसाई कॉटेज- पंकज सुबीर, देह-गाथा- पंकज सुबीर, अनीता दुबे, जिस लाहौर वेख लेया- प्रितपाल कौर, चुप क्यों हो बसंती- जयंती रंगनाथन, ज़ेहन का पैरहन- उमेश पंत, नीलकंठी प्रार्थनाएँ- रघुवीर शर्मा।शोध आलेख- गिरीश चन्द्र भट्ट, डॉ. फात्तिमा बीवी आर, पूजा कुशवाहा, डॉ. विनोद कुमार, डॉ संतोष गिरहे, नीरजा. टि. के, वर्षा पाल, अश्विनी अजी, डॉ सिन्धु जी नायर, अंजु गोत्रा, शशि कुमारी, श्वेता रानी, डॉ. गजेंद्र सिंह, मिन्नु जोसेफ, प्रीति खजूरिया, कुमार मंगलम, डॉ. सुनीता कुमारी, प्रो. राखी उपाध्याय, डॉ. अनिल कुमार गुप्ता, डॉ. आइ. एम मेमन, डॉ. रमेश कुमार, डा. देवेंद्र कुमार, कविता चूर, पूनम पाधा, डॉ. कोमल एन. आहिर, डॉ. उषा कुमारी जे.बी., डॉ. रमेश कुमार, मीनाक्षी, अमर टैगोर, प्रो. डॉ. नंदादेवी बोरसे, डॉ. प्रियंका कुमारी, पटेलिया हरिशभाई बी., ललिता देवी, मन्नू देवी, सुरजीत कौर, जितेंद्र शर्मा, डॉ. शीतल ए. अग्रवाल, डॉ. रीटा एच. पारेख, डॉ. प्रियंका श्रीवास्तव, अमित कुमार चौबे, किरण कटोच, सपना, डॉ. अनिल कुमार पाण्डेय, मोनिका चौहान, डॉ. रीता सिंह, दीपिका चौहान, डॉ. रीता सिंह, आलिया जेसमिना, बिभूति बिक्रम नाथ, आलोक कुमार सिंह, डॉ. अनुपमा पाण्डेय, डॉ पुन्जभाष्कर, वैशाली सिंघल, राणा कुमार झा, डॉ. अभिषित त्रिपाठी, नवनीत, पूजा, पूजा, बिनीता मल्ल, देवेन्द्र कुमार, विनय कुमार सिंह, बिन्दु डनसेना, ज्योति कुमारी, चैतराम यादव, नवीन चंद्र भट्ट, प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार, मनीष कुमार, डॉ. योगेन्द्र सिंह, वर्षा गजानन पाटील, मु ज़ाहिद रज़ा सिद्दीकी, डॉ. अमित कुमार, डॉ. परमजीत .एस पनेसर। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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बुधवार, 10 जनवरी 2024

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 8, अंक : 32, जनवरी-मार्च 2024 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 8, अंक : 32, जनवरी-मार्च 2024 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- स्त्री- विमर्श और देह स्वातंत्र्य की सही परिभाषा समझनी होगी, कहानीकार-उपन्यासकार लक्ष्मी शर्मा से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- सलाखों को झकझोरते हाथ और हवा में लटकते पाँव- अनिल प्रभा कुमार। कथा-कहानी- हर सवाल का जवाब नहीं होता- डॉ. रमाकांत शर्मा, क्लब क्रॉलिंग- अरुणा सब्बरवाल, रूपान्तरण- कीड़े से तितली- चंद्रकला जैन, पीपल की शीतल छाया- डॉ. रमेश यादव, ख़ुद के बनाए रास्ते- अदिति सिंह भदौरिया, देवदूत- राजा सिंह। भाषांतर- हाशिए से..., पंजाबी कहानी, मूल लेखक : जतिंदर सिंह हांस, अनुवाद : जसविंदर कौर बिन्द्रा, सिसकती ज़िंदगी- प्रवासी पंजाबी कहानी, मूल लेखक : रविंदर सिंह सोढी, अनुवाद : प्रो. नव संगीत सिंह। लघुकथा- कंजक- डॉ. नितीन उपाध्ये, रिचार्ज- सुरेश सौरभ, स्वाद- बेस्वाद- सतीश राठी। रेखाचित्र- वो पुण्यात्मा- ज्योति जैन। संस्कृति- अमेरिका में राम- रेखा भाटिया। ललित निबंध- परिचय–न तुम हमें जानो...- वंदना मुकेश, छूटने का बंधन- पंकज त्रिवेदी। व्यंग्य- खाओ पियो मौज मनाओ पार्टी- दीपक गोस्वामी, दीमकों का उर्दू साहित्य से प्रेम- उर्दू व्यंग्य रचना, मूल रचनाकार – मुजतबा हुसैन, अनुवाद – अखतर अली। दोहे- डॉ. गोपाल राजगोपाल। ग़ज़ल- जय चक्रवर्ती, के. पी. अनमोल। शहरों की रूह- ग्रैंड कैनियन का सफ़र-तृष्णा या तृप्ति- रेखा भाटिया। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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