माड़साब वापस आ गए हैं काफी दुचे पिटें से आ रहे हैं काफी दिनों से काफी कुछ झेलने के बाद अब माड़साब की वापसी हो रही है । इस बीच कई सारे दिन बीत गए हैं और काफी कुछ गुजर चुका है । उड़नतश्तरी की वापसी हो चुकी है अभिनव भी कुछ दिनों के लिये भारत आकर वापस हो चुके हैं और राकेश जी भी एक दुखद प्रसंग में आकर जा चुके हैं । मतलब ये कि इस बीच हमारे शहर के सूखी नदी में काफी कुछ बह चुका है पानी को छोड़कर । पानी इसलिये नहीं क्योंकि पानी तो अब बातल में मिलता है । हमारे दादा कहा करते थे कि बेटा कभी भारत में दूध की नदियां कहा करती थीं । हम अपने पोतों से कहा करेंगें कि बेटा हमारे जमाने में तो पानी की नदियां कहा करतीं थीं । और वे उत्सुकता के साथ कहेंगें सच दादाजी पानी की नदियां और वो भी साफ पानी की नदियां । खैर तो अब तो काफी कुछ हो चुका है । माड़साब की छुट्टी के पीदे एक कारण ये भी था कि माड़साब की कक्षाओं के समय पर बिजली गुल हो जाती है और उसके कारण ये होता था कि कक्षाएं नहीं लग पाती थीं । अब तो कुछ कटौती का समय बदला है । और हमारे प्यारे मध्य प्रदेश में अब कटौती का शेड्यूल कुछ उस प्रकार है । सुब्ह 7 बजे से 10 बजे तक घोषित कटौती और उसके बाद फिर 10:30 से लेकर दोपहर 2 बजे तक अघौषित कटौती फिर 2:30 से लेकर शाम 6 बजे तक पुन: घोषित कटौती और उसके बाद 7 बजे से लेकर रात 12 तक अघोषित कटौती । और उसके बाच जो आधे आधे घंटे की बिजली मिल रही है उसके बारे में भी वही बात कि अगर उस बीच कहीं लोड शेडिंग हो गई तो वो भी गई । खैर हमने पांच साल पहले एक सरकार को हटा कर दूसरी को बिठाया था क्योंकि वो सरकार बिजली नहीं दे पारही थी और अब शायद पांच महीने बाद इसको भी हटा देंगें कारण वही बिजली नहीं दे पा रही है । आज माड़साब काफी बतौलेबाजी करके केवल कक्षाओं का माहौल बना रहे हैं और वो भी इसलिये क्योंकि हमको काफी समय हो गया है कक्षाओं में आए तो कम से कम आज से विद्यार्थियों को ये तो पता चल ही जाए कि माड़साब वापस आ गए हैं और अब कक्षाएं शुरू होने वाली हैं । हमने कक्षाओं को बहर के प्रारंभ पर छोड़ा था और हम वहीं से पुन: उठा कर शुरू करेंगें और एकदम प्रारंभ से ही उठाएंगें । बहरों के बारे में जो कुछ भी हमने देखा था उसको फिर से देखना होगा क्योंकि काफी दिन हो चुके हैं और उसके बाद काफी कुछ हो चुका है । कहीं पर आपके माड़साब को ये भी कहा गया कि वे तो मूर्ख हैं और ये भी कहा गया कि वे अहंकार लेकर स्तंभ लिखते हैं । उसके बाद एक आत्मावलोकन माड़साब ने किया कि क्या माड़साब सचमुच ऐसे हैं । और आत्मावलोकन का परिणाम अभी कुछ मिला नहीं हैं । खैर माड़साब कक्षाएं प्रारंभ कर रहे हैं ऐ बात हर आमो खास को बता दी जाए । और हां एक बात और माड़साब ने भूतनाथ देखी और सच बोलें तो माड़साब को भोत मजा आया । काफी मजेदार है फिल्म । तो आज आप भूतनाथ देखें और कल कक्षा में आऐं जहां माड़साब आपको भूत बनाने वाले हैं । ( आज शीर्षक में जनाब इसहाक असर साहब के कुछ शेर लगे हैं )
Monday, 12 May, 2008
कोई कोना भी हो सुनसान बुरा लगता है, अब बिना पेड़ के दालान बुरा लगता है , ये मिरी सोच मुझे आज कहां ले आई, घर में आया हुआ मेहमान बुरा लगता है
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पंकज सुबीर
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एक साक्षात्कार मृत्यु के साथ जब ऐसा लगा था कि अब सब कुछ ख़त्म ही होने वाला है और एक दर्शन मानवीयता का
ऐसा लगता है कि मेरी परेशानियों के दिन अभी और लम्बे समय तक चलना चाह रहे हैं । पिछले कुछ समय से परेशानियों ने कुछ इस तरह से घेरा हुआ है कि बस उस पर शनिवार की घटना ने तो पूरे दिन और रविवार को भी मन को विचलित किये रखा ऐसा लगा कि अब बस सब कुछ खत्म ही होने वाला है पर जाने किसकी दुआओं के असर से बच गया । दोपहर का समय था लगभग चार बजे के आसपास मैं भोपाल सै लौट रहा था अपनी मारुती वैन लेकर के । रास्ते में हाईवे बनाने वालों ने सड़क को तो ऊंचा कर दिया पर किनारों को नहीं भरा जिससे के सड़क और ज़मीन के बीच में करीब डेढ़ फुट का फासला है और वो भी एकदम सीधा । मतलब कहीं आपने ग़लती से भी गाड़ी को सड़क नीचे उतारा तो सीधी सी बात है कि आपकी गाड़ी का पलटना तय है । गाड़ी धड़ से नीचे गिरेगी और अगर गति में है तो पलटना तो तय है । मैं चला जा रहा था कि अचानक एक गाय जो कि उस तरफ मुंह करके खड़ी थी जाने किस वजह से उलट कर भागी और उसके बचाने के चक्कर में मैं भूल ही गया कि सड़क और जमीन में डेढ़ फुट का अंतर है और बात की बात में गाड़ी सड़क को छोड़कर जमीन पर आकर धड़ाक से गिरी । गिरते ही संतुलन चला गया और दूसरा तीसरा और चौथा पहिया भी जमीन पर आ गिरा और उसके बाद गाड़ी स्पीड में लहराती हुई एक पुलिया की ओर बढ़ चली कुछ देर तक तो मैंने उसको नियंत्रण में लेने का प्रयास किया मगर जब बात नहीं बनी तो हार कर सोच लिया कि अब तो पुलिया से टकराना है और उसके बाद जो होना है वो होगा ही । अचानक पुलिया के कुछ दूर पर गाड़ी जोर का झटका खाकर रुक गई । हाथ में थोड़ी सी चोट लगी और कुछ नहीं । मैं हैरत में भरा गाड़ी से उतरा तो ज्ञात हुआ कि एक मिट्टी का टीला रास्ते में आ गया था जिससे टकरा कर गाड़ी रुक गई थी । और उसमें फंस गई थी । मिट्टी होने के कारण गाड़ी को ज़रा सा भी नुकसान नहीं हुआ और ना ही मुझे । कुछ देर तक तो मैं हैरान सा खड़ा सोचता रहा कि क्या है ये सब । ये किसकी दुआओं का फल है जो मिट्टी के टीले के रूप में सामने आ गया है । समय का एक पल ही तो बीच में बाकी रहा गया था जब गाड़ी को उस पुलिया से टकराना था । और उसी पल में वो टीला जीवन और मृत्यु के बीच आकर खड़ा हो गया कि नहीं अभी नहीं अभी तो बहुत काम बाकी हैं । एक और ऐसा सच देखने को मिला जिसके जिक्र के बगैर ये बात अधूरी ही रहा जाएगी । थोड़ी ही दूर पर कुछ मजदूर और ड्रायवर खड़े थे जब उन्होंने देखा तो दौड़ते हुए आए और कुशलक्षेम पूछने लगे । मैंने कहा कि कोई चोट नहीं है बस गाड़ी फंस गई है तो उनमें से एक ड्रायविंग सीट पर बैठ गया और बाकियों ने धकेलते हुए बात की बात में गाड़ी को लाकर सड़क पर खड़ा कर दिया । जब मैंने पैसे देने चाहे तो सबने हाथ जोड़ दिये कहने लगे कि बाबूजी आपको ईश्वर ने बचा लिया वही हमारे लिये बहुत है । और जो हमने किया वो तो करना ही था । मैं अभिभूत रहा गया आज भी ऐसी मानवता बाकी है । नानी सच कहती हैं कि कुछ अच्छे लोगों के कारण ही पृथ्वी टिकी है अन्यथा तो कभी भी खत्म हो जाएगी । खैर दुर्घटना की मानसिकता को मानवीयता ने दूर कर दिया और मैं उनको सलाम करता हुआ वापस आ गया ।
आज से ग़ज़ल की कक्षाएं प्रारंभ होनी थीं पर शनिवार का अनुभव आप लोगों के साथ बांटना था । उसके पीछे क्या कारण है वो अब बताता हूं । दरअस्ल में जब रविवार को मैंने सोचा की वो मिट्टी का टीला वास्तव में क्या था तो मुझे पता चला कि वो वास्तव में माता पिता और परिवार की दुआएं थीं और आप सब मित्रों की शुभकामनाएं थीं जो मुझे मृत्यु के मुख से खींच लाईं । धन्यवाद देकर आपके स्नेह को छोटा नहीं कर सकता । पर हां बात वही है कि आप सब का प्रेम है जो मुझे संकट के इस दौर में संबल दे रहा है ।
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पंकज सुबीर
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Sunday, 4 May, 2008
ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात - मैं वापस आ रहा हूं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के साथ
दादाजी कहा करते थे कि ईश्वर जिनको प्रेम करता है उनको खूब कष्ट देता है । उनको कभी भी सुकून से नहीं रहने देता है । अगर दादाजी की भाषा में बात करूं तो शायद ईश्वर मुझसे कुछ ज़्यादा ही प्रेम करता है । और शायद इसीलिये ...... ख़ैर मगर मुझे इस बात में इस बात की खुशी तो है ही कि जब भी ईश्वर मुझे कष्ट देता है तो कई सारे लोगों को भी भेजता है जो आकर कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं । मेरी पिछली पोस्ट पर कई सारे लोगों के संदेश प्राप्त हुए और कई सारे फोन भी । ऐसा लगा कि मेरा दुख तो बंट गया है कई सारे लोगों ने उस पीर को बांट लिया है । अभिनव को फोन मिला और जो बात अभिनव ने कही उससे मैं अभिभूत हो गया मैं नहीं जानता कि कैसे कोई किसी के इतना नजदीक हो जाता है । और वो भी संबंधों के ठंडेपन वाले इस दौर में । अभिनव ने जो कुछ कहा वो सीधे जाकर ह्रदय को छू गया । अपनेपन का एक झौंका सा आप लोगों की ओर से आया और जीवन की तपन को कम करके चला गया । संकट के दिन भले ही ना टले हों पर ये तो विश्वास है कि मेरे साथ कई लोग हैं जो कि संकट के दिनों में मेरे साथ खड़े हैं । एक पुराना गीत है '' पास बैठो तबीयत बहल जाएगी मौत भी आ गई हो तो टल जाएगी'' बस वैसा ही कुछ लगा मुझे भी भले ही आप सब मेरे साथ भौतिक रूप से नहीं हैं पर आत्मीय रूप से तो सब मेरे साथ हैं और वही साथ होना खास होता है । जो भौतिक रूप से साथ होते हैं वो कितना साथ होते हैं ये हम सब जानते हैं । राकेश जी के यहां पर भी दुखों का सिलसिला थम नहीं रहा है । पहले एक भ्राता का बिछोह और अब दूसरे का भी । ईश्वर का ये न्याय कभी कभी अच्छा नहीं लगता कि अच्छे लोगों को ज्यादा दुख दिये जाएं । उस सब के बाद भी राकेश जी का फोन प्राप्त हुआ तो ऐसा लगा कि कहीं दूर बैठा कोई बड़ा भाई सांत्वना दे रहा है कि छोटे दुखी मत होना मैं तेरे साथ हूं । कंचन और सुनीता जी का फोन वैसे ही मिला जैसे परदेस में बसी कोई बहन भाई पर किसी संकट के दौरान अकुला के फोन करती है कि भैया के पास जा तो नहीं सकते पर मन तो वहीं है । मैं नहीं जानता था कि मेरा परिवार इतना बड़ा हो गया है कि उसमें इतने सारे भाई बहन हो गए हैं । समीर जी का स्नेह उनका प्रेम ये सब बातें भला भूल जाने वाली हैं । अभिनव का जब फोन आया तो ऐसा लगा कि परवाह के साथ को छोटा भाई कह रहा है कि मैं हूं ना । मैं नहीं जानता कि मेरे किन अच्छे कार्यों के कारण ईश्वर ने मुझे ये परिवार दिया है । खैर अब मैं वापस आ रहा हूं । एक लम्बी नज़्म लिख रहा हूं अपनी मिष्टी (मीठी) पर और उसके साथ ही संभवत: अपनी दूसरी पारी का प्रारंभ करूंगा । अंग्रेजी में कहावत है शो मस्ट गो ऑन । समीर जी आपने काफी पहले एक सलाह दी थी मैंने उसे नहीं माना तो एक दुख कहीं से और भी मिला जिसका जि़क्र यहां नहीं कर सकता पर ये ज़रूर कहूंगा कि अब मैं दोस्तों की सलाह को इग्नोर नहीं करूंगा । जाने क्यों वो ग़लती कर बैठा और अपमानित हो गया । खैर तुलसी बाबा ने कहा है यश अपयश जीवन मरण सब विधना के हाथ । यश की कामना हो तो अपयश के लिये भी अपने आपको तैयार रखना चाहिये । चलिये जल्दी ही हम मिलते हैं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के दूसरे खंड के साथ । अभी तो बस ये
एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों, ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों
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पंकज सुबीर
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Wednesday, 23 April, 2008
विदा प्रिय बिटिया तुम्हारा और मेरा साथ शायद इतना ही था, जाओ सितारों के देश में जाकर बसो
रिश्ते ख़ून के होते हैं तो अपने साथ जाने कैसा बंधन रखते हैं कि उनसे मन जुड़ ही जाता है । और बिछोह पर एक टीस एक दर्द सा दे जाता है । एक माह से ब्लागिंग से दूर रहने के पीछे कारण था कि घर में एक नए मेहमान के स्वागत की तैयारियां चल रहीं थीं । और उसीको लेकर कुछ परेशानियां थीं ।सप्ताह भर पहले वो अपनी मां के पेट से मुझे पैर मार मार कर कह रही थी कि पापा तैयार रहो मैं आने वाली हूं । दो दिन पहले उस नए मेहमान का आगमन भी हुआ । एक नन्हीं सी प्यारी सी बिटिया के रूप में । मगर शायद उसका और हमारा साथ विधाता ने बहुत ज्यादा नहीं लिख कर भेजा था । जन्म के साथ ही कुछ परेशानियां उसे थीं और जनम के घंटा भर बीतते न बीतते तो उसे लेकर भोपाल भागना पड़ा किन्तु रास्ते में ही उसने कह दिया प्यारे पापा इस जनम में बस इतना ही साथ फिर कभी मिलेंगें । और वो विदा ले गई । सुंदर सी उस बिटिया को हाथों में थामे मैं लौट आया । जाने क्यों या किस बात पर रूठ गई वो मुझसे जो आते ही केवल एक घंटे में ही मुझे और अपनी मम्मी को छोड़ कर चली गई । जाने क्या अपराध था हम दोनों का जो उसने हमारे साथ रहना ही पंसद नहीं किया । कुछ देर पूर्व जो मां के गर्भ में खेल रही थी अब पृथ्वी माता के गर्भ में है । बस रह रह कर एक ही बात मुझे साल रही है जो लिखने के लिये आज मैंने यहां ब्लाग पर आने का निर्णय लिया कि क्या अपराध था मेरा जो वो इस तरह से रूठ कर चली गई । सब कह रहे हैं कि बहुत सुंदर थी वो और ज्यादा सुंदर होने के कारण ही नहीं रुकी क्योंकि उसे तो वहां जाना था जहां पर सुंदर लोग रहते हैं । जो भी हो प्रिय बिटिया भले ही तुम मुझसे और अपनी मम्मी से नाराज होकर चली गईं मगर हम तुम्हें याद कर रहे हैं । विदा प्रिय बिटिया सितारों में जाकर बसो । मीठी ( यही नाम सोचा था मैंने उसके लिये ) शायद मैं और तुम्हारी मम्मी तुम्हारे लायक नहीं थे । विदा मीठी विदा । तुम्हारा पापा
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पंकज सुबीर
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Friday, 4 April, 2008
देखिये हास्य व्यंग्य से भरपूर टेपा सम्मेलन की चित्रमय झांकी
जज का मेकअप तो करना ही होगा तभी तो वो जज लगेंगें । टेपा जज ओम मोदी का मेकअप विक्की के द्वारा।
भई जज ने सजा सुनाई है कि नाचो तो नाचना तो होगा ही । पूर्व विधायक और आंचलिक पत्रकार संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शंकर लाल साबू का नृत्य।
उफ नाचने में श्री शंकरलाल साबू का पेटीकोट ही खिसक गया ।
नाचना तो पड़ा भाजपा के जिला उपाध्यक्ष श्री राजकुमार जी गुप्ता को भी भई सजा तो सजा ही है ।
और ये सजा कि कांग्रेस के पूर्व विधायक श्री शंकरलाल साबू और भाजपा के पूर्व विधायक श्री मदन लाल त्यागी जी साथ ही नाचें ।
अरे भाई पेटीकोट पहनना भी नहीं आता । व्यवसायी श्री कैलाश अग्रवाल को पेटीकोट धारण करवाते श्री कमल झंवर ।
फंस गया ना फंसना तो था ही तोंद जा बढ़ा रखी है इतनी ।
आप पहले तो ये सड़ी सब्जियों से बना गुलदस्ता ग्रहण करें लायनेस अध्यक्ष रीता दुबे जी ।
भले ही आप ब्यूटी पार्लर चलाती हों पर हम तो केमल के रंगों से ही करेंगें मेकअप ।
जज साहब ओम मोदी तैयार हैं अपनी झाड़ू के साथ अदालत के लिये ।
थोड़ा मेकअप करवा लीजिये राजकुमार गुप्ता जी यही कह रहे हैं पास खड़े कालेज के प्राचार्य श्री भगचंद जी जैन जी ।
आप तो पेटीकोट इस तरह से ही पहन लो ऊपर से फस जाता है । पूर्व विधायक श्री साबू को धारण करवाते पत्रकार श्री पुरुषोत्तम कुइया ।
जरा आपका मेकअप कर दूं शायर महोदय । डॉ कैलाश गुरू स्वामी का मेकअप करते प्रमोद जोशी ।
जम रहे हो शायर साहब
मेरी लंबाई ज्यादा है पेटीकोट छोटा पड़ जाएगा यही कह रहे हैं पूर्व विधायक मदन लाल त्यागी ।
पूर्व पार्षद किन्नर पायल जान के चित्र के सम्मुख चिमनी जला रहे हैं । चिर कुआरे नागरिक बैंक के अध्यक्ष श्री प्रेमबंधू शर्मा ।
सूत्रधार पंकज सुबीर गले में सीटी बांधे और बिना कांच का चश्मा लगाए ।
किन्नर पायल जान के चित्र को प्रणाम कीजिये राजकुमार गुप्ता जी ये ही कह रहे हैं दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ शैलेष तिवारी ।
सूपे में रखकर लाए जा रहे हैं पेटीकोटचलिये आप तो झाड़ू के छत्र के नीचे चलें । पूर्व विधायक जी कह रहे हैं सुरेंद्र सिंह ठाकुर ।
प्रस्तुतकर्ता
पंकज सुबीर
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