बुधवार, 7 नवंबर 2018

शुभ दीपावली, शुभ दीपावली, शुभ दीपावली… आप सभी को दीपावली के पावन पर्व की मंगल कामनाएँ आइए आज श्री राकेश खण्डेलवाल जी, श्रीमती लावण्या दीपक शाह जी, श्री नीरज गोस्वामी जी, श्री गिरीश पंकज जी, नुसरत मेहदी जी, श्री द्विजेन्द्र द्विज जी और श्री मंसूर अली हाशमी के साथ मनाते हैं दीपावली का पर्व।

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शुभ दीपावली, शुभ दीपावली, शुभ दीपावली… आप सभी को दीपावली के पावन पर्व की मंगल कामनाएँ । दीपावली का यह पावन पर्व आप सभी के जीवन में मंगल और सुख लेकर आए। आप सब रचनात्मक दीपकों के प्रकाश से आलोकित रहें, आप सब अपनी सक्रियता से अपनी रचना धर्मिता से हमेशा प्रकाशित रहें यही प्रार्थना है। दीपावली अँधेरे कोनों में रोशनी के दीपक जलाने का पर्व है आप सब अपने लेखन के दीपक, अपनी रचनाओं के चराग यूँ ही प्रकाशित करते रहें, और उनके उजास में हमारा समय हमारा समाज जगमगाता रहे। शुभ दीपावली, शुभ दीपावली, शुभ दीपावली।

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deepawali-164_thumb_thumb1ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे deepawali-16_thumb_thumb1

शुभ दीपावली, शुभ दीपावली, शुभ दीपावली… आप सभी को दीपावली के पावन पर्व की मंगल कामनाएँ आइए आज श्री राकेश खण्डेलवाल जी, श्रीमती लावण्या दीपक शाह जी, श्री नीरज गोस्वामी जी, श्री गिरीश पंकज जी, नुसरत मेहदी जी,  श्री द्विजेन्द्र द्विज जी और श्री मंसूर अली हाशमी के साथ मनाते हैं दीपावली का पर्व। विशेष कर नुसरत मेहदी जी का शुक्रिया जिन्होंने  अमेरिका कनाडा के सफ़र में मॉन्ट्रियाल से 3 डिग्री टेम्प्रेचर में ग़ज़ल कह कर भेजी, यही तो स्नेह और प्रेम है इस ब्लॉग के प्रति आप सबका जो इसे निरंतर रखता है।

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राकेश खंडेलवाल

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शरद की पूर्णिमा से हो शुरू यह
सुधाये है टपकती व्योम पर से
जड़े है प्रीत के अनुराग चुम्बन
लपेटे गंध अनुपम,पाटलों पे
किरण खोलेगी पट जब भोर के आ
नई इक प्रेरणा ले हंस पड़ेंगे
नयी परिपाटियों की रोशनी ले
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

यही पल हैं कि जब धन्वन्तरि के
चषक से तृप्त हो लेंगी त्रशाए
“नरक” के बंधनों से मुक्त होकर
खिलेंगी रूप की अपरिमित विभागों
भारत की पूर्ण हो लेगी प्रतीक्षा
वियोगि पादुका से पग मिलेंगे
नए इतिहास के अब पृष्ठ लिखने
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

मिटाकर इंद्र के अभिमान को जब
हुआ गिरिराज फिर  स्थिर धरा पर
बना छत्तीस व्यंजन भोग छप्पन
लगाएँ भोग उसका  सिर झुकाकर
मिलेंगे भाई जाकर के बहन से
नदी यमुना का तट। शोभित करेंगे
मनाएँगे उमंगों के पलों को
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे

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राकेश जी के गीतों का क्या कहना, एकदम दूसरी दुनिया के गीत होते हैं ये। प्रीत के अनुराग चुम्बन जो गंध लपेटे अनुपम पाटलों पे आते हैं, उनका क्या कहना, किरण जब भोर के पट खोलती है और नयी परिपाटियों की रोशनी सामने आती है तो छंद से सुगंध आने ही लगती है। पादुका से पग मिलने का बिम्ब तो कमाल का है। और फिर दीपावली के बाद की गोवर्धन पूजा का चित्र तो अगले छंद में इस प्रकार आया है कि पूरा चित्र ही साकार हो उठा है। बहुत ही सुंदर वाह वाह वाह।

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श्रीमती लावण्या शाह

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दीपावली की प्रतीक्षा में   
ज़रा सोचो, दिवाली, आ रही है
दीयों में, लौ, बनी, बल खा रही है
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  .... ... 

सुनहरी शाम, आई है, घरों में,
रुपहली रात, नभ, मुस्का रही है !
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  ........

हों आतिशबाजियाँ, नीले गगन पे,   
चमकते चेहरे हों हर एक जन के !
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  ........

मिठाई हो, हँसे हर एक कोना,
दिलों में प्यार, पलता हो, सलोना !
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  .......

हो रौनक, और लगे सब कुछ, सुहाना
कलश पर बाती के संग हो, दियाना
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  .......

हो शुभ मंगल, करें, पूजन, हवन सब,     
  हों मंगल आरती में अब मगन सब !
ज़रा सोचो दिवाली आ रही है ....
ज़रा सोचो  ......

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लावण्या जी ने भी उसी बहर पर एक सुंदर गीत कह कर भेजा है। बहुत ही सुंदर गीत है, दीपावली की सारी मंगल कामनाओं को समेटे और दीपावली के सारे दृश्यों की आहट लिए यह गीत मद्धम मद्धम गूँजता है। सुनहरी शाम के नभ पर आने के बाद रुपहली रात का आ जाना। आतिशबाज़ियाँ और चमकते चेहरों के बीच दीपावली का उल्लास यही तो उत्सव है। शुभमंगल की कामना हो मंगल आरती में सब मगन हो रहे हैं, हर तरफ शुभ की उजास है, यही तो दीपावली है। वाह वाह वाह।

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नीरज गोस्वामी

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बदल कर भेष फूलों का, छलेंगे
ये काँटें जब मिला मौका, चुभेंगे

तुम्हारा जिस्म डाली मोगरे की
महक उट्ठेगा जब ये गुल खिलेंगे

बुजुर्गों की भी सुनते हैं ये बच्चे
मगर जो दिल कहेगा वो करेंगे

फटा जब ढोल खुद डाला गले में
बजेगा जब सुनेंगे , सर धुनेंगे

सिफर हमने किया ईजाद माना
सिफर से कब मगर आगे बढ़ेंगे

अंधेरों की सियासत को मिटाने
ये दीपक रात-भर यूँ ही जलेंगे

तसव्वुर में किसी के मुब्तला हैं
पुकारो मत, जमीं पे आ गिरेंगे

शजर की याद हो गहरी सफर में
तो रस्ते धूप के दिलकश लगेंगे

रखें निस्बत मगर कुछ फासले भी
तभी नीरज सभी रिश्ते निभेंगे

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नीरज जी की ग़ज़लें उनके ही रंग की होती हैं। यहाँ भी वे अपने रंग में हैं। मतले में चेतावनी देता हुआ एक संदेश है और उसके बाद एकदम वस्ल और प्रेम का रंग शायर पर चढ़ जाता है अपने प्रिय मोगरे के फूल के साथ । दो पीढ़ियों की टकराहट और समन्वय का अगला शेर सुंदर है। सिफर वाला शेर तो ग़ज़ब का ही तंज़ कर रहा है हमारे समय पर खूब। और उसके बाद गिरह का शेर भी बहुत अच्छा बना है। तसव्वुर में ज़मीं पर गिरने का भाव भी कमाल है। शजर का याद का सफ़र में आना गहरे अर्थों वाला शेर। बहुत अच्छी ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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गिरीश पंकज

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अगर हिम्मत जुटा कर के उठेंगे
सितमगर एक दिन बेशक मिटेंगे

अंधेरे हाथ अपने अब मलेंगे
'ये दीपक रात भर यूं ही जलेंगे"

मुझे उम्मीद है मंजिल मिलेगी
हमारा काम है चलना, चलेंगे

मिटा देंगे जगत का हम अंधेरा
गिनूँगा हाथ अब कितने उठेंगे

भले दो चार खंडित हो गए हैं
मगर कुछ स्वप्न दोबारा पलेंगे

यहां है भूख, बेकारी, करप्शन
यही मुद्दे जरूरी क्यों टलेंगे

हमारे हाथ में जलता दिया है
अंधेरे क्या हमें अब भी छलेंगे

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सकारात्मक भाव से सजा हुआ मतला जीने का हौसला प्रदान कर रहा है। और उसके बाद गिरह का हुस्ने मतला भी खूब बना है। फिर अगला ही शेर एक बार फिर से सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर है। एकदम सुंदर बना है। खंडित हो गए स्वपनों के बाद एक बार फिर से दूसरे स्वप्न पैदा हो जाना ये जिंदगी की सबसे बड़ी आशा है। और उसके बाद एक बार फिर शायर अपने समय से भूख और बेरोजगारी को लेकर प्रश्न कर रहा है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है। वाह वाह वाह।

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नुसरत मेहदी जी

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नई टकसाल में जाकर ढलेंगे
कई सिक्के यहां फिर से चलेंगे

ज़रा सी फ़िक्र की वुसअत बढ़ाकर
नए मफ़हूम में मानी ढलेंगे

ये होगा फिर कई किरदार एक दिन
कहानीकार को ख़ुद ही खलेंगे

बहुत भटका रही हैं क़ुरबतेँ अब
तो हम कुछ फ़ासला रख कर चलेंगे

जिसे आना है लौ से लौ जला ले
"ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे"

बढ़ा दी है तपिश सूरज ने अपनी
तो अब ये बर्फ़ से लम्हे गलेंगे

खुला रक्खो दरे उम्मीद नुसरत
दुआओं के शजर फूले फलेंगे

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नुसरत जी ने ईता के दोष से बचने के लिए एंगे की जगह लेंगे को ध्वनि बनाया है। बहुत ही सुंदर मतला हमारे आपपास के समाज पर गहरा प्रश्न करता हुआ। और अगला ही शेर जीवन के सबसे बड़े दर्शन सोच के दायरे के विस्तार की बहुत सुंदरता के साथ बात करता है। कहानी कार वाला शेर पढ़ कर मैं स्तब्ध रह गया, मेरे अंदर के कहानीकार को तो अभी भी कई किरदार खलते हैं, ग़ज़ब। बहुत भटका रही हैं कुरबतें नुसरत मेहदी जी का अपने अंदाज़ का शेर है बहुत ही सुंदर बहुत खूब। और गिरह का शेर तो क्या कमाल का बना है, उफ़। तपिश में लम्हों का गलना बहुत सारे अर्थ लिए हुए एक सुंदर शेर । और मकता भी दीपावली की सकारात्मकता को समेटे है। बहुत सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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द्विजेंद्र द्विज

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अँधेरे कब तलक अब दम भरेंगे
ये दीपक रात भर यूँ  ही जलेंगे

अँधेरे ही अगर  मन में रहेंगे
तो फिर ये दीप जल कर क्या करेंगे

अँधेरे आस्तीनों में पलेंगे
तो पग-पग पर हमें अक्सर डसेंगे

जो मायावी उजाले हैं, छलेंगे
उजालों पर तो वे फंदे कसेंगे

अँधेरों में कुछ ऐसे आ फँसेंगे
अँधेरों की ही सब माला जपेंगे

अँधेरे बैठ जाएँगे जड़ों में
अगर हम यूँ उन्हें ढोते रहेंगे

जो उनके रास्तों में आ रहे हैं
वो सारे पेड़ तो पहले कटेंगे

उजालों की सफ़ेदी के सिपाही
अँधेरों की सियाही से डरेंगे?

अँधेरे हैं अँधेरों की ज़रूरत
अँधेरों को उजाले तो खलेंगे

अँधेरे आदतों में आ बसे तो
हमेशा आदतों में ही बसेंगे

उजालों को तो आना ही है इक दिन
उजाले इस तरह कब तक टलेंगे

बपौती हैं किसी की क्या उजाले?
यहीं के हैं यहीं देने पड़ेंगे

अँधेरों ने जलाए हैं जो दीपक
वो दीपक क्या भला तम को हरेंगे

जलाओगे अगर दीपक से दीपक
अँधेरे कब तलक फिर यूँ टिकेंगे

भले हर रोज़ सूरज को है ढलना
नहीं ये आस के सूरज ढलेंगे

सिखाओ मत हमें यह क़ायदा तुम
जो कहना है हमें हम वो कहेंगे

उन्हें दरकार है कुछ तो उजाला
उजाले के लिए जो मर मिटेंगे

उजालों की तो मर्यादा यही है
ये कालिख पर भी उजियारा मलेंगे

उजालों का अगर हम साथ दें तो
अँधेरे इस तरह फूलें फलेंगे?

उजालों की नदी में डूब कर हम
उजाला अपने माथे पर मलेंगे

उजाले जिनके दम से हैं 'द्विज' उनके
नसीबों से अँधेरे कब छटेंगे?

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मतले के साथ चारों हुस्ने मतला भी अंधेरे से लड़ने की उम्मीद और हौसले से भरे हुए हैं। सब के सब बहुत सुंदरता के साथ दीपाली के अर्थ को साकार कर रहे हैं। जो उनके रास्ते में आ रहे हैं उन पेड़ों के कटने की बात क्या कमाल है, ग़ज़ब। और उजालों के सिपाहियों का अंधेरों से नहीं डरने वाला शेर भी खूब बना है। अंधेरे अंधेरों की ज़रूरत होना और अंधेरों की आदत पड़ जाने के बात भी बहुत ही सुंदरता के साथ कही गई है। उजालों की बपौती की बात क्या चुनौती के साथ कही गई, यहीं देने पड़ेंगे का जवाब नहीं ।अंधेरों के जलाए दीपकों की ओर इशारा कर के शायर ने राजनैतिक तंज़ कसा है बहुत खूब। और उजालों की मर्यादा का शेर उजियारे मलने के भाव को समेटे है। और अंत में शायर सामाजिक सरोकार में डूब कर प्रश्न करता है समय से मकते में। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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Mansoor ali Hashmi

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मंसूर अली हाशमी

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हे ग़ुंचा तो अभी गुल भी खिलेंगे
खिले है फूल अब फल भी  मिलेंगे।

तेरी यादों की लेकर रोशनी अब
ये दीपक रात भर यूँ ही जलेंगे।

मैं गर्दिश में हूँ तुम ठहरे ही रहना
मिले थे फिर मिले है फिर मिलेंगे

यहीं सदियों से होता आ रहा है
गिरें हैं फिर उठेंगे फिर चढ़ेंगे।

अभी 'मी टू' का चर्चा हर तरफ है
उपेक्षित क्या मुझे अब भी करेंगे?

'पटाख़े' चल रहे है, फिर रहे है
जो छेड़ा तो यक़ीनन यें फटेंगे।

बदलते दौर में मअयार बदले
घटेगा कोई तब तो हम बढ़ेंगे

हुए जब रुबरु तो फिर वह बोले
चलो जी! फेसबुक पर ही मिलेंगे

नही यह क़ैस-ओ-लैला का ज़माना
सितम हर्गिज़ न अब तो हम सहेंगे।

ब्लॉगिंग, फेसबुक अब छोड़ बैठें
लिखेंगे हम न अब कुछ भी पढ़ेंगे।

दिवाली 'हाश्मी' तू भी मना ले
दुबाला इस तरह ख़ुशियां करेंगे।

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बहुत हीं सकारात्मक मतले के साथ ग़ज़ल प्रारंभ होती है। और उसके बाद ही बहुत ही सुंदरता के साथ गिरह का शेर नए तरीक़े से बाँधा गया है। गर्दिश वाले शेर का मिसरा सानी तो क्या कमाल बना है। बहुत ही ग़ज़ब । और वैसा ही अगला शेर भी है। मीटू में मिसरा सानी की मासूमियत जानलेवा टाइप की है। किसी के घटने से अपने बढ़ने वाले शेर की बात बहुत ही सुंदर है। जीवन दर्शन का पूरा बिम्ब है। और सोशल मीडिया की आहट लिए रचे गए शेर भ नई कहन के कारण दिलचस्प हैं। वाह वाह वाह।

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शुभ दीपावली, शुभ दीपावली, शुभ दीपावली… आप सभी को दीपावली के पावन पर्व की मंगल कामनाएँ आप खुलकर दाद दीजिए। मिलते हैं दीपावली के बासी मुशायरे के साथ क्योंकि अभी भी कुछ ग़ज़लें बाक़ी हैं।

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