आप सभी को पाँच दिवसीय प्रकाश पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएँ, दीपकों का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का प्रकाश लेकर आये। आप सपरिवार स्वस्थ रहें, सानंद रहें, सुखी रहें।
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"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
आइये आज तरही मुशायरे में सुनते हैं गुरप्रीत सिंह जम्मू को।

गुरप्रीत सिंह जम्मू

अभी तो पहले हादसे से ही हैं हम सँभल रहे।
वो इसके बावजूद भी हैं अगली चाल चल रहे।
ये जानते हुए कि झूठ था तुम्हारा वायदा,
हम आज तक तुम्हारे वायदे से हैं बहल रहे।
जो चाहा था वो छोड़ कर सभी कुछ और पा लिया,
अब आप ही बताएँ हम सफल रहे? विफल रहे?
जो लोग ढल रहे थे अब तलक परिस्थिति में वो,
जुटा के हौसला हैं अब परिस्थिति बदल रहे।
दुखी न हो ये देख कर कि अंधकार है घना,
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे।"

मतले में ही दोनों मिसरों में बहुत सुंदर सामंजस्य के साथ शेर कहा गया है। सँभल रहे और चाल चल रहे की जोड़ी कमाल बनी है। अगले शेर में एक प्रकार की स्वतंत्रता है कि आप इसे कहीं भी उपयोग कर सकते हैं, महबूब के लिए भी और लीडर के लिए भी। इस प्रकार के शेर असल में ग्लोबल होते हैं। अगला शेर हम सब के जीवन की कथा है, जो कुछ चाहा था उसे छोड़ कर जीवन में सब कुछ पा लेने की कथा कह रहा है यह शेर। परिस्थितियों में ढल रहे लोगों का जागना और परिस्थितियों को बदलने के लिए जुट जाना युग परिवर्तन के प्रतीक रूप में सामने आ रहा है। यह बदलाव का शेर है। हर युग में ऐसा होता है कि लोग सहन करते करते अचानक ही सीना तान कर खड़े हो जाते हैं। अच्छा शेर। अंत के शेर में बहुत अच्छे से गिरह लगाई गयी है तरही मिसरे की। बहुत कमाल। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

गुरप्रीत सिंह जम्मू बहुत अच्छे से प्रकाश पर्व की स्वागत में दीपक जलाए हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। मैंने तो अपने हिस्से की दाद दे दी, अब आप लोग भी अपने हिस्से की दाद शायर को प्रदान करें। पाँच दिवसीय प्रकाश पर्व की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ।
अभी तो पहले हादसे से ही हैं हम सँभल रहे।
वो इसके बावजूद भी हैं अगली चाल चल रहे।
ये जानते हुए कि झूठ था तुम्हारा वायदा,
हम आज तक तुम्हारे वायदे से हैं बहल रहे।
जो चाहा था वो छोड़ कर सभी कुछ और पा लिया,
अब आप ही बताएँ हम सफल रहे? विफल रहे?
जो लोग ढल रहे थे अब तलक परिस्थिति में वो,
जुटा के हौसला हैं अब परिस्थिति बदल रहे।
दुखी न हो ये देख कर कि अंधकार है घना,
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे।"
मतले में ही दोनों मिसरों में बहुत सुंदर सामंजस्य के साथ शेर कहा गया है। सँभल रहे और चाल चल रहे की जोड़ी कमाल बनी है। अगले शेर में एक प्रकार की स्वतंत्रता है कि आप इसे कहीं भी उपयोग कर सकते हैं, महबूब के लिए भी और लीडर के लिए भी। इस प्रकार के शेर असल में ग्लोबल होते हैं। अगला शेर हम सब के जीवन की कथा है, जो कुछ चाहा था उसे छोड़ कर जीवन में सब कुछ पा लेने की कथा कह रहा है यह शेर। परिस्थितियों में ढल रहे लोगों का जागना और परिस्थितियों को बदलने के लिए जुट जाना युग परिवर्तन के प्रतीक रूप में सामने आ रहा है। यह बदलाव का शेर है। हर युग में ऐसा होता है कि लोग सहन करते करते अचानक ही सीना तान कर खड़े हो जाते हैं। अच्छा शेर। अंत के शेर में बहुत अच्छे से गिरह लगाई गयी है तरही मिसरे की। बहुत कमाल। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

गुरप्रीत सिंह जम्मू बहुत अच्छे से प्रकाश पर्व की स्वागत में दीपक जलाए हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। मैंने तो अपने हिस्से की दाद दे दी, अब आप लोग भी अपने हिस्से की दाद शायर को प्रदान करें। पाँच दिवसीय प्रकाश पर्व की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ।
