इस बार जैसे यहाँ लौटने में सदियाँ ही बीत गयी हैं। पिछला तरही मुशायरा 2025 की होली पर आयोजित होना था, उसके लिए मिसरा दिया जा चुका था। ग़ज़लें भी प्राप्त हो गयी थीं, मगर फिर होली से कुछ ही दिन पहले पिताजी अनंत यात्रा पर निकल गये। उसके बाद से जैसे यहाँ भी सन्नाटा छा गया। पिछला मुशायरा 2024 की दीपावली पर ही हुआ था, उसके बाद से जैसे सब कुछ ठहर सा गया है यहाँ। इस ब्लॉग पर इस आयोजन को बीस बरस हो गये हैं। बीस बरस में जाने क्या क्या होता गया। कई साथी हाथ छुड़ा कर चले गये। कुछ ने विदा कहा तो कुछ ने अलविदा कहा। मगर फिर भी बीस साल की अवधि छोटी नहीं होती है। आपके प्रेम और स्नेह के कारण यह सफ़र बीस साल से चल रहा है।
एक बार फिर से तरही मुशायरा करने की इच्छा से यहाँ वापसी हुई है। एक बार फिर से दीपावली पर चौपाल सजाने की इच्छा हो रही है। रचनाओं के दीपक जला कर अमावस के अँधेरे को मिटाने की चाह मन में है।
मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे
बहुत आसान सी बहर है- बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़ जिसके रुक्न हैं- मुफ़ाएलुन मुफ़ाएलुन मुफ़ाएलुन मुफ़ाएलुन या 1212 1212 1212 1212
यहाँ ‘जल’ शब्द क़ाफ़िया है और ‘रहे’ रदीफ़ है। इसका मतलब आप चल, जल, छल, पल, फल, बल, मल, टल, कल, खल, गल, जैसे क़ाफ़िये और साथ में बदल, निकल, सँभल, उबल, उछल, तरल, गरल, उगल, मसल जैसे क़ाफ़िये भी ले सकते हैं।
सबसे प्रचलित तो इस बहर पर शिव ताँडव स्त्रोत है जटाटवी गलज्जले प्रवाह पावितस्थले
और फ़िल्मी गाने भी इस बहर पर ख़ासे लोकप्रिय हैं-
पुकारता चला हूँ मैं गली-गली बहार की (फ़िल्म: मेरे सनम)
अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं (फ़िल्म: हुम दोनों)
वो शाम कुछ अजीब थी (फ़िल्म: ख़ामोशी)
ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है (फ़िल्म: उमराव जान)
उम्मीद है कि आप सभी की रचनाएँ समय से प्राप्त होंगी।