मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021

आज ईता दोष पर कुछ बातें। दीपावली को बस एक सप्ताह ही शेष रह गया है, जल्द से जल्द अपनी ग़ज़ल भेजें।

​प्रिय दोस्तो, मिसरा देने के बाद ही कुछ सदस्य तो एकदम जल्दी से ग़ज़ल कह कर भेज देते हैं, लेकिन कुछ सदस्य इंतज़ार करते हैं कि मुशायरा प्रारंभ हो जाए उसके बाद भेजेंगे। इस बार भी यही हो रहा है, कुछ सदस्यों ने तुरंत ही भेज दी ग़ज़ल और कुछ इंतज़ार में ही हैं। जो ग़ज़लें आई हैं, उनको पढ़ कर लग रहा है कि क़ाफ़िये को लेकर कितनी मेहनत की है सदस्यों ने। बहुत ही अलग तरह के क़ाफ़िये सामने आ रहे हैं। तरही ग़ज़ल का सबसे आनंददायक पहलू यही तो होता है कि हम यह देखें कि किस प्रकार के क़ाफ़िये सामने आ रहे हैं। तरही में सबसे आकर्षण क़ाफ़ियों का चयन ही होता है। इस बार के क़ाफ़िये में ईता को दोष बन जाने की संभावना है। अभी कहीं किसी प्लेटफ़ार्म पर चल रहे तरही मुशायरे में वहाँ प्रकाशित किसी ग़ज़ल पर चर्चा में मेरे नाम का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पंकज सुबीर के अनुसार  -“दिलों  में उमीदें  जगाने  चला हूँ, बुझे दीपकों को जलाने चला हूँ” इसमें ईता का दोष नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि मेरे नाम का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया। उसमें इस ब्लॉग का भी संदर्भ दिया गया था। मेरे पास किसी का मैसेज आया तो मैंने कहा कि इसमें तो बिलकुल ईता का दोष बन रहा है, मेरे संदर्भ से जो भी कह रहे हैं, वह बिलकुल ग़लत कह रहे हैं। इसमें “आने” ध्वनि क़ाफ़िया की ध्वनि है। यदि हम आने को हटा दें तो बचता है जग और जल, जो संपूर्ण शब्द हैं शब्दकोश के। मगर यह दोनों शब्द समान ध्वनि वाले शब्द हैं इसलिए ईता को दोष बन रहा है। जैसे हस्तीमल हस्ती की मशहूर ग़ज़ल “प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है, नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है”, में भी ईता का दोष है।

उसी प्रकार इस बार के मिसरे में भी यही समस्या आ सकती है यदि आपने क़ाफ़िया चयन मतले में करते समय सावधानी नहीं बरती।
छोटी ईता दोष

जैसे यदि आपने मतला यह कहा- 

उजाले के हैं सैनिक हौसलों से ये भरे दीपक,  अँधेरा हो न पाएगा, वो देखो जल उठे दीपक

इसमें क्या हो रहा है कि क़ाफ़िया बनाया गया है “भरे” और “उठे” को, जिनमें से “ए” की मात्रा हटाने के बाद जो शब्द बचते हैं वो हैं “भर” और “उठ”, जो कि मुकम्मल शब्द हैं शब्दकोश के। इसलिए आप यदि ऐसा करते हैं तो ईता दोष आ जाएगा। यह छोटी ईता का दोष कहलाएगा। अब आप कहेंगे कि ए की मात्रा को हटाया क्यों जा रहा है? वह इसलिए कि यदि मतले के दोनों मिसरों में क़ाफ़िया की ध्वनि को शब्द से हटने के बाद यदि कोई अ​र्थपूर्ण शब्द बचता है तो वह हट कर रदीफ़ का हिस्सा बन जाएगी। जैसे यहाँ रदीफ़ हो गया है “ए दीपक”। यदि किसी एक मिसरे में भी उसके हटने के बाद कोई निरर्थक शब्द बचता है तो उसे क़ाफ़िये के शब्द से नहीं हटाया जाएगा और वह रदीफ़ की ​हिस्सा नहीं बनेगी। ईता दोष से बचने के लिए मतले के किसी एक मिसरे में क़ाफ़िया ऐसा होना चाहिए जिसमें से क़ाफ़िया ध्वनि हटाने के बाद निरर्थक शब्द बचे।

अब इसे कैसे ठीक किया जाएगा, ऐसे

उजाले के हैं सैनिक हौसलों से ये भरे दीपक, अँधेरा हो न पाएगा वो देखो जल गए दीपक

अब “गए” में से “ए” की मात्रा हटाने पर केवल “ग” बचेगा जो अर्थहीन है, इसलिए ईता का दोष नहीं बनेगा। हमने केवल एक ही मिसरे में ऐसा किया है और ईता का दोष हट गया। पहले मिसरे में अभी भी “भरे” ही है जिसको हमने नहीं बदला है।

ऊपर जिस शेर का संदर्भ मैंने दिया है, उस तरह का मतला भी आपने बनाया तो उसमें भी समस्या आ सकती है।

उजाले के ये सैनिक रात भर हैं जागते दीपक, अँधेरा हो न पाए बस यही हैं सोचते दीपक

अब इसमें क्या हुआ है कि रदीफ़ हो गया “ते दीपक” और बचे हुए “सोच” तथा “जाग” जो कि संपूर्ण शब्द हैं, मगर समान ध्वनि वाले नहीं है इसलिए ईता का दोष बनेगा।

अब इसे कैसे ठीक किया जाएगा, ऐसे

उजाले के ये सैनिक रात भर हैं जागते दीपक, अँधेरा हो न पाएगा अगर जलते रहे दीपक

या अगर आप कहें कि नहीं जी हमको तो “ते दीपक” के साथ ही ग़ज़ल कहनी है तो कुछ ऐसे, मगर इसमें आगे पूरी ग़ज़ल में आपको यही “ते दीपक” की बंदिश निभानी होगी।

उजाले के ये सैनिक रात भर हैं जागते दीपक, वो देखो चल पड़े फिर से शहीदी रास्ते दीपक

बड़ी ईता दोष

इसी ग़ज़ल में यदि आपने बड़ी ग़लती कर दी तो बड़ा ईता दोष भी बन सकता है।

जैसे आपने मतला कहा

उजाले के हैं सैनिक हौसलों से ये भरे दीपक, भले कितना अँधेरा हो मगर हैं कब डरे दीपक

इसमें आपने “डरे” और “भरे” को मतले में लेकर क़ाफ़िया “ए” की जगह “रे” कर दिया है, अब आगे आपको करे, झरे, खरे, तरे, ही क़ाफ़िया बनाना है, अगर आपने आगे कहीं भी जले, कहे, जैसे क़ाफ़िये लगा लिए तो बड़ी ईता का दोष बन जाएगा। यदि आपने आगे “रे” के ही क़ाफ़िये बनाए तो ईता का दोष नहीं बनेगा।

अब इससे कैसे बचा जा सकता है-

उजाले के हैं सैनिक हौसलों से ये भरे दीपक, भले कितना अँधेरा हो नहीं हैं हारते  दीपक

अब बातें हम पिछले कई अध्याय में कर चुके हैं,, मगर चूँकि मेरा नाम लेकर कहीं कुछ ग़लत संदर्भ दिया गया था, इसलिए मैंने यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी समझा। ईता का दोष वह दोष है, जिसको लेकर पिछले कई सालों से बहस छिड़ी हुई है। कुछ लोग कहते हैं कि इसे तो अब मानना ही नहीं चाहिए। मगर ज़रा सी सावधानी रख कर इससे बचा जा सकता है।

ऊपर तो मतले कहे हैं उनमें केवल व्याकरण देखें, कहन नहीं देखें क्योंकि यह व्याकरण समझाने के लिए लिखे गए हैं।

और हाँ अपनी ग़ज़लें जल्द भेज देंगे तो अच्छा रहेगा।

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

दोस्तो, दीवावली में बस कुछ ही दिन शेष रहे गए हैं, तो क्यों न इस बार का तरही मुशायरे की तैयारी प्रारंभ की जाए

बहुत कठिन था पिछला समय और आने वाला समय भी कैसा होगा कोई नहीं जानता है। ऐसा लग रहा था मानों हर तरफ़ केवल और केवल मृत्यु का ही तांडव चल रहा हो। बहुत से लोगों ने अपनों को खोया है। उन अपनों को जो अभी बस दो दिन पहले ही पूरी शिद्दत के साथ सफ़र में साथ बने हुए थे। जो चले गए उनकी बस यादें ही शेष रह गई हैं। हमारे इस ग़ज़ल परिवार से भी बहुत से लोगों ने अपनों को खोया है। अभी तक स्तब्ध हैं वे लोग जो अपनों को खो चुके हैं। इसलिए इस बार का यह तरही मुशायरा बस एक दीपांजलि होगा उन लोगों को जो असमय चले गए। और एक प्रार्थना कि वह समय फिर से लौट कर न आए, जो हम सब ने अप्रैल से जून तक देखा है।

इस बार का तरही मुशायरा एक बहुत ही प्रचलित बहर पर हो रहा है।

1222-1222-1222-1222

मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन

बहरे हज़ज मुसमन सालिम

इस बार जो मिसरा दिया जा रहा है, उसकी विशेषता यह है कि उसके दो हिस्से है। मतलब यह कि शुरू के दो रुक्न और बाद के दो रुक्न। पहला हिस्सा मतलब शुरू के दो रुक्न उर्दू में हैं और बाद के दो रुक्न हिन्दी में। वैसे तो हिन्दी और उर्दू अब एक ही ज़बान हो चुकी हैं, फिर भी इस मिसरे में प्रयोग किया है कि गंगा और जमना का पानी संगम पर दिख सके। दिख सके कि यहाँ संगम पर गंगा-जमनी तहज़ीब एकाकार होती हे, और इसके बाद जो कुछ आगे बहता है, उसमें न गंगा होती है, न जमना, बस हिन्दुस्तानी भाषा होती है।

उजाले के मुहाफ़िज़ हैं, तिमिर से लड़ रहे दीपक

इस मिसरे में रदीफ़ है “दीपक” और क़ाफ़िया है “रहे” में आ रही “ए” की मात्रा, मतलब सुने, कहे, बचे, ये, वे, ले, रतजगे, पड़े, भरे, पहचानते, जानते, जागते, काटते, पूछते, और इसी तरह के बहुत बहुत क़ाफ़िये आप उपयोग में ला सकते हैं। बहुत कठिन नहीं है इस बार क़ाफ़िया, क्योंकि रदीफ़ के लिए अंत की दो मात्राएँ 22 सुरक्षित हैं तथा उसके पहले की मात्राओं का जो विन्यास है, वह आपको स्वतंत्रता देगा कि आप 2 या 12 या 212 या 2212 के वज़न पर कोई भी  क़ाफ़िया उपयोग कर सकते हैं। बस ध्यान रखियेगा कि इस बार जो क़ाफ़िया है उसमें आपको मतले पर बहुत ध्यान देना होगा, नहीं तो ईता का दोष बन सकता है। जैसे यदि आपने मतले में रहे के साथ सुने या कहे या भरे को बाँधा तो उससे ईता को दोष बनेगा। आपको बस मतले में एक क़ाफ़िया ऐसा रखना है जिसमें “ए” की मात्रा हटाने के बाद कोई प्रचलित शब्द न बचे। जैसे रहे में से ए हटेगा तो रह बचेगा, जो एक शब्द है। जागते में से ए हटेगा तो जागत बचेगा जो कोई शब्द नहीं है। तो बस मतले में यह सावधानी रखनी है कि एक मिसरे का क़ाफ़िया ऐसा हो, जिसमें से “ए” हटाने पर कोई प्रचलित शब्द नहीं बचे।

तो देर किस बात की,  बस कह डालिए एक ग़ज़ल इस मिसरे पर, और आपकी ग़ज़ल के साथ हम मनाएँगे इस बार की दीपावली।

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 22 , त्रैमासिक : अक्टूबर-दिसम्बर अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी, संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक, शहरयार, सह संपादक शैलेन्द्र शरण, पारुल सिंह आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 22 , त्रैमासिक : अक्टूबर-दिसम्बर अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविताएँ / गोरख पांडेय, आवरण चित्र / पंकज सुबीर, संपादकीय / शहरयार। व्यंग्य चित्र / काजल कुमार। पुस्तक समीक्षा- रज्जो मिस्त्री, राजेंद्र सिंह चूला / प्रज्ञा, मगर, शेक्सपीयर को याद रखना- रमेश दवे / संतोष चौबे, अम्लघात- प्रो.अवध किशोर प्रसाद / सुधा ओम ढींगरा, थोड़ा-सा खुला आसमान- उमाशंकर सिंह परमार / डॉ. रामकठिन सिंह, धूप के लिए शुक्रिया का गीत तथा अन्य कविताएँ- डॉ. नीलोत्पल रमेश / मिथिलेश कुमार राय, वैश्विक प्रेम कहानियाँ- प्रो.अवध किशोर प्रसाद / सुधा ओम ढींगरा, मैं फूलमती और हिजड़े- रमेश शर्मा / उर्मिला शुक्ल, बंटी, बबली और बाबूजी का बटुआ- सुरेश उपाध्याय / दीपक गिरकर, कैराली मसाज पार्लर- डॉ. उमा मेहता / अर्चना पैन्यूली, मध्यरात्रि प्रलाप- शैलेन्द्र चौहान / कैलाश मनहर, एस फॉर सिद्धि- मेधा झा / संदीप तोमर, इसी से बचा जीवन- डॉ. नीलोत्पल रमेश / राकेशरेणु, बहुत दूर गुलमोहर- डॉ. उपमा शर्मा / शोभा रस्तोगी, विवस्त्र तथा अन्य कहानियाँ- श्रीनाथ / प्रताप दीक्षित, हमारे गाँव में हमारा क्या है- डॉ.रामनिवास / अमित धर्मसिंह, कविता फिर भी मुस्कुराएगी- डॉ. नीलोत्पल रमेश / भारत यायावर, खारा पानी- नीरज नीर / आशा पाण्डेय, उफ्फ! ये एप के झमेले- नवीन कुमार जैन / अरुण अर्णव खरे, सिलवटें- सरोजिनी नौटियाल / विकेश निझावन, साक्षात व्यंग्यकार- ब्रजेश कानूनगो / डॉ. पिलकेन्द्र अरोरा, शह और मात- गोविंद सेन / मंजुश्री, टूटेंगे दर्प शिलाओं के- डॉ. राम ग़रीब पाण्डेय विकल / डॉ. मनोहर अभय, मेरी चुनिन्दा कहानियाँ- मनोज कुमार / अशोक गुजराती, वसंत के हरकारे - कवि शैलेन्द्र चौहान- शिखर जैन / सुरेंद्र सिंह कुशवाह, सफ़र में धूप बहुत थी- शैलेन्द्र शरण / ज्योति ठाकुर, एक देश बारह दुनिया- ब्रजेश राजपूत / शिरीष खरे, हक़ीक़त के बीच दरार- मनीष वैद्य / ली मिन-युंग / देवेश पथ सरिया, त्रासदी का बादशाह- रमेश बत्तरा- डॉ. गीता डोगरा / प्रेम जनमेजय, तरसेम गुजराल, पेड़ की पोशाक- रमेश शर्मा / डॉ. अंजुमन आरा, वक्त का अजायबघर- ब्रजेश कानूनगो / निर्मल गुप्त, कथा समय- खेमकरण 'सोमन' / अशोक भाटिया, यांरा से वॉलोंगॉन्ग- दीपक गिरकर / शेर सिंह। केंद्र में पुस्तक- दृश्य से अदृश्य का सफ़र- प्रकाश कांत, उर्मिला शिरीष, मनीष वैद्य, रश्मि दुधे, सुधा ओम ढींगरा। नई पुस्तक - नर्मदा के पथिक- ओमप्रकाश शर्मा, हे राम...! - महेश कटारे, एक टुकड़ा आसमान- विनोद कुशवाहा, दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों का रचना विधान- मिथिलेश वामनकर, एक थी मैना, एक था कुम्हार- हरि भटनागर। शोध आलेख- राजनीति और नागार्जुन की कविता- डॉ. नूरजहाँ परवीन। डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
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वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 23, त्रैमासिक : अक्टूबर-दिसम्बर 2021

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 23, त्रैमासिक : अक्टूबर-दिसम्बर 2021 अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- संपादकीय, मित्रनामा, विस्मृति के द्वार- 'परेड, कानपुर', उषा प्रियम्वदा। कथा कहानी- मैं लौट रही हूँ, उर्मिला शिरीष, तुम उसे तलाशने मत आना..., सैली बलजीत, कजरी का प्रेम- मुरारी गुप्ता, मोंटू- सरस दरबारी, पत्ते और डालियाँ- अनीता शर्मा, नाईन्टी नाईन रोज़ेस- ज्योत्सना सिंह, पिल्लू- सुनीता पाठक। नई क़लम- वाइड इफेक्ट- दर्शना जैन। भाषांतर- शिल्पी- बांग्ला कहानी, मूल लेखक : सत्यजीत राय, अनुवाद : सुचिस्मिता दास, नववर्ष का बलिदान- चीनी कहानी, लेखक: लू शुन, अनुवाद: विवेक मणि त्रिपाठी, बिना धूप के साये- पंजाबी कहानी, लेखक : तृप्ता के. सिंह, अनुवाद : डॉ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा, अंग्रेज़ी कवि जॉन हे की कविताओं का अनुवाद- अनुवाद- उषा देव। व्यंग्य- बाहुबली, सूर्यकांत नागर, कुटाई- ठुकाई- पिटाई - मदन गुप्ता सपाटू, बोध कथा - सम्राट, गुरु और पुतले- कमलेश पाण्डेय। संस्मरण- डॉ. कुँवर बेचैन- वो बेचैन मन, डॉ. अरुण तिवारी "गोपाल"। लघुकथा- मल भेद- सुभाष चंद्र लखेड़ा, आबरू- मनमोहन चौरे। दोहे- शिवकुमार अर्चन। कविताएँ- ब्रजेश कानूनगो, जावेद आलम ख़ान, राजीव कुमार तिवारी, मनीष कुमार यादव। ग़ज़ल- विवेक चतुर्वेदी, विज्ञान व्रत। गीत- सूर्य प्रकाश मिश्र। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, रेखाचित्र - जयंत देशमुख, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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