सोमवार, 12 अप्रैल 2021

शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 21, त्रैमासिक : अप्रैल-जून 2021 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी, संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक, शहरयार, सह संपादक शैलेन्द्र शरण, पारुल सिंह के संपादन में शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 6, अंक : 21, त्रैमासिक : अप्रैल-जून 2021 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता / मदन कश्यप। आवरण चित्र / राजेन्द्र शर्मा। संपादकीय / शहरयार। व्यंग्य चित्र / काजल कुमार।
पुस्तक समीक्षा-
अपेक्षाओं के बियाबान (कहानी संग्रह) दीपक गिरकर / डॉ. निधि अग्रवाल, मीडिया का मायाजाल (पत्रकारिता) प्रेम कुमार / डॉ. मुकेश कुमार, मेरी प्रिय कविताएँ (कविता संकलन) प्रो. अवध किशोर प्रसाद / अनिरुद्ध प्रसाद विमल, अब ख्वाब नए हैं (कविता संग्रह) डॉ. नीलोत्पल रमेश / अनिता रश्मि, कठपुतलियाँ जाग रही हैं (कविता संग्रह) मनीष वैद्य / श्रीराम दवे, प्रेम (कहानी संग्रह) प्रो. अवध किशोर प्रसाद / पंकज सुबीर, ठौर (कहानी संग्रह) विजय पुष्पम / दिव्या शुक्ला, खारा पानी (कहानी संग्रह) गोविंद सेन / आशा पांडेय, गली हसनपुरा (उपन्यास) हरिराम मीणा / रजनी मोरवाल, अँगूठे पर वसीयत (उपन्यास) रमेश शर्मा / शोभनाथ शुक्ल, माफ करना यार (संस्मरण) राकेश शर्मा / बलराम, बिना मतलब (कहानी संग्रह) संदीप वर्मा / राजासिंह, वे रचना कुमारी को नहीं जानते (व्यंग्य संग्रह) कमलेश पाण्डेय / शांति लाल जैन, तीस पार की नदियाँ (कविता संग्रह) डॉ. नीलोत्पल रमेश / सत्या शर्मा 'कीर्ति', धूप में नंगे पाँव (संस्मरण) योगेन्द्र शर्मा / स्वयं प्रकाश, सुरंग में लड़की (कविता संग्रह) , हरिराम मीणा / राजेन्द्र नागदेव, जूता ज़िंदाबाद (कविता संग्रह) डॉ. मक्खन मुरादाबादी / अशोक अंजुम, फाँसी बाग (उपन्यास) राकेश भारतीय / नरेन्द्र नागदेव, सुन रहा हूँ इस वक्त  (कविता संग्रह) अश्विनीकुमार दुबे / सतीश कुमार सिंह, चाय की विश्व यात्रा (निबंध), आराधना झा श्रीवास्तव / कादंबरी मेहरा, दस कुंवारियों का दृष्टांत (नाटक संग्रह)
माटिन जॉन / कुमार संजय, खुलती रस्सियों के सपने (कविता संग्रह) अमरेंद्र मिश्र / राग रंजन।
केंद्र में पुस्तक-
खिड़कियों से झाँकती आँखें (कहानी संग्रह) अशोक प्रियदर्शी, डॉ. मधु संधु
सुधा ओम ढींगरा, रिश्ते (कहानी संग्रह) दीपक गिरकर, प्रो. अवध किशोर प्रसाद
पंकज सुबीर।
नई पुस्तक दृश्य से अदृश्य का सफ़र (उपन्यास) / सुधा ओम ढींगरा, गीली पाँक (कहानी संग्रह) / उषाकिरण खान, बर्फ़ के फूल (जया जादवानी की प्रेम कहानियाँ) संपादक : मनीषा कुलश्रेष्ठ, कहिये मंज़िल से इंतज़ार करे (उपन्यास)/ गजेन्द्र सिंह वर्धमान, ओ मारिया पिताशे (यात्रा संस्मरण) / प्रतिभा अधिकारी, इक्कीस फेरों का फ़रेब (उपन्यास) / सुनीता पाठक, यही तो इश्क़ है (ग़ज़ल संग्रह) / पंकज सुबीर, मन कस्तूरी रे (उपन्यास) / अंजू शर्मा, सरहदों के पार दरख़्तों के साये में (कविता संग्रह)/रेखा भाटिया, कुहासा छँट गया (कहानी संग्रह) / ममता त्यागी, फ़ैमिली बिज़नेस की सच्चाइयाँ (​प्रबंधन) लेखक : हेनरी हॅचेसन / अनुवाद : इंज़ी. राजेन्द्र जैन, कोई ख़ुशबू उदास करती है (कहानी संग्रह) / नीलिमा शर्मा, अपनी सी रंग दीन्हीं रे (कहानी संग्रह) / सपना सिंह, शह और मात (कहानी संग्रह) / मंजुश्री, कुम्हलाई कलियाँ (कहानी संकलन) / सीमा शर्मा, हाशिये का हक़ (साझा उपन्यास) / नीलिमा शर्मा, डॉ. रंजना जायसवाल,  डॉ. गीता द्विवेदी, डॉ. जया आनंद, बहती हो तुम नदी निरंतर (गीत संग्रह) / श्याम सुंदर तिवारी, हरे स्कर्ट वाले पेड़ों के तले (कहानी संग्रह) / नीलम कुलश्रेष्ठ, कब तक माफ़ करेगी अम्मा (कविता संग्रह) / नीरज पाराशर, द= देह, दरद और दिल (कहानी संग्रह) / विभा रानी।
उपन्यास अंश - सीतायन (बांग्ला उपन्यास) मल्लिका सेनगुप्ता, अनुवाद : सुशील कान्ति डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
ऑन लाइन पढ़ें-    
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वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 21, अप्रैल-जून 2021 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 6, अंक : 21, अप्रैल-जून 2021 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय, विस्मृति के द्वार - धीरे-रे खुलें किवाड़, उषा प्रियम्वदा, कथा कहानी- भ्रम- कविता वर्मा, पानी की परत- चौधरी मदन मोहन समर, छतरी- सुमन कुमार घई, मास्टरनी का जादूमंतर- इला सिंह, चिन्ना वीदू- विनीता शुक्ला, अनछुआ- अंशु जौहरी, फटा हुआ बस्ता- डॉ. रमाकांत शर्मा। लघुकथा - पाव रोटी- किसलय पंचोली, जुण- उपहार- सुनील गज्जाणी। भाषांतर- क़ब्ज़ा कर लिया गया मकान - लातिन अमेरिकी कहानी, जूलियो कोर्टाज़ार- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय। लिप्यांतरण- लघुकथाएँ - मूल : डॉ. अशफाक़ अहमद, अनुवाद: सेवक नैयर। आलेख- जनसंचार का बदलता परिदृश्य- नंद भारद्वाज। व्यंग्य- ख़ाली स्थान की सुरंगों से- धर्मपाल महेंद्र जैन, शादी-ब्याह की नेटवर्किंग में जनवासा क्वारिण्टीन - डॉ. रंजना जायसवाल। पहली कहानी- मेरा नाम सुहानी है...- जुगेश कुमार गुप्ता। शहरों की रूह- मन के कैमरे में कैद बीजिंग (चीन) - शशि पाधा। संस्मरण- 'भिट्ट' जाने का वह सुख- कृष्णकुमार 'आशु'। यादों के झरोखे से- चश्मे की खोज- डॉ. अफ़रोज़ ताज। दोहे- जय चक्रवर्ती। ग़ज़ल- अशोक अंजुम। कविताएँ- अरुण सातले, नरेश अग्रवाल, शैलेन्द्र चौहान, अनुजीत इकबाल, कमलेश कमल, रश्मि प्रभा। आख़िरी पन्ना 82 आवरण चित्र- राजेंद्र शर्मा, रेखाचित्र - रोहित प्रसाद, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

 होली का त्योहार आकर बीत भी गया। कोरोना के कारण हर तरफ़ एक प्रकार का डर फैला हुआ है। मगर फिर भी होली का आयोजन यहाँ ब्लॉग पर पूर्व की तरह हो पाया है तो उन रचनाकारों के कारण जो ब्लॉगिंग के इस कठिन समय में भी ब्लॉग की इस देहरी पर अपनी रचनाओं के दीप रखने आ जाते हैं। बासी होली की परंपरा भी ब्लॉग पर रही है, तो आज हम बासी होली मनाते हैं। होली के सात दिन बाद तक, मतलब शीतला सप्तमी तक यह परंपरा चलती है।
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

अभिनव शुक्ल
चिरकुटों ने भांग घोली, आ गई होली,
दोस्ती है, दुश्मनी थी, आ गई होली।
बस गले मिल कर गिरीं बूँदें टपर टप टप,
मैं न बोला, तू न बोली, आ गई होली।
तितलियाँ हर दिन परखती हैं बगीचे को,
फूल ने तितली टटोली, आ गई होली।
सुबह उठ कर ये लगा मौसम नशीला है,
हमने फिर तारीख़ देखी आ गई होली।
रंग यूँ बिखरे कि सारी बंदिशें टूटीं,
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली।

होली के तमाम रंगों को समेटे हुए हुए है यह ग़ज़ल। होली के त्योहार के सामने आते ही जो चीज़ें याद आती हैं उनतें भांग, रंग, बंदिशों का टूटना जैसी बातें होती हैँ। अभिनव ने भी इन सब का ही उपयोग कर के बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है। मतले में अपने नाम का उपयोग ठीक पहले ही शब्द में बहुत अच्छे से किया है। बहुत सुंदर ग़ज़ल।

गिरीश पंकज
''फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली''
जिंदगी का राग सहसा गा गई होली
बूढ़े, बच्चे, नौजवां सब बावरे दिखते
सबके जेहन में यहाँ पे छा गई होली
ज़िंदगी सहसा लगे रंगीन लोगों को
इस कदर हर शख्स को ही भा गई होली
रंग मस्ताने हुए कुछ चोलियां भींगी
देख गोरी को बहुत शरमा गई होली
देख कर के बावरा सबको हुआ ऐसा
बिन पिये ही भंग कुछ बौरा गई होली
भूल कर अलगाव सारे एकरस देखो
प्यार के रंगों  से यूँ नहला गई होली
चढ़ गई थी भंग फिर उतरी नहीं पंकज
होली तो 'हो ली' बहुत दिन ना गई होली

गिरीश जी की यह दूसरी ग़ज़ल है, उनकी पहली ग़ज़ल हम होली के दिन सुन चुके हैं। हाँ ये बात अलग है कि यह ग़ज़ल उन्होंने भांग चढ़ाने के बाद लिखी है, क्योंकि इसमें क़ाफिया सरक गया है, सरक गया है मतलब ई की मात्रा से आ की मात्रा हो गया है। इस बार क़ाफिये को लेकर जो दो विकल्प थे उनमें दोनों में ई की मात्रा थी, मगर शिवबूटी पीकर सब उल्टा पुल्टा हो जाता है। मगर ग़ज़ल बहुत अच्छी कही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि जहाँ लोग एक ही नहीं कह पा रहे थे, वहाँ गिरीश जी ने दो ग़ज़लें कह दी हैं। सुंदर ग़ज़ल।

राकेश खंडेलवाल
खुल गए एकाकियत के बंद दरवाजे
ठण्ड  से जकड़े बदन में हलचलें जागीं
रात की फैली हुई चादर ज़रा सिकुड़ी
धूप ने गुदड़ी उठा कर ताक पर टांगी
खोल प्राची का बगीचा एक गौरैय्या
आ फुदकती नाचती हो सुरमयी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

हाथ सरसों के किये हैं खेत ने पीले
अब बिखरते रंग सूखे और कुछ गीले
आ गई अंगनाई में सारी पड़ोसन आज
भाभियों के साथ मिल कर के मटर छीले
इक हिनाई हाथ की थपकी पडी तो फिर
बन्नियों के गीत गाती  ढोलकी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

कह रहा है जेठ, भाभी आओ मैं रंग दूँ
गाल की रंगत गुलाबी और कुछ कर दूँ  
चंग पर बजते बिरज के जो सरस रसिये
उन मिठासो के शहद को होंठ पर धर  दूँ
तो कहे नटखट ग्वालिन नैन मटका कर
खा गयी देवर बुढाउ भंग की गोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

राकेश जी के गीत सचमुच ऐसे होते हैं कि उन पर कोई टिप्पणी करने की जगह बस सुनते रहने की इच्छा होती है। यह गीत भी ऐसा ही है। कैसे-कैसे चित्र बना देते हैं वे अपने शब्दों से। ऐसा लगता है जैसे हम गीत नहीं सुन रहे हैं, बल्कि स्मृतियों के गलियारों में टँगे हुए चित्रों को देख रहे हैं। पूरा गीत होली के समूचे माहौल को सजीव करता हुआ गुज़र जाता है। बहुत ही सुंदर गीत।

आप सबको होली तथा रंगपंचमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। आनंद से रहिये और दाद देते रहिये।

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