सोमवार, 21 मार्च 2022

आइए आज चरणजीत लाल जी, तिलक राज कपूर जी, राकेश खंडेलवाल जी और सौरभ पाण्डेय जी के साथ मनाते हैं बासी होली।

बासी होली का अपना ही आनंद होता है। हर त्यौहार का एक बासी संस्करण होता है। यह संस्करण इसलिए होता है कि हम एकदम से त्यौहारों के ख़ुमार से बाहर नहीं आना चाहते हैं। हमारे यहाँ तो हर त्यौहार लगभग सात-आठ दिन तक मनाया जाता है। और यह जो बाद में मनाया जाता है यही तो बासी त्यौहार होता है। जिस प्रकार बासी पूरियों को बासी कढ़ी या बासी रायते के साथ खाने का आनंद होता है इसी प्रकार बासी त्यौहार का भी आनंद होता है। और होली के पर्व का समापन तो वैसे भी एक ऐसे त्यौहार से होता है जिसमें बासी भोजन किया जाता है, शीतला सप्तमी का त्यौहार।

ले गुलाबी दुआ जा तुझे इश्क़ हो

आइए आज चरणजीत लाल जी, तिलक राज कपूर जी, राकेश खंडेलवाल जी और सौरभ पाण्डेय जी के साथ मनाते हैं बासी होली।

चरनजीत लाल

 ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क़ हो
गुंचा-ए-दिल खिला, जा तुझे इश्क़ हो
साज़-ए-दिल पे कोई रागिनी छेड़ दे
रंग-ए-महफ़िल जमा, जा तुझे इश्क़ हो
इस रंगीली सी होली की मस्ती में तू
बस गुलाल उड़ा, जा तुझे इश्क़ हो
चाँद पूनम का बरसा रहा चाँदनी
भीग इसमें ज़रा, जा तुझे इश्क़ हो
सातरंगा धनक, भीगी-भीगी फ़ज़ा
महज़बीं को झुला, जा तुझे इश्क़ हो
ज़ुल्फ़ की बदलियों से जो है झाँकता
उस क़मर पे फ़िदा, जा तुझे इश्क़ हो
नर्गिसी आँखों से ज़ौक़-ए-बादा-कशी
भूल जा मय-कदा, जा तुझे इश्क़ हो
ज़िंदगी में मुक़ाबिल मुसीबत हैं जो
सब धुएं में उड़ा, जा तुझे इश्क़ हो
इश्क़ आशिक़ भी है और माशूक़ भी
ये पहेली बुझा, जा तुझे इश्क़ हो
तिश्ना-लब ज़िंदगी में हों जब भी ‘चरन’
जाम-ए-उलफ़त पिला जा तुझे इश्क़ हो

मतले में ही बहुत अच्छे से गिरह को बाँधा गया है। सच कहा है कि दिल का गुंचा खिलने के लिए सबसे ज़रूरी होता है इश्क़ का होना। और जो रागिनी साज़े दिल पर छेड़ी जाती है उसी से महफ़िल का रंग सजता है। जब पूनम का चाँद चाँदनी बरसाने लगता है तो उसमें भीग जाने का नाम ही मुहब्बत होता है।जब सात रंगों का धनक खिल उठता है और फ़ज़ा ख़ुशनुमा हो जाती है, तब उसे ही इश्क़ का मौसम कहा जाता है। नर्गिसी आँखों से जो मय पी ली जाती है तो मयकदा फिर भूली बिसरी बात हो जाता है। और फिर वही एक बात कि जब इश्क़ में हो तो उसके बाद हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाना ही चाहिए। इश्क़ आशिक़ भी होता है और माशूक भी और इसी पहेली को सुलझाने का नाम ही इश्क़ होता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

तिलक राज कपूर
रंग ले इक नया, जा तुझे इश्क़ हो
मन बना बावरा, जा तुझे इश्क़ हो।
रास राधा किशन का लिये सोच में
रंग में डूब जा, जा तुझे इश्क़ हो।
हर तरफ़ खुद में खोये हुए लोग थे
में किसे बोलता, "जा तुझे इश्क़ हो"।
दर्प के रंग में डूब कर क्या मिला
रंग ले प्यार का, जा तुझे इश्क़ हो।
मकतबे इश्क़ है इक सज़ा या मज़ा
खुद लगाले पता, जा तुझे इश्क़ हो।
एक झोंका हवा का हुआ फागुनी
कान में कह गया, "जा तुझे इश्क़ हो"।
इश्क़ की ये फुहारें तो शुरुआत हैं
डुबकियाँ कुछ लगा, जा तुझे इश्क़ हो।
वो फकीरों सी मस्ती में नाचा किया
और गाता रहा, "जा तुझे इश्क़ हो"।
जो तुझे चाहिये वो मुझे है पता
"ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क़ हो।"

ज़िंदगी के रंगों से अलग जब कोई नया रंग हम अपने लिए चुनते हैं तभी तो हम इश्क़ में होते हैं, यही तो मतले की भाव से पता चल रहा है। होली के चिरंतन नायक-नायिका राधा और कृष्ण को अपने ध्यान में लाए बिना कैसी होली। जब तक आप अपने आप में ही खोए हैं, तब तक आपको इश्क़ हो ही नहीं सकता क्या सुंदर बात कही है। और अगले ही शेर में प्रेम ओर दर्प की तुलना क्या कमाल तरीके से की गई है। मकतबे इश्क़ सज़ा है या मज़ा यह तो वहाँ दाखिला लेने के बाद ही पता चलेगा क्या ही सुंदर बात। हवा के फागुनी झोंके का कान में कहना कि जा तुझे इश्क़ हो वाह। इश्क़ फुहारों का नाम नहीं, इश्क़ तो डुबकी लगाने का नाम है। फ़कीरों की मस्ती में नाचते हुए दुआ देना कि जा तुझे इश्क़ हो वाह क्या बात है। और अंत में गिरह का शेर भी बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ कहा गया है। वाह वाह वाह सुुदर ग़ज़ल।
 

राकेश खण्डेलवाल
अपने यौवन की सीढ़ी पे पग जब धरे
अपनी रफ़्तार से और आगे बढ़े
तब तुझे इश्क़ हो, अपने परिवेश से
अपने वातावरण और निज देश से
इश्क़ उससे हो जो न प्रदूषण करे
अपने संग दूसरों के दुखो को हरे
निष्ठ रह काम में चाहे जो रिस्क हो
है गुलाबी दुआ, इस तरह इश्क़ हो

इश्क़ उससे जो नारे लगाए नहीं
काम के वास्ते, हिचकिचाए नहीं
भ्रष्ट हर आचरण का विरोधी रहे
सत्य हो शब्द में, जो अधर से बहे
अगली पीढ़ी की चिंता अभी से करे
वायु में, जल में कोई भी विष न भरे
तेरे व्यवहार में, कुछ न संदिग्ध हो
है गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क़ हो

इश्क़ परवान तेरा निरंतर चढ़े
कोई जिसके असर से न बच कर रहे
वादियाँ हों नई, हों फ़िज़ाएँ नई
नव दिशा ढूँढ चल दे घड़ी की सुई
तुझको आदर्श दुनिया को देने नए
कामयाबी तेरे पाँव आदर छुए
एक संकल्प हो, और कुछ मिक्स हो
ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क़ हो

क्या ही कमाल का गीत है। पूरा गीत एक मुकम्मल इंसान को बनाने के लिए लिखा गया है। प्रकृति के साथ रहने के लिए जिस प्रकार का इंसान चाहिए इसकी पूरी वयाख्या है इस गीत में। एक जवान होते लड़के को इसके अलावा और क्या दुआ दी जा सकती है। कि वह प्रकृति से भी प्रेम करे और देश से भी। उससे इश्क़ करे जो भ्रष्ट न हो, जो नारे नहीं लगवाता हो, जो सच बोलता हो। जिसके मन में अगली पीढ़ी की चिंता हो। जो जल और वायु को प्रदूषित न करे। एकदम नए आदर्शों का पाठ लेकर यह गीत कुछ नए तरीके से इन्सान को गढ़ने की बात कर रहा है। नई​ दिशा में चल रही घड़ी की सूई भी इसी की तरफ़ इशारा कर रही है। एकदम नए तरीके से लिखा गया गीत है, नए इंसान का गीत है। बहुत सुंदर गीत वाह वाह वाह। 


 सौरभ पाण्डेय
पुतलियों ने कहा जा तुझे इश्क हो
फागुनी है हवा, जा तुझे इश्क हो
हैं कई मायने रंग औ’ गंध के
गर नहीं ये पता, जा तुझे इश्क हो
चुन रहे थे सदा कौडियाँ, शंख-सीप
फिर समुंदर हँसा, ’जा तुझे इश्क हो’
चैत्र-बैसाख की थिर-मदिर साँझ में
टेरती है हवा.. ’जा तुझे इश्क हो’
देख कर ये गगन गेरुआ-गेरुआ
गा उठी है धरा, जा तुझे इश्क हो
उपनिषद गा रहे सुन सखे, बावरे,
एक ही फलसफा --जा तुझे इश्क हो !
दे किताबें मुझे जो मुहब्बत पढ़ें,
या रहूँ अनपढ़ा, जा तुझे इश्क हो
जिंदगी बस नहीं निरगुनी धुन-लगन
ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क हो

पुतलियों के कहने के साथ शुरू हो रहा मतला फागुन की हवा के पास तक पहुँचता है। सच कहा कि रंग और गंध के कई अर्थ होते हैं लेकिन उनको समझने के लिए इश्क़ करना बहुत ज़रूरी होता है। कौड़ियाँ और सीप तलाश रहे लोगों पर समंदर का हँस कर कहना कि जा तुझे इश्क़ हो और तू गहरे डूब के मोती निकाले। वाह। चैत्र की मदिर साँझ में हवा का टेर कर कहना कि जा तुझे इश्क़ हो बहुत सुंदर दृश्य चित्र। गगन को गेरुए रंग में रँगे हुए देख कर धरा का कहना कि जा तुझे इश्क़ हो, बहुत ही सुंदर। उनपनिषद से लेकर सारे धर्म ग्रंथ एक ही बात कहते हैं कि जा तुझे इश्क़ हो। सच कहा कि वही किताबों को मुझे दो जो मुहब्बत पढ़ाती हों नहीं तो मुझे अनपढ़ा रहने दो। और अंत में यह कि ज़िंदगी केवल निरगुन नहीं बहुत कुछ सगुन भी है, मगर उसके लिए इश्क़ करना होता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

 

आज के चारों रचनाकारों ने अपनी रचनाओं से बासी होली को सार्थक कर दिया है। आपका काम है कि दिल से दाद दीजिए इन तीनों रचनाकारों को। इसके बाद अगर भभ्भड़ कवि आते हैं तो उनके साथ समापन होगा मुशायरे का।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय चरनजीत जी ने ग़ज़ल की रवायत को बड़ी ख़ूबसूरती से निभाया है। बहुत अच्छे अश’आर हुये हैं। बहुत बहुत बधाई आदरणीय चरनजीत जी को।

    आदरणीय तिलक राज जी की ग़ज़ल ख़ूबसूरत अश’आर से सजी हुई है। हर तरफ ख़ुद में खोये हुये लोग थे… आज के हालात पर बहुत अच्छा शे’र हुआ है। एक झोंका हवा का.. बहुत ख़ूबसूरत शे’र है। आदरणीय तिलक राज जी को बहुत बहुत बधाई इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिये।

    आदरणीय राकेश तो एक नये अंदाज में सामने आये हैं इस बार। पर्यावरण बचाने और भ्रष्टाचार मिटाने जैसे कार्यों को इश्क़ के माध्यम से करने की बात लाजवाब कर देती है। बहुत सुन्दर गीत हुआ है। बासी होली के अवसर पर एकदम ताज़गी भरा गीत हुआ है। बहुत बहुत बधाई आदरणीय राकेश जी को।

    आदरणीय सौरभ जी का शब्द शिल्प कमाल का है। हैं कई मायने.. तथा चुन रहे थे सदा.. बड़े ही सुन्दर अश’आर हुये हैं। बहुत बहुत बधाई आदरणीय सौरभ जी को इस शानदार ग़ज़ल के लिये।

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  2. कितनी बेहतरीन रचनायें हैं सभी की सभी एक से बढ़ कर एक ।

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  3. सभी की बेहतरीन रचनाएँ हैं। यह सिलसिला जारी रहे। होली का आनंद आ जाता है।

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  4. इस बार तरही की जब घोषणा हुई तब फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन्, फ़ायलुन् जैसी बह्र देखकर लगा कि इस बार तो ग़ज़ल कहना बहुत आसान रहेगा। यह भ्रम तत्काल ही टूट गया जब रदीफ़ पर ध्यान दिया। 'जा तुझे इश्क़ हो' जैसा भविष्य काल का किसी के द्वारा किसी के लिये कहा गया पूर्ण वाक्य मिसरा-ए-सानी के बचे हुए 2 फ़ायलुन् के साथ टेढ़ी खीर निकला। शेर कहने के बाद कई बार मिसरा-ए-ऊला और मिसरा-ए-सानी का राब्ता स्पष्ट होता न दिखा। इस तरही में भाग लेने और इस तरही से भाग लेने में बहुत अंतर नहीं बचा था। एक अच्छी खा़सी कवायद हो गयी और किसी तरह हाजिरी लग सकी। सभी भाग लेने वालों को बधाईयॉं और उन सभी का आभार।

    अब भभ्भड़ भाई भौंचक्के की प्रतीक्षा है।

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  5. सभी गजलकारों को बहुत बहुत बधाई, उनकी उत्कृष्ट रचना के लिए।। वास्तव में लंबे रदीफ के साथ भाव को बरकरार रखते हुए सार्थक शे'र कहना कठिन ही होता है। इसमें महारत ऐसे कई लंबे रदीफ के साथ मशक्कत करने के बाद आती है । बहरहाल होली पर मुनक़्क़ीद यह मुशायरा अच्छी तरह से गुजरा और हम सबने इसमें भागीदारी दर्ज कराकर इस मुशायरे को रंगीन व रसदार बनाने में सफल रहे। आप सब को मुबारकबाद।

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  6. बासी होली के बाद आज रंगपंचमी ! बासंतिक बयार विभिन्न रंगों के उद्भव का कारण होती है.
    इस अंक में सम्मिलित विद्वानों के साथ अपनी प्रस्तुति को देखना सुखकर है.
    शभी शाइरों को हार्दिक शुभकामनाएँ.

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