बुधवार, 3 नवंबर 2021

आइये तरही मुशायरे के क्रम को आज आगे बढ़ाते हैं चार शायरों और एक कवयित्री के साथ। दिगम्बर नासवा, धर्मेंद्र कुमार सिंह, सुधीर त्यागी, गुरप्रीत सिंह और रेखा भाटिया की रचनाओं के साथ।

उजाला और अँधेरा, यह हमारे जीवन के दो पक्ष हैं। दोनों के बीच से होकर हमारा जीवन गुज़रता रहता है।जीवन हमेशा अँधेरों से उजाले की तरफ़ जाने को ही बेचैन रहता है। दीपावली का पर्व इसी बेचैनी का प्रतीक होता है। जब हम दीपकों के माध्यम से प्रकाश फैला कर एक अँधेरी रात को रोशन करने का प्रयास करते हैं। अमावस की रात दीपकों के उजाले से जगमग हो जाती है। आज छोटी दीपावली के अवसर पर आइये रचनात्मक प्रकाश से अपने समय को रोशन करने का संकल्प लें।
उजाले के मुहाफ़िज़ हैं तिमिर से लड़ रहे दीपक
आइये तरही मुशायरे के क्रम को आज आगे बढ़ाते हैं चार शायरों और एक कवयित्री के साथ। दिगम्बर नासवा, धर्मेंद्र कुमार सिंह, सुधीर त्यागी, गुरप्रीत सिंह और रेखा भाटिया की रचनाओं के साथ।

 दिगम्बर नासवा

हिफाज़त से रखो यूँ भी हैं काली रात के दीपक
जलेंगे देर तक तूफ़ान से जो बच गए दीपक
बिना मांगे ही अपनी रौशनी सबको लुटाते हैं
सितारे, चाँद, जुगनू, आग, सूरज और ये दीपक

तुम अपनी ओढ़नी से ढांप लेना उम्र भर मुझको
हमारी आरज़ू के जल रहे हैं देर से दीपक
गली में तीरगी के वे चले आए हैं बे-परदा
बहाना जलने का करने लगे हैं ये मुए दीपक

मिलेगी रौशनी यक्साँ भले रंगत जुदा होगी
वे सोना हो, के पीतल हो, के मिट्टी के बने दीपक
है मेरी ज़िन्दगी का मुख़्तसर सा ख्वाब बस इतना
ज़रूरत के मुताबिक़ बन सकूँ सबके लिए दीपक

तुम इनका हौसला, अरमान, ख्वाहिश, जुस्तजू देखो
उजाले के मुहाफ़िज़ हैं तिमिर से लड़ रहे दीपक
 सबसे पहले तो मतले की ही बात की जाए, कितनी सुंदरता के साथ मतले में एकदम नए प्रतीक के साथ बात कही गई है। और उसके बाद के शेर में दीपक के बहाने सभी की बात बहुत सुंदर।पहली बार ओढ़नी के माध्यम से प्रेम की बात भी इस मुशायरे में आई है, कवि वही जो हर जगह प्रेम की तलाश कर ले। और उसके बाद किसी के बेपरदा आने से दीपकों का जलना वाह क्या बात है।  अलग-अलग दीपकों की रोशनी एक ही होने की बात तो बहुत कमाल है, सोने या मिट्टी का दीपक उजाला एक सा ही करता है।सबके लिए दीपक बनने का सपना भी बहुत सुंदर है। और अंत में गिरह का शेर भी बहुत सुंदर बनाया है। वाह वाह वाह, बहुत सुंदर ग़ज़ल

धर्मेन्द्र कुमार सिंह

उजाला पढ़ रहे थे देर तक अब थक गये दीपक
दुबारा स्नेह भर दें हम बस इतना चाहते दीपक
हैं जिनके कर्म काले, वो अँधेरे के मुहाफ़िज़ हैं
सब उजले कर्म वाले जल रहे बन शाम से दीपक

दिये का कर्म है जलना दिये का धर्म है जलना
तुफानी रात में ये सोचकर हैं जागते दीपक
अगर बढ़ता रहा यूँ ही अँधेरा जीत जाएगा
उजाले के मुहाफिज़ हैं, तिमिर से लड़ रहे दीपक

इन्हें समझाइये इनसे बनी सरहद उजाले की
बुझे कल दीप इतने हो गये हैं अनमने दीपक
अँधेरे से तो लड़ लेंगे मगर प्रभु जी सदा हमको
बचाना ब्लैक होलों से यही वर माँगते दीपक

जलाने में पराये दीप तुम तो बुझ गये ‘सज्जन’
तुम्हारी लौ लिये दिल में जले सौ-सौ नये दीपक
  क्या ही सुंदर मतला है, एकदम ताज़गी से भरपूर उजाले को पढ़ने का प्रयोग एकदम अनूठा है। अति सुंदर। अगले ही शेर में एकदम  व्यंजना के माध्यम से हमारे समय के रहनुमाओं पर बहुत कमाल का प्रहार है।गिरह का शेर भी बहुत सुंदर है, जिसमें अँधेरे और उजाले के संघर्ष का चित्रण किया गया है।और अगले शेर में दीपकों के बहाने सत्य की लड़ाई लड़ रहे सैनिकों के अनमने होने की बात बहुत सुंदर है। ब्लैक होल रूपी अंधकार से बचाने की दुआ असल में हमारे आसपास के ब्लैक हौल्स पर कटाक्ष है। मकते का शेर भी बहुत सुंदर है, जिसमें लौ से लौ जलाने का प्रयोग बहुत अनूठा है। वाह वाह वाह, बहुत सुंदर ग़ज़ल
 
सुधीर त्यागी

वजूदे कमतरी में भी, लड़ाई ठानते दीपक
उजाले के मुहाफ़िज़ है, तिमिर से लड़ रहे दीपक
रहे महफूज़ ये दुनिया, जलाया सुब्ह तक खुद को
हवाले शम्स के करके, सुकूं से सो गए दीपक

बड़ी मुश्किल से मैंने की, जहाँ दीदार की कोशिश
मिले दीवार पर मुझको, कई पहचान के दीपक
हवा छू कर कई लरजे, कई की बढ़ चुकी थी लौ
किसे मालूम था होंगे, ग़ज़ब के मनचले दीपक

करोड़ों तारे रोज़ाना, फ़लक पे टिमटिमाते हैं
ख़ुदा का शुक्र है जिसने, सजाए अर्श पे दीपक
  मतले में ही दीपकों की बात बहुत सुंदर तरीके से कही गई है, वजूदे कमतरी के बाद भी लड़ाई ठानते हुए दीपकों का बिम्ब बहुत अच्छा है।अगला ही  शेर और कमाल का है जिसमें सुबह तक जलते रहे दीपक के बलिदान की कहानी बहुत अच्छे से कही गई है। और अगला शेर एक बार फिर प्रेम की दुनिया में ले जाता है हमको, पहचान के दीपक बहुत सुंदर प्रयोग है। अगले शेर में भी प्रेम की दुनिया में हवा छूकर लरजने और लाै बढ़ने के बिम्ब बहुत सुंदर हैं यहाँ मनचले दीपकों का प्रयोग भी बहुत सुंदर है। अंतिम शेर में सितारों के सामने दीपकों की रोशनी की तुलना बहुत अच्छे से की गई है।  वाह वाह वाह, बहुत सुंदर ग़ज़ल

गुरप्रीत सिंह
 
तिमिर से लड़ते-लड़ते सुबह तक जो आ गए दीपक
किसी को याद है? इनके सिवा भी और थे दीपक
मुझे दीपावली पर ये बहुत कुछ याद करवाएं
तुम्हारी ज़ुल्फ जैसी शब, तुम्हारी आंख से दीपक

ज़रा लहरा के आंचल तुम जो इनके पास से गुज़रे
मुझे ऐसा लगा जैसे ज़रा सा हँस दिए दीपक
किसी का रास्ता रौशन करें जैसे भी हो पाए
बनें सूरज, बनें जुगनू, बनें या फिर भले दीपक

भले ही कम हैं गिनती में, निभाए जा रहे हैं फर्ज़
उजाले के मुहाफिज़ हैं तिमिर से लड़ रहे दीपक
तुम्हारी ज़िंदगी में रौशनी यूं ही नहीं 'जम्मू'
कोई है, जो जगाता है तुम्हारे नाम के दीपक
 क्या ही कमाल का मतला है, उसमें भी मिसरा सानी तो एकदम ज़बरदस्त है, इस प्रकार से भी इस मिसरे पर लिखा जा सकता है, यह नहीं सोचा था। बहुत सुंदर। और दीवावली की रात को शायर को किसी की ज़ुल्फ़ें और किसी की आँखें याद आ जाना, वाह क्या बात है। और अगले शेर में भी वही आलम है कि किसी के पास से आँचल लहरा के गुज़र जाने में ही दीपक हँसने लगते हैं। किसी का रास्ता रोशन करने की कामना लिए दीपक बन जाने की इच्छा बहुत सुंदर है। गिरह का शेर भी बहुत सुंदर बना है। और मकते का शेर एक बार फिर से कमाल का बना है, प्रेम की क्या सुंदर प्रस्तुति है इस शेर में। वाह वाह वाह, बहुत सुंदर ग़ज़ल

रेखा भाटिया 

माँ की आस के दीपक
सजा है मेरा शहर, मेरे भारत देश में
सजी है हर दुकान, सजा है हर कोना
भर्र-भर्र भाग रही गाड़ियाँ, धुआँ उड़ा रही
लोग पैरों में भी पहिये लगा गज़ब ढा रहे
धमाके पटाकों  के, मंदिरों  की घंटियाँ
फेरीवालों की आवाजें, बुलाते रंगोली ले लो
दीये ले लो, असली माहेश्वरी साड़ियाँ
अरे बहनजी ले लो, बहुत बढ़िया माल
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सुहानी शामें
हर मुख पर रौनक है, चमक ख़ुशियों  की
हर किसी को जल्दी है, असंख्य काम हैं निपटाने
उमंगें भरी हैं कूट-कूट कर, इंतज़ार रहा साल भर
नया क्या ख़रीदा जाएगा, पुराना क्या जाएगा
झाड़न,रंगाई, धुलाई, सिलाई, खरीदारी
मेरे घर का आँगन, तैयारी कर रहा स्वागत की
माँ लक्ष्मी के आने की, बहुत उम्मीदों के साथ
इस दिवाली आएगा सुख, वैभव, समृद्धि
दिवाली की यादें, बिता मेरा बचपन, घर का आँगन
रामायण देख दिमाग में राम-रावण का होता युद्ध
पिताजी का लाड़ बिगड़ता, माँ की सख्ती फटकारती
पाई-पाई जोड़ माँ जोड़ती थी घर का कोना-कोना
खरीद लाती थीं घर की ख़ुशियाँ, जुगाड़ लगाती
हमें चढ़ा अटारी उतरवातीं उनका कुबेर का खज़ाना
लिके -छिपे, धूल से पटे, तेल से सने, बदरंगे पुराने दीये
धुलवाती बड़े चाव से फिर छज्जे पर  धूप सेंकते दीये
तोरण, झालर, फूलों वाली चादर, पेटी में दबा कालीन
शोख़-नर्म, करीने से बाहर आ इतराते, घर में सज जाते
इठलाते हम भी, काया पलट जाती, घर महल-सा
माँ दीयों में भर तेल मुँडेर पर जगाती, रोशन आँगन होता
हम निभाते परम्परा, हवा के झोंके से दीयों को बचाते
बुझने से पहले, नन्ही अँगुलियों से ढाँप लेते माँ की आस
आज यहाँ बैठे हैं महलों में माँ से दूर, यहाँ नहीं है माँ के दीये,
अटारी में छिपा माँ का कुबेर का खज़ाना, पाई-पाई का जोड़,
पिताजी का लाड़, माँ की सख़्ती और रामायण का युध्द
यहाँ तो है टी लाईट कैंडल्स, शॉपिंग, दिवाली की पार्टियाँ, नाच-गाना
हजारों डॉलर खर्च कर कर भी ख़ुश होता नहीं मन का कोना-कोना
कैसे विवेकी माँ खरीद लाती थी ख़ुशियाँ थोड़े में, जोड़ती घर को

इस दिवाली नहीं जोड़ पाई माँ खुशियाँ, कोरोना में खो गई
किसी के पिता की, माँ की, भाई-बहन की अनमोल ज़िंदगियाँ
याद करते हैं हमें निभानी है माँ की परम्परा, हम माँ से सक्षम नहीं
फिर भी, रक्षा करेंगे बुझते दीयों की हवा के हर झोंके से
उजाले के मुहाफ़िज़ हैं, तिमिर से लड़ रहे दीपक हम
हम माँ की आस हैं, बुझने न पाए कोई साथी,कोई परिवार
इस दिवाली याद कर बचपन मुस्कान लौटा लाएँगे सबकी !
  इस कविता को पढ़कर क्या कहा जा सकता है, बस कुछ समय के लिए हम स्तब्ध और नि:शब्द रह जाते हैं। हम सभी के जीवन में जो दीपावलियाँ बचपन में आईं, उनकी यादें हम सबके पास सुरक्षित हैं। उन्हीं यादों को शब्द प्रदान कर दिए हैं रेखा जी ने। ऐसा लगता है जैसे हम कविता नहीं पढ़ रहे, बल्कि स्मृति के गलियारे से होकर गुज़र रहें हैं, सब कुछ देखते हुए। छोटी-छोटी बातों को किस सुंदर तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है, कमाल। और उसके बाद अंतिम पंक्तियों में जैसे दर्द का गहरा सागर उमड़ पड़ता है। विशेषकर वह पंक्तियाँ कि हम माँ से सक्षम नहीं। यह कविता एक यात्रा है, जिसके पूरी होने के बाद हम बस ख़ामोश बैठे रह जाते हैं। कविता बेचैन कर जाती है हमें। वाह वाह वाह, बहुत सुंदर कविता।
 
आज के रचनाकारों ने समाँ बाँध दिया है। छोटी दीपावली का यह पर्व आज इन रचनाओं से रोशन हो गया है। आप सभी को छोटी दीपावली की शुभकामनाएँ, देते रहिये दाद इन रचनाकारों को , मिलते हैं अगले अंक में।

32 टिप्‍पणियां:

  1. सभी गजलकारों को बहुत बहुत बधाई।

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  2. दिगम्बर जी,धर्मेंद्र जी और डॉक्टर सुधीर के साथ गुरप्रीत जी की आज की ग़ज़लें कहीं कहीं रूमानी होते हुए भी दीपकों के तिमिर से लड़ने के हौसलें से लबरेज़ हैं। एक छोटा सा दीपक हिम्मत और हौसलें की इतनी बड़ी उपमा बन सकता है ये इस तरही की ग़ज़लों को पढ़ कर जाना।
    बहुत ही शानदार ग़ज़लें आज की।
    रेखा जी की कविता को क्या कहें,लगा बचपन में घूम रहे थे, मगन। और फिर कोरोना ने अपनी क्रूरता से ज़िंझोड़ दिया। असली दीवाली पर वो ही है है जो गली मोहल्लों में दोस्तों एयर लोगो के साथ अनुभव की जाती है। ख़रीदारी, तैयारी से लेकर दीवाली मनाने तक। बहुत सुंदर कविता।

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  3. आज प्रस्तुत कविता और चारों ग़ज़लें छोटी दीवाली का विशेष उपहार रहीं। सभी को इस अवसर पर बधाइयाँ।

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  4. सोना हो या पीतल हो या मिट्टी के बने दीपक --- बेहतरीन दिगंबर भाई.

    बुझे कल दीप इतने हो गए हैं अनमने दीपक--धर्मेंद्र की गहरी सोच का प्रतीक

    किसे मालूम था होंगे गज़ब के मनचले दीपक सुधीर जी की सुन्दर ग़ज़ल और
    गुरप्रीत जी का हंस दिए दीपक मुशायरे में जान दाल रहा है.
    रेखा भाटिया जी की रचना अपने आप में एक अनुभव है
    सभी को हार्दिक बधाई

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  5. मिलेगी रौशनी यक्साँ भले रंगत जुदा होगी
    वे सोना हो, के पीतल हो, के मिट्टी के बने दीपक।

    वाह वाह क्या शेर कहे हैं दिगम्बर नासवा जी ने अपनी इस गजल में। कितनी आसानी से ये शानदार शेर कह दिया है :
    बिना मांगे ही अपनी रौशनी सबको लुटाते हैं
    सितारे, चाँद, जुगनू, आग, सूरज और ये दीपक।
    वाह वाह बहुत खूब जी।

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  6. उजाला पढ़ रहे थे देर तक अब थक गये दीपक
    दुबारा स्नेह भर दें हम बस इतना चाहते दीपक
    वाह वाह क्या शानदार मतला है। वाकई बहुत अलग और बहुत ताजगी से भरा ये शेर। इसके अलावा भी धर्मेंद्र जी ने अपनी गजल बाकी सभी अशआर बहुत ही खूब कहे हैं जैसे

    अँधेरे से तो लड़ लेंगे मगर प्रभु जी सदा हमको
    बचाना ब्लैक होलों से यही वर माँगते दीपक
    वाह बहुत ही खूब जी

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  7. रहे महफूज़ ये दुनिया, जलाया सुब्ह तक खुद को
    हवाले शम्स के करके, सुकूं से सो गए दीपक
    सुधीर त्यागी जी ने बहुत ही पुख्ता शेरों से सजी गजल कही है। बहुत आनंद मिला उनकी यह गजल पढ़ कर। और यह शेर तो बिलकुल ही कमाल लगा :
    करोड़ों तारे रोज़ाना, फ़लक पे टिमटिमाते हैं
    ख़ुदा का शुक्र है जिसने, सजाए अर्श पे दीपक

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  8. रेखा भाटिया जी की रचना ने सभी को बहुत परभावित और जज्बाती किया है। और ऐसा होना ही था । यह रचना है ही ऐसी। वाह बहुत ही खूब ।

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  9. दिगम्बर नासवा

    प्रकाश पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
    "बिना मांगे ही अपनी रौशनी सबको लुटाते हैं
    सितारे, चाँद, जुगनू, आग, सूरज और ये दीपक"

    'दीपक' को सही पंक्ति में खड़ा किया है, निस्वार्थ दीपक, प्रेरणादायक।


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  10. धर्मेंद्र कुमार सिंह
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
    "उजाला पढ़ रहे थे देर तक अब थक गये दीपक
    दुबारा स्नेह भर दें हम बस इतना चाहते दीपक"

    नये अंदाज़ का शेर, सुब्हानल्लाह।

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  11. सुधीर त्यागी

    दीपावली मुबारक।

    "वजूदे कमतरी में भी, लड़ाई ठानते दीपक
    उजाले के मुहाफ़िज़ है, तिमिर से लड़ रहे दीपक"

    मतले में लाजवाब गिरोहबंदी।

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  12. गुरप्रीत सिंह

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
    तिमिर से लड़ते-लड़ते सुबह तक जो आ गए दीपक
    किसी को याद है? इनके सिवा भी और थे दीपक
    मुझे दीपावली पर ये बहुत कुछ याद करवाएं
    तुम्हारी ज़ुल्फ जैसी शब, तुम्हारी आंख से दीपक
    ज़रा लहरा के आंचल तुम जो इनके पास से गुज़रे
    मुझे ऐसा लगा जैसे ज़रा सा हँस दिए दीपक
    किसी का रास्ता रौशन करें जैसे भी हो पाए
    बनें सूरज, बनें जुगनू, बनें या फिर भले दीपक
    भले ही कम हैं गिनती में, निभाए जा रहे हैं फर्ज़
    उजाले के मुहाफिज़ हैं तिमिर से लड़ रहे दीपक
    तुम्हारी ज़िंदगी में रौशनी यूं ही नहीं 'जम्मू'
    कोई है, जो जगाता है तुम्हारे नाम के दीपक
    बहुत उम्दा अशआर निकाले है प्राजी। बहुत मुबारक बाद।

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  13. रेखा भाटिया

    शुभ दीपावली।

    लाजवाब रचना, पंकज जी ने सही कहा है "हम कविता नही पढ़ रहे स्मृति के गलियारे से गुज़र रहे है।"

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  14. दिगंबर नासवा जी, धर्मेंद्र जी, सुधीर त्यागी जी और गुरप्रीत जी आप सब से यहां मिला और तरही के ग़ज़ल सुन कर मन बहुत प्रसन्न हुआ है.
    रेखा भाटिया जी ने सम्पूर्ण घर और रिश्तों के दर्शन करा दिए।
    आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं
    - Sulabh Jaiswal

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  15. आज दोबारा से सभी रचनाएँ फिर से पढ़ीं , दिवाली की यादों की मीठी सौगात समझकर। एक से बढ़कर एक बेहतरीन रचनाएँ हैं। सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई। सच एक दीपक को लेकर बहुत विविधता के साथ सभी रचनाकारों ने विविध प्रयोगकर उम्दा रचनाएँ रची हैं और नई ऊचाइयों को छुआ है। हर रचना विशिष्ट है और रचनाकार की अपनी अगल विशिष्टता।
    आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ

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  16. धर्मेन्द्र जी तो हमेशा से ही कमाल करते हैं ... बेमिसाल और जुदा अंदाज़ की गज़ल कहने में माहिर हैं ...
    गुरप्रीत जी ने भी बहुत कमाल की गज़ल कही है ... दीपक का ही होंसला है जो सुबह तक जलता है ...
    सुधीर त्यागी जी की गज़ल और रेखा भाटिया जी की कविता लाजवाब है ... बचपन की गलियों से मिलवाने का बहुत धन्यवाद रेखा जी ...
    इस कामयाब मुशायरे की सभी को बहुत बहुत बधाई ...

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  17. आदरणीय दिगम्बर नासवा जी, सुधीर त्यागी जी, गुरप्रीत जी एवं रेखा जी को बहुत बहुत बधाई इन शानदार रचनाओं के लिए। आप सब दिग्गज रचनाकरों के साथ स्थान पाकर दिल से खुशी हुई। बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सुबीर जी को मेरी रचना को स्थान देने के लिये।

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