सोमवार, 26 सितंबर 2022

आइए दीपावली के अवसर पर आयोजित किए जाने वाले मुशायरे के बारे में बात करते हैं।

दोस्तो, समय अपनी गति से चलता ही चला जाता है। पता ही नहीं चला कि ब्लॉग को पन्द्रह बरस पूरे भी हो गए। 2007 में इस ब्लॉग को प्रारंभ किया था, अगस्त माह में। ब्लॉगिंग से तो उससे पहले भी जुड़ा हुआ था लेकिन इस ग़ज़ल के ब्लॉग की शुरुआत अगस्त 2007 में की थी। और देखते ही देखते बीच में पन्द्रह बरस बीत गए। जो लोग 2007 में जुड़े थे, उनमें से अब बहुत सारे लोग साथ नहीं हैं। कुछ व्यस्त हो गए, और कुछ शायद त्रस्त हो गए (मुझसे)। महावीर जी और प्राण शर्मा जी जैसे वरिष्ठ जन जो उस समय साथ थे अब सितारों में जा कर बस गए हैं। पन्द्रह सालों के इस सफ़र की तरफ़ जब मुड़ कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि बहुत अच्छा रहा है यह सफ़र अभी तक। हालाँकि पिछले सात-आठ सालों में ब्लॉग की लोकप्रियता दूसरे सोशल मीडिया के माध्यमों की तुलना में बहुत घटी है, मगर फिर भी ब्लॉग मेरा अभी भी सबसे पसंदीदा माध्यम है अपने आप को व्यक्त करने का। अब लोग यहाँ कम आते हैं, पहले जैसी भीड़-भाड़ अब नहीं होती। ब्लॉग के माध्यम से बने हुए रिश्ते मगर अब भी क़ायम हैं। कुछ ऐसे रिश्ते जो मन के अंदर गहरे तक बसे हुए हैं। रिश्ते जो ब्लॉग से निकल कर जीवन में प्रवेश कर चुके हैं। सच में पन्द्रह साल एक बड़ा समय होता है। ब्लॉग पर बीता हुआ यह पन्द्रह साल का समय बहुत सुखद है, बहुत सी यादों से भरा हुआ एक पिटारा है यह समय। इस पिटारे को खोल कर जब चाहे उस समय में आवा जाही की जा सकती है।

पिछले सप्ताह हमारे तरही के रेगुलर शायर श्री सौरभ पाण्डेय जी से भोपाल में किसी कार्यक्रम में मुलाकात हुई। मिलते ही उन्होंने सबसे पहले पूछा – क्या बात है इस बार दीपावली का मिसरा अभी तक दिया नहीं गया ? मैंने उत्तर दिया ज़रा तो प्रतीक्षा कीजिए जल्द ही मिसरा दे दिया जाएगा। भोपाल से लौटते हुए मैं सोच में पड़ गया कि कुछ तो है इस ब्लॉग परिवार के आयोजनो में कि इसकी प्रतीक्षा सबको रहती है। शायद वह परिवार का माहौल, वह आत्मीयता है, जिसके कारण यहाँ के मुशायरे की प्रतीक्षा सबको रहती है।

तो इस बार भी हमेशा की ही तरह हम तरही मुशायरे का आयोजन करने जा रहे हैं। और आज की यह पोस्ट असल में तरही मुशायरे का मिसरा दिये जाने के लिए ही है। इस बार का मिसरा है-

क़ुमक़ुमे यूँ जल उठेंगे नूर के त्योहार में

2122-2122-2122-212

फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलुन

(बहरे रमल मुसमन महज़ूफ़)

यह तो हुआ मिसरा अब बात करते हैं रदीफ़ और क़ाफ़िया की। इस बार रदीफ़ है “में” और क़ाफ़िया है “आर” की ध्वनि। मतलब त्यौहार में जो “आर” की ध्वनि है वही हमारे क़ाफ़िया की ध्वनि है। मतलब यह कि आर, पार, बार, ख़ार, चार जैसे 21 वज़्न वाले शब्द तथा अख़बार, ख़ुद्दार, बीमार, लाचार, सरकार जैसे 221 के वज़्न वाले शब्द भी आप ले सकते हैं। और हाँ बादाख़्वार जैसे 2221 वज़्न वाले शब्दों को भी आप क़ाफ़िया के रूप में ले सकते हैं। इस बहर पर कुछ मशहूर गीत-ग़ज़ल हैं “चुपके चुपते रात दिन आँसू बहाना याद है”, “आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज़ हैं”। 

तो दोस्तो यह है इस बार के तरही मुशायरे का मिसरा। अब दीपावली में बस एक ही माह रह गया है, इसलिए जल्दी से मिसरे पर काम कीजिए और ग़ज़ल कह डालिए। आज से नवरात्रि पर्व प्रारंभ हो गया है, मतलब यह कि त्योहारों का सिलसिला आज से शुरू हो गया है। तो त्योहारों के इस सिलसिले को निरंतर रखिए और उत्सवी आनंद में तरही में शामिल हो जाइए। इंतज़ार रहेगा आपकी ग़ज़लों का।

8 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत है मिसरे का । अभी एक मिनिट में एक शेर भी हो गया।

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  2. बहर तो इस बार की गुनगुनाती हुई है। अब देखना है कि शेर कहने की दमखम बची है कि नहीं।

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  3. जय हो पंकज जी. खूब याद् दिलाई की आपने पंद्रह बरस बिता दिय्ये इस ब्लॉग पर हमें ग़ज़ल सिखाने में और एक हम हैं कि आज बजी ग़ज़ल का एक मिसरा भी नहीं कह पाए. तो भैया जी इतिहास तो अपने को दोहराएगा ही और हमारे तो बस की नायं ग़ज़ल कह पाएं। जो कह सकें उन सभी को अग्रिम बधाई और हम उन्हें पढ़ने के इंतज़ार में रहेंगे।

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  4. नूर के त्योहार में ! ..
    दीप-दीयों का निराला त्योहार, ज्योति के आह्वान का पर्व है. दीपावली आत्मीय पर्व और उल्लसित त्योहार का अद्भुत सामंजस्य है. इस बार का मिसरा भी इसकी तसदीक करता है.
    कोशिश तो लाजिमी है. अलबत्ता उभर क्या पाता है यही देखना है.

    सौरभ

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  5. सुबीर जी की लगन व् म्हणत का प्रतिफल है की मैं भी इस मंच से बहुत कुछ सीख पाई हूँ. सभी साथियों को दशहरा की शुभकामनाएं

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  6. ग़ज़ल
    2122-2122-2122-212
    देखो समझो फूल काँटे का चलन संसार में
    राह जीने की मिलेगी तुझको भी व्यहवार में

    चार पैसे आते ही बदला चलन और चाल भी
    जाने कैसे आ गया बदलाव फिर गुफ़्तार में

    आदमी का आदमी से दिल का नाता है जुड़ा
    मोती दिल दिल का पिरो लो धड़कनों की तार में

    सोचों के मंझधार में वो बह गई क्यों, क्या पता
    जाने ऐसा क्या था देखा उसने बहती धार में

    जब ज़ुबां की बात ‘देवी’ ना समझ पाओ कभी
    भावनाएँ ढूँढ लेना इन लिखे अश्यार में

    देवी नागरानी

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