गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

 होली का त्योहार आकर बीत भी गया। कोरोना के कारण हर तरफ़ एक प्रकार का डर फैला हुआ है। मगर फिर भी होली का आयोजन यहाँ ब्लॉग पर पूर्व की तरह हो पाया है तो उन रचनाकारों के कारण जो ब्लॉगिंग के इस कठिन समय में भी ब्लॉग की इस देहरी पर अपनी रचनाओं के दीप रखने आ जाते हैं। बासी होली की परंपरा भी ब्लॉग पर रही है, तो आज हम बासी होली मनाते हैं। होली के सात दिन बाद तक, मतलब शीतला सप्तमी तक यह परंपरा चलती है।
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली
आइये आज बासी होली के रंग उड़ाते हैं तीन रचनाकारों राकेश खण्डेलवाल जी, गिरीश पंकज जी और अभिनव शुक्ल के साथ

अभिनव शुक्ल
चिरकुटों ने भांग घोली, आ गई होली,
दोस्ती है, दुश्मनी थी, आ गई होली।
बस गले मिल कर गिरीं बूँदें टपर टप टप,
मैं न बोला, तू न बोली, आ गई होली।
तितलियाँ हर दिन परखती हैं बगीचे को,
फूल ने तितली टटोली, आ गई होली।
सुबह उठ कर ये लगा मौसम नशीला है,
हमने फिर तारीख़ देखी आ गई होली।
रंग यूँ बिखरे कि सारी बंदिशें टूटीं,
फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली।

होली के तमाम रंगों को समेटे हुए हुए है यह ग़ज़ल। होली के त्योहार के सामने आते ही जो चीज़ें याद आती हैं उनतें भांग, रंग, बंदिशों का टूटना जैसी बातें होती हैँ। अभिनव ने भी इन सब का ही उपयोग कर के बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है। मतले में अपने नाम का उपयोग ठीक पहले ही शब्द में बहुत अच्छे से किया है। बहुत सुंदर ग़ज़ल।

गिरीश पंकज
''फागुनी मस्ती में डूबी आ गई होली''
जिंदगी का राग सहसा गा गई होली
बूढ़े, बच्चे, नौजवां सब बावरे दिखते
सबके जेहन में यहाँ पे छा गई होली
ज़िंदगी सहसा लगे रंगीन लोगों को
इस कदर हर शख्स को ही भा गई होली
रंग मस्ताने हुए कुछ चोलियां भींगी
देख गोरी को बहुत शरमा गई होली
देख कर के बावरा सबको हुआ ऐसा
बिन पिये ही भंग कुछ बौरा गई होली
भूल कर अलगाव सारे एकरस देखो
प्यार के रंगों  से यूँ नहला गई होली
चढ़ गई थी भंग फिर उतरी नहीं पंकज
होली तो 'हो ली' बहुत दिन ना गई होली

गिरीश जी की यह दूसरी ग़ज़ल है, उनकी पहली ग़ज़ल हम होली के दिन सुन चुके हैं। हाँ ये बात अलग है कि यह ग़ज़ल उन्होंने भांग चढ़ाने के बाद लिखी है, क्योंकि इसमें क़ाफिया सरक गया है, सरक गया है मतलब ई की मात्रा से आ की मात्रा हो गया है। इस बार क़ाफिये को लेकर जो दो विकल्प थे उनमें दोनों में ई की मात्रा थी, मगर शिवबूटी पीकर सब उल्टा पुल्टा हो जाता है। मगर ग़ज़ल बहुत अच्छी कही है। और सबसे बड़ी बात यह है कि जहाँ लोग एक ही नहीं कह पा रहे थे, वहाँ गिरीश जी ने दो ग़ज़लें कह दी हैं। सुंदर ग़ज़ल।

राकेश खंडेलवाल
खुल गए एकाकियत के बंद दरवाजे
ठण्ड  से जकड़े बदन में हलचलें जागीं
रात की फैली हुई चादर ज़रा सिकुड़ी
धूप ने गुदड़ी उठा कर ताक पर टांगी
खोल प्राची का बगीचा एक गौरैय्या
आ फुदकती नाचती हो सुरमयी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

हाथ सरसों के किये हैं खेत ने पीले
अब बिखरते रंग सूखे और कुछ गीले
आ गई अंगनाई में सारी पड़ोसन आज
भाभियों के साथ मिल कर के मटर छीले
इक हिनाई हाथ की थपकी पडी तो फिर
बन्नियों के गीत गाती  ढोलकी बोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

कह रहा है जेठ, भाभी आओ मैं रंग दूँ
गाल की रंगत गुलाबी और कुछ कर दूँ  
चंग पर बजते बिरज के जो सरस रसिये
उन मिठासो के शहद को होंठ पर धर  दूँ
तो कहे नटखट ग्वालिन नैन मटका कर
खा गयी देवर बुढाउ भंग की गोली
फागुनी मस्ती में डूबी आ गयी होली

राकेश जी के गीत सचमुच ऐसे होते हैं कि उन पर कोई टिप्पणी करने की जगह बस सुनते रहने की इच्छा होती है। यह गीत भी ऐसा ही है। कैसे-कैसे चित्र बना देते हैं वे अपने शब्दों से। ऐसा लगता है जैसे हम गीत नहीं सुन रहे हैं, बल्कि स्मृतियों के गलियारों में टँगे हुए चित्रों को देख रहे हैं। पूरा गीत होली के समूचे माहौल को सजीव करता हुआ गुज़र जाता है। बहुत ही सुंदर गीत।

आप सबको होली तथा रंगपंचमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। आनंद से रहिये और दाद देते रहिये।

5 टिप्‍पणियां:

  1. फूल ने तितली टटोली और फिर जैसा पंकज जी ने कहा 'मतले के शुरू में ही अपना नाम' 🤣😂🤣😂🤣😂 इस ग़ज़ल को विलक्षण बनाता है...जय हो!!!

    गिरीश जी की प्रतिभा का ज्वालामुखी हमारी तरह सुप्त नहीं हुआ है तभी दो दो ग़ज़लें ठोक के तीसरी की तैयारी में हैं और होली के शरमाने का चित्रण तो पहली बार हुआ है। ये शायद भंग का संपूर्ण समझ पर किए कब्जे का नतीजा है

    राकेश जी तो राकेश जी हैं इन सा न कोई हुआ न होगा... कलम है कि गौमुख जिससे काव्य की पावन गंगा सतत प्रवाहित होती र ती है... ये ग़जब थे ग़जब हैं और ग़जब ही रहेंगे... कैसा 'इन मिठासों को शहद के होंठ पर धर दूँ' अद्भुत वर्णन किया है...जय हो...अति आनंद भयो...

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  2. अभिनव शुक्ल पर आपकी चुटकी विशेष रही।
    गिरीश पंकज जी शरीफ़ शायर हैं जो उन्हें आज भी चोलियाँ दिखती हैं जबकि चोलियाँ का स्थान करीब-करीब हथिया ही लिया है डोरियों ने।
    राकेश जी के गीत वास्तव में ऐसे होते हैं कि उन्हें किसी अतिरिक्त टिप्पणी की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। गीत के बंद कुछ ऐसे निकलते हैं जैसे अष्टा-चंगा-पै का कोई माहिर खिलाड़ी हर बार अष्टा ही अष्टा निकाल रहा हो।
    रचनाकार और रचनाएं तो अपनी जगह, विशेष हैं आपके प्रयास जो तरही आयोजन को सफलता से एक सूत्र में पिरोते हैं।
    रंग पंचमी पर भभ्भड़ कवि भौंचक्के का इन्तिज़ार रहेगा।

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  3. आप की मेहनत का रंग तो होली के रंगों से भी अधिक गहरा है जो हर बार ऐसे अद्भुत आयोजन करते हुए कलम को गति प्रदान करता है. गिरीश जी की ग़ज़ल तो वापिस बरसाने ले जाती है. अभिनव तो आखिर अभिनव ही है और उससे अभिनव ग़ज़ल ही अपेक्षित है.

    तिलकजी की पहुँच तो उनके हर शेर में परिलक्षित होती है और नीरज जी का इंतज़ार है. चाँदनी अभी मोगरे के फूल पर सोइ हुई है शायद जयादा शिवबूटी का पान हो गया था. शीतला सप्तमी तक सेधक्स के नन्देऊ की आवाज़ से जाग ही जायेगी

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