दीपावली का त्यौहार संपन्न हो गया । बीतना समय का कार्य है सो वो बीतता है । सब कुछ ठीक हो गया । इस बीच बहुत व्यस्तता रही । दीपावली के ठीक बाद एक कार्यक्रम होना था जिसकी जिम्मेदारी टीम पी सी लैब पर थी । कार्यक्रम भी ठीक प्रकार से हो गया । लेकिन हां ये हुआ कि कार्यक्रम की व्यस्तता में अंकित के साथ बैठना बहुत ज्यादा नहीं हो पाया । दीपावली का अपना आनंद होता है सो उसका आनंद लिया गया । अब छठ पर्व की तैयारी चल रही है । अस्त होते सूर्य की पूजा और उदित होते सूर्य की पूजा । अभी दीपावली का त्यौहार कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला है क्योंकि छठ पूजा के बाद देव प्रबोधनी एकादशी तथा उसके बाद कार्तिक पूर्णिमा ये सब एक के बाद एक होने हैं । तो आइये कुछ और ग़ज़लों के साथ मनाते हैं बासी दीपावली ।
दीप ग़ज़लों के जल उठे हर सू, हमारे मिसरा ए तरह को इस बार शायरों ने यही बना दिया है । इतनी जगमग करती हुई ग़ज़लें आईं कि लगा कि दीप ही दीप जल उठे हों । और आज सुनते हैं श्री अशोक सलूजा अकेला जी तथा श्री वीरेंद्र जैन की ग़ज़लें ।
( पंडित अभिषेक शर्मा सुपुत्र श्री बब्बल गुरू पीसी लैब में दीपावली की पूजा करवाते हुए । )
अपने बारे में कहने को कुछ नही , जो एहसास रखता हूँ उन्हें जैसा महसूस करता हूँ ,लिख कर समय काटता हूँ !बस..... आज आप के ब्लॉग पर पढ़ रहा था ...जैसा समझा ,वैसे ही लिख दिया । बस क्या कहूँ ...
दीप खुशियों के जल उठे हर सू
इक लहर सी है अब उठे हर सू
हर तरफ हैं बज़ार में मेले
फूल खुशियों के हैं खिले हर सू
दुख सभी का मिटेगा सोच के ये
सब गले आज मिल रहे हर सू
आँख से आंसू मैंने पोंछ दिए
फूल ही फूल जब दिखे हर सू
दीप जलते हैं ज्यों दिवाली में
दिल में अब रौशनी भरे हर सू
जी लिया है बहुत अंधेरों में
रौशनी की नदी बहे हर सू
जिंदगी जब हो झूम के गाती
चुप "अकेला" ये क्यों फिरे हर सू
वाह वाह वाह । अच्छी ग़ज़ल कही है पूरी की पूरी ग़ज़ल सकारात्मक सोच से भरी है । दीपावली का अर्थ ही सकारात्मक सोच को बढ़ाना है । श्री अकेला जी ने जिस प्रकार के शेर निकाले हैं वो दीपावली की मूल भावना को प्रतिबिम्बित कर रहे हैं । बधाई बधाई बधाई ।
श्री वीरेंद्र जैन
मैं वीरेंद्र जैन वड़ोदरा में निवासरत हूँ एवं सिविल सर्विसेस के लिए प्रयत्न कर रहा हूँ , मैंने एक छोटी सी कोशिश की है ग़ज़ल लिखने की, मेरा पहला प्रयास है , आप सब अपना आशीर्वाद दें ।
फूल महके जो प्यार के हर सू
दीप खुशियों के जल उठे हर सू
इश्क की जब हवा बहे हर सू
एक नई दुनिया तब दिखे हर सू
चाँद उतरा फलक से है शायद
उसकी आहट सुनाई दे हर सू
उसने कर ली दो बातें जो मुझसे
मेरे ही चर्चे हो रहे हर सू
बस गया है नज़र में तू ऐसे
तेरी सूरत दिखे मुझे हर सू
यूँ तो सब कुछ ही पाया है फिर भी
मुझको तेरी कमी खले हर सू
सब्ज़ बागों पे छाई वीरानी
रंग पतझड़ के ही दिखे हर सू
शाम के ढलते ही मेरे दिल में ,
मेले यादों के फिर लगे हर सू
दर्द और ग़म की इन्तहां है बस
बदली अब पीर की छंटे हर सू
वाह वाह वाह । उम्दा ग़ज़ल है । और मुझे लगता है कि ये जो श्री वीरेंद्र ने कहा है कि ये उनकी पहली ग़जल़ है ये उन्होंने विनम्रता पूर्वक कहा है । परिचय तो नहीं है पर दावे से कह सकता हूं कि ये उनकी पहली ग़ज़ल नहीं है । जिस प्रकार से दीर्घ और लघु का संतुलन दूसरे रुक्न में बनाया है उससे तो यही पता चलता है । और चांद उतरा फलक से है शायद जैसे शेर पहली बार में नहीं कहे जा सकते । बस गया है नज़र में तू या फिर उसने कर ली दो बातें जैसे शेर तो यही कह रहे हैं । बधाई बधाई बधाई ।
तो आनंद लीजिये बासी दीपावली का । और आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का । ये ग़ज़लें जो दीपपर्व की स्मृतियों को फिर से उभार रही हैं । दाद देते रहिये और आनंद लेते रहिये ।