बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

शो मस्‍ट गो आन-

शायद आज पहली बार किसी अंग्रेजी के वाक्‍य को ब्‍लाग पोस्‍ट का शीर्षक बनाया है  । वो इसलिये कि इससे अच्‍छा कोई वाक्‍य मिल ही नहीं रहा था अपने आप को अभिव्‍यक्‍त करने के लिये । अज्ञेय ने कभी कहा था कि दुख आदमी को मांजता है, सो मैं भी ये कह सकता हूं कि इन दिनों मेरा मांजा जाना चल रहा है । आप सब लोगों की दुआएं मेल से और फोन से मिल रही हैं । जब इतने लोग किसी एक के लिये अच्‍छा सोच रहे हों तो ईश्‍वर को भी पिघलना तो पड़ता ही है । कितने नाम गिनाऊं जिन सबके संदेश मिल रहे हैं । कठिन समय ने ये तो बता ही दिया कि मैं अकेला नहीं हूं कई लोग मेरे साथ हैं । इतना नेह इतनी आत्‍मीयता, मन भर भर आ रहा है । ये सारे अनुभव अविस्‍मरणीय हैं । मुश्किलें तो अभी भी वैसी ही सामने हैं लेकिन उनसे जूझने की ऊर्जा आप सब के नेह ने दी है । और उसीके चलते सब के बाद भी ये कहने की हिम्‍मत कर पा रहा हूं कि शो मस्‍ट गो आन । और आप सब के लिये ये गीत

पिछले लगभग पन्‍द्रह बीस दिनों से एक ख़ामाशी सी हो रही है । त्‍यौहारों का समय सामने है और ऐसे में ख़मोशी का होना ठीक नहीं है । बस यही सोच कर अब कुछ फिर शुरू करने की बात दिमाग़ में आई और आज से ही दीपावली के तरही मुशायरे का आगाज़ करने की सोची । आगा़ज का मतलब ये कि कम से कम दीपावली के तरही मुशायरे का मिसरा ए तरह तो दे दिया जाये। जब सोचने बैठा तो सोच में एक बहर शिकायत करती हुई आ गई कि मेरा क्‍या क़सूर है जो मुझे आज तक कभी भी तरही में उपयोग नहीं किया गया । मुझे लगा बात तो सही है इसको अभी तक कभी उपयोग में तो नहीं लाया गया है । जबकि कायदे में तो ये ठीक पहली ही बहर है । ठीक पहली का मतलब ये कि सूची में ये सबसे पहली ही बहर है । आपने ठीक पहचाना ये बहरे रजज है ।

बहरे रजज़ के बारे में आपको ये तो पता ही होगा कि इसका स्‍थाई रुक्‍न 2212 है अर्थात मुस्‍तफएलुन । वहीं बहरे कामिल का स्‍थाई है 11212 अर्थात मुतफाएलुन  । सुनने में भले ही दोनों एक ही ध्‍वनि दे रहे हों लेकिन दोनों में अंतर है । अंतर ये है कि बहरे रजज़ के रुक्‍न में पहली मात्रा दीर्घ है जबकि कामिल में पहली मात्रा दीर्घ न होकर दो स्‍वतंत्र लघु हैं ।  ये फर्क ध्‍वनि में तो बहुत नहीं दिखाई देता लेकिन तकतीई में साफ दिखता है । तो इस बहर पर काम करते समय यही ध्‍यान रखना होता है ।

दीपावली के तरही मुशायरे के लिये बहरे रजज़ मुसमन सालिम  को चुना है । अर्थात 2212-2212-2212-2212 मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन । कुछ मित्रों का कहना है कि चूंकि ये बहर गाई जाने वाली बहरों में शामिल नहीं है इसलिये इस पर नये लोगों को लिखने में परेशानी आ सकती है । लेकिन मेरा कहना है कि नये लोग अब हैं कहां अब तो सब पुराने हो चुके हैं । तो अब तो मुश्किल काम होने ही चाहिये ।

जलते रहें,   दीपक सदा,    क़ाइम रहे,    ये रौशनी

मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन-मुस्‍तफएलुन

मुस्‍ (2)

तफ (2)

ए (1)

लुन (2)

जल

ते

हें

दी

पक

दा

क़ा

इम

हे

ये

रौ

नी

क़ाफिया - ई की मात्रा ( अजनबी, जिंदगी, चांदनी, आदमी ) रदीफ़ – अनुपस्थित ( गैर मुरद्दफ) 

काफिये को लेकर ध्‍यान दें कि उसमें अं की बिंदी नहीं हो । अर्थात नहीं, कहीं, ज़मीं  आदि नहीं लेने हैं । केवल और केवल ई की मात्रा को ही लेना है । एक ध्‍यान देना है कि मतले में ईता का दोष आ सकता है सो उसका ध्‍यान रखें । अर्थात मतले के दोनों काफियों में से कोई एक काफिया ऐसा हो जिसमें  ई  की मात्रा को हटाने के बाद शब्‍द अर्थहीन हो जाता हो । जैसे रौशनी  में से   की मात्रा हटाने के बाद रौशन  बचता है वो अपने आप में एक शब्‍द है जो अर्थहीन नहीं है । यदि आप रोशनी को एक काफिया बनाते हैं मतले में तो दूसरा काफिया आपको ऐसा रखना होगा जिसमें   की मात्रा हटाने के बाद शब्‍द अर्थहीन हो जाए   जैसे अजनबी । अजनबी में से ई को हटाने पर अजनब बचता है जो कोई अर्थ नहीं रखता । यहां पर  ई  हर्फे रवी है । ऐसा माना जाता है कि जो अतिरिक्‍त मात्रा है जो कि हर्फे रवी बन रही है उसको हटा कर ध्‍वनि  देखी जाती है कि अब काफिया क्‍या बच रहा है । यदि हर्फे रवी हटने के बाद काफिया अर्थहीन हो जाये तो उसका मतलब ये है कि हर्फे रवी अलग से जोड़ी गयी मात्रा न होकर उस शब्‍द का अभिन्‍न अंग है जिसको हटाया नहीं जा सकता है । तथा उस शब्‍द की पूरी ध्‍वनि ही लेनी है । ये छोटी ईता  ( ईता-ए-ख़फी) है । बड़ी ईता ( ईता-ए-जली) वो है जिसमें दोष साफ दिख जाता है जैसे दानिशमंद और दौलतमंद  को यदि मतले में काफिया बनाते हैं तो जो मंद है वो हटने के बाद दौलत और दानिश शब्‍द बच रहे हैं जो दोनों ही अर्थवान हैं । और चूंकि ये साफ दिख रहा है इसलिये इसे ईता-ए-जली बड़ा दोष कहते हैं । रौशनी  और  आदमी  ( रौशन+ई=रौशनी, आदम+ई=आदमी)  का दोष साफ दीख नहीं रहा है इसलिये उसे छोटी ईता ईता-ए-ख़फी कहते हैं । ( हालांकि कुछ लोग आदमी  की ई हटाने पर बचे आदम को अर्थहीन मान कर उसे उपयोग कर लेते हैं । )  ध्‍यान रखें कि ईता का ध्‍यान केवल और केवल मतले में ही रखना होता है तथा मतले में भी  किसी एक मिसरे में काफिया ( दोनों में नहीं) ऐसा हो जिसमें हर्फे रवी हटने के बाद शब्‍द बेकार( बिना अर्थ का) हो जा रहा हो। उस्‍ताद ने एक बार बहुत पहले ईता की व्‍याख्‍या की थी जो कुछ इस प्रकार थी उनका कहना था कि यदि हर्फे रवी मुख्‍य शब्‍द का बहुत अभिन्‍न अंग ( दो जिस्‍म एक जान) नहीं है तो वो रदीफ का हिस्‍सा बन जाएगा और उस स्थिति में काफिये का संतुलन गड़बड़ा जाएगा । ( वैसे उस्‍ताद का कहना था कि गैर मुरद्दफ स्थिति में ईता पर ध्‍यान देने की ज़रूरत नहीं होती, और इस बार का हमारा मिसरा गैर मुरद्दफ ही है ) ।

पूर्व में मैंने काफी बार ये कहा है कि ईता का दोष लिपि से होता है इसलिये देवनागरी में ये नहीं होता, लेकिन उर्दू लिपि में साफ दिखता है । इसीलिये देवनागरी में या हिंदी में ग़ज़ल कहने वालों को इससे मुक्‍त रखा गया है । लेकिन एक बार गौतम ने बहुत पते की बात कही कि यदि हम किसी विधा पर काम कर रहे हैं तो उसके पूरे नियमों का पालन करें । बस यही सोच कर आज ईता को लेकर ये बातें कहीं । चलिये अब एक प्रश्‍न का उत्‍तर दीजिये क्‍या किसी मतले में गुलाब और आब  ये दोनों काफिये लिये जा सकते हैं । यदि हां तो क्‍यों और नहीं तो क्‍यों ।

तिलक जी ने एक बहुमूल्‍य सुझाव दिया था कि सब लोग पूरी ग़ज़ल में एक शेर ऐसा निकालें जिसमें मात्राएं शुद्ध रूप में हों । शुद्ध रूप का अर्थ कि कोई दीर्घ गिरा कर लघु नहीं की गई हो । जैसा इस बार के मिसरा ए तरह में भी किया गया है । वहां सारी मात्राएं शुद्ध रूप में हैं । और उस शुद्ध शेर को मतले के ठीक बाद लगाना चाहिये । जिससे बहर का ठीक अनुमान लग सके । तो तिलक जी का सुझाव सर माथे पर तथा सभी लोग इसका ध्‍यान में रखें कि ग़ज़ल में एक शुद्ध शेर हो जिसमें सभी मात्राएं अपने शुद्ध रूप में ही हों ।

तरही की ग़ज़लें हर हाल में 20 अक्‍टूबर तक भेज दें ताकि हम जल्‍दी से मुशायरा प्रारंभ कर दीपावली को समापन कर सकें ।

और उदाहरण तो आप ही लोगों को बताने हैं कि इस बहर पर कौन से गीत या ग़ज़लें प्रसिद्ध हैं । हां एक प्रश्‍न ज़ुरूर पूछना हैं मुझे और वो ये कि क्‍या बशीर बद्र साहब की मशहूर ग़ज़ल कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो  क्‍या हमारी इसी बहर पर है अथवा नहीं । हां तो कैसे नहीं तो क्‍यों  ।

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