यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
आइए आज से प्रारंभ करते हैं जाड़ों का तरही मुशायरा। आज दो रचनाकार अपनी रचनाएँ लेकर आ रहे हैं। यह रचनाकार हर तरही में एक से अधिक रचनाएँ भेज कर हमारे मुशायरे को समृद्ध करते हैं। आज सुनते हैं राकेश खंडेलवाल जी और मन्सूर अली हाशमी जी से उनकी रचनाएँ।
राकेश खंडेलवाल
मिला है निमंत्रण, ग़ज़ल इक कहें आ
“यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम”
तो मन ये कहे अब चलें हम वहीं पर
जहां सर्दियों का गुलाबी हो मौसम
तो फिर जाग उट्ठी है मन में अचानक
वो सोंधी महक बाज़री रोटियों की
खुली धूप में गोठ इतवार वाली
उड़द दाल की चूरमा बाटियों की
कटोरी भरा गाजरी गर्म हलवा
इमारती वे ताज़ा गरम चाशनी में
समोसे, कचौड़ी, तली मूँगफलियाँ
महकती हुई वादियों, घाटियों की
मगर फिर हक़ीक़त मिटा देती सपना
औ ख़्वाबों का फिर टूट जाता है परचम
चली आइ है सामने बचपनों की
वे कोहरे में डूबी हुई कच्ची राहें
ठिठुरती हुई स्वेटरों मफ़लरों में
दो सूखे अधर मिचमिचाती निगाहें
भरी जेब चिलग़ोज़े और किशमिशों से
थे सात आठ काजू या बादाम संग में
इसी के सहारे सुबह से दुपहर तक
रही मौन ठंडी सिकुड़ती कराहें
अभी गर्म कमरे में पाँवे पसारे
यही यादें हमको किए जाती बेदम
कहीं खो गई तापने की अंगीठी
जो पत्थर के लकड़ी के कोयले जलाती
कहाँ खोई है साँझ चौपाल वाली
जहां पीढ़ियाँ थी चिलम गुड़गुड़ाती
बताना अभी हैं क्या आलाव जलते
अभी चंग पर गए जाती क्या लहरी
अभी गूंजती है वे सारंगियाँ क्या
जो दरवेशिया थीं कथाएं सुनाती
यहां ऊहापोहों के उमड़े कुहासे
मनाते है उन गर्म लम्हों का मातम
यह गीत नहीं है बल्कि जैसे पूरा एक चित्र है मौसम का। इस चित्र में बाजरे की रोटी के साथ में इतवार की गोठ मनाती हुई मंडली किसी कोने के दिखाई दे रही है तो गाजर का हलवा, कचौरियाँ, इमरती जैसे व्यंजन पहले ही बंद में किसी कोने में रखे हुए हमको दिखाई दे रहे हैं। बचपन में स्वेटर तथा मफलरों से अपने आप को बचाता हुआ बचपन गलियों में घूम रहा है जेब में किशमिशें और चिलगौज़े भर कर। देर रात तक तापने की अंगीठी में सुलगते हुए पत्थर के कोयले और साँझ की चौपाल पर गुड़गुड़ाती हुई चिलमें, जलते हुए आलाव पर दरवेशों के किस्से। सचमुच ऐसा लग रहा है कि यह गीत नहीं बल्कि एक पूरा का पूरा चित्र है, जो हमें अपने बचपन की गलियों में ले जा रहा है। बहुत ही सुंदर गीत वाह वाह वाह।
मन्सूर अली हाश्मी
यहां पड़ रही है जगह पहले ही कम
कहीं मन में बसने न आ जाये बालम
अजी खाइये अब ग़िज़ाए मुरग़्ग़न'
'यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम'
न पंखे की हाजत न ए.सी. की झंझट
खपत कम तो आयेगा बिजली का बिल कम
गरम पानी से गर नहाना हुआ तो
'गटर गैस', चूल्हे को कर लेंगे बाहम
कभी फूल झरते थे बातों से उनकी
हर इक जुमले पर अब निकलते है बलग़म
कभी 'लेडी-फिंगर' थे, नाज़ुक बदन था
है कद्दू की मानिंद अब भारी-भरकम
वो फूलों की रानी बहारो की मलका
रहे हम तो माली वह कहलाती 'मेडम'
हुए 'शेख़'* समझो न कमज़ोर हमको
बहुत 'हाश्मी' में अभी तो है दमख़म
* शेख़ =बुज़ुर्ग
मन्सूर अली हाशमी जी की हज़लें सुन कर किस के मन में गुदगुदी नहीं होती है। इस बार ठिठुरते हुए मौसम में उनकी यह ग़ज़ल हँसी की गर्मी पैदा कर रही है। वन बीएचके में बालम के आन बसने की चिंता कवि को मतले में दुखी किए हुए है। अगले ही शेर में बहुत सुंदर तरीक़े से गिरह बाँधी गई है। कवि को भी जेब की चिंता होती है, तभी तो वह ठंड के मौसम में ख़ुश है कि एसी बंद हो जाएँगे तो बिजली का बिल कम हो जाएगा। ठंड के मौसम में फूल की जगह बलग़म का चित्रण कवि की चिंता को दर्शा रहा है। हर लेडी फिंगर को अंतत: कद्दू होना है, इस चिंरंतन सत्य को बहुत अच्छे से बाँधा गया है। मकते के शेर में हमारे बुज़ुर्ग शायर अपने दमख़म को लेकर कितने आश्वस्त हैं, यह देखकर अच्छा लगा । बहुत सुंदर हज़ल, वाह वाह वाह।