सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

हर सन्‍नाटे को कभी न कभी टूटना होता है और त्‍योहार उसका सबसे अच्‍छा कारण बन सकते हैं ।

मित्रों बहुत बहुत दिनों के बाद यहां पर कुछ हलचल हो रही है । असल में कुछ ऐसा होता गया कि यहां पर आने के लिये जितना समय चाहिये होता है उतना समय उपलब्‍ध नहीं होता था । और बस इस कारण या उस कारण से यहां का सन्‍नाटा धीरे धीरे बढ़ता चला गया। इस बीच बहुत कुछ घट गया। हम पिछली बार होली  पर मिले थे और अब दीवाली सामने आ गई है । दोनों ही पर्व दो अलग अलग ऋतुओं के पर्व होते हैं । वसंत से चल कर हम शरद तक आ गये और हमारा सन्‍नाटा जस का तस बना रहा।

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इस बीच बहुत कुछ हुआ । इन्‍दु शर्मा कथा सम्‍मान की  पहले घोषणा हुई और फिर उसके बाद लंदन की यात्रा । घोषणा से यात्रा के बीच में बस केवल भागदौड़ थी । और उसी बीच में हिन्‍दी चेतना के विशेषांक का सम्‍पादन भी पूरा करना था । दोनों कार्य ठीक प्रकार से सम्‍पन्‍न हो गये । जब इन्‍दु शर्मा कथा सम्‍मान की घोषणा की गई  थी तो मन में बड़ी दुविधा थी । पहली विदेश यात्रा को लेकर मन उलझन में था कि क्‍या किया जाए और क्‍या न किया जाए । नीरज जी ने जरूर ये आश्‍वस्‍त किया था निश्चिंत रहें सब कुछ ठीक ठाक होगा । और वीजा की भागदौड़ के बीच उनका ये कहना मन को बड़ा सुकून देता रहा । लंदन यात्रा के ठीक एक सप्‍ताह पूर्व हिन्‍दी चेतना का अंक जारी कर दिया गया । और प्रिंट संस्‍करण का विमोचन लंदन यात्रा के ठीक एक दिन पूर्व किया गया। इस बीच परिवार में कुछ सदस्‍यों की अस्‍वस्‍थता भी मन को अशांत करती रही ।

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किन्‍तु कहा जाता है कि सकारात्‍मक सोच ही सब कुछ ठीक करती है । सो नीरज जी ने जो कहा था निश्चिंत रहिये सब कुछ ठीक होगा । सो हो गया । लंदन की यात्रा और वहां का अवार्ड फंक्‍शन सकुशल संपन्‍न हुआ । फंक्‍शन को लेकर कभी विस्‍तार से बातें होंगीं । क्‍योंकि वह ग्रांड फंक्‍शन उतने विस्‍तार की संभावना लिये हुए है । बस ये कि आप सबकी शुभकामनाएं मिलती रहीं । कई गैरों की शुभकामनाएं मिलीं तो कई अपनों ने शुभकामनाएं देना या कुछ और कहना मुनासिब नहीं समझा । कुछ नये बने रिश्‍तों ने उनको ऐसा करने से रोक दिया । बहुत अजीब हो जाते हैं रिश्‍ते जब हम ये देख कर काम करने लगते हैं कि हमारे द्वारा ऐसा करने से हमारे नये बने रिश्‍तों पर कोई प्रभाव तो नहीं पड़ेगा । खैर रिश्‍तों की भी उम्र होती है और उनको भी रीतना और बीतना होता है । ''खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्‍छा............'' ।

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बचपन में इस टॉवर ब्रिज की एक तसवीर हमारे सरकारी घर में दीवार की दरारों को छिपाने के लिये लगाई गई थी । बड़ी सी तस्‍वीर जो पूरी दीवार को ढंके हुई थी । हम बच्‍चे इसी तस्‍वीर के सामने खड़े होकर अपने जन्‍मदिन पर चित्र खिंचवाते थे । तब हम बातें करते थे कि एक दिन सचमुच के लंदन ब्रिज ( तब हम इसका नाम लंदन ब्रिज ही समझते थे) पर भी खड़े होकर चित्र खिंचवाएंगे । जब नहीं पता था कि ये कब और कैसे सच होगा । लेकिन 2013 के जन्‍मदिन पर ये सच हो गया । और याद आ रहे थे बचपन के वे सारे जन्‍मदिन ।

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खैर तो बात ये कि दीपावली पर ब्‍लॉग के सन्‍नाटे को तोड़ने की इच्‍छा है । तरही का आयोजन तो इतनी जल्‍दी में नहीं हो सकता है किन्‍तु इच्‍छा है कि बरस बरस के दिन ब्‍लॉग पर सूनापन नहीं रहे । यहां पर ग़ज़लों के गीतों के दीपक जलें और जगमगाते रहें । कैसे किया जाए ये समझ में नहीं आ रहा है । एक तरीका तो मुक्‍तकों का है कि किसी मिसरे पर मुक्‍तक लिखे जाएं । एक तरीका ये कि कोई मिसरा न हो बस आप सबकी दीपावली पर लिखी कोई रचना हो । और जो कुछ न हुआ तो पिछले दीपावली मुशायरों में से ही कुछ लिया जाए । निर्णय आप सब को करना है । मैं तो बस ये देखना चाहता हूं कि इतने दिनों की चुप्‍पी ने इस ब्‍लॉग  परिवार पर प्रभाव तो नहीं डाल दिया है ।

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तो आप बताइये कि क्‍या करना है । क्‍योंकि करने वाले तो आप लोग ही हैं । और ब्‍लॉग भी आपका ही है । हां  पिछले दिनों एक गीत मन में  रह रह कर गूंजता रहा ।

ओ मेरे सनम,  ओ मेरे सनम,  दो जिस्‍म मगर,  इक जान हैं हम

                             पता नहीं क्‍यों, क्‍या इस बहर पर कुछ काम किया जा सकता है । मगर उसके लिये तो पहले ये जानना होगा कि इसकी बहर क्‍या है रुक्‍न क्‍या हैं । आप लोगों को पता होगा शायद। क्‍या पता क्‍या है । बड़ी हैरत की बात है । सुनते हैं कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय का तराना भी इससे कुछ कुछ मिलता जुलता है । क्‍या कहते हैं । मेरा दिमाग तो कुछ काम नहीं कर रहा  ।

तो ये देखिये और सोचिये

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