इस बार दीपावली के मुशायरे में जो ख़ास है वो ये है कि इस बार हम मुरक्कब बहरों की तरफ बढ़ गये हैं । मुरक्कब बहरें जो कि दो विभिन्न प्रकार के रुक्नों के संयोग से बनती हैं । और इस बार हम काम कर रहे हैं बहरे खफ़ीफ़ पर । बहरे खफ़ीफ़ एक ऐसी बहर है जो कि बहुत पसंद की जाने वाली बहर है । मगर मुशायरे की घोषणा के लगभग बीस दिन बीत जाने के बाद भी ऐसा लग नहीं रहा है कि ये बहर लोगों को पसंद आ रही है । अभी तक जिन रचनाकारों की रचनाएं मिल चुकी हैं वे हैं श्री राकेश खंडेलवाल जी, लावण्य शाह दीदी, श्री निर्मल सिद्धू, श्री नवीन चतुर्वेदी, श्री धर्मेंद्र सिंह सज्जन, श्री दिगंबर नासवा, डॉ संजय दानी और श्री सौरभ शेखर । अर्थात 8 रचनाकारों की रचनाएं मिल चुकी हैं । मैं ग़ज़ल के स्थान पर रचना शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहा हूं कि हमारे तरही मुशायरे में सब प्रकार की सामग्री होती है जहां एक ओर ग़ज़लें होती हैं वहीं दूसरी ओर गीत और छंदमुक्त कविताएं भी शामिल होती हैं । कुल मिलाकर हमारा ये तरही मुशायरा दरअसल में काव्य के विविध रूपों का एक इन्द्र धनुष होता है । और ये इंद्रधनुष अपने सारे रंगों के साथ दीपावली के अवसर पर निखरने वाला है विविधरंगी रचनाओं से ।
बहरे खफ़ीफ़ में चूंकि दो प्रकार के रुक्न हैं इसलिये इसके मुज़ाहिफ़ रुक्न भी दो प्रकार के हो सकते हैं । इसमें फाएलातुन के और मुस्तफएलुन दोनों ही सामिल रुक्नों के मुज़ाहिफ़ रुक्न हो सकते हैं । जैसा कि हम पहले जान चुके हैं कि बहरे खफ़ीफ़ की सालिम बहर को उर्दू या हिंदी में उपयोग में नहीं लाया जाता है इसलिये इसकी मुज़ाहिफ़ बहरें ही उपयोग में लाई जाती हैं । जैसे कि इस बार की ही जो बहर है जिसमें 2122-1212-22 (112) वज़्न है । या यूं कहें कि फाएलातनु-मुफाएलुन-फालुन( फएलुन) है । अब इसमें जो पहला रुक्न है वह तो सालिम ही उपयोग किया जा रहा है । किन्तु दूसरे रुक्न में कुछ तब्दीली की गई है । तब्दीली ये की गई है कि कुछ मात्राओं को कम कर दिया गया है । अब ये देखें कि कुल कितनी मात्राएं कम की गईं हैं । दूसरा रुक्न है 2212 जिसको कि बना दिया गया है 1212 इसका नाम होता है मख़बून । इसका नाम मख़बून इसलिये है क्योंकि ये ख़ब्न से बना है । अब ये ख़ब्न क्या होता है । तो आइये जानते हैं ख़ब्न की परिभाषा ।
ख़ब्न : यदि किसी रुक्न के प्रारंभ में सबब ख़फ़ीफ़ हो ( यदि एक पूर्ण दीर्घ हो जैसे ग़म, हम आदि जिसे सबब ख़फ़ीफ़ कहा जाएगा ) तो उस सबब खफ़ीफ़ का दूसरा हर्फ गिरा दिया जाता है । जैसे मुस्तफएलुन में वज़्न है 2212 तो इसमें रुक्न के प्रारंभ में ही एक सबब ख़फ़ीफ़ आ रहा है । और यदि हमें इसे ख़ब्न करना हो तो इसके पहले दीर्घ की एक मात्रा को घटा कर उसे एक लघु कर देगें । शेष रुक्न पूर्ववत ही रहेगा । तो पहली मात्रा को गिराने पर बना 1212 मुफाएलुन । जैसे यदि फाएलुन में खब्न किया जायेगा तो बनेगा फएलुन, 212 से बनता है 112 । तो फाएलुन बाली बहर में फएलुन को और मुस्तफएलुन वाली बहर में मुफाएलुन को कहा जायेगा मखबून । यही मुफाएलुन बहरे हजज में जब आयेगा तो वहां पर मकबूज के नाम से आयेगा क्योंकि वहां पर ये कब्ज़ ( रुक्न की पांचवी मात्रा को कम करना ) नाम की तब्दीली से पैदा होगा ।
अगली बार हम ये देखने की कोशिश करेंगें कि जो हमारी बहर में आखिर का रुक्न है जिसको लेकर हमारे पास स्वतंत्रता है कि हम 22, 112, 2121, 221 कुछ भी ले सकते हैं । तो ये रुक्न किस प्रकार की तब्दीली से पैदा किये जा रहे हैं । याद रहे कि ये तब्दीली अपने सामिल रुक्न फाएलातुन में की जायेगी । क्योंकि तीसरा रुक्न हमारी सालिम बहर में फाएलातुन है । तो उसी फाएलातुन में अलग अलग प्रकार की जि़हाफ़ से हम पैदा करेंगें मुज़ाहिफ़ रुक्न । तो वही बात हुई कि जब रुक्न अपने मूल रूप में हो तो उसे सालिम रुक्न कहा जाता है । और जब उसमें कुछ जिह़ाफ़ से अर्थात मात्रा की घट बढ़ कर दी जाये तो वो मुज़ाहिफ़ रुक्न कहलायेगा ।
सालिम रुक्न + जिहाफ़ = मुज़ाहिफ़ रुक्न
मुस्तफएलुन (2212) + जिहाफ़ (ख़ब्न) = मुज़ाहिफ़ रुक्न (मख़बून ) 1212
तो ये तो बहुत सी जानकारी है जो कि रुक्नों के बारे में है । आइये अब तो कलम उठा कर हम ग़ज़ल को लिखने की शुरूआत करें । ठीक है बहुत से लोग मेल द्वारा कुछ न कुछ बहाना कर चुके हैं । तो उनको उनके हाल पर छोड़ते हुए कम से कम आप तो ग़ज़ल लिखें । क्योंकि बहाने बाज तो हर स्थिति के लिये बहानों के साथ तैयार होते हैं । कभी बहर कठिन है तो कभी काफिया, कभी विषय कठिन है तो कभी रदीफ । एक कहावत है जिसमें कुछ ऐसा कहा गया है कि आंगन टेढ़ा और नाच वाच जैसा कुछ । अभी तो पूरी याद नहीं आ रही है आपको याद आये तो बताइये । मेरा ऐसा मानना है कि हम जिस बात को लेकर ( कवि, शायर, लेखक ) लोगों से अतिरिक्त फुटेज प्राप्त कर रहे हैं कम से कम उसके प्रति तो ईमानदार रहें । हम कवि के रूप में समाज से अतिरिक्त मान प्राप्त करना तो चाहते हैं लेकिन हम कविता नहीं लिखना चाहते । कुछ लोग तरही की घोषणा के साथ ही मेल कर देते हैं अरे इस बार तो बहुत कठिन है । ऐसा लगता है कि आगे से दो प्रकार के मिसरे देने होंगें एक सामान्य मिसरा और दूसरा बहरे हजज पर अत्यंत लचर मिसरा । क्योंकि हजज पर तो कम से वो लोग लिख ही पाएं ।
खैर आभार श्री राकेश खंडेलवाल जी, लावण्य शाह दीदी, श्री निर्मल सिद्धू, श्री नवीन चतुर्वेदी, श्री धर्मेंद्र सिंह सज्जन, श्री दिगंबर नासवा, डॉ संजय दानी और श्री सौरभ शेखर के प्रति जो उन्होंने समय पर रचनाएं भेज कर बात का मान रखा । आशा है 16 अक्टूबर तक बाकी लोगों की भी रचनाएं प्राप्त हो जाएंगीं ।
और एक नज़र इधर भी ।