बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं ''मत कहो इसे घन गर्जन है, ये नभ का प्रणय निवेदन है'' ''चपला है या वरमाला है, अंबर ने जिसे उछाला है'' वर्षा मंगल काव्य गोष्टियों में इसको बहुत पसंद किया जाता था । अब तो लगभग विस्मृत सा हो गया है ये गीत शायद पुरानी किसी डायरी में हो मिला तो पूरा सुनाने की कभी कोशिश करूंगा ।
बरसात के गीत- बरसात को लेकर कई सारे गीत बने हैं । कुछ तो ऐसे हैं कि जो वर्षा का पूरा चित्र सामने ले आते हैं । मेरी कई सारी जो इच्छाएं अधूरी हैं उनमें एक ये भी है कि कभी किसी वर्षा से घिरे पहाड़ी जंगल में रात बिताऊं और रात भर वर्षा की ध्वनियां सुनूं । वर्षा जो सबसे बड़ी संगीतकार है । फिलहाल तो ये गीत सुनाने की इच्छा हो रही है जो फिल्म परख का है और जिसे लता जी ने ऐसे गाया है कि यूं लगता है मानो सामने बरसात हो ही रही हो । मेरे पसंदीदा वर्षा गीत में बरसन लागीं सावन बुंदिया-बेगम अख्तर, रिमझिम गिरे सावन- लताजी तथा किशोर जी, नाच रे मयूरा नाच रे मयूरा-मन्नादा, सावन की रिमझिम में -मन्ना दा, बादल तो आये लहरा के छाये-लताजी, अंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर-सुधा मल्होत्रा, उमड़ घुमड़ के आई घटा-दो आंखें बारह हाथ, हरियाला सावन ढोल बजाता-दो बीघा जमीन, बादल यूं गरजता है-बेताब, रिमझिम के तराने लेकर आई-काला बाजार, लगी आज सावन की- चांदनी, और कई कई गीत हैं । कभी अलग से हम इन गीतों की बात करेंगें । फिलहाल तो ये गीत सुनें ।
बरसात का चमत्कार-बरसात का ही एक अनोखा चमत्कार सीहोर में हुआ । शहर से होकर बहने वाली छोटी सी नदी सीवन पिछले पांच महीनों से बिल्कुल ही सूखी पड़ी थी । कल भी दोपहर तक वही हालत थी कि लोग पानी बरसने की उम्मीद लगाये बैठे थे । बच्चे उसी प्रकार सूखी नदी में खेल रहे थे जैसे खेलते हैं । कि अचानक चमत्कार हुआ अचानक देखते ही देखते नदी उफन पड़ी और इस प्रकार की बात की बात में बाढ़ जैसा दृष्य हो गया । लोग हैरान थे कि आसमान खाली है कहीं कोई बारिश नहीं है फिर ये बाढ़ कहां से आ गई । पूरा शहर नदी के किनारे एकत्र हो गया । पता चला कि ऊपर कहीं पहाड़ी इलाके में जोरदार बारिश हुई है जो नदी का जल संग्रहण क्षेत्र है । वहीं का पानी ये आ रहा है । इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्कार इधर सर पर सूरज चमक रहा था । लोग पानी को तरस रहे थै और उधर सूखी नदी में अचानक ही बाढ़ आ गई ।
तरही मुशायरा-तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी उत्साह लोगों ने दिखाया है और काफी लोगों की ग़ज़लें मिल चुकी हैं । इस बार की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं कि सुनने में आनंद आ जायेगा । मेरी इच्छा तो ये थी कि सभी की ग़ज़लें उन्हीं की आवाज में लगाता किन्तु बात वही है कि सबके पास रिकार्डिंग की सुविधा जाने हो या न हो । चलिये ऐसा करेंगें कि इस बार एक वर्षा मंगल काव्य गोष्ठी करेंगें जिसमें कि सभी की आवाज में ही कविताये होंगीं । फिलहाल तो बात तरही मुशायरे की जिसको लेकर कई सारी रचनाएं तो आ गई हैं और अभी भी आ रही हैं । मेरा विचार है कि 7 जुलाई को तरही मुशायरे का आयोजन प्रारंभ करने का । अपने सभी ज्ञात अज्ञात गुरुओं और उस्तादों को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर अपनी और से समर्पित करते हुए ये तरही मुशायरे का आयोजन करने की इच्छा है । ज्ञात अज्ञात इसलिये क्योंकि कई सारे ऐसे हैं जिन्होंने मुझे हाथ पकड़ कर सिखाया तो कई ऐसे हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा कभी मिला नहीं । उन सबको मेरी और से एक भावांजलि होगा इस बार का तरही मुशायरा । तो 7 जुलाई गुरू पूर्णिमा को हम प्रारंभ करते हैं मिसरे ' रात भर आवाज देता है कोई उस पार से' जिस पर कई अच्छी रचनायें हैं । और हां अगला मुशायरा केवल बहर पर होगा जिसमें कोई मिसरा नहीं दिया जायेगा केवल बहर दी जायेगी जिस पर लिखना होगा । और उसमें कम से कम एक शेर बरसात पर, एक सावन पर और एक बहन पर या राखी पर रखना होगा । बहर क्या होगी वो जल्द ही ।
एक बहुत पुरानी ग़ज़ल- बरसात से याद आया कि जब लिखना सीख रहा था । उस समय उस्ताद लोग कहते थे कि इस पर लिखो उस पर लिखो । कभी दीपावली आ जाती थी तो आदेश होता था कि दीवाली की गोष्ठियां होनी है दीवाली पर लिखो कभी होली तो कभी कुछ और । ऐसे ही कभी किसी वर्षा मंगल में जाना था सो उस्ताद का आदेश हुआ कि बरसात पर ग़ज़ल लिख कर लाना । वो दौर था जब ग़ज़ल का ककहरा सीख ही रहे थे । खैर जैसे तैसे लिख कर ले गये । कुछ शेर पसंद भी किये गये । आज बरसों बाद वो ग़ज़ल कहीं से निकली तो यहां प्रस्तुत कर रहा हूं । ग़ज़ल जस की तस है जैसी उस समय लिखी थी वैसी ही । कुछ परिवर्तन करके उसका टटकापन समाप्त नहीं करना चाहता । जहां जो कमियां हैं वे भी वैसी ही हैं जो लगभग पन्द्रह साल पहले की उस गोष्ठी के समय थीं । एक और ग़ज़ल भी निकली है जो रक्षाबंधन पर हुई एक बहनों की गोष्ठी के लिये लिखी थी । उसे बाद में दैनिक भास्कर ने भी छापा । वो कभी बाद में आज तो ये बरसाती ग़ज़ल । आज माड़साब पकड़ में आये हैं एक पुरानी ग़ज़ल देकर सो इसमें खूब छांटिये दोष बहर के कहन के, मात्राओं के, उच्चारण के और खबर लीजिये माड़साब की । चूंकि पन्द्रह साल पुरानी ग़ज़ल है अत: दोष तो होंगें ही ।
गरज कर झूम कर बादल उठे हैं ,आ भी जाओ तुम ।
तुम्हारी राह में मौसम बिछे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥
कहीं पर बात हम तुम में ,कोई ठहरी हुई सी है ।
शुरू करने हमें कुछ सिलसिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥
जहां पर ख्वाब कोई हमने तुमने ,मिल के रोपा था ।
वहीं उस मोड़ पर ही हम खड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥
जहां तक देखिये नज़रों की हद तक ,सिर्फ बारिश है ।
फुहारों के दुपट्टे से उड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥
बुझा है चांद का कंदील अब तो बस अंधेरा है ।
सितारों के भी सब दीपक बुझे हैं , आ भी जाओ तुम ॥
लगे है यूं के ज्यों पाज़ेब खनकाई है ये तुमने ।
छमाछम छम छमाछम सुर बजे हैं ,आ भी जाओ तुम॥
अंधेरी रात है ,बरसात है ,और उफ़ ये तनहाई ।
सबर के जाम अब मुंह तक भरे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥
कहीं झींगुर की चिकमिक है ,कहीं बारिश की छम छम है ।
सभी सुर आज आपस में मिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥
अंधेरा है भले बाहर ,मगर घर में उजाला है ।
तुम्हारी याद के दीपक जले हैं ,आ भी जाओ तुम॥
भिगो कर हाथ बारिश में, मुझे छूती हैं आ आकर ।
हवाऐं आज पागल सी फिरे हैं , आ भी जाओ तुम ॥
अभी कल तक तो बंजर था ,मगर अब आके देखो तो।
यहां पर हसरतों के गुल खिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥