शनिवार, 13 सितंबर 2008

कौडि़यों में बिक रही संसद है मेरे मुल्‍क की, दो टके की हो गई संसद है मेरे मुल्‍क की

पिछले दिनों जब टीवी पर देखा कि किस प्रकार से भारत की संसद में सांसदों को आलू प्‍याल की तरह से खरीदने का और बेचने का दौर चला तो उसी दिन इस ग़ज़ल ने जन्‍म लिया था । पूरी ग़ज़ल तो खैर काफी तीखी लिखा गई है जब मैंने बाबई के मुशायरे में इसको पढ़ा तो कुछ शुभचिंतक शायरों ने कहा कि इसको संवेदनशील स्‍थान पर मत पढ़ना । जैसे कि एक बार और किसी शेर पर किसी परिचित ने कहा था कि इसको मत पढ़ना । मगर मुझे लगता है कि जब राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि

''आज़ादी खादी के कुरते की एक बटन

आज़ादी टोपी एक नुकीली तनी हुई

फैशन वालों के लिये नया फैशन निकला 

मोटर में बांधों तीन रंग वाला चिथड़ा''

तो क्‍या  वे कवियों को एक संदेश नहीं दे रहे हैं कि जन के लिये समर्पित रहो ना कि किसी और के लिये । आज अगर कोई कवि तीन रंग वाला चिथड़ा लिख दे तो हंगामा ही मच जाये और लोग पत्‍थर लेकर पिल ही पडें । खैर तो जिस शेर पर मेर मित्र ने मना किया था वो एक दूसरी ग़ज़ल का ये शेर था जिस ग़ज़ल में केवल आ की मात्रा ही काफिया थी ।

तुम्‍हारे तीन रंगों को बिछायें या कि ओढ़ें हम

के वो कमबख्‍़त दर्जी इसकी नेकर भी नहीं सिलता

मेरा एक ही मानना है कि कविता मनरंजन से ज्‍यादा जनरंजन की चीज़ है । मनरंजन जहां तक सीमा हो वहां तक हों मगर उससे ज्‍यादा कविता को जनरंजन के लिये होना चाहिये । ग़ज़ल के बारें में लोग कहते हैं कि इसको नाज़ुक होना चाहिये इसमें नफासत होनी चाहिये वगैरह वगैरह । मगर मैं कहता हूं कि अगर ऐसा है तो फिर आज भी लोगों की जुबान पर वोही शेर क्‍यों चढ़ें हैं जो जैसे खुदी को कर बुलंद इतना के हर तकदीर ....  जो कि जनरंजन के शेर थे । दुष्‍यंत की पूरी ग़ज़लें जनरंजन की ग़ज़लें हैं । हालंकि मैं दुष्‍यंत की ग़ज़लों से पूरी तरह से सहमत नहीं हूं पर फिर भी आज लोगों की ज़बान पर हैं तो वही हो गई है पीर पर्वत सी ... या फिर बाढ़ की संभावनाएं ।  तो इसके पीछे कारण ये ही है कि लोग अपने दर्द अपनी पीड़ायें ही सुनना पसंद करते हैं।और उसको ही याद भी रखते हैं ।  तो मेरा अनुरोध है कि मनरंजन के लिये लिखें पर जनरंजन का भी ध्‍यान रखें । आपनी ग़ज़ल में एक शेर ऐसा ज़ुरूर रखें जो कि वर्तमान व्‍यवस्‍था से विद्रोह करता हो । विशेषकर मैं वीनस केसरी, गौतम राजरिशी से अनुरोध करूंगा कि आप तो युवा हैं आपकी ग़ज़लों में तो वो तेवर वो आग होनी चाहिये कि अंदर तक हिला दे । अगली कक्षा में अपनी एक पूरी कविता प्रस्‍तुत करूंगा जो कि ऐसी ही है ।

खैर तो आज से हमको कक्षायें प्रारंभ करना है और ये कक्षायें अब प्रयास रहेगा कि नियमित हों । हां इस बार तरीका थोड़ा अलग होगा । पहले तो हर सप्‍ताह एक कक्षा होगी । और फिर समस्‍याओं पर चर्चा वे समस्‍याऐं जो कि आपकी ग़ज़लों के माध्‍यम से आती हैं   और एक होगा तरही मुशायरा जो हर सप्‍ताह किसी एक मिसरे पर होगा । जैसे इस बार कि बहर है

इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा

आपको इस पर अपना मतला बनाना है और  कम से कम पांच शेर निकालने हैं । बहर है रमल मुसमन महजूफ़ । रुक्‍न हैं  फ़ाएलातुन-फ़ाएलातुन-फ़ाएलातुन-फ़ाएलुन  या कि 2122-2122-2122-212 । ये पहली कक्षा है इसलिये बता रहा हूं कि क़ाफिया  है  आ  की मात्रा और रदीफ है हो जाएगा । अब आपका मतला अपना होना चाहिये और कम से कम एक शेर ऐसा होना चाहिये जिसमें मिसरा सानी हो इतना मत चाहो उसे वो बेवफा ओ जायेगा ( इसको गिरह लगाना कहते हैं कि आपने एक शेंर में मिसरा सानी मूल रखा और मिसरा ऊला लिखा)। ग़ज़ल तो आप पहचान ही गये होंगे बशीर बद्र साहब की है । एक मनोरंजक तथ्‍य आपको बता  दूं बशीर बद्र साहब  को जिस शेर ने ख्‍याति दी उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये वो ग़ज़ल वास्‍तव में उन्‍होंने तरही में लिखी थी ( ये बात उन्‍होंने मुझे ख़ुद चर्चा में बताई ) । किसी शायर की ग़ज़ल का मिसरा न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए तरही मुशायरे के लिये मिला था और उस पर उन्‍होंने उस पर अपनी ग़ज़ल बनाई कभी तो असमां से चांद उतरे ..... । और इस ग़ज़ल में एक शेर में उन्‍होंने मूल मिसरे न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये पर गिरह बांधी थी उजाले अपनी यादों के ..  उसके बाद जो कुछ हुआ वो इतिहास है । तरह पर लिखी ग़ज़लों को आप अपने नाम से पढ़ सकते हैं किन्‍तु पढ़ने से पूर्व बताना होता है कि किस शायर की किस ग़ज़ल पर आपने काम किया है । तो कक्षा का आग़ाज़ हम करते हैं तरही मुशायरे से । जल्‍द अपनी ग़ज़लें ( पांच शेर न निकाल पायें तो मतला और तीन शेर निकालें ) तैयार करें और भेजें ताकि आगे का कारोबार चल सके । ( कक्षायें पुन: प्रारंभ होने के लिये आभार व्‍यक्‍त करना हो तो मुझे नहीं इनको करें श्री समीर लाल जी,श्री नीरजी गोस्‍वामी जी वीनस केसरी, कंचन चौहान,  इन लोगों ने कक्षायें प्रारंभ करने के लिये जो दबाव डाला उतना तो वाम दलों ने पांच सालों में मनमोहन सिंह पर भी नहीं डाला होगा )

आपका उत्‍साह आगे की कक्षाओं के लिये प्रेरणा बनगा

परिवार