गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

आइए आज दो बहुत ही उम्दा शायरों धर्मेन्द्र कुमार सिंह और दिगम्बर नासवा के साथ इस तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं ।

तरही का आगाज़ बहुत अच्छे से हुआ है। और कमाल की बात यह है कि लगता है कि तरही का इंतज़ार सर्दी भी कर रही थी, इधर हमारा मुशायरा प्रारंभ हुआ और उधर सर्दियों ने भी अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। मौसम एकदम से बदल गया है। दो दिन पहले तक जो मौसम मेहरबान था, वह अब एकदम ठंड के चाबुक ले कर आ गया है। वैसे भी पिछले कुछ सालों से यही हो रहा है कि अचानक ही एकदम ठंड का मौसम आ जाता है। ख़ैर इस बार पहली बार हम इस मौसम के स्वागत में मुशायरा आयोजित कर रहे हैं। और यह मुशायरा भी आप सब के उत्साह के कारण बहुत अच्छा होने वाला है।
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
आइए आज दो बहुत ही उम्दा शायरों धर्मेन्द्र कुमार सिंह और दिगम्बर नासवा के साथ इस तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं ।
 धर्मेन्द्र कुमार सिंह
बड़ा जादुई है तेरा साथ हमदम
हुये जिस्म उरियाँ तो ठंडक हुई कम
समंदर कभी भर सका है न जैसे
मिले प्यार कितना भी लगता सदा कम

ये सूरत, ये मेधा, ये बातें, अदाएँ
कहीं बुद्ध से बन न जाऊँ मैं गौतम
कुहासे को क्या छू दिया तूने लब से
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम

मुबाइल मुहब्बत का इसको थमा दे
मेरे दिल का बच्चा मचाता है ऊधम
मतले का मिसरा सानी एकदम कमाल है, विरोधाभास को इस प्रकार मिसरे में उपयोग करना, वाह और उस पर क्या सोच है। प्यार को लेकर कहा गया शेर बहुत सुंदर है, सच में समंदर भी उस प्यास को कभी नहीं भर सकता जो प्यास प्यार की होती है। और उस पर बुद्ध से गौतम बन जाने वाला अगला शेर। क्या कमाल का मिसरा सानी बनाया है, बहुत ही ज़बरदस्त मिसरा है। कुहासे को लब से छू लेने की बात करने वाला शेर भी एकदम कमाल है, और उस के साथ गिरह भी बहुत सुंदर बाँधी गई है। अंतिम शेर बहुत मासूमियत के साथ कहा गया है। कितनी छोटी सी इच्छा है दिल की। बहुत ही कमाल । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह, वाह, वाह।

दिगम्बर नासवा
पहाड़ों ने थामा है सर्दी का परचम
फ़िज़ाओं में कोहरे की बजती है सरगम
डिनर सुरमई अब्र पर बुक है अपना
परिंदों के पर पे चलें बैठ के हम

वहीं चाँदनी सो रही मस्त हो के
जहाँ बर्फ़ की है रज़ाई मुलायम
हवा सर्द मौसम के नश्तर हों जैसे
खिली धूप जैसे के जाड़ों की मरहम

चिनारों पे फ़ुर्क़त के लम्हे मिलेंगे
सुलगते हैं यादों की सिगड़ी में तुम-हम
चहकने लगे कुछ रिबन आसमानी
हरी पत्तियों पर गिरी यूँ ही शबनम

न जाड़ों में ठंडी, न गर्मी गरम हो
ख़ुदा मान जाए तो बदले ये सिस्टम
शटर दिन का खुलने पे दिखने लगा है
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम 
बहुत ही सुंदर मतले के साथ ग़ज़ल शुरू हो रही हैसर्दी का परचम तथा कोहरे की सरगम का प्रयोग बहुत ही शानदार है। अगले शेर में कल्पना की उड़ान अब्र पर डिनर करने के लिए परिंदों के पर पे बैठ कर जा रही है, बहुत ख़ूब। बर्फ़ की रज़ाई में चाँदनी का सोना, क्या ही कमाल प्रयोग किया गया है। मौसम में नश्तर पर धूप का मरहम, एकदम नयी बात, धूप को पहली बार मरहम लगाते देखा। चिनारों का ज़िक्र न हो तो सर्दी का मौसम ही कैसा, उस पर यादों की सिगड़ी तो एकदम सुंदर है। इस ग़ज़ल में प्रतीकों का कमाल बहुत अच्छे से किया गया है, जैसे रिबन आसमानी बहुत सुंदरता से आया है। और अगले शेर में ख़ुदा से सिस्टम बदल देने की मासूम गुज़ारिश। अंतिम शेर में गिरह भी बहुत सुंदर तरीक़े से बाँधी गई है। दिन का शटर खुलना एकदम कमाल है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।
आज के दोनों शायरों ने एकदम तरही को जाड़ों के मौसम के रंग प्रदान कर दिए हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़लें कही हैं दोनों ने। बिलकुल नए प्रयोग किए हैैं दोनों ने अपनी ग़ज़लों में। सर्दियों के मौसम की सुंदरता लिए हैं दोनों ग़ज़लें। तो आप भी दाद दीजिए और प्रतीक्षा कीजिए अगले अंक की।

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