शनिवार, 26 जुलाई 2008

माड़साब भी कई दिनों के बाद लौट रहे हैं और अभिनव भी । अभिनव ने एक ग़ज़ल को पटल पर रखा है देखें कि क्‍या है वो

ग़ज़ल की कक्षाएं कुछ दिनों से बंद सी हैं और माड़साब अगर शुरू करना भी चाहें तो मध्‍य प्रदेश की सर‍कार ने उसपे रोक लगा दी है । घबराइये नहीं दरअस्‍ल में ये रोक बिजली की कटौती के कारण लगी है । हमारे यहां पे आजकल बिजली जाती नहीं है आती है । हम ये नहीं कह पाते कि बिजली गई हम ये कहते हैं कि आ गई क्‍योंकि । जाती ज्‍यादा है । खैर अभिनव की ग़ज़ल की तखतीई करें और बताएं कि क्‍या हाल हैं ।

सूचना आई फटा है आर्याव्रत में बम,
मुट्ठियाँ भींचे हुए बस देखते हैं हम,

नखलऊ, जैपूर, बंगलूरु, हईद्राबाद,

मुंबई, काशी, नै दिल्ली दम दमा दमदम,
बात ये पहुँची जब अपने हुक्मरानों तक,
हंस के बोले ग्लास में डालो ज़रा सी रम,
अब नियमित रूप से मौसम ख़बर के बाद,
बम की खबरें आ रही हैं देख लो प्रियतम,
आदमीयत हो रही है आदमी में कम,
पढ़ के लिख के बन गए हैं पूरे बेशरअम.
फर्क पड़ता ही नहीं कोई किसी को अब,
दुःख रहा फिर दिल हमारा आँख है क्यों नम,
हिंदू मुस्लिम लड़ मरें तो कौन खुश होगा,
सोच कर देखो मेरे भाई मेरे हमदम.

परिवार