दीपावली प्रकाश का पर्व है, इसको कई प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। लेकिन सबसे अच्छा प्रतीक यह है कि यह अंधकार पर प्रकार की विजय का पर्व कहा जाता है। अंधकार इसलिए क्योंकि यह अमावस के दिन आने वाला त्योहार है। अमावस की अँधेरी रात में जब गहरा काला अंधकार सारी सृष्टि को अँधेरे से भर देना चाहता है, तब नन्हें-नन्हें दीप उसकी चुनौती को स्वीकार कर जगमग करते हुए हर दिशा में जल उठते हैं। दीपकों का प्रकाश उस अँधेरे की राह में हौसलों का उजास लिये चुनौती बन कर खड़ा हो जाता है। और उसके बाद अमावास की वह रात दीपकों की पूर्णिमा में बदल जाती है। आज से पाँच दिवसीय प्रकाश-पर्व प्रारंभ हो रहा है। आज धन-त्रयोदशी है, जो धन तथा आरोग्य दोनों का ही दिवस है। आप सभी को पाँच दिवसीय प्रकाश पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएँ, दीपकों का यह पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का प्रकाश लेकर आये। आप सपरिवार स्वस्थ रहें, सानंद रहें, सुखी रहें।
आइये आज तरही मुशायरे में सुनते हैं चार शायरों को- डॉ. विजय सक्सेना, मंसूर अली हाश्मी, धर्मेंद्र कुमार सिंह तथा गिरीश पंकज को।
डॉ. विजय सक्सेना
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
वो पाप करने वाले देखो आज हैं न कल रहे
असुर-विनाश कर के राम आये लौट कर नगर
पवन के पुत्र साथ में पराक्रमी प्रबल रहे
ख़ुशी बढ़ी थी जीत की जो आये राम लौट कर
लखन सदैव साथ उनके एक एक पल रहे
नहीं असुर का अंत था, वो अंत था ग़ुरूर का
भरा हो मन में घोर तम तो ज्ञान भी निबल रहे
खड़ी हैं आरती का थाल लेके मातृशक्तियाँ
नयन से उर्मिला के भी हैं अश्रु-कण उबल रहे
नहीं था उर्मिला का त्याग मृत्युशैया से भी कम
वियोग कितना ही प्रबल हो प्रेम तो अचल रहे
मना था पर्व जीत का वो दीपमालिकाओं से
ख़ुशी में दीप जो जले थे आज तक वो जल रहे
प्रकाश-पर्व सत्य की 'विजय' कथा का घोष है
हो राम-राज, देश ये सुफल रहे, सफल रहे
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
वो पाप करने वाले देखो आज हैं न कल रहे
असुर-विनाश कर के राम आये लौट कर नगर
पवन के पुत्र साथ में पराक्रमी प्रबल रहे
ख़ुशी बढ़ी थी जीत की जो आये राम लौट कर
लखन सदैव साथ उनके एक एक पल रहे
नहीं असुर का अंत था, वो अंत था ग़ुरूर का
भरा हो मन में घोर तम तो ज्ञान भी निबल रहे
खड़ी हैं आरती का थाल लेके मातृशक्तियाँ
नयन से उर्मिला के भी हैं अश्रु-कण उबल रहे
नहीं था उर्मिला का त्याग मृत्युशैया से भी कम
वियोग कितना ही प्रबल हो प्रेम तो अचल रहे
मना था पर्व जीत का वो दीपमालिकाओं से
ख़ुशी में दीप जो जले थे आज तक वो जल रहे
प्रकाश-पर्व सत्य की 'विजय' कथा का घोष है
हो राम-राज, देश ये सुफल रहे, सफल रहे
डॉ. विजय सक्सेना हमारे मुशायरे में पहली बार तशरीफ़ ला रहे हैं। मगर पहली ही ग़ज़ल से उन्होंने अपने प्रभावशाली दस्तक दी है मुशायरे में। पूरी ग़ज़ल राम-कथा पर लिखी गयी मुसल्सल ग़ज़ल है, मतले का शेर गिरह का शेर भी है और राम-कथा के आग़ाज़ का भी। राम की वापसी और उस विजय में हनुमान तथा लक्ष्मण की भूमिका को दर्शाते दोनों शेर बहुत सुंदर बने हैं। असुर के रूप में अभिमान के अंत के बारे में बहुत अच्छे से शेर में बात की है। उर्मिला के विरह पर लिखे गये दोनों शेर उसकी व्यथा को बहुत अच्छे से व्यक्त कर रहे हैं, वियोग में प्रेम का जीवित बने रहने का भाव बहुत ही सुंदर उभर कर आया है। और उसके बाद का शेर दीपावली पर्व के इतिहास तथा दीपकों की कथा को बहुत अच्छे से रेखांकित कर रहा है। मकते का शेर एक मंगल कामना के साथ ग़ज़ल को समाप्त करता हुआ बहुत ख़ूबसूरत शेर है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है, वाह वाह वाह।
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मंसूर अली हाश्मी
हवा के पैरोकार अपने पैंतरे बदल रहे
मगर ये दीप जल रहे, मगर ये दीप जल रहे
सितारें गर्दिशों मैं हैं, ज़मीन पे ये आदमी
ये अपनी चाल चल रहे वो अपनी चाल चल रहे
कमाल है धमाल है 'ए आई' पर सवाल है?
अजीब कश्मकश कि ना निगल ही ना उगल रहे!
वो 'कॉकरोच' नाम जो सभी को नापसंद था
उसी का नाम ले के अब गिरे हुए सँभल रहे
उलझ रहे हैं चार के विचार मैं अभी तलक
अधेड़ उम्र में भी ये मियाँ जी क्यों मचल रहे!
बढ़ा करे भले ही ये अँधेरा ज़ोरो-ज़ुल्म का
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
ग़रीब खाने से निकल ये कौन सिम्त चल रहे
'अमीरी' ही कि चाह में ये रास्ते बदल रहे
बदल के दल, बदल सका न भाग्य जिनका आज तक
जिन्हें न काम मिल सका अभी तलक मचल रहे
ये लिख रहे वो पढ़ रहे कमाले 'मीडिया' ग़ज़ब!
लगा के उल्टा चश्मा कितने साल ही से चल रहे
बदल के 'ई वी एम' को भी नतीजा ना बदल सके
दबाया कोई भी बटन खिले तो बस कमल रहे
बहर सरल भले ही थी परिस्थिति से जूझ कर
ग़ज़ल सराई करने में क्या 'हाश्मी' सफल रहे?
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मतले में दोहराव का प्रयोग बहुत ही सुंदरता के साथ किया गया है। उसके बाद कृत्रिम बुद्धिमता तथा कॉकरोच जैसे समसामयिक विषयों को बहुत ही सुंदरता के साथ शेर में पिरोया गया है। गिरह का शेर भी बहुत ही सुंदर बना है अंधकार और प्रकाश के बीच के द्वंद्व को बहुत अच्छे से उभारा गया है। ग़रीबी से अमीरी की तरफ़ जाने की चाह में जूझती हुई आबादी की बात हो या सत्ता की चाह में दल को बदल कर सत्ता की मलाई खाने की कोशिश में लगे हुए नेताओं की बात हो, बहुत गहरे व्यंग्य के साथ बात को कहा गया है। मीडिया इन दिनों जिस प्रकार का जादू कर रही है तथा चुनाव आयोग भी जिस प्रकार के कमाल दिखा रहा है, इन दोनों ही बातों को बहुत सुंदरता के साथ और व्यंग्य के साथ लिखा गया है। मकते का शेर असल में हाश्मी जी के जीवन में इस समय चल रही कुछ कठिन परिस्थितियों का चित्रण है। बहुत अच्छी ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
हवा के पैरोकार अपने पैंतरे बदल रहे
मगर ये दीप जल रहे, मगर ये दीप जल रहे
सितारें गर्दिशों मैं हैं, ज़मीन पे ये आदमी
ये अपनी चाल चल रहे वो अपनी चाल चल रहे
कमाल है धमाल है 'ए आई' पर सवाल है?
अजीब कश्मकश कि ना निगल ही ना उगल रहे!
वो 'कॉकरोच' नाम जो सभी को नापसंद था
उसी का नाम ले के अब गिरे हुए सँभल रहे
उलझ रहे हैं चार के विचार मैं अभी तलक
अधेड़ उम्र में भी ये मियाँ जी क्यों मचल रहे!
बढ़ा करे भले ही ये अँधेरा ज़ोरो-ज़ुल्म का
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
ग़रीब खाने से निकल ये कौन सिम्त चल रहे
'अमीरी' ही कि चाह में ये रास्ते बदल रहे
बदल के दल, बदल सका न भाग्य जिनका आज तक
जिन्हें न काम मिल सका अभी तलक मचल रहे
ये लिख रहे वो पढ़ रहे कमाले 'मीडिया' ग़ज़ब!
लगा के उल्टा चश्मा कितने साल ही से चल रहे
बदल के 'ई वी एम' को भी नतीजा ना बदल सके
दबाया कोई भी बटन खिले तो बस कमल रहे
बहर सरल भले ही थी परिस्थिति से जूझ कर
ग़ज़ल सराई करने में क्या 'हाश्मी' सफल रहे?
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मतले में दोहराव का प्रयोग बहुत ही सुंदरता के साथ किया गया है। उसके बाद कृत्रिम बुद्धिमता तथा कॉकरोच जैसे समसामयिक विषयों को बहुत ही सुंदरता के साथ शेर में पिरोया गया है। गिरह का शेर भी बहुत ही सुंदर बना है अंधकार और प्रकाश के बीच के द्वंद्व को बहुत अच्छे से उभारा गया है। ग़रीबी से अमीरी की तरफ़ जाने की चाह में जूझती हुई आबादी की बात हो या सत्ता की चाह में दल को बदल कर सत्ता की मलाई खाने की कोशिश में लगे हुए नेताओं की बात हो, बहुत गहरे व्यंग्य के साथ बात को कहा गया है। मीडिया इन दिनों जिस प्रकार का जादू कर रही है तथा चुनाव आयोग भी जिस प्रकार के कमाल दिखा रहा है, इन दोनों ही बातों को बहुत सुंदरता के साथ और व्यंग्य के साथ लिखा गया है। मकते का शेर असल में हाश्मी जी के जीवन में इस समय चल रही कुछ कठिन परिस्थितियों का चित्रण है। बहुत अच्छी ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
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धर्मेंद्र कुमार सिंह
चुनाव की किताब के वरक़ तमाम जल रहे
रिज़ल्ट ख़ुद ही ख़ुद के होने की वजह बदल रहे
ज़मीर बेच कर बने अमीर लोग होंगे वो
ग़रीब के नसीब को जो पाँव से मसल रहे
सवाल जब किया गया कि रोटियाँ कहाँ गईं
जवाब में सिपाहियों के बूट सर कुचल रहे
किताब में लिखा हुआ विधान बस किताब तक
ज़मीन पर तो क़ायदे क़दम-क़दम बदल रहे
जड़ें टँगी हैं धूप में, हवा में पत्तियाँ गड़ीं
अजीब पेड़ हैं कि जो बिना ज़मीन फल रहे
मैं सो रहा था छाँव में तो ख़्वाब ने जगा दिया
कहा कि तू भी चल जहाँ तमाम लोग चल रहे
निचोड़ कर सुखा दिया है रस्सियों पे आसमाँ
नजूम बूँद बन के अब ज़मीन पर टहल रहे
लगा के पंख उड़ चला है पत्थरों का कारवाँ
पहाड़ दंग हैं कि पत्थरों के पर निकल रहे
शिखर पे बैठ कर जिन्हें ग़ुरूर था बड़ा वही
ज़रा सी धूप खिल गयी तो बर्फ़ से पिघल रहे
तमाम ज़ुल्म कर के भी ये देखकर वो दंग हैं
हम अपने पाँव पर खड़े हैं और ख़ुद ही चल रहे
यही सुकून है बहुत कि इस कठिन घड़ी में भी
"मिटाने अंधकार को हैं देखो दीप जल रहे"
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मतले में ही गहरी व्यंजना के साथ जो कटाक्ष किया गया है, वह बहुत धारदार है। रोटियों के प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों के जूतों से कुचले जाने वाला शेर हासिले ग़ज़ल शेर है, ऐसे शेर बहुत मुश्किल से बनते हैं। विधान की किताबा वाला शेर और बिना ज़मीन के पेड़ों के फलने वाला शेर, कबीर की उलटबाँसियों की तरह व्यंग्य में बात करते हैं। हमारे समय का एक काला चेहरा प्रस्तुत करते हैं। रस्सियों पर सुखाए गये आसमाँ और पत्थरों के पर निकल आने वाले शेरों में प्रतीकों को क्या ही सुंदर उपयोग किया गया है। एकदम कमाल के शेर। अगले दोनों शेर असल में अभिमान के हार जाने के शेर हैं। बर्फ़ के पिघलने और ग़ुरूर के उतरने की बात तथा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े रहने की बात हमारे वर्तमान समय को बहुत अच्छे से व्यक्त करती है। अंतिम शेर में बहुत ही सुंदरता के साथ तरही मिसरे की गिरह लगायी गयी है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
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चुनाव की किताब के वरक़ तमाम जल रहे
रिज़ल्ट ख़ुद ही ख़ुद के होने की वजह बदल रहे
ज़मीर बेच कर बने अमीर लोग होंगे वो
ग़रीब के नसीब को जो पाँव से मसल रहे
सवाल जब किया गया कि रोटियाँ कहाँ गईं
जवाब में सिपाहियों के बूट सर कुचल रहे
किताब में लिखा हुआ विधान बस किताब तक
ज़मीन पर तो क़ायदे क़दम-क़दम बदल रहे
जड़ें टँगी हैं धूप में, हवा में पत्तियाँ गड़ीं
अजीब पेड़ हैं कि जो बिना ज़मीन फल रहे
मैं सो रहा था छाँव में तो ख़्वाब ने जगा दिया
कहा कि तू भी चल जहाँ तमाम लोग चल रहे
निचोड़ कर सुखा दिया है रस्सियों पे आसमाँ
नजूम बूँद बन के अब ज़मीन पर टहल रहे
लगा के पंख उड़ चला है पत्थरों का कारवाँ
पहाड़ दंग हैं कि पत्थरों के पर निकल रहे
शिखर पे बैठ कर जिन्हें ग़ुरूर था बड़ा वही
ज़रा सी धूप खिल गयी तो बर्फ़ से पिघल रहे
तमाम ज़ुल्म कर के भी ये देखकर वो दंग हैं
हम अपने पाँव पर खड़े हैं और ख़ुद ही चल रहे
यही सुकून है बहुत कि इस कठिन घड़ी में भी
"मिटाने अंधकार को हैं देखो दीप जल रहे"
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मतले में ही गहरी व्यंजना के साथ जो कटाक्ष किया गया है, वह बहुत धारदार है। रोटियों के प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों के जूतों से कुचले जाने वाला शेर हासिले ग़ज़ल शेर है, ऐसे शेर बहुत मुश्किल से बनते हैं। विधान की किताबा वाला शेर और बिना ज़मीन के पेड़ों के फलने वाला शेर, कबीर की उलटबाँसियों की तरह व्यंग्य में बात करते हैं। हमारे समय का एक काला चेहरा प्रस्तुत करते हैं। रस्सियों पर सुखाए गये आसमाँ और पत्थरों के पर निकल आने वाले शेरों में प्रतीकों को क्या ही सुंदर उपयोग किया गया है। एकदम कमाल के शेर। अगले दोनों शेर असल में अभिमान के हार जाने के शेर हैं। बर्फ़ के पिघलने और ग़ुरूर के उतरने की बात तथा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े रहने की बात हमारे वर्तमान समय को बहुत अच्छे से व्यक्त करती है। अंतिम शेर में बहुत ही सुंदरता के साथ तरही मिसरे की गिरह लगायी गयी है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
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गिरीश पंकज
इसीलिए तो बस अँधेरे को बहुत ये खल रहे
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
ज़रा सी दूर हमसे अब है कामयाबी दोस्तो
इसीलिए बिना रुके हैं चल रहे, तो चल रहे!
सियासती चरित्र को समझ न पाये हम कभी
इरादे और वादे इनके रोज़ ही तो टल रहे
खड़े रहे जो लोग बस नसीब के ही फेर में
तभी तो लक्ष्य पाने में सदा ही वो विफल रहे
कहेंगी ख़ुद ही स्वागतम् कभी तो मंज़िलें हमें
'गिरीश' के हृदय में स्वप्न जाने कब से पल रहे
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मतले में ही बहुत सुंदरता के साथ तरही मिसरे की गिरह लगायी गयी है। सच में अँधेरे को सबसे ज़्यादा वे दीप ही खलते हैं, जो उसे चुनौती देते हुए जल उठते हैं। लगातार चलते रहने की बात को चल रहे के दोहराव के साथ अगले ही शेर में बहुत सुंदरता के साथ व्यक्त किया गया है। सियासत के चरित्र को लेकर लिखा गया शेर हमारे समय का बहुत बड़ा सच है, सियासत के चरित्र को, उसके वादों और इरादों को सचमुच कोई, कभी नहीं जान सकता। अगला शेर जैसे कर्महीनता पर एक बहुत बड़ा कटाक्ष है, जो लो हमेशा केवल नसीब, क़िस्मत, भाग्य जैसे शब्दों पर ही भरोसा करके बैठे रहते हैं, उनक पर गहरा व्यंग्य कसा गया है इस शेर में। मकते के शेर में उसी उम्मीद, उसी आशा की बात कही गयी है, जो हर इंसान के अंदर होती है कि किसी न किसी दिन, कभी न कभी तो मंज़िल आकर उससे स्वयं कहेगी- स्वागतम्। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
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इसीलिए तो बस अँधेरे को बहुत ये खल रहे
"मिटाने अंधकार को हैं दीप देखो जल रहे"
ज़रा सी दूर हमसे अब है कामयाबी दोस्तो
इसीलिए बिना रुके हैं चल रहे, तो चल रहे!
सियासती चरित्र को समझ न पाये हम कभी
इरादे और वादे इनके रोज़ ही तो टल रहे
खड़े रहे जो लोग बस नसीब के ही फेर में
तभी तो लक्ष्य पाने में सदा ही वो विफल रहे
कहेंगी ख़ुद ही स्वागतम् कभी तो मंज़िलें हमें
'गिरीश' के हृदय में स्वप्न जाने कब से पल रहे
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मतले में ही बहुत सुंदरता के साथ तरही मिसरे की गिरह लगायी गयी है। सच में अँधेरे को सबसे ज़्यादा वे दीप ही खलते हैं, जो उसे चुनौती देते हुए जल उठते हैं। लगातार चलते रहने की बात को चल रहे के दोहराव के साथ अगले ही शेर में बहुत सुंदरता के साथ व्यक्त किया गया है। सियासत के चरित्र को लेकर लिखा गया शेर हमारे समय का बहुत बड़ा सच है, सियासत के चरित्र को, उसके वादों और इरादों को सचमुच कोई, कभी नहीं जान सकता। अगला शेर जैसे कर्महीनता पर एक बहुत बड़ा कटाक्ष है, जो लो हमेशा केवल नसीब, क़िस्मत, भाग्य जैसे शब्दों पर ही भरोसा करके बैठे रहते हैं, उनक पर गहरा व्यंग्य कसा गया है इस शेर में। मकते के शेर में उसी उम्मीद, उसी आशा की बात कही गयी है, जो हर इंसान के अंदर होती है कि किसी न किसी दिन, कभी न कभी तो मंज़िल आकर उससे स्वयं कहेगी- स्वागतम्। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।
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आज के चारों शायरों ने बहुत अच्छे से प्रकाश पर्व की अगवानी में अपने अशआरों की दीपक जलाए हैं। बहुत ही सुंदर हैं चारों ग़ज़लें। प्रकाश की तथा उजास की कई-कई कहानियाँ से ग़ज़लें कह रही हैं। मैंने तो अपने हिस्से की दाद दे दी, अब आप लोग भी अपने हिस्से की दाद इन चारों शायरों को प्रदान करें। पाँच दिवसीय प्रकाश पर्व की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

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