Tuesday, 29 January, 2008

वो हाथों में लिये काग़ज़ की चिडि़या बेचने वाले, गली में अब नहीं आते खिलौना बेचने वाले, हमारी छत से ऊंचे हो गए अब उनके दरवाज़े, खुली सड़कों पे थे कल तक बताशा बेचने वाले

क्षमा चाहता हूं कि इन दिनों कुछ सुस्‍त हो गया हूं दरअस्‍ल में कुछ काम काज का तनाव है और कुछ और दूसरी परेशानियां जिनके कारण ही इन दिनों कुछ व्‍यस्‍तता बनी है हां पिछले दिनों तीन चार दिनों से तो ननिहाल में था । पूरी तरह से गांव के जीवन का आनंद ले रहा था । गांव जहां पर आज भी अलाव जलता है और देर रात तक उसके आस पास दीन दुनिया की बातें चलती हैं । गांव जहां पर आज भी टी वी का जोर उतना नहीं है । गांव जहां पर आज भी सुबह मामी और नानी मिलकर सुब्‍ह से ही दही को मथने में जुट जाती हैं और मथने के बाद सभी बच्‍चों को रात की ठंडी दो रोटियों पर एक लोंदा नेनू ( ताज़ा मक्‍खन) रख कर दे देती हैं कि नाश्‍ता कर लो । मैंने भी उस सुब्‍ह के कलेवे का खूब आनंद लिया । घर्र घर्र चलती मथानी का शोर और उसको खींचती हुई नानी को देखकर मैंने भी एक दो हाथ मारे । गांव जहां पर आज भी रात होते ही खामोशी बिछ जाती है वो खामोशी जिसकी तलाश हम शहरों में करते रहते हैं । मैं अपने ननिहाल शायद आठ साल बाद गया था । जबकि मेरा ननिहाल केवल सत्‍तर किलोमीटर की ही दूरी पर है मुझे ऐसा लगा कि मैं क्‍यों नहीं आया यहां पर पिछले इतने सालों से जबकि ऐसा भी नहीं हैं कि मैं आ ही नहीं सकता था । दरअस्‍ल में पिछले दिनों से कुछ नैराश्‍य सा आ रहा था और उसके पीछे जब कारण देखा तो ज्ञात हुआ कि मैने अपने को पिछले कई सालों से छुट्टी ही नहीं दी है सो ऐसा हो रहा है । बस निकल पड़ा इस बार अपने को थोड़ा सा मुक्‍त करने और सच बताऊं कि बहुत अच्‍छा लगा । ताज़ा बना हुआ गुड़ आपने भी खाया होगा और आप भी जानते होंगें कि उसका स्‍वाद क्‍या होता है ।

खैर जो भी हो पर ये तो है ही कि छुट्टी के बहाने स्‍वयं को ताज़ा कर लिया और अब कुछ ठीक लग रहा हैं ।

चलिये अपने पाठ की ओर चलते हैं हमने जहां पर छोड़ा था वहां से ही शुरू करते हैं । हमने पिछले सबक में तीन और चार रुक्‍नों के बारे में बात की थी और उनका नाम निकाला था कि उनको क्‍या कहा जाता है । आज हम उनसे ही कुछ और आगे चलते हैं और जानते हैं कि उनके अलावा और क्‍या हो सकता है ।

मुरब्‍बा :-  घर में भले ही आपसे कहा जाऐ कि मुरब्‍बा किसको कहते हैं तो आप एक ही बात कहेंगें कि भाई जो घर में आंवले या आम का बनता है और जिसको खाने के बाद या साथ खाया जाता है उसको मुरब्‍बा कहा जाता है । पर ग़ज़ल के संदर्भ में मुरब्‍बा अलग ही होता है । मुरब्‍बा काह जाता है उस ग़ज़ल को जिसके हर एक मिसरे में दो रुक्‍न हों और कुलमिलाकर पूरे श्‍ोर में चार रुक्‍न हों । जैसे शेर है

मिरे दिल की भी ख़बर है

तुझे ऐ बेख़बर आ तो

मि र दिल की भि ख़ बर है
तु झ ऐ बख बर आ तो
फ ए ला तुन फ ए ला तुन

दरअस्‍ल में ये छोटी बहर हैं जिसमें केवल दो ही रुक्‍न हैं फएलातुन-फएलातुन ।  दो ही रुक्‍न होने के कारण ही इस बहर का नाम है बहरे रमल मुरब्‍बा मख़बून  अब ये रमल नाम तो विशेष रुक्‍न के कारण है जिसकी बात हम आगे करेंगें मगर जो मुरब्‍बा लगा हुआ है उसके पीछे कारण है ये कि ये दो रुक्‍नी मिसरों से बनी हुई ग़ज़ल है और हर मिसरे में दो ही मिसरे आ रहे हैं ।

मुसना :-  अब आता है मुसना ये भी एक विशेष प्रकार का नाम है जो एक खास बहर को ही दिया जाता है । वह  ग़ज़ल जिसके हर एक मिसरे में केवल एक ही रुक्‍न हो उसको कहा जाता है कि ये मुसना है । अब ये मुसना जो है ये नाम के साथ ही लग जाएगा जो कि ये बातएगा कि छोटी बहर है और हर एक मिसरे में एक ही रुक्‍न है ।

मेहर हूं
सहर हूं
फऊलुन

अब इसमें क्‍या हो रहा है कि एक ही रुक्‍न हे पूरे मिसरे में और पूरा काम एक ही से चल रहा है हालंकि ये बहर मुतकारिब है पर इसके नाम में मुसना भी आएगा जो कि ये बात रहा होगा कि ये एक रुक्‍न की ग़ज़ल है । इस तरह के प्रयोग कम ही किये गये हैं क्‍योंकि उसमें स्‍वतंत्रता नहीं है ।

आज के लिये इतना ही । अब तो ऐसा लगने लगा है कि माड़साब के साथ साथ विद्यार्थी भी थक गये हैं तभी तो कुछ काम नहीं हो रहा है । खैर हम अब बहर पर आ गए हैं और धीरे धीरे इस रहस्‍य पर से पर्दा उठ रहा है क‍ि क्‍या है वो जादू जिसको बहर कहा जाता है ।

4 टिप्पणियाँ:

कंचन सिंह चौहान said...

उपस्थित गुरुवर! मुरब्बा और मुसना दोनो समझ लिया।

Devi Nangrani said...

बहर यही निकला है!!
वो हाथों में / लिये कागज़ / की चिडिया बे /चने वाले
गली में अब / नहीं आते /खिलौना बे /चने वाले.
१२२२, १२२२, १२२२, १२२२
१२२२, १२२२, १२२२,

Devi Nangrani said...

वो हाथों में / लिये कागज़ / की चिडिया बे /चने वाले
गली में अब / नहीं आते /खिलौना बे /चने वाले.
१२२२, १२२२, १२२२, १२२२
१२२२, १२२२, १२२२, १२२२

Ripudaman said...

jee samjhey.