शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

शिवना साहित्यिकी का जनवरी-मार्च 2018 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeerr कार्यकारी संपादक, शहरयार Shaharyar , सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का जनवरी-मार्च 2018 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है- आवरण कविता, कहाँ गई चिड़िया...? / लालित्य ललित Lalitya Lalit , संपादकीय, शहरयार Shaharyar । व्यंग्य चित्र, काजल कुमार Kajal Kumar । आलोचना, नई सदी के हिंदी उपन्यास और किसान आत्महत्याएँ, डॉ. सचिन गपाट Sachin Gapat। संस्मरण आख्यान, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth Gyan Chaturvedi । विमर्श- गोदान के पहले, जीवन सिंह ठाकुर Jeevansingh Thakurr । संस्मरण- अविस्मरणीय कुँवर जी, सरिता प्रशान्त पाण्डेय । फिल्म समीक्षा के बहाने- मुज़फ्फरनगर, वीरेन्द्र जैन Virendra Jain । पेपर से पर्दे तक..., कृष्णकांत पण्ड्या Krishna Kant Pandya । पुस्तक-आलोचना- चौबीस किलो का भूत, अतुल वैभव Atul Vaibhav Singh Bharat Prasad । नई पुस्तक- हसीनाबाद / गीताश्री Geeta Shree , गूदड़ बस्ती / प्रज्ञा Pragya Rohini । समीक्षा- उर्मिला शिरीष Urmila Shirish , चौपड़े की चुड़ैलें, पंकज सुबीर, अशोक अंजुम Ashok Anjum Ashok Anjum , सच कुछ और था / सुधा ओम ढींगरा, मुकेश दुबे Mukesh Dubey , बंद मुट्ठी / डॉ. हंसा दीप @Dharm Jain , राम रतन अवस्थी Ram Ratan Awasthii , बातों वाली गली / वंदना अवस्थी दुबे, डॉ. ऋतु भनोट Bhanot Ritu , जोखिम भरा समय है / माधव कौशिक Madhav Kaushik , प्रतीक श्री अनुराग @pratik shri anurag / संतगिरी / मनोज मोक्षेंद्र Mokshendra Manoj । आवरण चित्र पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi , डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा। ऑन लाइन पढ़ें-
https://www.slideshare.net/shivnaprakashan/shivna-sahityiki-january-march-2018-for-web
https://issuu.com/shivnaprakashan/docs/shivna_sahityiki_january_march_2018

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

बासी त्योहार का भी अपना आनंद होता है आइये आज हम भी बासी दीपावली मनाते हैं तिलक राज कपूर जी, सुधीर त्यागी जी और सुमित्रा शर्मा जी के साथ।

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मित्रो हर त्योहार के बीत जाने के बाद एक​ सूनापन सा रह जाता है। ऐसा लगता है कि अब आगे क्या? और उसी सूनेपन को मिटाने के लिए शायद हर त्योहार का एक बासी संस्करण भी रखा गया। भारत में तो हर त्योहार का उल्लास कई दिनों तक चलता है। होली की धूम शीतला सप्तमी तक रहती है, रक्षा बंधन को जन्माष्टमी तक मनाया जाता है और दीपावली को देव प्रबोधिनी एकादशी तक। यह इसलिए ​कि यदि आप किसी कारण से त्योहार मनाने में चूक गए हों तो अब मना लें। हमारे ब्लॉग पर भी बासी त्योहारों के मनाए जाने की परंपरा रही है। कई बार तो बासी त्योहार असली त्योहार से भी ज़्यादा अच्छे मन जाते हैं।

deepawali (5)

कुमकुमे हँस दिए, रोशनी खिल उठी।

आइये आज हम भी बासी दीपावली मनाते हैं तिलक राज कपूर जी, सुधीर त्यागी जी और सुमित्रा शर्मा जी के साथ।

deepawali

TILAK RAJ KAPORR JI

तिलक राज कपूर

deepawali[4]

पुत्र द्वारे दिखा, देहरी खिल उठी
टिमटिमाती हुई ज़िन्दगी खिल उठी।

द्वार दीपों सजी वल्लरी खिल उठी
फुलझड़ी क्या चली मालती खिल उठी।

पूरवी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी
हर दिशा आपने जो छुई खिल उठी।

दीप की मल्लिका रात बतियाएगी
सोचकर मावसी सांझ भी खिल उठी।

इक लिफ़ाफ़ा जो नस्ती के अंदर दिखा
एक मुस्कान भी दफ़्तरी खिल उठी।

एक भँवरे की गुंजन ने क्या कह दिया
देखते-देखते मंजरी खिल उठी।

चंद बैठक हुईं, और वादे हुए
आस दहकां में फिर इक नई खिल उठी।

गांठ दर गांठ खुलने लगी खुद-ब-खुद
द्वार दिल का खुला दोस्ती खिल उठी।

देख अंधियार की आहटें द्वार पर
कुमकुमे हँस दिए, रोशनी खिल उठी।

सचमुच त्योहारों का आनंद तो अब इसी से हो गया है कि इस अवसर पर बेटे-बेटी लौट कर घर आते हैं। दो दिन रुकते हैँ और देहरी के साथ ज़िदगी भी खिल उठती है। फुलझड़ी के चलने से मालती के खिल उठने की उपमा तो बहुत ही सुंदर है, सच में रोशनी और सफेद फूल, दोनों की तासीर एक सी होती है। प्रेम की अवस्था का यही एक संकेत होता है कि चारों दिशाएँ किसी के छू लेने से खिल उठती हैं। एक लिफाफे को नस्ती के अंदर देखकर दफ़्तरी मुस्कान का खिल उठना, बहुत ही गहरा कटाक्ष किया है व्यवस्था पर। भंवरे की गुंजन पर मंजरी का खिल उठना अच्छा प्रयोग है। गांठ दर गांठ खुलने लगी खुद ब खुद में दिल के द्वारा खुलने से दोस्ती का खिल उठना बहुत सुंदर है। सच में गांठों को समय-समय पर खोलते रहना चाहिए नहीं तो वो जिंदगी भर की परेशानी हो जाती हैं। और अंत में गिरह का शेर भी बहुत सुंदर लगा है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

deepawali[6]

sudhir tyagi

सुधीर त्यागी

deepawali[6]

हुस्न के दीप थे, आशिकी खिल उठी।
आग दौनों तरफ, आतिशी खिल उठी।

साथ तेरा जो दो पल का मुझको मिला।
मिल गई हर खुशी, जिन्दगी खिल उठी।

खिल उठा हर नगर, मौज में हर बशर।
थी चमक हर तरफ, हर गली खिल उठी।

देखकर रात में झालरों का हुनर।
कुमकुमे हँस दिए,रोशनी खिल उठी।

रोशनी से धुली घर की सब खिडकियां।
द्वार के दीप से, देहरी खिल उठी।

हुस्न के दीपों से आशिकी का खिल उठना और उसके बाद दोनों तरफ की आग से सब कुछ आतिशी हो जाना। वस्ल का मानों पूरा चित्र ही एक शेर में खींच दिया गया है। जैसे  हम उस सब को आँखों के सामने घटता हुआ देख ही रहे हैं। किसी के बस दो पल को ही साथ आ जाने प जिंदगी खिलखिला उठे तो समझ लेना चाहिए कि अब जीवन में प्रेम की दस्तक हो चुकी है। और दीपावली का मतलब भी यही है कि नगर खिल उठे हर बशर खिल उठे हर गली खिल उठे। गिरह का शेर भी बहुत कमाल का बना है। देखकर रात में झालरों का हुनर कुमकुमों का हँसना बहुत से अर्थ पैदा करने वाला शेर है। दीवाली रोशनी का पर्व है, जगमग का पर्व है। जब रोशनी से घर की सारी खिड़कियाँ धुल जाएँ और द्वार के दीप से देहरी खिल उठे तो समझ लेना चाहिए कि दीपावली आ गई है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है। क्या बात है। वाह वाह वाह।

sumitra sharma

सुमित्रा शर्मा

deepawali[8]

झिलमिलाईं झलर फुलझड़ी खिल उठी
कुमकुमे हंस दिए रौशनी खिल उठी

घेर चौबारे आंगन में दिवले सजे
जैसे तारों से सज ये ज़मीं खिल उठी

सबके द्वारे छबीली रंगोली सजी
तोरण इतरा रहे देहरी खिल उठी

आज कच्ची गली में भी रौनक लगी
चूना मिट्टी से पुत झोंपड़ी खिल उठी

पूजती लक्ष्मी और गौरी ललन
पहने जेवर जरी बींधनी खिल उठी

नैन कजरारे मधु से भरे होंठ हैं
देखो श्रृंगार बिन षोडषी खिल उठी

लौट आए हैं सरहद से घर को पिया
दुख के बादल छंटे चांदनी खिल उठी

हँस के सैंया ने बाँधा जो भुजपाश में
गाल रक्तिम हुए कामिनी खिल उठी

पढ़ के सक्षम हुई बालिका गांव की
ज्ञान चक्षु खुले सुरसती खिल उठी

असलहा त्याग बनवासी दीपक गढ़ें
चहक चिड़ियें रहीं वल्लरी खिल उठी

झिलमिलाती हुई झलरों और खिलती हुई फुलझड़ियों का ही तो अर्थ होता है दीपावली। चौबारों और आँगन को घेर कर जब दिवले सजते हैं तो सच में ऐसा ही तो लगता है जैसे कि ज़मीं को तारों से सजा दिया गया है। सबे द्वारे पर छबीली रंगोली के सजने में छबीली शब्द तो जैसे मोती की तरह अलग ही दिखाई दे रहा है। दीपावली हर घर में आती है फिर वो महल हो चाहे झोंपड़ी हो सब के खिल उठने का ही नाम होता है दीपावली। लक्ष्मी और गौरी ललन की पूजा करती घर की लक्ष्मी के जेवरों से जरी से घर जगर मगर नहीं होगा तो क्या होगा। नैर कजरारे और मधु से भरे होंठ हों तो फिर किसी भी श्रंगार की ज़रूरत ही क्या है। पिया के सरहद से घर लौटने पर चांदनी का खिलना और दुख के बादलों का छँट जाना वाह। और पिया के भुजपाश में बँधी हुई बावरी के गालों में रक्तिम पुष्प ही तो खिलते हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

deepawali[10]

तो मित्रों ये हैं आज के तीनों रचनाकार जो बासी दीपावली के रंग जमा रहे हैं। अब आपको काम है खुल कर दाद देना। देते रहिए दाद।

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गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

शुभकामनाएँ, शुभकामनाएँ, दीपावली की आप सब को शुभकामनाएँ। आइये आज दीपावली का यह पर्व मनाते हैं रजनी नैयर मल्होत्रा जी , गिरीश पंकज जी, मन्सूर अली हाश्मी जी, राकेश खंडेलवाल जी, सौरभ पाण्डेय जी और श्रीमती लावण्या दीपक शाह जी के साथ।

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शुभकामनाएँ, शुभकामनाएँ, दीपावली की आप सब को शुभकामनाएँ। दीपावली का यह त्योहार आप सब के जीवन में सुख शांति और समृद्धि लाए। आप यूँ ही सृजन पथ पर चलते रहें। खूब रचनाएँ आपके क़लम से झरती रहें। आंनद करें, मंगलमय हो जीवन।

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कुमकुमे हँस दिए  रोशनी  खिल उठी

deepawali (2)

भकामनाएँ, शुभकामनाएँ, दीपावली की आप सब को शुभकामनाएँ। आइये आज दीपावली का यह पर्व मनाते हैं  रजनी नैयर मल्होत्रा जी , गिरीश पंकज जी, मन्सूर अली हाश्मी जी,  राकेश खंडेलवाल जी, सौरभ पाण्डेय जी और श्रीमती लावण्या दीपक शाह जी के साथ। आज कुछ छोटे कमेंट मेरी तरफ से आएँगे, दीपावली की व्यस्तता के कारण।

deepawali

rajni naiyyar malhotra

रजनी नैयर मल्होत्रा

deepawali[3]

कुमकुमे हँस दिए  रोशनी  खिल उठी
तुम मिले हमसफ़र ज़िंदगी खिल उठी

मेरे मिसरों में यूँ रातरानी घुली
महकी महकी मेरी शायरी खिल उठी

यूँ मिज़ाज अपने मौसम बदलने लगा 
बाग में बेला चम्पाकली खिल उठी

मुद्दतों पहले बिछड़ी थी जो राह में
मिल के फिर उस सखी से सखी खिल उठी

जो उलझती रही पेंचो ख़म में सदा 
ज़िन्दगी की  पहेली वही  खिल  उठी

भावनाओं को शब्दों ने आकर छुआ
सूनी सूनी मेरी डायरी खिल उठी

deepawali[5]

वाह वाह वाह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। हर रंग के शेरों से सजी हुई यह ग़ज़ल दीपवाली के माहौल को और ज्यादा खुशनुमा बना रही है। अलग अलग रंगों की रंगोली सी बना दी है अपनी ग़ज़ल से। रातरानी से लेकर चम्पाकली तक और सखी से मिलती सखी से लेकर सूनी डायरी के खिल उठने तक पूरी ग़ज़ल बहुत ही भावप्रवण बन पड़ी है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

girish pankaj

गिरीश पंकज

deepawali[7]

आप आए इधर शाइरी खिल उठी
जैसे सूरज दिखा हर कली खिल उठी

द्वार पे एक दीपक जलाया तभी
देख मन की खुशी ज़िंदगी खिल उठी

मन-अन्धेरा मिटा जिस घड़ी बस तभी
''कुमकुमे हँस दिए रौशनी खिल उठी''

एक भूखे को भरपेट भोजन दिया
बिन कहे आपकी बंदगी खिल उठी

दीप  मुस्कान के जब अधर पे सजे
रूप निखरा तेरा सादगी खिल उठी

कल तलक जो अँधेरे में डूबी रही
दीप जैसे जले हर गली खिल उठी

आओ मिल के अँधेरे से हम सब लड़ें
सुन के चंदा सहित चांदनी खिल उठी

deepawali[7]

गिरीश जी की ग़ज़लें वैसे भी जीवन के दर्शन का साक्षात्कार करवाती हैं। आज भी वे पूरे रंग में हैं। मतले में ही सूरज के दिखते ही कली के खिल उठने का प्रयोग बहुत सुंदर है। और उसके बाद द्वार पर दीपक जलाने से लेकर भूखे को भोजन करवाने तक तथा मुस्कान से सजती सादगी और अँधेरे से लड़ने के संकल्प के साथ समापन, सब कुछ बहुत सुंदर बना है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

mansoor hashmi

मन्सूर अली हाश्मी

deepawali[7]

आये अच्छे जो दिन! शायरी खिल उठी
चीर कर 'फेसबुक', खुल उठी खिल उठी।

आग की लो बढ़ी, तिलमिलाने लगी
जब इमरती गिरी चाशनी खिल उठी।

तीरगी शर्म से पानी-पानी हुई
कुमकुमे हँस दिए, रोशनी खिल उठी।

उनकी फ़ितरत में ही मेहरबानी न थी
ग़मज़दा देख रुख़ पर खुशी खिल उठी।

दिल में इकरार लब पर तो इंकार था
इसी तकरार ही में हँसी खिल उठी।

मह्वे आग़ोश थे, तन भी मदहोश थे
इन्तिहा पर पहुँच, ज़िन्दगी खिल उठी।

मेहरबानी 'रदीफ' की कहिये इसे
'हाश्मी' बंद चीज़ें सभी खिल उठी।

deepawali[7]

हाशमी जी का कमाल यह होता है कि वे हास्य और व्यंग्य का तड़का ग़ज़ब लगाते हैं। आज भी मतले में ही गहरा व्यंग्य कसा गया है। उसके बाद तीरगी का शर्म से पानी पानी होना और तकरार में हँसी का खिल उठना तथा इन्तिहा पर पहुँच कर जिंदगी की खिल उठना और उसके बाद अनोखा मकते का शेर। सब कुछ रंगे हाशमी से सराबोर है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह ।

deepawali[7]

rakesh khandelwal ji

राकेश खंडेलवाल जी

deepawali[7]

ऐ सुख़नवर कहो बीते कितने बरस
एक ही बस गजल को सुनाते हुए
बढ़ रही कीमतें बेतहाशा यहां
अपने अल्फ़ाज़ में नित सजते हुए
पर ये सोचा कभी, इसकी बुनियाद क्या
चढ़ रही सीढ़ियों पर सभी कीमतें
आओ इसका समाधान ढूंढें, तो फिर
रोशनी खिल उठे, कुमकुमे हँस पड़ें 

जो विरासत में हमको नियति से मिली
सम्पदायें सभी हमने दी है गंवा
भोर में बनती परछाई को देखकर
हम बढ़ाते रहे नित्य अपनी क्षुधा
चादरों की हदों में अगर पांव हम
अपने रखने का थोड़ा जतन यदि करें
मुश्किलें आप ही दूर हो जाएंगी
रोशनी खिल उठे कुमकुमे हंस पढ़ें

सूत भर श्रम का चाहा सिला गज भरा
मांगते हैं समझ कर, ये अधिकार है
किन्तु उत्पादकों, वितरकों को मिले
हम से हो न सका ऐसा स्वीकार है
मांग के, पूर्ति के जितने अनुपात है
ताक पर हमने जाकर उठा रख दिए
आज उनको समझ सोच बदलें अगर
कुमकुमे हंस पड़े रोशनी खिल उठे

जअब भी दीपावली आई, फरियाद की
मां की अक्षय कृपायें हमें मिल सकें
अवतरित हो हमारे घरों में बसे
ताकि जीवन समूचा खुशी से कटे
किन्तु दीपित हुई घर में लक्ष्मी, वही
अपने हाथों में तड़पी, सदा को बुझी
तो बताओ कहोगे भला किस तरह
कुमकुमे हँस दिए, रोशनी खिल उठा

आओ संकल्प की आजुरी हम भरें
आआज इस पर्व पर मन भी दीपित करें
अपना व्यवहार, वातावरण, आचरण
अपने आदर्श से ही समन्वित करें
तो बिखेरेगी कल भोर अंगनाई में
चाहतों से भरी झोलियों में खुशी
और उमड़ी उमंगे यह कहने लगें
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

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रचनाकारों को चुनौती देता हुआ राकेश खंडेलवाल जी का यह गीत मानों तमसो मा ज्योतिर्गमय का आह्वान है। सूत भर श्रम और गज भर का अधिकार, मांग और पूर्ति का अंतर, हमारी माँ लक्ष्मी की अक्षय कृपा पाने की कामना और हाथों में तड़पी दीपित हुई लक्ष्मी से लेकर संकल्प की अंजुरी भरने का संकल्प लेकर समापन के साथ एक सकारात्मक स्थिति में छोड़ता है गीत। बहुत ही सुंदर वाह वाह वाह।

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saurabh ji

सौरभ पाण्डेय

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फिर जगी आस तो चाह भी खिल उठी
मन पुलकने लगा नगमगी खिल उठी

दीप-लड़ियाँ चमकने लगीं, सुर सधे..
ये धरा क्या सजी, ज़िन्दग़ी खिल उठी

वो थपकती हुई आ गयी गोद में 
कुमकुमे हँस दिये, रोशनी खिल उठी

लौट आया शरद जान कर रात को..
गुदगुदी-सी हुई, झुरझुरी खिल उठी

उनकी यादों पगी आँखें झुकती गयीं
किन्तु आँखो में उमगी नमी खिल उठी

है मुआ ढीठ भी.. बेतकल्लुफ़ पवन..
सोचती-सोचती ओढ़नी खिल उठी

चाहे आँखों लगी.. आग तो आग है..
है मगर प्यार की, हर घड़ी खिल उठी

फिर से रोचक लगी है कहानी मुझे
मुझमें किरदार की जीवनी खिल उठी

नौनिहालों की आँखों के सपने लिये
बाप इक जुट गया, दुपहरी खिल उठी

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सौरभ जी की ग़ज़लें पढ़ने और सुनने दोनों का आनंद लिए होती हैं। दीप लड़ियाँ चमकने लगीं से लेकर किसी मासूम बच्ची के गोद में आने से कुमकुमों के जल उठने तक और शरद के आगमन से होती हुई रात की झुरझुरी तो जैसे कमाल के बिम्ब हैं। यादों में पगी आँखें, और मुआ ढीठ पवन सौरभ जी की विशिष्टता है इन प्रतीकों में। नौनिहालों की आँखों के सपनों के लिए बाप का जुटना सुंदर प्रयोग है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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श्रीमती  लावण्या दीपक शाह

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हँस ले दिए, हँस ले मुस्कुरा ले
आया सुमंगल है त्यौहार अपना
ले कुमकुम चरण, आईं माँ लछमी
रौशन हुआ घर का कोना, कोना !

मन से मन की हो दूरी, ना ये जरूरी
खुशियाँ लिए आया त्यौहार अँगना !
तेरी रौशनी से जगमगाता  सुहाना
उमंगों सभर, हँस  रहा चारों कोना !
हँस ले दिए , हँस ले मुस्कुरा ले !
रौशन हुआ घर का कोना, कोना !

हर तूफ़ानों  से लड़ता है तू हरदम 
तेरी रौशनी को न कोइ छीन पाया !
दिया तुझको है बल, किसने दिए ऐ
बतला किस से पाया है विश्वास अपना ?
है रचना ये उसकी, ब्रह्माण्ड - भूतल
उसे कोइ अब तक, न है जान पाया !
हँस ले दिए , हँस ले मुस्कुरा ले !
रौशन हुआ घर का कोना, कोना !

उसी ने बनाए हैं फूल रंगीन प्यारे
उसीने बनाए  जुगनू, चाँद औ सितारे 
वही रोशन करता, है हर एक निशानी
कहती ज्योति सुन, अब मेरी कहानी
रौशन कर दिए को ये दुनिया है फानी !
हँस इंसान, हो रौशन  दिए की तरहा
अपने मन से मिटा दे हर एक परेशानी !
सुन बात जोत की हँस दिए, फिर दिए
खील उठी रौशनी, आ गई दीपावली !

deepawali[7]

लावण्या जी ने इस अवसर पर शुभकामनाओं हेतु अपना यह गीत भेजा है। बहुत ही सुंदर और भावनाओं से भरा हुआ गीत है यह। बड़ी बहनों की शुभकामनाएँ यदि त्योहार के दिन सुबह मिल जाएँ तो और क्या चाहिए जीने को। रोशनी से भरी हुई हर पंक्ति मानों आशावाद से भरी हुई है और दीपक की ज्योति का मान बढ़ा रही है। बहुत ही सुंदर गीत है यह  वाह वाह वाह।

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शुभकामनाएँ, शुभकामनाएँ, दीपावली की आप सब को शुभकामनाएँ। आनंद और मंगल से पर्व को मनाएँ, आज रचनाकारों को भी दाद देने का समय बीच में निकालें। सबको बहुत बहुत शुभ हो दीपावली।

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बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

आइये आज रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी का यह त्योहार मनाते हैं अपने पाँच रचनाकारों के साथ। आज का यह पर्व धर्मेंद्र कुमार सिंह, गुरप्रीत सिंह, नकुल गौतम, राकेश खंडेलवाल जी और डॉ. संजय दानी के नाम।

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मित्रों दीपावली का त्योहार हमारी वर्ष भर की थकान को दूर करने का एक अवसर होता है। थकान दूर कर आने वाले समय की लिये कुछ और ऊर्जा को एकत्र करने का समय। और इस अवसर का लाभ उठाने में चूकना नहीं चाहिए। असल में हम सब जीवन की जिन परेशानियों और कठिनाइयों से जूझ रहे होते हैं उनके कारण हमारे लिए बहुत आवश्यक होता है कि हम अपने आप को इन पर्वों के बहाने कुछ ताज़ा कर लें। हमारे अंदर जो जीवन शक्ति है वो भी समय समय पर अपने आपको कुछ रीचार्ज करना चाहती है। रोज़ाना के रूटीन से हट कर अपने लिए अपनों के लिए कुछ समय यदि हम निकाल लें तो हमारे लिए जीवन कुछ आसान हो जाएगा। तो मित्रों बस यह कि आनंद मनाइये और आनंद बिखेरिये।

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आइये आज रूप चतुर्दशी या छोटी दीपावली या नरक चतुर्दशी का यह त्योहार मनाते हैं अपने पाँच रचनाकारों के साथ। आज का यह पर्व धर्मेंद्र कुमार सिंह, गुरप्रीत सिंह, नकुल गौतम, राकेश खंडेलवाल जी और डॉ. संजय दानी के नाम।

deepawali

dharmendra kuma

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

बात ही बात में सादगी खिल उठी
एक बिन्दी लगा साँवली खिल उठी

गुदगुदी कर छुपीं धान की बालियाँ
खेत हँसने लगे भारती खिल उठी

यूँ तो दुबली हुई जा रही थी मगर
डोर मज़बूत पा चरखड़ी खिल उठी

बल्ब लाखों जले, खिन्न फिर भी महल
एक दीपक जला झोपड़ी खिल उठी

एक नटखट दुपट्टा मचलने लगा
उसको बाँहों में भर अलगनी खिल उठी

जब किसानों पे लिखने लगा मैं ग़ज़ल
मुस्कुराया कलम डायरी खिल उठी

उसने पूजा की थाली में क्या धर दिया
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठी

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धर्मेंद्र की ग़ज़लों का मैं शुरू से प्रशंसक रहा हूँ। लेकिन इस बार की ग़ज़ल बिल्कुल अलग ही मूड में है, रचनाकार का यह रंग एकदम चौंकाने वाला है। एक ही बात में सादगी खिल उठी एक बिन्दी लगा साँवली खिल उठी वाह क्या मतला है। धान की बालियों के गुदगुदी करने से भारत की आत्मा का खिल उठना, कमाल है, यह बड़ा शेर हो गया है शायर की सोच के कारण। इस सोच को सलाम। और महल का खिन्न होना तथा एक ही दीपक जलने से झोपड़ी का खिल उठना, उस्तादों की राह पर कहा गया शेर है, कबीर और रहीम के कई दोहे इसी सोच पर कहे गए हैं। और नटखट दुपट्टे को बाँहों में भर कर अलगनी का खिल उठना, वाह यह तो कमाल पर कमाल है, बहुत ही बारीक शेर है। किसानों पर ग़ज़ल लिखते शायर की डायरी और उसका कलम हँसने लगे तो समझिये लेखन सार्थक हो गया। और अंत में गिरह का शेर बिल्कुल ही अलग सोच का शेर है। मिसरा उला ही ऐसा है कि बस। ये जो अनडिफाइंड “क्या” होता है, यह रचना में ग़ज़ब सुंदरता लाता है, कैफ़ भोपाली साहब ख़ूब उपयोग करते थे इसका। बहुत ही सुंदर और बहुत सलीक़े से कही गई ग़ज़ल। वाह वाह क्या बात है।

deepawali[8]

Gurpreet singh

गुरप्रीत सिंह

deepawali[8]

कुमकुमे हँस दिए, रौशनी खिल उठी
ऐसे हर घर में दीपावली खिल उठी

धूप हर दिन मिली, तो कली खिल उठी
आप मिलने लगे, ज़िन्दगी खिल उठी

खेलते बालकों की हँसी खिल उठी
मानो सारी की सारी गली खिल उठी

आप के पांव घर में मेरे क्या पड़े
छत महकने लगी, देहरी खिल उठी

पहले मंज़र में थी बस ख़िज़ाँ ही ख़िज़ाँ
ये नज़र आप से जो मिली, खिल उठी

सब से छुप के निकाली जो फ़ोटो तेरी
मेरे कमरे में तो चाँदनी खिल उठी

दर्द-ए-दिल आपने जो दिया, शुक्रिया
कहते हैं सब, मेरी शायरी खिल उठी

deepawali[8]

मतले में ही गिरह का शेर इस युवा शायर ने ख़ूब लगाया है, दीपावली की सारी भावनाओं को पूरी तरह व्यक्त करता हुआ। मतले के बाद दो हुस्ने मतला भी शायर ने कहे हैं। तीनों अलग अलग रंगों के हैं। धूप हर दिन मिली में प्रेम को बहुत सलीक़े से अभिव्यक्त किया है, किसी के मिलने से ज़िन्दगी का खिल उठना, यह ही तो जीवन है। प्रेम की धूप का प्रयोग बिल्कुल नया है, अभी तक प्रेम की चाँदनी होती थी। खेलते बालकों की हँसी से खिली हुई गली का मतला देर तक उदास कर गया, हाथ पकड़ कर एकदम बचपन में ले गया। बहुत ही सुंदर हुस्ने मतला। किसी के पाँव घर में पड़ते ही छत का महकना और देहरी का खिल उठना यही तो प्रेम होता है। पहले मंज़र में थी बस ख़िजाँ ही ख़िजाँ में मिसरा सानी में उस्तादों की तरह क़ाफिया लगाया है, बहुत ही सुंदर। किसी के फोटो को निकालते ही कमरे में चाँदनी का खिल उठनाबहुत ही सुंदर। और अंत में किसी के दर्दे दिल देने पर शुक्रिया कहना क्योंकि उससे शायर की शायरी खिला उठी है। बहुत ही सुंदर बात कही है, सचमुच प्रेम के बिना कोई भी रचनाकार रचनाकार हो ही नहीं सकता। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

deepawali[8]

Nakul Gautam

नकुल गौतम

deepawali[8]

वक़्त बस का हुआ तो घड़ी खिल उठी
रास्ते खिल उठे, हर गली खिल उठी

गाँव पहुँचा तो बस से उतर कर लगा
जैसे ताज़ा हवा में नमी खिल उठी

वो हवेली जो मायूस थी साल भर
एक दिन के लिए ही सही, खिल उठी

घर पहुँचते ही छत ने पुकारा मुझे
कुछ पतंगे उड़ीं, चरखड़ी खिल उठी

छत पे नीली चुनर सूखती देखकर
उस पहाड़ी पे बहती नदी खिल उठी

बर्फ़ के पहले फाहे ने बोसा लिया
ठण्ड से काँपती तलहटी खिल उठी

चीड़ के जंगलों से गुज़रती हवा
गुनगुनाई और इक सिंफ़नी खिल उठी

उन पहाड़ी जड़ी बूटियों की महक
साँस में घुल गयी, ज़िन्दगी खिल उठी

मुझ से मिलकर बहुत खुश हुईं क्यारियाँ
ब्रायोफाइलम, चमेली, लिली खिल उठी

थोड़ा माज़ी की गुल्लक को टेढ़ा किया
एक लम्हा गिरा, डायरी खिल उठी

शाम से ही मोहल्ला चमकने लगा
"कुमकुमे हँस दिये, रौशनी खिल उठी"

गांव से लौटकर कैमरा था उदास
रील धुलवाई तो ग्रीनरी खिल उठी

फिर मुकम्मिल हुई इक पुरानी ग़ज़ल
काफ़िये खिल उठे, मौसिकी खिल उठी

deepawali[8]

नकुल की कहन इस ग़ज़ल में बिल्कुल अलग अंदाज़ में सामने आई है। सबसे पहले तो मतले में ही जो कमाल किया है वो ग़ज़ब है, सचमुच प्रेम में और इंतज़ार में जो अकुलाहट होती है और उसके बाद जो मिलन की ठंडक होती है वह अलग ही आनंद देती है। वह हवेली जो मायूस थी साल भर शेर ने एक बार फिर से उदास कर दिया, घर में बच्चे आए हुए हैं मेरे भी, और मुझे पता है कि दीपावली के दो दिन बाद सबको जाना है। बहुत ही सुंदर बात कह दी है।और नीली चुनर को सूखती देखकर पहाड़ी नदी का खिल उठना, वाह क्या कमाल का अंदाज़ है इस शेर में, जिओ। बर्फ़ के पहले फाहे का बोसा, ग़ज़्ज़्ज़ब टाइप की बात कह दी है। चीड़ के जंगलों से गुज़रती हवा की बजती हुई सिम्फनी बहुत ही कमाल, यह आब्ज़र्वेशन ही होता है जो रचनाकार को अपने समकालीनों से कुछ आगे ले जाता है। प्रकृति की गंध से भरे अगले दोनों शेरों में जड़ी बूटियों से लेकर चमेली लिली तक सब कुछ महक राह है। और माज़ी की गुल्लक को टेढ़ा करने पर लम्हे का डायरी पर गिरना बहुत ही कमाल की बात कह दी है। गाँव लौटकर कैमरे की रील का धुलवाना और ग्रीनरी का खिल उठना, बहुत ही सुंदर क्या बात है, बहुत ही कमाल की ग़ज़ल। बहुत सुंदर वाह वाह वाह। (इस ग़ज़ल ने पलकों की कोरें नम कर दीं, क्यों ? ये बात ब्लॉग परिवार के वरिष्ठ सदस्य जानते हैं।)

deepawali[8]

rakesh khandelwal ji

राकेश  खंडेलवाल जी

deepawali[8]

आ गया ज्योति का पर्व यह सामने
सज रही हर तरफ दीप की मालिका
हर्ष उल्लास में डूबी हर इक डगर
घर की अंगनाई महकी, बनी वाटिका
ढोल तासे पटाखों के बजने लगे
नाचने लग पड़ी हाथ में फुलझड़ी
रक्त –‘पंकज’  निवासिन के सत्कार में
बिछ रही है पलक बन,  सजी ‘पाँखुरी’

और ‘रेखा’ हथेली से बाहर निकल
अल्पनाओं में दहलीज की ढल हँसी
सांझ का रूप सजता हुआ देखकर
कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठा

बारिशों में नहा मग्न मन शहर के
घर ने खिड़की झरोखों ने कपड़े बदल
चौखटों पर मुंडेरों पे दीपक रखे
फिर हवा से कहा अब चले, तो संभल
सज गए हैं सराफे, कसेरे सभी
झूमती मस्तियों में भरी बस्तियां
स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत हुई
धन की औ धान की और गृह लक्ष्मियाँ

अड़ गए टेसू चौरास्तो पर अकड़
साँझियां खिलखिला घूँघटों में हंसी
झूमकर प्रीत के ऐसे अनुराग में
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

‘पाँखुरी’ ‘नीरजों’ की लगाती ‘तिलक’
एक ‘सौरभ’ हवा में उड़ाते हुए
आज ‘पारुल’ के पाटल ‘सुलभ’ हो गए
आंजुरी में भरे मुस्कुराते हुए
स्वाति नक्षत्र में आई दीपावली
हर्षमय हो गए ‘अश्विनी’, फाल्गुनी
‘द्विज’ ‘दिगंबर’ दिशाओं को गुंजित करें
और छेड़ें ‘नकुल’ शंख से रागिनी

द्वार ‘शिवना’ के आकर ‘तिवारी’ कहें
आज सबके लिए शुभ हो दीपावली
मन के उदगार ऐसे सुने तो सहज
कुमकुमे हंस दिए रोशनी खिल उठी

deepawali[8]

राकेश जी जब भी कुछ करते हैं तो बस कमाल ही करते हैं, इस बार भी उन्होंने मेरे दोनों परिवारों को अपने गीत में समेट लिया है। गीत का पहला ही छंद मानों दीपावली के उल्लास में डूब कर रचा गया है। ऐसा लगता है जैसे छंद में से गंध, स्वर, नाद सब कुछ फूट रहा है। बहुत ही कमाल। सांझ का रूप सजता हुआ देखकर, कुमकुमे हँस दिये रोशनी खिल उठा, वाह क्या बात है। बारिशों से नहा चुके शहर का कपड़े बदलना और फिर उसके हवा से यह कहना कि अब ज़रा संभल कर चले, वाह वाह वाह, क्या ही सुंदर चित्र बना दिया है। साँझियां खिलखिला घूँघटों में हंसी, यह एक पंक्ति जैसे गीतों के स्वर्ण युग में वापस ले जाती है, मन में कहीं गहरे तक उतर जाती है। और उसके बाद के बंद में ब्लॉग परिवार के सदस्यों का प्रतीक रूप में ज़िक्र आना मानों सोने पर सुहागे के समान है। यह ही कला है जो राकेश जी को बहुत आगे का कवि बना देती है। अंतिम पंक्तियों में शिवना का ज़िक्र आ जाना कुछ भावुक भी कर गया। राकेश जी इस ब्लॉग के आधार स्तंभ क्यों हैं, यह बात आज की यह रचना पढ़कर ही ज्ञात हो जाता है। बहुत ही सुंदर गीत, क्या बात है, वाह वाह वाह।

deepawali[8]

sanjay dani

डॉ. संजय दानी

deepawali[8] 

कुककुमे हंस दिये रौशनी खिल उठी
एक चिलमन उठी, तो गली खिल उठी

इश्क़ का जादू सर मेरे जबसे चढा
दिल के आकाश की दिल्लगी खिल उठी

जब छिपा चांद बादल में तो दोस्तों
सोच कर जाने क्या चांदनी खिल उठी

जो घिरी थी उदासी के दामन में कल
तुम नहा आये तो वो नदी खिल उठी

शायरी में मेरी तुमने तन्क़ीद की
तो बुझी सी मेरी शायरी खिल उठी

देख खुश जूतियों को तेरी जाने मन
बुद्धी के चेहरे पर बेकसी खिल उठी

deepawali[8]

मतले में ही किसी चिलमन के उठते ही सारी गली का खिल उठना और साथ में कुमकुमों का हँसना, रोशनी का खिल उठना, जैसे पूरा का पूरा दृश्य ही इस एक शेर से बन रहा है। सच में यही तो होता है कि किसी एक चेहरे पर पड़ा नकाब, किसी एक चिलमन के हटते ही ऐसा लगता है मानों पूरा आसपास का परिदृश्य ही बदल गया है। किसी एक का जादू यही तो होता है। चाँद का बादलों में छिप जाना और किनारों से झरती हुई चाँदनी का खिल उठना प्रकृति के बहाने वस्ल का दृश्य रचने का एक सुंदर प्रयास है। और अगले ही शेर में किसी के नहा आने पर नदी का खिल उठना यही तो वो बात है जिसके लिए कहा जाता है कि जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। किसी के नहा लेने भर से नदी के खिल उठने की कल्पना केवल कवि ही कर सकता है। नहीं तो सोचिए कि बदलता क्या है कुछ भी नहीं, नदी तो वैसे ही बह रही है जैसे कल बह रही थी, लेकिन जो कुछ बदलता है वह नज़रिया होता है।नज़रिया ही तो प्रेम है और क्या है इसके अलावा। किसी एक द्वारा तन्कीद कर देने से शायरी का खिल उठना बहुत ही अच्छा है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है, वाह वाह वाह।

deepawali[8]

मित्रों आज तो पाँचों रचनाकारों ने मिल कर दीपावली का रंग ही जमा दिया है। बहुत ही कमाल की ग़ज़लें कही हैं पाँचों रचनाकारों ने। आज रूप की चतुर्दशी पर ऐसी सुंदर रूपवान ग़ज़लें मिल जाएँ तो और क्या चाहिए भला। तो दाद दीजिए खुलकर और खिलकर। मिलते हैं अगले अंक में।

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