सोमवार, 24 जुलाई 2017

शिवना साहित्यिकी का जुलाई-सितम्बर 2017 अंक

मित्रों, संरक्षक तथा सलाहकार संपादक सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार Shaharyar तथा सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का जुलाई-सितम्बर 2017 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है संपादकीय, शहरयार Shaharyar । व्यंग्य चित्र -काजल कुमार Kajal Kumar । आवरण कविता - शमशेर बहादुर सिंह, आवरण चित्र के बारे में....- विस्मय / पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi , उपन्यास अंश- पागलखाना / डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी Gyan Chaturvedi , संस्मरण आख्यान- होता है शबोरोज़ तमाशा मिरे आगे, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , कथा-एकाग्र- नीलाक्षी फुकन Nilakshi Phukan कहानी विखंडन Ajay Navaria , अनीता सक्सेना Anita Saxena कहानी Mehrunnisa Parvez , पुस्तक चर्चा- हँसी की चीखें / कांता राय Kanta Roy Santosh Supekar , एक वह कोना / गोविंद भारद्वाज Govind Bhardwaj Govind Sharma , पहाड़ पर धूप / यादवेंद्र शर्मा Murari Sharma , फिल्म समीक्षा के बहाने- हिन्दी मीडियम, माम, वीरेन्द्र जैन Virendra Jain , बातें-मुलाक़ातें- कृष्णा अग्निहोत्री Krishna Agnihotri , ज्योति जैन Jyoti Jain , रंगमंच- आर्यभट्ट और नाटक ‘अन्वेषक’, प्रज्ञा Pragya Rohini , पेपर से पर्दे तक- कृष्णकांत पंड्या Krishna Kant Pandya, पुस्तक-आलोचन- यादों के गलियारे से / कैलाश मण्डलेकर Kailash Mandlekar , समीक्षा, वंदना गुप्ता Vandana Gupta Maitreyi Pushpa / वो सफ़र था कि मुकाम था, शिखा वार्ष्णेय Shikha Varshney Aruna Sabharwal / उडारी, डॉ. ज्योति गोगिया @jyoti gogiya Sudha Om Dhingra / धूप से रूठी चाँदनी, योगिता यादव Yogita Yadav Shashi Padha / लौट आया मधुमास, शरद सिंह Sharad Singh@manohar agnani / अंदर का स्कूल, तरही मुशायरा Digamber Naswa Nusrat Mehdi @mahesh khalish Saurabh Pandey Nirmal Sidhu Girish Pankaj Tilak Raj Kapoor @sudhir tyagi @vasudeo agrwal Rakesh Khandelwal , आवरण चित्र- पल्लवी त्रिवेदी Pallavi trivedi photography photography - डिज़ायनिंग-सनी गोस्वामी Sunny Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/shivnaprakashan/shivna-sahityiki-july-september-2017
https://issuu.com/shivnaprakashan/docs/shivna_sahityiki_july_september_201

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

आइये आज हम ईद के मुशायरे का समापन करते हैं चार रचनाकारों के साथ शेख चिल्ली जी, बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी, महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ जी और राकेश खंडेलवाल जी की रचनाओं के साथ हम ईद की दुआओं में विश्व शांति की कामना करते हैं।

मित्रों चूँकि त्यौहार के बाद उसके मनाए जाने की एक सीमा होती है। और उसके बाद हमें अपने अपने कार्यों पर लौटना ही होता है। इसीलिए आज हम ईद के मुशायरे का समापन कर रहे हैं। हालांकि अपेक्षाकृत रूप से कम ग़ज़लें आईं इस बार लेकिन उसके पीछे मेरे विचार में बहर का मुश्किल होना और रदीफ काफिये के कॉमिब्नेशन का भी कुछ उलझन भरा होना एक कारण है। लेकिन एक बात तो है कि जो ग़ज़लें आईं वो बहुत अच्छी आईं। बहुत ही अच्छे प्रयोग शायरों ने किये। और एक अच्छी बात ये भी हुई है कि ईद मुबारक को लेकर सबके पास अच्छी ग़ज़लें भी हो गईं हैं। ईद के मुबारक मौके पर यदि आपको किसी मुशायरे में शिरकत करने जाना हो तो ये खूबसूरत ग़ज़ल आपके काम आएगी।

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आइये आज हम ईद के मुशायरे का समापन करते हैं चार रचनाकारों के साथ शेख चिल्ली जी, बासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी, महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’ जी और राकेश खंडेलवाल जी की रचनाओं के साथ हम ईद की दुआओं में विश्व शांति की कामना करते हैं।

कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

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शेख़ चिल्ली

सावन की झड़ी लायी ख़बर ईद मुबारक़
हो काश दुआओं में असर, ईद मुबारक

सलफास निगल कर भी वो बोला, मेरे बच्चों
रखना मेरे खेतों पे नज़र, ईद मुबारक़

मायूस खड़े काकभगोड़े ने बताया
कह कर था गया मुझ से बशर "ईद मुबारक़"

सुनकर ये टपकती हुई छत फूट के रोई,
चलता हूँ मैं लम्बा है सफ़र, ईद मुबारक़

क्रिसमस न, दीवाली न तो होली न गुरुपर्व
मज़दूर की किस्मत में किधर ईद मुबारक़

सरकार की नीयत पे लगे दाग धुलेंगे
हो जाय किसानों की अगर ईद मुबारक़

बक़वास है, सौ फ़ीसदी झूटी ये ख़बर है
कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक?

मतले में सकारात्मक नोट के साथ शुरू होकर पूरी ग़ज़ल व्यथा की कहानी कहती हुई एक लगभग मुसलसल ग़ज़ल है। जिसमें किसान और मजदूर की कहानी को आँसुओं से लिखा गया है। पहला ही शेर कलेजे को चीर कर उतर गया। मेरे जिले में पिछले पन्द्रह दिनों में बीस के लगभग किसान आत्म हत्या कर चुके हैं। और मिसरा सानी जैसा हूबहू एक वाकया हुआ भी है। एक किसान ने सल्फास खाकर अपने बच्चों से यही कहा था। उफ़्फ। और उसके बाद काकभगोड़े का दृश्य भी उसी कहानी को आगे बढ़ाता है। घर की टूटी हुई छत अपने मालिक को लम्बे सफ़र पर जाते हुए देख कर रो रही है बहुत ही मार्मिक दृश्य बन पड़ा है। अकाल में उत्सव लिखने वाले लेखक के लिए यह दृश्य कैसा होगा आप समझ सकते हैं। और यह भी सच है कि मजदूर के किस्मत में कोई त्यौहार नहीं होता। आखिरी शेर में जिस अंदाज़ में गिरह लगाई है वो अंदाज़ सबसे हट के है। सच में जो सबसे हट कर करे वो ही तो देर तक याद रहता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

रमजान गया आई नज़र ईद मुबारक,
खुशियों का ये दे सबको असर ईद मुबारक।

घुल आज फ़िज़ा में हैं गये रंग नये से,
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

पाँवों से ले सर तक है धवल आज नज़ारा,
दे कर के दुआ कहता है हर ईद मुबारक।

सब भेद भुला ईद गले लग के मनायें,
ये पर्व रहे जग में अमर ईद मुबारक।

ये ईद है त्योहार मिलापों का अनोखा,
दूँ सब को 'नमन' आज मैं कर ईद मुबारक।

बासुदेव जी ने ईद की पारंपरिक ग़ज़ल बहुत सलीक़े के साथ कही है। पाँवों से से ले सर तक है धवल आज नज़ारा में मानों ईदगाह का दृश्य ही सामने आ गया है जहाँ श्वेत परिधान पहने रोज़ेदार रमज़ान के समापन पर नमाज़ अदा कर रहे हैं। कितनी शांति होती है इस दृश्य में। श्वेत रंग वैसे भी शांति का प्रतीक है उसमें एक प्रकार की शीतलता होती है। सब भेद भुला कर ईद मनाने की बात और ईद के त्यौहार को अमर करने की बात बहुत अच्छे ढंग से कही गई है। मकते का शेर भी अच्छा बना है सच में ये त्यौहार मिलने मिलाने का ही तो त्यौहार है। इसमें बस एक ही काम करना चाहिए कि खूब मिलना मिलाना चाहिए। सबसे हँस कर मिलना ही तो ईद है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात वाह वाह वाह।

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महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक
है झूम उठा सारा शहर, ईद मुबारक

दो दोस्तियों का सदा पैग़ाम सभी को
मन में न रहे आज ज़हर, ईद मुबारक

दिल खोल के बाँटें सिवैयाँ, शौक अजब है
उल्फ़त की उठी दिल में लहर, ईद मुबारक

आया है हसीं वक़्त मेरे दोस्त ज़रा सुन
कुछ देर अभी और ठहर, ईद मुबारक

रंगीन नज़ारों में ख़लिश रब न भुलाना
कर लो जो इबादत दो पहर, ईद मुबारक.

खलिश जी ने छोटी लेकिन सुंदर ग़ज़ल कही है। दिल खोल के बाँटे सिवैयाँ शौक अजब है में उल्फत की दिल में उठी लहर की बात ही अलग है। सच में ये त्यौहार यही तो बताता है कि मेहमान को घर में बुला कर उसकी खातिर करो। उसका आपके घर आना आपकी बरकत में इज़ाफा होना ही है। कहते हैं खुदा आपसे खुश होता है तो आपके घर मेहमान भेजता है। और अगले शेर में प्रेम की भावना का वही चिरंतन भाव कि अभी न जाओ छोड़ कर। प्रेम में सबसे ज्यादा एक ही बात कही जाती है कुछ देर और ठहर जाओ। यही तो प्रेम है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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राकेश खंडेलवाल
रह रह के हुलसता है  जिगर ईद मुबारक
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

विस्फोट ही विस्फोट हैं हर सिम्त जहां में
रब की नसीहतों के सफे जाने कहाँ है
इस्लाम का ले नाम उठाते है जलजला
चाहे है हर एक गांव में बन जाए कर्बला
कोशिश है कि रमजान में घोल आ मोहर्रम
अब और मलाला नहीं सह पाएगी सितम
आज़िज़ हो नफ़रतों से ये कहने लगा है दिल
अब और न घुल पाये ज़हर  ईद मुबारक
कहती है ये  खुशियों की सहर ईद मुबारक

अल कायदा को आज सिखाना है कायदा
हम्मास में यदि हम नहीं तो क्या है फायदा
कश्मीर में गूंजे चलो अब मीर की गज़लें
बोको-हरम का अब कोइ भी नाम तक न ले
काबुल हो या बगदाद हो या मानचेस्टर
पेरिस मे न हो खौफ़ की ज़द मे कोइ बशर
उतरे फलक से इश्क़ में डूबी जो आ बहे
आबे हयात की हो नहर, ईद मुबारक
कहती है ये खुशियों की सुबह ईद मुबारक

राकेश जी हमेशा नए प्रयोगो के साथ मुशायरे में आते हैं इस बार भी उन्होंने नए प्रयोग किये हैं। पहला बंद गीत का उन लोगों को कठघरे में खड़ा करता है जो धर्म की आड़ में हिंसा के बीज बो रहे हैं और अपने कृत्यों से धर्म को बदनाम कर रहे हैं। हर गाँव में कर्बला बनाना चाहते हैं। तभी तो रचनाकार कहता है कि नफ़रतों से आज़िज़ आ चुकी है अब दुनिया। दूसरा बंद पहले बंदी की नकारात्मकता का हल तलाशता हुआ आता है। कश्मीर से लेकर काबुल और बगदाद हर जगह पर रचनाकार चाहता है कि फलक से उतर कर आई आबे हयात की नहर सारी दुनिया में बहे और सारी नफरतें उस नहर के प्रेम भरे पानी में बह जाएँ। सारी दुनिया खुशरंग हो जाए। बहुत ही सुंदर गीत क्या बात है वाह वाह वाह।

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तो मित्रों आप सब को ईद मुबारक। आज की चारों रचनाओं पर खुलकर दाद दीजिए। वैसे तो मुशायरे का अधिकारिक समापन हो चुका है लेकिन भभभड़ कवि का क्य है वो तो कभी भी आ सकते हैं। तब तक जय हो।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

ईद का त्यौहार हमारे मोहल्ले में अभी भी मनाया जा रहा है आज तिलकराज कपूर जी, गिरीश पंकज जी और डॉ. सुधीर त्यागी जी के साथ हम चलते हैं ईद की धूम में।

ईद का त्यौहार इसी सप्ताह आया और चला गया। लेकिन हम अभी भी उसके आनंद में डूबे हुए हैं। हमारे लिए तो ईद अभी भी चल रही है। हमारे मोहल्ले में ईद का त्यौहार अभी भी मनाया जा रहा है। असल में हम लोग ज़रा पुराने किस्म के लोग हैं हमारे लिए त्यौहार एक दस दिन तक चलने वाला उत्सव होता है। कम से कम दस से पन्द्रह दिनों तक नहीं मने तो वह त्यौहार ही कैसा। हम दीपावली को देव प्रबोधिनी एकादशी तक मनाते हैं, क्रिसमस को एक जनवरी तक मनाते हैं तो फिर ईद को क्यों नहीं। त्यौहार एक मनोदशा है जिसमें हम केवल आनंद ही तलाशते हैं। तो आइये आज भी हम इसी आनंद की खोज में निकलते हैं ईद के बहाने से।

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कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

आज हम तीन शायरों के साथ तरही के क्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। तिलकराज कपूर जी, गिरीश पंकज जी और डॉ. सुधीर त्यागी के साथ हम ईद का आनंद मना रहे हैं।

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तिलक राज कपूर

माँ तेरी दुआओं का असर "ईद मुबारक"
हैं दूर बहुत मुझसे ख़तर - ईद मुबारक

किस चाँद पे किसका है असर "ईद मुबारक"
पूछा तो ये कहती है सहर - ईद मुबारक़

अल्लाह की बंदों पे नज़र "ईद मुबारक"
आसान करे सबका सफ़र "ईद मुबारक"

दहकां तेरी मुश्किल नहीं समझेगा ज़माना
है भूख इधर और उधर "ईद मुबारक"

हर मोड़ पे कुछ प्रश्न खड़े रोक रहे थे
मुमकिन हुआ फिर भी ये सफ़र - ईद मुबारक

जो सुब्ह का भूला हुआ घर छोड़ गया था
आया है वही लौट के घर - ईद मुबारक

प्रश्नों की क़तारों में खड़ी भीड़ को देखो
मिलती है जिसे बनके सिफ़र "ईद मुबारक"

इक बार सभी दर्द भुलाकर उन्हें कहदे
"खुशियों से भरे आपका घर" - ईद मुबारक

कोशिश तो बहुत है कि कभी उनसे कहूं मैं
"हम पर हो इनायत की नज़र" - ईद मुबारक

पूरब में दिखा चाँद ये ऐलान हुआ है
जाते हैं भला आप किधर - ईद मुबारक

आग़ोश में इक ख़्वाब भरे सोच रहा हूँ
वो चांद कहे देख क़मर - ईद मुबारक

हम राह के काँटों को हटा उनसे कहेंगे
अब तुमको मुबारक हो डगर - ईद मुबारक

तन्हाई में डूबे हुए इंसा के लिए है
बीते हुए लम्हों का सफ़र "ईद मुबारक"

तिलक जी हर बार अपने शेरों से महफिल में चार चाँद लगा देते हैं। इस बार भी उन्होंने मतले में ही माँ की दुआओं के साथ शुरूआत की है। सच में माँ की दुआएँ साथ हों तो हर दुख हर गम दूर ही रहता है। जो सुब्ह का भूला हुआ घर छोड़ गया था में मिसरा सानी बहुत उम्दा बना है किसी के लौट के घर आ जाने पर सबकी ईद हो जाती है। किसी से बिछड़ कर भला कैसे ईद मन सकती है। और अगले शेर में प्रश्नों की कतारों में खड़ी भीड़ जिसे सिफर बन कर ईद मिल रही है उसका दर्द भी बहुत अच्छे से अभिव्यक्त हुआ है। बहुत खूब। अगले दोनों शेरों में दो वाक्यों को बहुत खूबी के साथ मिसरे में गूँथा गया है। खुशियों से भरे आपका घर और हम पर हो इनायत की नज़र ये दोनों वाक्य बहुत ही सुंदरता के साथ मिसरे में गूँथे गए हैं। बहुत ही सुंदर प्रयोग। पूरब में चाँद के दिखने के साथ हुआ ऐलान बहुत खूब है। अगले दोनों शेर प्रेम के शेर हैं। चाँद का क़मर को देख कर ईद मुबाकर कहना, वाह और हम राह के काँटों को हटा उनसे कहेंगे बहुत ही सुंदर प्रयोग। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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गिरीश पंकज

खुशहाल रहे आपका दर ईद मुबारक
"कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक"

हिद्दत सही रमजान में दय्यान के लिए
महका रहा है तुमको इतर ईद मुबारक
(दय्यान - स्वर्ग का वो दरवाज़ा जो रोजेदारों के लिए खुलता है)

तुमको नहीं देखा है ज़माने से दोस्तो
इस बार तो आना मेरे घर ईद मुबारक

अल्लाह ने बख्शी है हमें एक ये नेमत
मिलजुल के ज़िन्दगी हो बसर ईद मुबारक

छोटा - बड़ा है कोई नहीं सब हैं बराबर
रमजान दे रहा है ख़बर ईद मुबारक

गिरीश पंकज जी की ग़ज़ल हर मुशायरे में सबसे पहले प्राप्त होती है और इस बार भी ऐसा ही हुआ। मतले में ही गिरह को बहुत कमाल के साथ लगाया गया है। खुशहाल रहे आपका दर और उसके बाद गिरह का मिसरा बहुत सुंदर। अगला शेर रवायती शेर का एक बहुत ही खूबसूरत उदाहरण है। ईश की इबादत और उसके बाद खुलने वाला स्वर्ग का दरवाज़ा जिसके कारण रोज़ेदार इतर से महक रहा है। बहुत सुंदर। अगला शेर गहरे ​अर्थ की बात कह रहा है। इन दिनों जो कुछ हवाओं में फैला हुआ है उसकी और इशारा कर रहा है यह शेर। और अगला शेर एक दुआ है, एक प्रार्थना है, एक सीख है जो हम सबके लिए है। अंतिम शेर में सब के बराबर होने सबके इन्सान होने और  मिल जुल कर जीने की जो बात कही गई है वो सारी दुनिया को समझने की ज़रूरत है। बहुत सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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डॉ. सुधीर त्यागी

खुशहाल हो हर एक बशर ईद मुबारक।
बख्शे खुदा रहमत की नज़र ईद मुबारक।

दुश्मन भी अगर हो तो गले उसको लगा ले।
कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक।

कुछ लोग जो भटके हुए हैं राहे नबी से।
उनको भी चलो कह दें मगर ईद मुबारक।

कल छत पे मेरी चाँद लगा आ के टहलने,
और हँस के कहा जाने जिगर ईद मुबारक।

मिलने से गले पहले ज़रा आँख मिलाओ।
कहने का ज़रा सीखो हुनर ईद मुबारक।

इस बार गले लगने में दोनों को झिझक है।
सोलहवें बरस का है असर ईद मुबारक।

मतला एक दुआ के साथ खुलता है और दुनिया के हर इन्सान के लिए खुदा से खुशियों की और रहमत की माँग करता है। सच में त्यौहार का यही तो मतलब है कि हम सब एक स्वर में सभी के लिए खुशियों की माँग करें। अगले शेर में दुश्मन को भी गले लगाकर ईद के असली संदेश प्रेम को फैलाने की बात कह कर गिरह को लगाया गया है जो बहुत सुंदर बन पड़ा है। राहे नबी से भटके हुए लोगों को भी ईद मुबारक कहना और उनको भी अमन की राह पर लाने की बात करना ही तो असली ईद है। जाने जिगर काफिया इस मिसरे पर सबसे सटीक काफिया है जिसे बहुत सुंदर तरीके से सुधीर जी ने लगाया है। चाँद का छत पर टहलना और हंस के कहना वाह क्या बात है। और अगला शेर जिसमें मिलने से पहले आँख मिलाने का हुनर सीखने की नसीहत है बहुत ही सुंदर है। अंतिम शेर हम सबके जीवन की कहानी है मानों, बचपन से लेकर किशोरावस्था तक का साथा अचानक अजनबी क्यों बना देता है सोलहवें तक आते आते, क्यों ऐसा हो जाता है। यह झिझक ही सारी कहानी कह रही है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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तो यह हैं आज की तीनों शानदार ग़ज़लें। तीनों शायरों ने कमाल के प्रयोग किये हैं। अब आपको भी टिप्प्णियों में कमाल करना है, यदि आपके पास समय हो तो। क्योंकि इन दिनों लगता है कि आपके पास बहुत व्यस्तता है। खैर मिलते हैं अगले अंक में।

गुरुवार, 29 जून 2017

ईद का यह तरही मुशायरा कुछ विलंब से प्रारंभ हुआ है तो आइये आज सौरभ पाण्डेय जी और निर्मल सिद्धू जी के साथ मनाते हैं ईद का यह त्यौहार।

मित्रों कुछ कारणों से मन बहुत व्य​थित है, लेकिन बस यह लगता है कि आने वाला समय हो सकता है इन सब नफरतों को समाप्त कर दे। जो कांटे हमारी सुंदर बगिया में पैदा हो गए हैं समय की तेज हवा शायद उनको हटा दे। असल में इन्सान की आदत है कि वह कम से कम एक अवस्था में तो रहना चाहता ही है। या तो प्रेम की अवस्था या नफरत की अवस्था। यदि आप उसे प्रेम की अवस्था में रखेंगे तो वह नफरत की अवस्था में नहीं जाएगा लेकिन यदि आपने उसे प्रेम की अवस्था में नहीं रखा तो वह नफरत की अवस्था में जाएगा ही जाएगा यह तय है। इन दिनों हमारे साथ भी यही हो रहा है। हमने अपने आास पास से प्रेम को लगभग समाप्त ही कर दिया है और यही कारण है कि कमोबेश हर कोई अब नफरत की अवस्था में है। यह नफरत आज अपनी चरम सीमा पर है। लेकिन अभी भी मुझे लगता है कि हर बुरे समय में कुछ मुट्ठी भर लोग ऐसे होते हैं जो अपने समय को ठीक करने का माद्दा रखते हैं। और हमें उन ही लोगों में शामिल रहना है। घबराइये मत, डरिए मत, दुनिया में जब भी अँधेरे ने ऐसा माहौल बनाया है कि अब उसका ही साम्राज्य होगा तब तब कोई उजाले का दूत, फरिश्ता सामने आया है। तो हम सब भी उजालों के पक्ष में खड़े हैं और हमें इस पक्ष में खड़े ही रहना है यह तय कीजिए।

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कल की दोनों ग़ज़लें बहुत शानदार थीं और दोनों ही ग़ज़लों ने इब्तिदा का रंग खूब जमाया। ईद का त्यौहार जैसा कि सौरभ जी ने अपने एक कमेंट में कहा कि यह तो महीने भर मनाया जाने वाला त्यौहार है तो हम आने वाले समय में इसे मनाते रहेंगे। आइये आज सौरभ पाण्डेय जी और निर्मल सिद्धू जी के साथ ईद के त्यौहार का यह जश्न आगे बढ़ाते हैं।

कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक

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सौरभ पाण्डेय

पिस्तौल-तमंचे से ज़बर ईद मुबारक़
इन्सान पे रहमत का असर ईद मुबारक़

पास आए मेरे और जो ’आदाब’ सुना मैं
मेरे लिए अब आठों पहर ईद मुबारक़

हर वक़्त निग़ाहें टिकी रहती हैं उसी दर
पर्दे में उधर चाँद, इधर ईद मुबारक़ !

जिस दौर में इन्सान को इन्सान डराये
उस दौर में बनती है ख़बर, ’ईद मुबारक़’ !

जब धान उगा कर मिले सल्फ़ास की पुड़िया
समझो अभी रमज़ान है, पर ईद मुबारक़ !

इन्सान की इज़्ज़त भी न इन्सान करे तो
फिर कैसे कहे कोई अधर ईद मुबारक़ ?

भइ, आप हैं मालिक तो कहाँ आपसे तुलना
कह उठती है रह-रह के कमर.. ईद मुबारक़ !

तू ढीठ है बहका हुआ, मालूम है, लेकिन
सुन प्यार से.. बकवास न कर.. ’ईद मुबारक़’ !

जो बीत गयी रात थी, ’सौरभ’ उठो फिर से 
कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक

बहुत ही अच्छे मतले के साथ सौरभ जी ने ग़ज़ल की शुरुआत की है। पिस्तौल तमंचे से ज़बर ईद मुबारक और अगले मिसरे में रहमत का असर बहुत खूब बना है। प्रेम तो ईद का स्थायी भाव है किसी के आदाब कहते ही आठों पहर ईद हो जाना यही तो प्रेम है। प्रेम में रहो तो हर दिन ईद का ही दिन है। और अगले ही शेर में कहीं पर निगाहें टिका कर परदे में छिपे चाँद को देखने की इच्छा रखना बहुत ही सुंदर भाव है शेर में।  और अगले ही शेर में उसी चिंता की बात है जिस चिंता का ज़िक्र मैंने आज शुरूआत में किया है। सच में जिस दौर में इंसान को इंसान ही डराता है उस दौर में ईद मुबारक भी एक खबर ही तो होती है। और इंसान की यदि इंसान ही इज़्ज़त न कर रहा हो तो भला कैसे कोई कह सकता है ईद मुबारक। बहुत ही सामयिक चिंताओं से भरे शेर। किसानों के फाके और रोज़े से भरी जिंदगी का शेर भी बहुत अच्छा है। मकते में गिरह को बहुत ही सुंदर तरीके से बाँधा है सौरभ जी ने। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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निर्मल सिद्धू

सब उसका करम उसकी मेहर ईद मुबारक
हर शय का है पैग़ामे-नज़र ईद मुबारक

फूलों ने दिया कलियों को जो ईद का तुहफ़ा
मख़मूर हुये गाँव-नगर ईद मुबारक

जन्नत का संदेशा, है दिया चाँद ने शब को
कहती है ये ख़ुशियों की सहर ईद मुबारक

नफ़रत को मिटा कर ये मुहब्बत को बसा दे
ऐसा जो कहीं कर दे असर, ईद मुबारक

तस्वीर संवर जायेगी उस पल ही जहां की
निकले जो दुआ बनके अगर ईद मुबारक

‘ निर्मल ’ भी हुआ आज तो मस्ती में दिवाना
जब उसने कहा जाने-जिगर ईद मुबारक

वाह वाह क्या खूब ग़ज़ल कही है निर्मल जी ने। मतले में ही ऊपर वाले के प्रति शुक्रिया जताने का जो अंदाज़ है वो बहुत ही सुंदर है। सच में हम सब यदि प्रेम सीख जाएँ तो हर दिन,हर शय का पैगाम ईद मुबारक ही होगा। जन्नत का संदेशा जो चांद ने दिया रात को और उसके बाद की सुबह मे ईद मुबारक का संदेश चारों तरफ फैलना बहुत ही सुंदर चित्र बनाया है शब्दों से। और अगले ही शेर में हम सबकी दुआ को स्वर मिलते हैं कि नफरत को मिटा कर हर तरफ यदि मुहब्बत को बसा दिया जाए तो उससे अच्छी ईद और कोई हो ही नहीं सकती। सचमुच इस दुनिया की तस्वीर उसी पल सँवर जाए यदि हम सबके होंठों पर दुआओं के रूप में प्रार्थना आ जाए। यह दुनिया अब यही चाहती है। और मकते के शेर में प्रेम को बहुत सुंदर ढंग से पिरो दिया है। बहुत ही अच्छे से काफिया निभाया गया है। मुझे लगता है कि यह  काफिया बाँधने का बहुत खूब उदाहरण है। का​फिया वाक्य का हिस्सा ही बन गया है। खूब। वाह वाह वाह सुंदर ग़ज़ल।

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तो यह हैं आज के दोनों शायर जिन्होंने बहुत ही सुंदर ग़ज़लें कही हैं। कमाल के शेर दोनों ने निकाले हैं। आपका काम है कि आप इन कमाल के शेरों पर दाद दीजिए और खुल कर दाद दीजिए। मिलते हैँ अगले अंक में। ईद मुबारक।

मंगलवार, 27 जून 2017

मुशायरा आज से शुरू कर रहे हैं, क्योंकि ग़ज़लें अधिकांश कल ही प्राप्त हुई हैं। तो आइये आज से हम ईद मनाना शुरू करते हैं यहाँ। और आज दिगंबर नासव तथा नुसरत मेहदी जी की ग़ज़लों के साथ मनाते हैं ईद।

ब्लॉग परिवार के सभी सदस्यों को ईद मुबारक, ईद मुबारक, ईद मुबारक।

मित्रों इस बार ईद के मुशायरे का मिसरा कुछ कठिन तो था यह तो ज्ञात था लेकिन इतना कठिन हो जाएगा कि ईद के एक दिन पूर्व तक भी ग़ज़लें नहीं के बराबर आएँगी यह पता नहीं था। इसी कारण ईद का त्यौहार अब हम बासी ही मनाएँगे। अच्छा भी है कम से कम कुछ दिनों तक और त्यौहार का माहौल बना रहेगा। जिंदगी में और उसके अलावा है भी क्या। जो भी पल हम खुशी में जी लेते हैं वही जिंदगी की असली पल होते हैं। बाकी तो हम सबने अपनी जिंदगी को इतना कठिन बना लिया है कि हम खुश होना ही भूलते जा रहे हैं। त्यौहारों पर हम खुश होते हैं और उसके बाद फिर जिंदगी पुराने ढर्रे पर आ जाती है।

Eid-Mubarak-Wishes-Quotes-Messages-Wallpapers-SMS-2015-4

आइये आज से हम ईद का तरही मुशायरा शुरू करते हैं। और मनाते हैं ईद का त्यौहार हिलमिल कर।

कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक

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दिगंबर नासवा

रमजान में लौटेंगे वो घर, ईद मुबारक
सरहद से अभी आई खबर, ईद मुबारक

मुखड़ा है मेरे चाँद का, है चाँद की आमद
अब जो भी हो सबको हो मगर, ईद मुबरक

देखेंगे तो वो इश्क ही महसूस करेंगे
वो देख के बोलें तो इधर, ईद मुबारक

साजिश ने हवाओं की जो पर्दा है उड़ाया
आया है मुझे चाँद नज़र, ईद मुबारक

इंसान ही इंसान का दुश्मन जो बनेगा
तब किसको कहेगा ये शहर, ईद मुबारक

लो बीत गए दर्द की परछाई के साए
कहती है ये खुशियों की सहर, ईद मुबारक

वाह क्या बात है मतले में ही उन लोगों के लौटने के संकेत मिल रहे हैं जो अपने घर से साल भर दूर रहे और अब ईद के त्यौहार पर अपने घर लौट रहे हैं। सरहद से खबर आई है और ईद मन गई है। मुखड़ा है मेरे चांद का, है चांद की आमद, वाह वाह क्या मिसरा गढ़ा है। खूब। और अगले शेर में मासूमियत के साथ कहना कि वो देख के बोलें तो इधर ईद मुबारक। वाह सच बात है कि किसी के देखने और उसके ईद मुबारक कहने से ही तो ईद होती है। और साजिश से हवाओं की परदे का उड़ना और उसके बाद ईद मन जाना वाह क्या बात है। ग़ज़ब। और अंत के शेर में बहुत सुंदर तरीके से गिरह बांधी है। वाह वाह वाह क्या सुंदर ग़ज़ल खूब।

nusrat mehdi

नुसरत मेहदी

रक़सां हैं दुआओं के शजर ईद मुबारक
हैं नग़मासरा बर्ग ओ समर, ईद मुबारक

हर सम्त फ़ज़ाओं में उड़ाती हुई ख़ुशबू
"कहती है ये खुशियों की सहर ईद मुबारक"

लो फिर से महकने लगीं उम्मीद की कलियां
खुलने लगे इमकान के दर, ईद मुबारक

कुछ लोग हैं लेकिन पसे दीवारे अना भी
जा कह दे सबा जाके उधर ईद मुबारक

ये तय है कि हम ईद मनाने के नहीं हैं
मिलकर न कहा तुमने अगर ईद मुबारक

जो प्यास के दरिया में भी सेराब थे 'नुसरत'
दामन में हैं अब उनके गुहर ईद मुबारक

बात तीसरे शेर से ही शुरू की जाए पहले, कुछ लोग हैँ लेकिन पसे दीवार अना भी में मिसरा सानी घप्प से कलेजे में आकर कटार की तरह बैठ जाता है। जा कह दे सबा जाके उधर ईद मुबारक। कमाल कमाल क्या सुंदर और मासूम मिसरा है। वाह। मतला बहुत ही खूब बना है रकसां हैं दुआओं के शजर ईद मुबारक और मिसरा सानी ने मिलकर मानों ईद का एक पूरा चित्र ही बना दिया है। पहले ही शेर में बहुत ही सुंदर तरीके से गिरह बांधी है। गिरह बांधने में बहुत नफासत का उपयोग किया गया है। और अगले ही शेर में इमकान के दर खुलने का चित्र भी बहुत ही सुंदर तरह से बनाया गया है। और एक और आहा और वाह वहा टाइप का शेर है ये तय है कि हम ईद मनाने के नहीं हैं में मिसरा सानी मोहित कर ले रहा है मिलकर न कहा तुमने अगर ईद मुबारक। और मकते का शेर सब के जीवन में ईद के त्यौहार द्वारा बिखेरी गई खुशियों की बात कर रहा है। सच में यही तो त्यौहार होता है जो सबके जीवन में रंग और नूर ले आता है। वाह वाह वाह क्या बात है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।

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तो मित्रों ये हैं आज के दोनों शायर। इन कमाल की ग़ज़लों पर दाद दीजिए और इंतज़ार कीजिए अगले अंक का। सबको ईद मुबारक।

सोमवार, 29 मई 2017

इस बार ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे का तरही मिसरा

मित्रों आप सबको पवित्र रमज़ान के महीने के आगमन की शुभकामनाएँ। इन दिनों बहुत व्यस्तता में घिरा हुआ हूँ। असल में ऑफिस के नवीनीकरण तथा विस्तार के कार्य के चलने के कारण कम्प्यूटर से लगभगग रिश्ता टूटा हुआ-सा है। मगर फिर भी आज ज़रा कुछ देर का समय निकाल कर ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले तरही मुशायरे का मिसरा दे रहा हूँ। दिमाग़ बहुत उलझनों में घिरा है इसलिए हो सकता है कि इस बार का मिसरा आपको कुछ कमज़ोर लगे। लेकिन अब जैसा भी है उसी पर काम करना है।

इस बार बहर का चुनाव “बहरे हज़ज मुसमन मकफ़ूफ महज़ूफ” किया है। यह गाए जाने वाली बहर है जिसके अरकान कुछ इस प्रकार से हैं 221-1221-1221-122 मतलब मफऊलु-मफाईलु-मफाईलु-फऊलुन। यह बहुत गाई जाने वाली बहर है और इस पर कई फिल्मी गीत भी हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं। ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा’ या फिर ‘बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी’, आदि आदि। जैसा कि हम पहले ही कई बार बात कर चुके हैं कि यह वैसे तो बहुत लोकप्रिय बहर है लेकिन इसमें बहुत सावधानी के साथ कार्य करना होता है। ज़रा सी ग़लती से दूसरा या तीसरा रुक्न 1221 के स्थान पर 1212 या 2121 हो जाता है और अंतिम रुक्न भी 122 के स्थान पर 212 हो जाता है। चूँकि गाकर लिखी जाती है इसलिए इस अंतर का आपको पता भी नहीं चलता। इसकी एक हमशक्ल बहर है “बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफ़ूफ महज़ूफ” जिसके अरकान हैं 221-2121-1221-212 इसलिए होता अक्सर है कि दोनों बहरों के रुक्न एक दूसरे में मिल जाते हैं। गाते समय इसका पता ही नहीं चलता। जैसे हम दो गानों को देखते हैं पहला तो जो हमने ऊपर लिया “बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी” और दूसरा “मिलती है ज़िंदगी में मुहब्बत कभी कभी”। ये दोनों गाने आप अगर गुनगुना के देखेंगे तो दोनों एक ही धुन पर लगेंगे, लेकिन वास्तव में यह दोनों ही अलग अलग बहरों पर हैं। पहला बहरे हज़ज पर है तो दूसरा बहरे मुजारे पर है। बस यही सावधानी आपको रखनी होगी कि दोनो एक दूसरे में घुल मिल न जाएँ।

तो इस बार ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे का तरही मिसरा है

कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक

कह-ती-है 221 (है को गिराया गया है)

ये-ख़ुशि-यों-की 1221 (ये और की को गिराया गया है)

स-हर-ई-द 1221

मु-बा-रक 122

इस बार रदीफ़ ईद मुबारक है और सहर शब्द में का​फिया की ध्वनि है मतलब जो अर की ध्वनि है वही हमारे का​फिया की ध्वनि है। कुछ कठिन ज़रूर है क्योंकि एक तो  का​फिया कुछ उलझन भरा है और उस पर ज़रा सी चूक से वह रदीफ के साथ अपने संबंध तोड़ भी सकता है। बहर तो मुश्किल भरी है ही।

जैसा कि आपको पता है कि यह मुशायरा शिवना साहित्यिकी पत्रिका में प्रकाशित भी होगा। जुलाई अंक में इस को लिया जाएगा। ईद के कुछ दिनों पूर्व हम इस मुशायरे का आयोजन यहाँ ब्लॉग पर प्रारंभ कर देंगे। तो लग जाइए काम पर और तैयार कीजिए ईद के अवसर पर सुनाई जाने वाली ग़ज़ल। तब तक नमस्कार। 

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

शिवना साहित्यिकी का अप्रैल-जून 2017 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है।

मित्रों, संरक्षक तथा सलाहकार संपादक सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra, प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeer , कार्यकारी संपादक- शहरयार Shaharyar तथा सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का अप्रैल-जून 2017 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है संपादकीय, शहरयार। व्यंग्य चित्र -काजल कुमार Kajal Kumar । कविताएँ- तनवीर अंजुम Tanveer Anjum , वंदना मिश्र , जया जादवानी Jaya Jadwani । शख़्सियत - होता है शबोरोज़ तमाशा मिरे आगे, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth । कहानी- नीला.....नहीं शीला आकाश, अमिय बिन्दु Amiya Bindu । फिल्म समीक्षा के बहाने- जौली एलएलबी, वीरेन्द्र जैन Virendra Jain। आवरण चित्र के बारे में....- गेंद वाला फोटो / पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi । ख़बर कथा एक थी सोफिया और बिखरे सपने , ब्रजेश राजपूत Brajesh Rajput । पुस्तक-आलोचना- उजली मुस्कुराहटों के बीच / डॉ. शिवानी गुप्ता विमलेश त्रिपाठी । पुस्तकें इन दिनों.... - छल / अचला नागर Achala Nagar , पकी जेठ का गुलमोहर / भगवान दास मोरवाल भगवानदास मोरवाल , भ्रष्टाचार के सैनिक / प्रेम जनमेजय । कथा-एकाग्र- शकील अहमद। समीक्षा- डॉ. सुशील त्रिवेदी / जलतरंग, माधुरी छेड़ा / गीली मिट्टी के रूपाकार। एक कहानी, एक पत्र.... Prem Bhardwaj सुधा ओम ढींगरा। पड़ताल नया मीडिया : नया विश्व, नया परिवेश, डॉ. राकेश कुमार Rakesh Kumar । तरही मुशायरा ( Nusrat MehdiRajni Malhotra Nayyar Rakesh Khandelwal Bhuwan Nistej Nirmal Sidhu धर्मेन्द्र कुमार सिंह Digamber Naswa @gurpreet singh @nakul gautam Dwijendra Dwij Girish Pankaj @anshul tiwari Pawan Kumar Ias Neeraj Goswamy Tilak Raj Kapoor @anita tahzeeb @ Saurabh Pandey Parul Singh @mustafa mahir Ashwini Ramesh Mansoor Ali Hashmi Pankaj Subeer @sudheer tyagi Madhu Bhushan Sharma । आवरण चित्र- पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi - डिज़ायनिंग-सनी गोस्वामी Sunny Goswami
आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
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सोमवार, 20 मार्च 2017

आज शीतला सप्तमी पर होली की आग का ठंडा करके होली के त्योहार का समापन होता है, तो अपनी अत्यंत ठंडी ग़ज़ल लेकर आ रहे हैं भभ्भड़ कवि भौंचक्के।

मित्रों होली का मुशायरा बहुत ही अच्छा रहा। सबने ख़ूब कमाल की ग़ज़लें कहीं। और सबसे अच्छी बात तो यह रही कि क़फिये की परेशानी बताने वालों ने भी ग़ज़ब की ग़ज़लें कहीं। अब मुझे लगता है कि हम यहाँ पर और कठिन प्रयोग भी कर सकते हैं। आप सब जिस अपनेपन से आकर यहाँ पर महफ़िल सजाते हैं उसके लिए आप सबको लाखों लाख सलाम प्रणाम। असल में तो यह ब्लॉग है ही आप सबका, यह एक परिवार है जिसमें हम सब वार-त्योहार मिलते हैं एक साथ एकत्र होते हैं और ख़ुशियाँ मनाते हैं। अब अगला त्योहार ईद का आएगा जून में तो हम अगला त्योहार वही मनाएँगे। चूँकि हमें शिवना साहित्यिकी हेतु हर चौथे माह एक मुशायरा चाहिए ही तो हमें अब इस प्रकार से ही करना होगा। ईद इस बार जून के अंतिम सप्ताह में है तो हम पवित्र रमज़ान के माह में अपना मुशायरा प्रारंभ कर देंगे और ईद तक उसको जारी रखेंगे। जुलाई के अंक हेतु हमें ग़ज़लें प्राप्त हो जाएँगी।

आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में

आज भभ्भड़ कवि अपनी ठंडी ग़ज़ल लेकर आ रहे हैं ताकि बहुत अच्छी और गर्मा गर्म ग़ज़लों से रचनाकारों ने जो होली की आग भड़का रखी है वह शीतला सप्तमी के दिन ठंडी हो जाए। कुछ शेर भभ्भड़ कवि ने घोर श्रंगार में लिख दिये हैं होली के अवसर का लाभ उठाते हुए, आप इस बात पर उनकी ख़ूब लानत-मलानत कर सकते हैं। मित्रों इस बार का जो क़ाफिया था वह ज़रा सी असावधानी से मिसरे से असंबद्ध हो सकता था और भर्ती के क़ाफिये में बदल सकता था। भभ्भड़ कवि ने केवल यह देखने की कोशिश की है कि वह कौन से क़ाफिये हैं जो बिना असंबद्ध हुए उपयोग किए जा सकते हैं और किस प्रकार से उपयोग किये जा सकते हैं। इस बार का रदीफ़ बहुअर्थी रदीफ़ था। रंग शब्द के कई अर्थ होते हैं। पहला तो वही रंग मतलब एक वस्तु जैसे ‘लाल रंग’, दूसरा रंग रंगने की क्रिया जैसे ‘मुझे रँग दे’, तीसरा रंग एक अवसर जैसे ‘आज रंग है’, चौथा रंग एटीट्यूड में होना, फुल फार्म में होना, प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन जैसे यह कि ‘आज तो वह पूरे रंग में है’, पाँचवा रंग होता है असर, किसी का असर, जैसे ‘मैं हमेशा उसके रंग में रहा’। इसलिए इस बार सबसे ज़्यादा प्रयोग करने के अवसर थे, और रचनाकारों ने किए भी। भभ्भड़ कवि ने अलग-अलग क़ाफियों के साथ अलग-अलग प्रयोग करने की टुच्ची-सी कोशिश की है। बहुत सारे शेर कह डाले हैं, कौन रोकने वाला है, उस्ताद कहा करते थे कि बेटा बुरा ही करना है तो ख़ूब सारा करो, गुंजाइश रहेगी कि उस ख़ूब सारे बुरे में एकाध कुछ अच्छा भी हो जाए। कुल 32 क़ाफियों का उपयोग इस ग़ज़ल में किया गया है। जो क़ाफिये असंबद्ध होने के ख़तरे से भरे थे उनको छोड़ दिया गया है। तो आइये इतनी अच्छी ग़ज़लों के बाद यह कड़वा किमाम का पान भी खा लिया जाए। तो लीजिए प्रस्तुत है भभ्भड़ कवि भौंचक्के की ग़ज़ल।

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भभ्भड़ कवि ‘भौंचक्के’

जिसको देखो वही है तेरे रंग में
कुछ तो है इस तेरे साँवले रंग में

इक दुपट्टा है बरसों से लहरा रहा
सारी यादें रँगी हैं हरे रंग में

दिल की अर्ज़ी पे भी ग़ौर फ़रमाइये
कह रहा है रँगो भी मेरे रंग में

रंग डाला था होली पे उसने कभी
आज तक हम हैं भीगे हुए रंग में

बस इसी डर से बोसे नहीं ले सके 
दाग़ पड़ जाएँगे चाँद-से रंग में

तुम भी रँगरेज़ी देखो हमारी ज़रा
"आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में"

जिस्म से रूह तक रंग चढ़ जाएगा
थोड़ा गहरे तो कुछ डूबिये रंग में

थक गया है सफ़ेदी को ढोते हुए
अब रँगो चाँद को दूसरे रंग में

आज रोको लबों की न आवारगी
बाद मुद्दत के आए हैं ये रंग में

ख़ूब बचते रहे रंग से अब तलक
सोलहवाँ जब लगा, आ गिरे रंग में

हम दिवानों की होली तो बस यूँ मनी
उनको देखा किये भीगते रंग में

इक दिवाना कहीं रोज़ बढ़ जाएगा
रोज़ निकलोगे गर यूँ नए रंग में

दिल को मासूम बच्चा न समझो, सुनो
तुमने देखा कहाँ है इसे रंग में

दोस्ती का जो करते थे दावा बहुत
एक सच जो कहा, आ गए रंग में

रिंद प्यासे हैं तब तक ही ख़ामोश हैं
थोड़ी मिल जाए तो आएँगे रंग में

उसके रँग में रँगे लौट आए हैं घर
घर से निकले थे रँगने उसे रंग में

उफ़ ! लबों की ये सुर्ख़ी, ये काजल ग़ज़ब !
आज रँगने चले हो किसे रंग में

शर्म से जो लरजते थे दिन में वही
रात को अपने असली दिखे रंग में

मन में कोंपल-सी फूटी प्रथम प्रेम की
कच्चे-कच्चे सुआपंखिये रंग में

वस्ल की शब बरसती रही चाँदनी
हम नहाते रहे दूधिये रंग में

तब समझना कि तुमको मुहब्बत हुई
मन जो रँगने लगे जोगिए रंग में

ज़ाफ़रान एक चुटकी है शायद मिली
इस तेरे चाँदनी से धुले रंग में

ज़िंदगी ने थी पहनाई वर्दी हरी
मौत ने रँग दिया गेरुए रंग में

आसमाँ, फूल, तितली, धनक, चाँदनी
है हर इक शै रँगी आपके रंग में

फिर कोई दूसरा रंग भाया नहीं
उम्र भर हम उसीके रहे रंग में

वस्ल की रात उसका वो कहना ये, उफ़ !
'आज रंग डालो अपने मुझे रंग में'

हैं कभी वो ख़फ़ा, तो कभी मेहरबाँ
हमने देखा नहीं तीसरे रंग में

आपका वक़्त है, कौन रोके भला
आप रँग डालें चाहे जिसे रंग में

कल की शब हाय महफ़िल में हम ही न थे
सुन रहे हैं के कल आप थे रंग में

रूह पर वस्ल का रँग चढ़े, हाँ मगर
जिस्म भी धीरे-धीरे घुले रंग में

है 'सुबीर' उम्र का भी तक़ाज़ा यही
ख़ुश्बुए इश्क़ भी अब मिले रंग में

तो मित्रों यह है भभ्भड़ कवि भौंचक्के की ग़ज़ल। दाद खाज खुजली जो कुछ भी आपको देना है आप उसके लिए स्वतंत्र हैं। सड़े अंडे, टमाटर आदि जो कुछ आपको देना है वह आप कोरियर भी भेज सकते हैं। भभ्भड़ कवि पूरे मन से उन सबको स्वीकार करेंगे। तो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। होली के मुशायरे का इसी के साथ समापन घोषित किया जाता है। भभ्भड़ कवि ने पूरे बत्तीस लोटे पानी डाल कर उस आग को बुझाया है जिसे आप लोगों ने मेहनत से सुलगाया था। तो मिलते हैं अगले मुशायरे में।

शनिवार, 18 मार्च 2017

होली का मुशायरा अब अपने अंतिम पड़ाव तक आ पहुँचा है। आज तरही के समापन से ठीक पहले सुनते हैं पारुल सिंह जी, राकेश खण्डेलवाल जी और तिलकराज कपूर जी को।

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मित्रों इस बार का तरही मुशायरा बहुत ही आनंद में बीता है। एक से बढ़ कर एक ग़ज़लें सामने आईं हैं। इन ग़ज़लों में कई तरह के रंग खिले और होली का एक पूरा माहौल इन ग़ज़लों में बन गया। अब हम धीरे धीरे समापन तक आ गए हैं। समापन हमेशा ही एक प्रकार का ख़ालीपन मन के अंदर पैदा करता है। मगर अभी तो एक अंक और आएगा जिसमें भकभौ आएँगे।

आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में

आइये आज होली के तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं। समापन के ठीक पहले सुनते हैं पारुल सिंह जी, राकेश खण्डेलवाल जी और तिलकराज कपूर जी को। और अंत में भभ्भड़ कवि को समापन करना है ऐसा हम मान कर चल ही रहे हैं। तो इसके बाद अब कोई ग़ज़ल नहीं भेजिए क्योंकि बस अगली पोस्ट अंतिम होगी जिसमें समापन होगा।

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पारुल सिंह

शाम ढलने लगी लाल-से रंग में
जैसे आँचल किसी का उड़े रंग में

मैँ ग़ज़ल घोल लाई सजन चाँद में
आओ रँग दूँ तुम्हें इश्क़ के रंग में

चाँद ने बाहों में भर के पूछा मुझे
शर्म से गाल क्यूँ रँग गए रंग में

फागुनी रात ने चाँद से ये कहा
और मस्ती मिला, बावरे, रंग में

झम झमा झम झमकती फिरे ज़िंदगी
हो गई है धनक आपके रंग में

हैं ज़रा सा ख़फ़ा अब मना लो हमें
ये मिलन फिर सजे इक नए रंग में

शर्त है बात हक़ की ज़ुबाँ पर न हो
ढल गई है वफ़ा कौन से रंग में

दिल मिले साथ दिल के गले से लगा
केसरी घुल गया है हरे रंग में

बस गए धूप बन के नज़र में पिया
वस्ल ही वस्ल है अब खिले रंग में

शाम ढलने लगी लाल-से रंग में मतले में ही प्रकृति का बहुत सुंदर चित्र खींचा गया है। और उसके बाद गिरह का शेर भी हल्की सी तब्दीली के साथ बहुत ही सुंदर बना है। ग़ज़ल का चाँद में घोलना और उसके सजन का रँगना वाह क्या प्रतीक हैं। और अगले ही शेर में चाँद का बाहों में भरना भी और पूछना भी कि गाल क्यूँ रँग गए हैं, क्या बात है सुंदर। अगले शेर में एक बार फिर से चाँद है जिसे रात कह रही है कि और मस्ती मिला बावरे, वाह क्या बात है बहुत ही सुंदर शेर है। और किसी के प्रेम में ज़िंदगी का धनक बन जाना और झमकते फिरना ग़ज़ब है। झमकना ही तो प्रेम का सबसे पहला लक्षण होता है।  हक़ की बात करने से मना किया जाता है तो उसमें वफ़ा सचमुच नहीं होती है। प्रेम में तो सब कुछ हक़ के दायरे में आ जाता है। और जब पिया धूप बन कर नज़र में बस जाएँ तो हर क्षण वस्ल का ही होता है और वह भी धूप के ​खिले रंग में। वाह वाह क्या बात है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।  
TILAK RAJ KAPORR JI

तिलकराज कपूर

भांग को घोटते घोटते रंग में
क्‍या न क्‍या कह गये अधचढ़े रंग में।

टोलियों में चले मनचले रंग में
अजनबी भी मिले तो रंगे रंग में।

साल भर मेक-अप से पुते रंग में
कुछ मिटे रंग से, कुछ मिले रंग में।

रोग मधुमेह जबसे लगा मित्रवर
अब मिठाई न कोई चले रंग में।

एक उत्‍सव सराबोर है रंग से
फायदा मत उठा मुँहजले रंग में।

रंग इन पर चढ़ेगा न दूजा कोई
गोपियाँ हैं रँगी श्‍याम के रंग में।

टेसुओं से लदी डालियाँ कह रहीं
आईये, खेलिये, डूबिये रंग में।

सीख शाला से बच्‍चों ने हमसे कहा
खेलिये न रसायन भरे रंग में।

कुछ मुहब्‍बत मिलाकर गुलालों में हम
''आओ रंग दें तुम्‍हें इश्‍क़ के रंग में।''

तिलकराज जी ने होली के रंगों में रँगी यह ग़ज़ल कही है बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। मतले में एक बारीक सी बात है, जिन लोगों ने भाँगा घोंटने वालों को देखा है वे इस बारीकी को समझेंगे कि उस समय घोंटने वाला अलग ही रंग में होता है, उस रंग को बहुत अच्छे से उठाया है मतले में। और साल भर जो मेकअप से पुतते हैं उनके लिए होली के क्या मायने भला ? उनकी तो साल भर ही होली होती है। मधुमेह का रोग अगले शेर में एक दुखती रग पर हाथ रख रहा है। गोपियों पर उद्धव ने बहुत रंग चढ़ाने की कोशिश की थी लेकिन हार गए थे और कह दिया था कि रंग इन पर चढ़ेगा न दूजा कोई। टेसुओं से लदी डालियाँ सचमुच ही आमंत्रण देती हैँ कि होली आ गई है और होली होनी चाहिए। और अंत में मुहब्बत को गुलालों में मिला कर किसी को अपने इश्क़ के रंग में रँगने का आमंत्रण बहुत ही सुंदर। क्या बात है वाह वाह वाह।

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राकेश खण्डेलवाल

पन्चमी आ गई सतरँगे रंग में
आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

राह तकते हुये नैन थकने लगे
आयें भकभौ लिये फ़लसफ़े रंग में

आस! होली पे अब रहनुमाई रँगे
एक शफ़्फ़ाक से दूधिये रंग में

आई गज़लों की तहज़ीब हमको नहीं
फ़िर भी गज़लें कहें डूब के रंग में

रंग  इक जो चढ़े फिर न उतरे कभी
तरही आयेगी हर पल नये रंग में 
राकेश जी बहुत कम ग़ज़लें कहते हैं। इस बार भभ्भड़ कवि भौंचक्के को निमंत्रित करने हेतु उन्होंने भी ग़ज़ल कह ही दी है। और जब राकेश जी का निमंत्रण है तो भकभौ को आना ही होगा। रंग की पंचमी जो इधर मालवा अंचल में होती है वह सचमुच ही सतरँगे रंग् की होती है। और अगले ही शेर में भकभौ को पीले चावल देने राकेश जी सीधे वाशिंगटन डीसी से आ गए हैं। भकभौ पर अब दबाव बन चुका है पूरा। अगले शेर में देश की राजनीति को श्वेत रंग से रँगे जाने की एक ऐसी कामना जो हर देशवासी के मन में है। आमीन। इतनी अच्छी ग़ज़ल कहने वाले को ग़ज़ल की तहज़ीब नहीं आती यह कहना ही ग़लत है। और अंत में हमारे इस तरही मुशायरे की लिए एक प्रार्थना है कि यह होता रहे यूँ ही निरंतर। बहुत ही सुंदर कामना और बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। क्या बात है वाह वाह वाह।

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तो मित्रो यह हैं आज के तीनों रचनाकार और आपका वही काम कि आपको दाद देना है खुलकर। क्योंकि आपकी दाद ही भकभौं के लिए हौसला बढ़ाने का काम करेगी।

बुधवार, 15 मार्च 2017

हर त्यौहार का एक रंग वह भी होता है जिसे बासी रंग कहा जाता है, इस ब्लॉग पर बासी रंग और ज़्यादा खिलता है। आइए आज तिलकराज कपूर जी और डॉ. सुधीर त्यागी के साथ बासी रंग मनाते हैं।

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होली का पर्व आया और चला भी गया हालाँकि हमारे इधर मालवा में तो अभी असली रंग का दिन रंग पंचमी बचा हुआ है। हमारे यहाँ होली पर तो नाम का रंग होता है असली तो रंग पंचमी ही होती है। और इस बार तो लग रहा है कि यहाँ ब्लॉग पर भी रंग पंचमी तक रंग चल ही जाएगा। बल्कि लगता है कि भभ्भड़ कवि भौंचक्के की इण्ट्री तो शायद उसके भी बाद हो पाए। कुछ नए लोग जुड़ रहे हैं जो दौड़ते भागते रेल पकड़ रहे हैं। जो भी हो हमारा मक़सद तो यही है कि रचनाधर्मिता को बढ़ावा दिया जाए, जो भी हो, जैसे भी हो। असल तो रचनाधर्मिता ही होती है। तो आइए आज रंग भरे माहौल का और बढ़ाते हैं।

आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में

मित्रो इस बार की ग़ज़लें बहुत परिपक्व ग़ज़लें हैं। और ऐसा हुआ है कुछ कठिन रदीफ और काफ़िये के कॉम्बिनेशन के कारण। यह सारी ग़ज़लें और गीत शिवना साहित्यिकी पत्रिका के अगले अंक में प्रकाशित होंगे। और हाँ चूँकि पत्रिका त्रैमासिक है तो अब हमें साल में चार मुशायरे तो आयोजित करने ही होंगे। होली दीवाली तो होते ही हैं अब लगता है वर्षा और ग्रीष्म के मुशायरे भी आयोजित करने होंगे। आइए आज बासी होली मनाते हैं तिलकराज कपूर जी और डॉ. सुधीर त्यागी के साथ।

TILAK RAJ KAPORR JI

तिलकराज कपूर

शह्र डूबा कहूँ कौनसे रंग में
दिख रहे हैं सभी आपके रंग में।

रंग क्या है, समझने की चाहत है गर
सर से पा तक कभी डूबिये रंग में।

प्यास लगने पे अक्सर ही हमने पिये
अश्रु अपनी घुटन से भरे रंग में।

किस तरह से वो निष्पक्ष होंगे कहो
जन्म जिनका हुआ और पले रंग में।

जब मुहब्बत में आगे निकल आये हम
दौर रुस्वाईयों के चले रंग में।

जो दिखा आँखों से बस वही तो कहा
ये खबर क्यूँ  छपी दूसरे रंग में ।

रंग नफ़रत का तुमसे उतर जायेगा
''आओ रंग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में।''

वाह वाह तिलक जी तो एक के बाद एक ग़ज़लें प्रस्तुत करते जा रहे हैं। पहले दो लग चुकी हैँ और अब यह तीसरी ग़ज़ल, क्या बात है। सच है जब सब के सब किसी एक ही रंग में रँग चुके हों तो यह कह पाना बड़ा मुश्किल होता है कि कौन किस रंग में रँगा है। रंग क्या है समझने की चाहत हेतु सर से पैर तक डूबने की सलाह बहुत ही सुंदर है। किस तरह से वो निष्पक्ष होंगे भला में जन्म होना और पलना जो रंगों में कहा गया है वह बहुत ही गंभीर इशारा है। पत्रकारिता की ख़बर लेने वाला शेर जिसमें कहा गया है कि हमने तो कुछ और कहा था लेकिन छपा तो कुछ और है बहुत ही अच्छा शेर बना है। एक सुचिंतित टिप्पणी है यह आज की पत्रकारिता पर। और अंत में गिरह का शेर भी उतना ही सुंदर बना है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

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डॉ. सुधीर त्यागी

क्या मिला तुमको नफ़रत भरे रंग में
आओ रँग दे तुम्हे इश्क के रंग में

ऐसी बस्ती बसे काश कोई, जहाँ
आदमी प्रेम के बस रँगे रंग में

अब नहीं हैं अमन के कबूतर यहाँ
सब रँगे केसरी या हरे रंग में

प्यार, मनुहार, तकरार सब हैं रखे
क्या पता तुम मिलो कौनसे रंग में

अब बचे कौन कातिल नज़र से यहाँ
घुल गई भंग जब हुस्न के रंग में

डॉ. सुधीर जी पहली बार हमारे मुशायरे में आ रहे हैं। दिल्ली के रहने वाले हैं और कविताएँ ग़ज़लें लिखने का शौक़ रखते हैं। पहली आमद है इसलिए तालियों से स्वागत आपका। मतला में ही गिरह को बाँधा गया है और बहुत अच्छे से बाँधा गया है। और अगले ही शेर में एक ऐसी बस्ती की कामना करना जहाँ पर हर आदमी बस और केवल बस प्रेम के ही रंग में रँगा हुआ हो। सचमुच ऐसी बस्ती की कामना तो हम सब रचनाकार करते हैं। अगला शेर जिसमें अमन के कबूतरों के माध्यम से हमारे झंडे के तीसरे रंग की बात कही गई है बहुत ही सुंदर बन पड़ा है। प्यार, मनुहार, तकरार सब रखने की बात करने वाला शेर प्रेम की अंदर की कहानी कहता है, सच में हमें सारे रंग ही रखने होते हैं। और अंत में हास्य का तड़का लगाए शेर कि हुस्न के रंग में जब भंग घुल जाए तो उससे कौन बचेगा फिर।

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तो यह है आज की बासी होली। आप दाद देने का काम जारी रखिए क्योंकि दाद से ही भभ्भड़ कवि को आने की प्रेरणा मिलेगी। अभी शायद कुछ और बासी होली मने और उसके बाद करण अर्जुन की तर्ज़ पर भभ्भ्ड़ कवि आएँगे।

सोमवार, 13 मार्च 2017

होली है भई होली है रंगों वाली होली है। आज होली का दिन है आप सबको रंग भरी शुभकामनाएँ। आइए आज पाँच रचनाकारों के साथ मनाते हैं होली का पर्व आदरणीय तिलक राज कपूर जी, राकेश खंडेलवाल जी, अश्विनी रमेश जी, सुमित्रा शर्मा जी, मन्सूर अली हाश्मी जी और अनीता तहज़ीब जी के साथ।

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होली है भइ होली है रंगों वाली होली है, रंगबिरंगी होली है। बुरा न मानो होली है, बुरा न मानो होली है। उल्लास, उमंग और तरंग लिए होली आपके द्वार पर आ खड़ी हुई है। आइये होली के रंग में हम सब डूब जाएँ और आज रंगमय हो जाएँ। सब परेशानियाँ भूल जाएँ, सारी रंज़िशें भुला दें और बस होली मय हो जाएँ। जो रंग हो वह बस होली का ही हो। बाकी सारे रंगों को अब कुछ दिनों के लिए भूल जाएँ हम। 

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आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में

आइए आज पाँच रचनाकारों के साथ मनाते हैं होली का पर्व आदरणीय तिलक राज कपूर जी, राकेश खंडेलवाल जी, अश्विनी रमेश जी, सुमित्रा शर्मा जी, मन्सूर अली हाश्मी जी  और अनीता तहज़ीब जी के साथ।

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तिलक राज कपूर

बंद अधरों में है अधखिले रंग में
एक नाज़ुक कली मदभरे रंग में।

शह्र डूबा कहूँ कौनसे रंग में
दिख रहे हैं सभी आपके रंग में।

श्याम के रँग डूबी हुई राधिका
क्या दिखा तू बता साँवले रंग में।

चाँद छत पर ठहर देखता ही रहा
चाँद आग़ोश में चांद के रंग में।

एक दुलहिन हथेली रचाते हिना
सोचती है सपन क्या भरे रंग में।

रास का अर्थ तुम भी समझ जाओगे
”आओ रंग दें तुम्हें  इश्क  के रंग में।”

तिलक जी की एक ग़ज़ल हम कल भी सुन चुके हैँ, यह दूसरी ग़ज़ल है उनकी। मतला ही मानों श्रंगार रस से सराबोर होकर लिखा गया है। घनघोर श्रंगार का मतला। और अगला हुस्ने मतला भी प्रेम की अलग कहानी कह रहा है। सारे शहर किसी एक के रँग में रंग जाए तो क्या कहा जाए फिर। प्रेम से आध्यात्म की ओर जाता हुआ अगला शेर जिसमें श्याम के रंग में डूबी हुई राधिका से कवि पूछ रहा है कि क्या रखा है भला साँवले रंग में, उधो याद आ गए इस शेर को पढ़ कर।  हथेली पर हिना सजाती दुलहन की सोच कई अर्थ समेटे है आने वाले समय को लेकर अनिश्चितता के चलते। और अंतिम शेर में रास का अर्थ समझाने के लिए इश्क़ के रंग में रँगने का शेर ख़ूब बना है। बहुत सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह। 

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राकेश खंडेलवाल

आई होली पे तरही नयी इस बरस
आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में
और मैं सोचता सोचता रह गया
भाई पंकज हैं डूबे लगा भंग में

कौन सी तुक है आई समझ में नहीं
आज टेपा यहाँ इश्क करने लगे
सूरतो हाल का रंग सारा उड़ा
और वे इश्क का रंग भरने लगे
अब तो नीरज के, पंकज के कुछ शेर ले
हम भी कह देंगे सब एक ही संग में
जब खुमारी उतर जायेगी, तब  कहें
आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

इश्क की बोतलें आई गुजतात से ?
या कि गंगा किनारे सिलों पर घुटी
इश्क हम तब करेंगे हमें दें प्रथाम
चार तोले की लाकर के शिव की बुटी
पास में अपने कोई ना चारा बचा
आजकल जेब भी है जरा तंगमय
होलियों का चढ़े थोड़ा महुआ तो फ़िर
आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

अपने माथे पे हमने तिलक कर लिया
और सौरभ रखा टेसुओं का निकट
सज्जनों को दिगम्बर करे होलिका
सामने आ खड़ी है समस्या विकट
अश्विनी हो गई उत्तराफ़ाल्गुनी
आज पारुल भी, गुरप्रीत भी दंग हैं 
और नुसरत ने ये मुस्कुरा कर कहा
आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में

राकेश जी का यह गीत हमारे ब्लॉग परिवार को ही समर्पित है। होली के रंग लेकर आए हैं वे सबको हास्य के रंग में सराबोर करने के लिए। यही शिष्ट और शालीन हास्य तो होली की विशेषता होती है कविता में। राकेश जी ने उस रंग से हम सबको सराबोर कर दिया है। मिसरा ए तरह से लेकर क़ाफिया तक सभी को लपेट लिए हैं राकेश जी। जोगीरा सारारारा की धुन पर राकेश जी ने नीरज जी, सौरभ जी, तिलक जी से लेकर युवाओं तक सभी को रँग में रंग दिया है। उनकी कलम से चली हुई पिचकारी ने किसी को भी नहीं छोड़ा है। सबके माथे पर प्रेम से चंदन मिश्रित गुलाल उन्होंने लगा दिया है। बहुत ही सुंदर गीत हम सब इसके रंग में रंग चुके हैं। बहुत ही भावपूर्ण और सुंदर गीत क्या बात है वाह वाह वाह।

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अश्विनी रमेश

चाँद तारों भरी महफिले रंग नें
”आओ रंग दें तुम्हें  इश्क  के रंग में।”

मद भरा ये समां नाचे झूमे यहां
रम गये हम यहाँ यों नये रंग में

रंग में रँग गये हम किसी के यहां
खो गये अब नयन  मदभरे रंग में

होली आयी रे आयी रे होली ए हो
रँग के इक दूजे को नाचो रे रंग में

छेड़ दो रागिनी प्रेम की आज तो
खो सके  सुरमयी  बावरे रंग में

दौलते हुस्न के रंग तो  कम चढ़े
रँग गये हम मगर  सांवले रंग में

माफ़ करना हमें हो गये मस्त हम
रँग गये इस कदर हम तिरे रंग में

अश्विन जी ने बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है। पूरी ग़ज़ल होली के रंग में ही रँगी हुई है। होली के मूड को और ज़्यादा रंग में बढ़ाती हुई यह ग़ज़ल है। किसी के मदभरे रंग में रँग जाना ही तो होली होती है। मदभरे नयनों के रंग में जब कोई रंग जाता है तो उसके बाद ही तो होली होती है। होली में यही तो होता है कि हम एक दूसरे को रंग कर नाचते हैं गाते हैं और धमाल मचाते हैं। दौलते हुस्न के रंग हमेशा ही कम पड़ते हैं क्योंकि मन तो हमेशा ही साँवले रंग में रँगना चाहता है। यही तो असली रंग है। जो रंग मन पर चढ़ जाए वही असली रंग होता है जो तन पर चढ़ता है वह तो नकली रंग होता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह। 

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सुमित्रा शर्मा 

झूम हर तृण रहा फाग के रंग में    
बूटी ज्यों  घुल गई हो हरे रंग में

शीत में थीं विरह के जो धूसर हुईं
चाह बौरा गईं  फागुने  रंग में

छोड़ दो जोगिया और  वलकल  अभी  
आओ रंग दें तुम्हे इश्क के रंग में

ढाई आखर के रंग में जो डूबा यहां
रंग रहा वो हरिक दिन नए  रंग में

पास घर के तुम्हारे क्या पार्लर खुला
रोज़ तुम सज रही जो  नए  रंग में

रंग भरने की बिरियाँ वो कौली भरें
बेधड़क हो अनंग ज्यों घुले रंग में

केश चांदी हुए तो अलग रौनकें
गात उजला लगे इस पके रंग में

पार सरहद उड़े रंग ये इश्क का
जो न भीगे ज़मीं खून के रंग में

ये जुनूँ इश्क का इस क़दर तक बढ़े
सांस रँगने लगे सांवरे रंग में

वाह वाह क्‍या ही सुंदर ग़ज़ल कही है सुमित्रा जी ने आनंद ही ला दिया है । मतले में ही जो बात कही है कि किस प्रकार से फाग के रंग में हर तिनका झूम रहा है जैसे कोई भांग पी रखी हो। बहुत ही सुंदर। और गिरह का शेर तो शायद पूरे मुशायरे का सबसे ज़बरदस्‍त शेर बना है। जोगिया और वलकल को छोड़कर इश्‍क़ के रंग में रंगने की जो बात कही है वह बहुत ही ग़ज़ब कही गई है बहुत ही सुंदर। ढाई आखर के रंग में डूबने की बात भी अगले ही शेर में बहुत अच्‍छे से कही गई है। और यहां से अपने रंग में आते हुए हास्‍य का रस ग़ज़ल ने पकड़ लिया है घर के पास पार्लर का खुलना और रोज़ नए रंग में दिखना यह बहुत ही सुंदर प्रयोग है। अगले शेर में ग़ज़ल घनघोर श्रंगार में डूब जाती है रंग भरने की बिरियां वो कौली भरें, अहा आनंद ही आनंद और मिसरा सानी रहस्‍य को खोलता हुआ। फिर उसके बाद अगला शेर केश में चांदी घुल जाने के बाद भी उस रंग का आनंद ले रहा है पके रंग का आनंद उठा रहा है। अंतिम शेर भी श्रंगार के रंग को समेटे हुए बहुत ही खूब बन पड़ा है, सांस के सांवले रंग में रंगना वाह क्‍या बात है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है क्‍या बात है वाह वाह वाह।

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अनिता 'तहज़ीब'

आई होली सभी रँग गये रंग में
हैं मुलाकातों के सिलसिले रंग में

सुब्ह आई सँवर सुनहरे रंग में
शाम घुलने लगी साँवरे रंग में

रंग अपना ज़रा घोल दे रंग में
देखूँ कैसी लगूँ मैं तेरे रंग में

रंग उतरे न ताउम्र इसका कभी
"आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में"

द्वार आँगन हँसी कहकहे गूँजते
रँग गया फ़ाग भी मसखरे रंग में

रंग ही रंग आयें नज़र हर तरफ़
रँग गई ज़ीस्त उम्मीद के रंग में

कोई जादू ही आता है शायद तुझे
अब मेरे रतजगे हैं तेरे रंग में

चाँदनी छा गई हर गली बाम पर
चाँद भीगा हुआ प्रीत के रंग में

लाल पीला हरा जामुनी चम्पई
भर गई हैं बहारें नये रंग में

एक झोंका हवा का मिला पत्तों से
छाँव सजने लगी धूप के रंग में

अनीता जी ने हमारे ब्लॉग परिवार के बारे में कहीं पढ़ा और बस वे आ गईं इस मुशायरे में शामिल होने। उनका चित्र नहीं मिला तो एक छोटी बिटिया का चित्र लगाया जा रहा है। मतला बहुत ही सुंदर है मुलाक़ातों के सिलसिले ही तो होते हैं जो किसी भी त्योहार को त्योहार बनाते हैं। अगले दोनों हुस्ने मतला भी सुंदर बन पड़े हैं सुबह का सुनहरे रंग में रँगना और शाम का साँवले रंग में डूबना, सुंदर चित्र है। और अगला हुस्ने मतला तो कमाल है किसी से अपना रंग रँग में घोलने की चाह ताकि उसमें स्वयं को रँग कर देखा जा सके, वाह क्या बात है। उसके बाद गिरह का शेर भी बहुत ही सुंदर बना है। बहुत ही सुंदर शेर। एक और सुंदर शेर जिसमें ज़ीस्त का उम्मीद में रँग जाना और हर तरफ़ प्रेम ही प्रेम दिखाई देना चित्रित है। और एक शेर जिसमें जादू से रतजगे का रंग जाना बहुत ही कमाल का शेर है। सच में यही तो ग़ज़ल का शेर होता है। अंतिम शेर में भी बहुत नाज़ुक बात कही गई है जिसमें हवा के झोंके से पत्तों का मिलना और छाँव का धूप के रंग में रँगना। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है अनीता जी ने। वे इस ब्लॉग पर पहली बार आईं हैं उनका स्वागत है। बहुत सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वा​ह वाह वाह।

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मन्सूर अली हाश्मी

आज फिर आ गये हैं गधे रंग में
भाँग पी चल रहे हैं रँगे रंग में।

मार दें न दुलत्ती कि बचिये ज़रा
हैं गधे आज कुछ चुलबुले रंग में।

बच के रहना सखी आज होरी के दिन
रोड पर फिर रहे हैं गधे रंग में।

ए-ए करते हुए शब्द के सिर चढ़े
कैसे-कैसे मिले काफिये रंग में।

वोट के बदले मिलते यहाँ नोट हैं
अब गुलाबी, थे पहले हरे रंग में।

शब्द में, अर्थ में, गीत में, छन्द में
आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में।

प्रीत में, रीत में, सुर में, संगीत में
गुन गुनाऊँ तुम्हें हर नये रंग में।

'हाश्मी' केसरी तो कन्हैया हरा
मित्रता से बने हैं सगे रंग में।

हाशमी जी हास्य रस की ग़ज़लें कहते हैं, यह उनका ही रंग है। मतला ही गधे को प्रतीक बना कर हास्य के माध्यम से मानसिकता पर व्यंग्य कस रहा है। बहुत ही अच्छा मतला। अगले ही शेर में एक चेतावनी सामने आ रही है जन साधारण को सूचित करते हुए। दुलत्ती से बचने की समझाइश देते हुए। और अगले शेर में सखी अपनी सखी को चेतावनी दे रही है कि बच के रहना आज सड़क पर गधे अपने रंग में फिर रहे हैं। अगले शेर में तरही मिसरा के क़ाफिये को ही लपेट लिया है शायर ने और ख़ूबी यह कि ए-ए की ध्वनि के साथ लपेटा है तो हमारे काफिये की भी ध्वनि है और गधे का भी यही स्वर होता है। वाह। वोट के बदले मिलते नोट में गुलाबी और हरे रंग का प्रयोग मिसरा सानी में बहुत ही सुंदर हुआ है, यह शेर बहुत कमाल का हुआ है। और गिरह का शेर जिस प्रकार एकदम रंग बदल लेता है वह चौंका देता है, जिन चीज़ों से रँगना चाहता है कवि वह बहुत सुंदर है। इसके ठीक बाद का शेर भी इसी प्रकार के भाव लिए हुए है। कितने तरीक़े से प्रेमी अपने महबूब को गुनगुनाना चाहता है। और मकते का शेर तो अंदर तक भिगो देता है। बहुत ही सुंदर भावना से भरा हुआ शेर। क्या बात है बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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तो आप सबको होली की शुभकामनाएँ। आपके जीवन में रंग रहें, उमंग रहे, उल्लास हो और जीवन ख़ुशियों से भरा रहे हमेशा। आप यूँ ही खिलखिलाते रहें, जगमगाते रहें। दाद देते रहें। और इंतज़ार करते रहें भभ्भड़ कवि भौंचक्के का।

शनिवार, 11 मार्च 2017

होली है भइ होली है रंग बिरंगी होली है, आइये आज होली मनाते हैं अपने इन रचनाकारों के साथ आदरणीय नीरज गोस्वामी जी, पवन कुमार जी, तिलक राज कपूर जी, सौरभ पाण्डेय जी और मुस्तफ़ा माहिर के साथ मनाते हैं होली।

 होली है भइ होली है रंग बिरंगी होली है। मित्रो एक ओर होली सामने आ खड़ी हुई है। कल होली है और आज रात को होलिका दहन होना है। होलिका दहन के साथ ही हम होली के त्योहार के रंगों में डूब जाएँगे। हमारे यहाँ पर यह रंगों का त्योहार पूरे पाँच दिनों तक चलता है रंग पंचमी को रंगों का सबसे ज़्यादा हल्ला होता है। वैसे तो हमारे यहाँ मालवा में शीतला सप्तमी के साथ ही होली का समापन होता है। जब महिलाएँ जाकर होलिका दहन वाले स्थान पर पानी डाल कर होलिका की आग को ठंडा करके आते हैं। उस दिन घरों में ठंडा ही खाया भी जाता है। रात का बना हुआ बासी खाना। कुछ भी गरम नहीं खाया जाता है उस दिन। तो होली दहन से लेकर शीतला सप्तमी तक यह पूरा क्रम बना रहता है। आइये आज से होली के क्रम को प्रारंभ करते हैं।

आओ रंग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में
मित्रों इस बार का मुशायरा कठिनाई पर विजय का मुशायरा है। सभी रचनाकारों ने एक कठिन क़ाफिया बहुत अच्छे से निभा लिया है। तो आइये आज आदरणीय नीरज गोस्वामी जी, पवन कुमार जी, तिलक राज कपूर जी, सौरभ पाण्डेय जी और मुस्तफ़ा माहिर के साथ मनाते हैं होली।
 पवन कुमार
 
हुस्न को देख लें इश्क़ के रँग में
आओ रंग दें तुम्हें इश्क़ के रँग में

एक धनक सी बिखरती रहे आस पास
शेर कहते रहें इश्क़ के रँग में

दिल के अंदर थीं दुनिया की बेचैनियाँ
मिल गयीं राहतें इश्क़ के रँग में

बेक़रारी, जुनूँ और दीवानगी
बेख़ुदी, वहशतें इश्क़ के रँग में

पानियों पर नया रँग चढ़ता हुआ
भीगती बारिशें इश्क़ के रँग में

कोई करवट बदलता रहा रात भर
पड़ गयीं सिलवटें इश्क़ के रँग में

दिल को पागल बनाये सदा मोर की
कूकती कोयलें इश्क़ के रँग में

सबको पैग़ाम चाहत का देते रहें
सारी दुनिया रंगें इश्क़ के रँग में
पवन जी का मैसेज आया कि भाई ग़फ़लत में रदीफ़ कुछ बड़ा चयन कर लिया है। मैंने कहा कोई बात नहीं मिसरा तो वही है। तो उन्होंने इश्क़ के रंग में को रदीफ़ बना कर ग़ज़ल कही है। गुणी शायर हैं तो उनकी ग़ज़ल में भी उनका रंग दिख रहा है। मतला ही इतना ख़ूब है कि बस, रवायती शायरी का एक सुंदर उदाहरण। इश्क़ अपने रंग में रँग कर हुस्न को देखना चाहता है। एक धनक का बिखरना और उसके ही रंग में शेर कहते रहना, यही तो हर कवि की इच्छा होती है हर शायर की चाहत होती है। ख़ूब शेर। दिल के अंदर दुनिया की बेचैनियों को समेट कर इश्क़ के रंग में राहतें हर रचनाकार तलाशता है, उसे पवन जी ने बहुत ही सुंदर तरीक़े से व्यक्त किया है। बेक़रारी, जुनूँ, दीवानगी मतलब इश्क़ के सभी तत्वों को समेटे है शेर। बारिशों का भीगना और पानियों पर इश्क़ का रंग चढ़ना बहुत ही सुंदर शेर है। लेकिन जो शेर ठक से दिल पर आ लगता है वह है कोई करवट बदलता रहा रात भर… उफ़ क्या मिसरा सानी लगाया है, ग़ज़ब ग़ज़ब। और उतना ही सुंदर है अंतिम शेर दुनिया भर में प्रेम का संदेश फैलाने को लेकर की गई एक दुआ एक प्रार्थना। आमीन, ईश्वर इसे सच करे। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।
नीरज गोस्वामी
 
झुर्रियाँ क्या छुपीं फाग के रंग में
हम जवाँ-से ठुमकने लगे रंग में  

इन गुलालों से होली बहुत मन चुकी 
आओ रँग दें तुम्हें इश्क के रंग में

तल्खियाँ हों नदारद अगर खुश रहें  
तू तेरे रंग में, मैं मेरे रंग में 

बात कुछ तो फ़िज़ाओं में फागुन की है
हर कोई लग रहा है मुझे रंग में

कोई चाहत कभी कोई कोशिश न की
जो मिला हम उसी के रँगे रंग में  

उन सियारों के सिक्के चले तब तलक
जब तलक रह सके वो छुपे रंग में
 

बिन तेरे रंग में रंग “नीरज”  न था 
यूँ रँगा था सभी ने मुझे रंग में
मतला तो उसी रंग में है जिसको कि रंग-ए-नीरज कहा जाता है। अपने आप को सदा जवान मानने का रंग। उम्र को हराने का रंग। बहुत सुंदर। उसके ठीक बाद​ गिरह का शेर भी ख़ूब बना है। सचमुच जीवन में प्रेम के आने से पहले ही खेली जाती है गुलाल से होली, उसके बाद तो इश्क़ का ही रंग चलता है। वाह। और अगला ही शेर सारी तल्ख़ियों को एक दूसरे के रंग घोल कर बहा देने का इतना अच्छा संदेश दे रहा है कि उसे पूरी दुनिया में प्रसारित करने की इच्छा हो रही है। बहुत ही सुंदर शेर है। कोई चाहत कभी कोई कोशिश न की में मिसरा सानी बहुत ही सुंदर भावना लिए हुए है। सच में यदि हम हर किसी के रंग में अपने आप को रँगने का हुनर सीख जाएँ तो जीवन कितना आसान हो जाएगा हमारे लिए। लेकिन हम तो अपने रंग में दूसरों को रँगना चाहते हैं। उन सियारों के सिक्के चले एक गंभीर व्यंग्य समेटे है। लोक कथा को साहित्य में उपयोग करने का अनुपम उदाहरण। यह एक बड़ी कला होती है। और उसके बाद मकते का शेर भी बहुत गहरी बात कह रहा है सच तो यही है कि हमें दुनिया के सारे रंग लगा दिये जाएँ तो भी रंग तो हम पर किसी एक का ही चढ़ता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है, क्या बात है वाह वाह वाह।
तिलक राज कपूर
 
इस तरफ़ बदनसीबी खिले रंग में
उस तरफ़ खुशनसीबी दबे रंग में।

नोटबुक के सभी वर्क़ कोरे थे पर
देखिये खिंच गये हाशिये रंग में।

आप कोरे हैं दिल के सुना था मगर
आपने भी लिखे फै़सले रंग में।

श्वेत भी है मगर देखते वो नहीं
ग़ुम सियासत हरे गेरुए रंग में।

सुब्ह‍ लायेंगे कैसे नयी वो कहो
जिनकी खुशियाँ हैं अँधियार के रंग में।

ज़ेह्न में रात भर प्रश्न उठते रहे
कुछ के उत्तर दिखे अनसुने रंग में।

जि़न्दगी से शिकायत बहुत हो चुकी
देखिये हर नया पल नये रंग में।

देख अत्फ़ाल की मस्तियों को कभी
खेलते धूप में, धूल के रंग में।

अर्थ दीवानगी का समझ जाओगे
”आओ रंग दें तुम्हें इश्क के रंग में।”
इस तरफ़ बदनसीबी और उस तरफ़ ख़ुशनसीबी के दबे और खिले रंग का प्रतीक तिलक जी ने अपने ही तरीक़े से उपयोग किया है जिसके लिए वह मशहूर हैं। मतला ही बहुत सुंदर बना है। नोटबुक के कोरे वर्क़ और हाशियों का रंग में होना यह एक गम्भीर पोलेटिकल शेर है जिसे ध्यान से समझे जाने की आवश्यकता है। अगला ही शेर एक बार फिर पोलेटिकल रंग लिए हुए है, भले ही वह ऊपर से प्रेम का शेर दिख रहा हो किन्तु है वह भी सुंदर पोलेटिकल शेर। श्वेत रंग पर किसी की नज़र नहीं पड़ना हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है जिस पर किसी की नज़र पड़े न पड़े किन्तु शायर की तो पड़ेगी ही। और देश के किसानों, मज़दूरों के लिए समर्पित शेर जिनकी ख़ुशियाँ हैं अँधियार के रंग में, बहुत अच्छा शेर। मकते के ठीक पहले के दोनों शेर एक दम जीवन की सकारात्मकता की ओर ले चलते हैं। यही तो कविता होती है जो विडम्बनाओं की बात करते-करते सकारात्मक हो जाए। बच्चों की मस्तियों को देख कर हम सब जीवन को जीने का तरीक़ा सीख सकते हैं। वे जिस प्रकार धूल और धूप में खेलते हैं उससे सीखा जा सकता है।  गिरह को मकते में बहुत ही सुंदर तरीक़े से लगाया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह क्या ही ख़ूब ग़ज़ल।
सौरभ पाण्डेय

दिख रहे थे अभी तक उड़े रंग में
सुर लगा फाग का.. आ गये रंग में

गुदगुदाने लगी फुसफुसाहट, उधर
मौसमों के हुए चुटकुले रंग में

ताकि मुग्धा हुई तुम पुलकती रहो 
आओ रँग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में

वो न आयेगा दर पे हमें है पता
अल्पना हम सजाते रहे रंग में

खेत किसको सुने किसको आगोश दे
फावड़े और फंदे दिखे रंग में 

मुट्ठियाँ भिंच गयीं, दिल दहकने लगा 
इस तरह गाँव के दल दिखे रंग में

फिर यही सोच कर थम गयीं सिसकियाँ
या खुदा, फिर खलल मत पड़े रंग में
मतला होली के रंग को ख़ूब समेटे हुए है। सच में यही तो होता है, हम सब जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे होते हैं और अचानक ही फाग का सुर लगता है और हम सब रंग में आ जाते हैं। बहुत ही सुंदर मतला। और अगले ही शेर में फुसफुसाहट के गुदगुदाहट तथा मौसमों के चुटकुले, एक पूरा का पूरा शब्द चित्र सामने बन जाता है आँखों के। अगले शेर में मुग्धा और पुलकित जैसे शब्द ग़ज़ल के सौंदर्य में कई गुना वृद्धि कर रहे हैं, यही होता है भाषा का सौंदर्य। अगला शेर निराशा के बीच आशा की अल्पना सजाते रहने की भावना लिए हुए है। प्रेम में इंतज़ार का अपना महत्व होता है, हम कई बार यह जानते हुए भी इंतज़ार करते हैं कि आने वाले को नहीं आना है। अगले दोनों शेर विडम्बना की बात करते हैं, जो हमारे समय की विडम्बना है। खेत में किसानों की आत्म हत्या और दूसरी और गाँव तक सांप्रदायिकता की भावना का पहुँच जाना यह हमारे समय की सबसे बड़ी समस्याएँ हैं, जिन पर शायर ने अपनी चिंता व्यक्त की है। केवल शायर, कवि  ही तो चिंतित होता है। और अंतिम शेर में सिसकियों का थम जाना एक दुआ के साथ कि फिर कभी ख़लल न पड़े रंग में । बहुत ख़ूब। क्या बात है बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है वाह वाह वाह।
 
मुस्तफ़ा माहिर

ऐसे जीना भी क्या बेसुरे रंग में।
आओ रंग दें तुम्हें इश्क़ के रंग में।

रंग असली तेरा कौन सा है बता
हर दफ़ा तू दिखे है नऐ रँग में।

प्यार गहराया ऐसा कि दिखने लगा
तू मेरे रंग में मैं तेरे रंग में।

तुझपे फबती हैं तेरी जफ़ाएं फ़क़त
तू लगे है बुरा दूसरे रंग में।

ज़िन्दगी सबकी बेरंग तस्वीर है
जो रँगी जाए अच्छे बुरे रंग में।

पूछते हो तो कह दूँ जचे है बहुत
तुमपे पटियाला वो भी हरे रंग में।
मुस्तफ़ा बहुत दिनों बाद हमारे तरही मुशायरे में शामिल हुए हैं। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल लेकर आए हैं वे। मतला ही कुछ अलग तरीक़े से कहा गया है कि जो कुछ भी प्रेम में नहीं है, इश्क़ में नहीं है वो बेसुरे रंग में ही होता है। जो इश्क़ के रंग में रँग जाता है वो सुर में आ जाता है। और अगले ही शेर में जो प्रश्न है कि रंग असली तेरी कौन सा है बता, बहुत ही सुंदर तरीके से बातचीत के लहजे में शेर को बाँधा है। मासूमियत के साथ। ख़ूब्र। और प्यार के बढ़ने का वही असर जिसमें हम एक दूसरे के रंग में ही दिखने लगते हैं। प्रेम यही तो होता है जिसमें एक दूसरे के रंग में हमें रंग दिया जाता है। लेकिन जफ़ाओं वाला शेर तो एकदम रवायती रंग लिए हुए है। ग़ज़ल के रवायती रंग में रँगा हुआ है यह शेर। तू लगे है बुरा दूसरे रंग में वाह क्या बात है ग़ज़ब। उस्तादाना अंदाज़ में कहा गया है यह शेर, कमाल का शेर। ज़िंदगी की बेरंग तस्वीर में अच्छे और बुरे रंग लगना सूफ़ियाना शेर है अचछा बना है। और अंत का शेर तो बहुत ही ग़ज़ब बन पड़ा है। हरे रंग के पटियाला सूट में महबूब को देखना और वो भी शायर की नज़र से, क्या बात है एकदम कमाल का शेर है यह। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है भाई। क्या बात है वाह वाह वाह।
वाह वाह आज तो सभी रचनाकारों ने मिलकर बहुत ही ख़ूब रंग जमाया है। ऐसी ग़ज़लें जिनको बार-बार पढ़ा जाए तो भी कम। उस्तादों के रंग में ग़ज़लें कहीं हैं सभी ने। तो आपका भी काम बढ़ गया है दाद देने का। जितनी सुंदर ग़ज़लें है उतनी ही अच्छी दाद भी दी जानी चाहिए। तो देते रहिए दाद।