Tuesday, 1 January, 2008

अजय कनोडिया जी की दो ग़ज़लें जिनकी बहरों के बारे में तो क्‍या कहा जाए मगर आज सब कुछ माफ है क्‍योंकि खुश है जमाना आज पहली तारीख है

ajay kanodia

1

नया साल जब आता है, मन खुशियों से भर जाता है
और गीत पुराना सा कोई, एक नज्म नई बन जाता है

नया साल आएगा जब, नया सवेरा भी होगा
सोच यहीं देहलीज पे ही भोलू भूका सो जाता है

नया साल यह सुखमय हो, आशाए सबकी पूरी हो
हम भी खुश हो तुम भी खुश हो, मन बार बार दोहराता है

2

चलो फिर दिल से कह दें के, नया कोई गीत ये गाए
बहारों कुछ करो ऐसा, हर कली फूल बन जाए

मिटा दी नाफ्रतें दिल से, मेरा दिल है बहुत खाली
चलो कुछ ढूंढ के लाये बसाए प्यार के साए

चलो फिर दिल से कह दें के, नया कोई गीत ये गाए
बहारों कुछ करो ऐसा, हर कली फूल बन जाए

मिटा दी नाफ्रतें दिल से, मेरा दिल है बहुत खाली
चलो कुछ ढूंढ के लाये बसाए प्यार के साए

खुशी ढूंढी ज़माने में, खुशी इतनी मिली हमको
बड़ा मुश्किल था तय करना किसे खोए किसे पाए

बहुत ही ख़ूबसूरत है, सुनो जीवन की ये राहें
अगर हम ठान ले मन में यहाँ जन्नत उतर आए

अजय कनोडिया

2 टिप्पणियाँ:

अजय कानोडिया said...

सर जी

सबसे पहले तो नया साल मुबारक आपको भी और क्लास में उपस्थित अन्य मित्रों को भी |

और जहाँ तक ग़ज़ल में गलतियों का सवाल है , होम वर्क पुरा करने के लिए जल्दी में जो भी बना वह भेज दिया |
एक बार फिर क्षमा चाहता हूँ गलतियों के लिए, पर इससे यह बात साफ हो गई है की, बहरो के बारे में सबसे ज्यादा ज्ञान की जरूरत मुझे है, आशा है अब यह इंतज़ार जल्द ख़त्म हो जाएगा

आभार

अजय

Devi Nangrani said...

काश हमारी सोच साकार हो पाती

बहुत ही ख़ूबसूरत है, सुनो जीवन की ये राहें
अगर हम ठान ले मन में यहाँ जन्नत उतर आए.

निराशा में आशाओं के दीपक जलाओ
Ajay prayas positive hai yahi kya kam hai.

देवी नागरानी