बुधवार, 28 दिसंबर 2011

इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में, विदा ले रहा है वर्ष 2011 और आने को है 2012, तो आइये स्‍वागत करें इस बीस बारह का ।

विगत का विदा देना और आगत का स्‍वागत करना जीवन इन दोनों घटनाओं से ही मिल कर बनता है । जीवन का आनंद ही इसमें, यही तो जीवन रस हैं । कहते हैं हमारा शरीर पांच रसों से मिल कर बना है कड़वा, मीठा, खट्टा, खारा और तीखा । आयुर्वेद कहता है कि किसी भी रस की यदि कमी हो जाये या अधिकता हो जाये तो बीमारी हो जाती है । इसीलिये बूढ़े सयाने कहते थे कि नीम की पत्‍ती, करेले और मेथी दाने भी खाते रहना चाहिये । उससे शरीर में कड़वे रस की मात्रा बनी रहती है । वे कहते थे कि भोजन की थाली में सभी रस होने चाहिये, कुछ मीठा हो, कुछ नमकीन हो, कुछ तीखा हो, कुछ खट्टा हो और कुछ कड़वा भी हो । मगर हम आजकल ऐसे हो गये हैं कि हमारी थाली में रसों का संतुलन ही नहीं है । ठीक उसी प्रकार हमारे जीवन में भी रसों का संतुलन नहीं है । हम उन्‍हीं रसों को चाहते हैं जो हमें अच्‍छे लगते हैं उन रसों को नहीं चाहते जो हमारे लिये अच्‍छे हैं । मीठा हमें अच्‍छा लगता है और कड़वा हमारे लिये अच्‍छा है । खैर चलिये बात को आगे बढ़ाते हैं ।

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स्‍व. श्री रमेश हठीला जी

गुरू साहब ( इसी नाम से पुकारता था पूरा शहर उनको ) के नाम के आगे स्‍वर्गीय लगाते हुए कलम कांपने लगती है । जिंदगी से भरे हुए इन्‍सान के नाम के आगे कोई कैसे स्‍वर्गीय लगा दे । जन्‍म से केवल एक किडनी, हृदय की जबरदस्‍त बीमारी और तिस पर ये कि मजाल जो कभी अपनी शुगर को 200 से नीचे उतर आने दें । अर्थाभाव के कारण कक्षा आठ से अधिक नहीं पढ़ पाये, लेकिन भले ही स्‍कूल कालेज की शिक्षा अधूरी रह गई हो किन्‍तु पढ़ना लिखना कभी नहीं छोड़ा । स्‍वाभिमान ऐसा कि जब किसी मित्र ने दौड़ भाग करके मुख्‍यमंत्री सहायता कोष से बीमारी के उपचार के लिये एक लाख रुपये स्‍वीकृत करवा दिये तो चैक को धन्‍यवाद के पत्र के साथ कलेक्‍टर को वापस कर आये । शिवना संस्‍था की आत्‍मा थे वे । सारे कार्यक्रम एक उनके खड़े रहने से हो जाते थे । और अब जब वे नहीं हैं तो पिछले एक साल से सब कुछ मानो थम सा गया है । वे जनकवि थे । जनकवि इस मामले में कि वे लगातार दस सालों तक प्रतिदिन एक स्‍थानीय समाचार पत्र में कुडलियां लिखते रहे । और कुंडलियां भी कैसीं, शहर की समस्‍या, अफसरों के भ्रष्‍टाचार और नेताओं की अकर्मण्‍यता के खिलाफ ।खूब विरोध सहा किन्‍तु लिखते रहे । जनता की आवाज़ को अपनी क़लम से उतारते रहे । प्रेम और विद्रोह ये उनकी कविताओं के स्‍थाई भाव थे । उनकी एक ग़ज़ल यहां प्रस्‍तुत है ।

प्यार से तेरा अभी परिचय नहीं है
ये समर्पण है कोई विनिमय नहीं है
मात्र मोहरे हैं सभी शतरंज के हम
मौत कब हो जाये ये निश्चय नहीं है
मत उड़ाओ भावानाओं की हंसी तुम
प्यार मेरा प्यार है अभिनय नहीं है
इस जहाँ की ऑंधियों से मत डराओ
प्यार तो वट वृक्ष है किसलय नहीं है
प्यार शाश्वत सत्य शिव, सुन्दर, सनातन
रूप यौवन कोष तो अक्षय नहीं है
जो मिला उनमुक्त हाथों से लुटाओ
अर्थ जीवन का कभी संचय नहीं है

इस बार का तरही मुशायरा श्री रमेश हठीला जी की पुण्‍य स्‍मृतियों को ही समर्पित है । और जैसा कि पहले बताया है कि इस बार दो मिसरे हैं

इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गांव में

दोनों में से जो भी आपको पसंद आये आप उस पर अपनी ग़ज़ल कह सकते हैं । काफी ग़जलें आ चुकी हैं । और जो आईं हैं वे यक़ीनन काफी बेहतरीन हैं । इस बार का रदीफ 'है अभी तक गांव में' लिखने वालों के लिये एक सुंदर चुनौती है कि मुझे बांध सको तो बांध लो । सुंदर इसलिये कि इस रदीफ पर बहुत सुंदर प्रयोग हो सकते हैं । अभी तक जो ग़ज़लें मिली हैं वे बहुत सुंदर हैं और विविधता लिये हुए हैं । जिन लोगों ने अभी तक ग़ज़लें नहीं भेजी हैं वे कृपया 5 जनवरी तक भेज दें ताकि हम सही समय पर मुशायरे को शुरू कर सकें ।

और सीहोर आइये ठंड के मौसम में आपको आंगन में अमरूद के पेड़ के नीचे झूले पर बिठा कर चूल्‍हे की गरम गरम ज्‍वार की रोटियां टमाटर की चुर्री की साथ खिलाईं जाएंगीं और साथ में ताजे अमरूद भी । ( टमाटर की चुर्री की रेसिपी - एक बर्तन में पका टमाटर साबुत डालो, साथ में साबुत हरी मिर्ची, हरा धनिया, नमक, अब थोड़ा सा पानी डाल कर सामग्री को हाथों से मसलना शुरू कर दो, चूर डालो, जब पूरी तरह से चूर दो तो समझो चुर्री हो गई तैयार । और हां उसमें दिमाग बिल्‍कुल मत लगाओ । )

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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में या कुछ पु‍राने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में - स्‍व. रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा ।

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स्‍व. रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

इस बार के तरही मिसरे को लेकर काफी सकारात्‍मक प्रतिक्रियाएं मिली हैं । सभी को इस बार के दोनों ही मिसरे बहुत पसंद आए हैं । अब देखना ये है कि पसंद आने के बाद कितने अच्‍छे शेर कहे जाते हैं । वैसे अभी पहले ही सप्‍ताह में दो ग़ज़लें प्राप्‍त हो भी चुकी हैं । इससे पता चलता है कि इस बार का मिसरा ए तरह लोगों को बहुत ही पसंद आया है । इस बार के मिसरे में एक प्रकार की रवानगी है जो कुछ तो एक बहुत ही उम्‍दा बहर होने के कारण और फिर उतने ही सरल क़ाफि़यों के कारण और प्रवाहमान हो गई है । तिस पर उसका रदीफ मिसरे के सौंदर्य को दोबाला कर रहा है । लेकिन इस बार की ग़ज़ल कहने के लिये सबसे अधिक जो चीज़ ज़ुरूरी है वो है संवेदनशीलता, वो नास्‍टेल्जिया जो आपको बार बार अपनी जड़ों की ओर खींचता है । मुझे लगता है कि इस बार के मिसरे पर प्रवासी ग़ज़लकार बहुत सुंदर शेर निकाल सकते हैं, इसलिये क्‍योंकि उनका नास्‍टेल्जिया बहुत गहरा होता है । हम तो अपने गांव जाकर देख आते हैं किन्‍तु वे तो अब उससे भी दूर हैं ।

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इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में

कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में

तरही मुशायरा दोनों ही मिसरों पर होगा 'इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में' और 'कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में' किसी भी एक मिसरे को लेकर ग़ज़ल कहनी है । ‘ई’ की मात्रा (बाक़ी, होती, रहती, उड़ती, आती, चलती) को क़ाफि़या बनाना है और 'है अभी तक गांव में' या 'हैं अभी तक गांव में' को रदीफ । ज़ाहिर सी बात है कि पहले मिसरे में बात एकवचन में होगी और दूसरे में बहुवचन में ।

एकवचन :

झूम के बरसात आती है अभी तक गांव में

कोकिला मल्‍हार गाती है अभी तक गांव में

बहुवचन :

बारिशें लहरा के आती हैं अभी तक गांव में

कोयलें मल्‍हार गाती हैं अभी तक गांव में

बहर तो सीधी है 2122-2122-2122-212 ( बहरे रमल मुसमन महजूफ) यथा रामसीता-रामसीता-रामसीता-रामरे या सर झुकाओगे तो पत्‍थर देवता हो जायेगा । 13 जनवरी को श्री रमेश हठीला जी की प्रथम पुण्‍यतिथि पर ये मुशायरा होना है । तो रचनाएं 7 जनवरी के पूर्व भेजनी होंगीं । यदि हो सके तो एक शेर श्री रमेश हठीला जी को श्रद्धांजलि स्‍वरूप अवश्‍य कहें । जहां तक क़ाफियों का प्रश्‍न है तो उसके लिये तो ख़ज़ाना भरा पड़ा है मिलती, आती, जाती, बाकी, बैठी, लड़की, बूढ़ी, बच्‍ची, मिट्टी, चक्‍की, सौंधी, खिलती, चलती, उड़ती, कच्‍ची, नानी, दादी, आदि आदि आदि । हर वो शब्‍द जिसका वज्‍़न 22 है तथा जो ई पर समाप्‍त हो रहा है वो हमारा काफिया है । या फिर हर वो शब्‍द जिसका वज्‍़न 122 है जैसे निभाती, उड़ाती, मिलाती, सुहाती, पकड़ती, सुलगती, तो वो भी हमारा काफिया हो सकता है । या फिर जिसका वज्‍़न 2122 है जैसे सांझबाती तो वो भी काफिया हो सकता है । तो बात वही कि काफियों का तो अंबार है इस बार । और रदीफ के साथ निर्वाहन भी बहुत मुश्किल नहीं है । तो चलिये उठाइये क़लम और कह डालिये एक शानदार ग़ज़ल ।

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यादें 10 दिसंबर की

आज कुछ फोटो जो अचानक ही इस बार 10 दिसंबर को निकल आये । दस दिसंबर को चंद्र ग्रहण था और साथ ही थी शादी की सालगिरह भी । पुराने फोटो देखना भी अपने आप में एक पूरी यात्रा होती है । यात्रा जो स्‍मृति के गलियारों से होती हुई जाने कहां कहां चली जाती है । तो आइये आप भी देखिये वो चित्रमय झांकी ।

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एक पारंपरिक शादी जो बिल्‍कुल किसी फिल्‍म की तरह थी ।

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अत्‍याधिक ठंड हो जाने के कारण रजाई ओढ़ कर फेरे लिये थे ।

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भतीजा अभिमन्‍यू जो मेरा बहुत लाड़ला है ।

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नये सफर की शुरूआत

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दोनों फोटो के बीच में बरसों का अंतर है ।

इच्‍छा तो और भी बहुत फोटो दिखाने की हो रही है लेकिन फिर अपना ही लिखा एक व्‍यंग्‍य लेख याद आ रहा है 'बोर करता जीवन' जो कि बरसों पहले दैनिक भास्‍कर में छपा था । उसमें लिखा था कि इन लोगों के घर कभी मत जाओ पहला जिसके घर अभी अभी कोई शादी हुई हो ( अगला एल्‍बम और सीडी दिखा दिखा कर पकाएगा ) । दूसरा जिसके घर अभी कोई बच्‍चा स्‍कूल जाना शुरू किया हो उसके घर मत जाओ ( अगला जानी जानी तथा टिवंकल टि्विंकल सुना सुना कर पकाएगा ) । सो मैं भी क्‍यों पकाऊं आपको अपनी शादी की तस्‍वीरें दिखा दिखा कर । आपका ग़ज़ल कहने का बनता हुआ मूड और बिगड़ जायेगा ।

तो देर किस बात की चलिये गुलाबी सर्दियों में अपने गांव को याद करके कह डलिये ख़ूबसूरत सी एक ग़ज़ल ।

 

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

एक माह का अंतराल बीच में हो गया है । दीपावली के तरही मुशायरे का ख़ुमार अब उतर चुका है सो आइये कुछ और बात करें ।

दीपावली का तरही मुशायरा बहुत ही सफलता के साथ पूरा हुआ । इस बीच बहुत दिनों से ब्‍लाग पर कुछ भी नहीं लगाया गया । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के कुछ लिखना चाह रहे थे लेकिन कुछ नहीं लिख पाये । और बस यूं ही होता रह गया । इस बीच ये हुआ कि फेसबुक पर अक्‍सर कुछ न कुछ होता रहा । और बस यूं लगा कि मित्रों से संपर्क तो हो ही रहा है । इस बीच देखा कि दिसंबर भी आ चुका है और अब तो नया साल भी दहलीज पर आकर खड़ा हो गया है । तो लगा कि कुछ हो जाये ।

पिछले दो दिनों से कुछ व्‍यस्‍तता रही । पहले तो बात इन्‍दौर की हो जाये । रविवार को इन्‍दौर जाना हुआ । वहां की लेखिका श्रीमती ज्‍योति जैन के कविता संग्रह में मुख्‍य अतिथि के रूप में बुलाया गया था । अच्‍छा लगा ये जानकर कि लोग अब इस योग्‍य समझने लगे हैं कि मुख्‍य अतिथि या मुख्‍य वक्‍ता के रूप में बुलाएं । ज्‍योति जी के पूर्व में दो कहानी संग्रह आ चुके हैं तथा ये तीसरी पुस्‍तक उनकी आई है । जब मंच पर जाकर बैठा तो वहां से जिन लोगों पर नज़र पड़ी श्रोताओं में वो सब साहित्‍य के दिग्‍गज बैठे थे । आदरणीय सरोज कुमार जी ( जिन्‍होंने मेरी कहानियां छाप छाप कर मुझे यहां तक पहुंचाया ), दादा चंद्रसेन विराट जी, दादा नरहरि पटेल जी, पुरुषोत्‍तम दुबे जी, प्रभु जोशी जी और ऐसे ही कितने ही नाम । वे सब जो दिग्‍गज हैं वे सब श्रोताओं के रूप में बैठे थे और मैं मुख्‍य अतिथि के रूप में मंच पर था । क्‍या बोलता और कैसे बोलता । वे लोग जिनको तब से पढ़ रहा हूं जब लिखना आता तक नहीं था, वे श्रोता बने सामने बैठे थे । खैर जैसे तैसे जो कुछ बोल सकता था बोल दिया । कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता ये थी कि कार्यक्रम अपने निर्धारित समय पर ठीक घड़ी की सुइयों के हिसाब से शुरू हुआ और समय से दस मिनिट पहले समाप्‍त हो गया ( क्‍योंकि अध्‍यक्ष और मुझे 20-20 मिनिट बोलना था और हम 15-15 मिनिट ही बोले ।) ।

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और फिर उसके बाद दूसरा कार्यक्रम जो कि वहीं पास के दूसरे सभागृह में होना था । उसमें मध्‍यप्रदेश लेखक संघ द्वारा मेरा सम्‍मान तथा मेरा एक छोटा सा भाषण होना था । वहीं उसी कार्यक्रम में श्री मुकेश तिवारी जी से पहली बार मुलाकात हुई । कार्यक्रम के पूर्व चर्चा के दौरान दादा चंद्रसेन विराट जी ने कहा -पूरा भाषण ग़ज़ल विधा पर ही देना है । मैं एक बार फिर से दुविधा में पड़ गया । खैर जैसे तैसे करके नैया पार हुई । कुछ बीच में बहस और प्रश्‍नोत्‍तर की स्थिति भी बनी । जो मेरा ज्ञान था उस अनुसार मैंने उत्‍तर दिये । हां वहां इता पर भी मैंने अपनी राय व्‍यक्‍त की और उर्दू हिंदी को लेकर काफी कुछ कहा । काफी कुछ जो विवाद खड़े करने वाला हो सकता था । दूसरे दिन उसी सब को समाचार पत्रों ने प्रकाशित भी किया ।

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और फिर देर रात तक वापसी हुई इन्‍दौर से । फिर अगले दिन बरसों बाद अपने ननिहाल जाना हुआ । मेरा ननिहाल भोपाल से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है दिल्‍लोद नाम का । बरसों बाद वहां जाना हुआ । अपने खेत देखे । वो खेत जो अब अपने नहीं रहे । मन बहुत दुखता है ऐसी जगहों पर जाकर । दिन भर वहां रहना हुआ । नानी से और बाकी सबसे मिलना जुलना होता रहा ।

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वहीं पर एक मिसरा बना दिमाग में ''कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हैं अभी तक गांव में''  और लगा कि मिसरा तो ठीक है  और इस पर एक तरही मुशायरा तो करवाया ही जा सकता है । तरही मुशायरा जो कि श्री रमेश हठीला जी की स्‍मृतियों को समर्पित हो । जिनकी पुण्‍यतिथि 13 जनवरी आने ही वाली है । आप क्‍या कहते हैं । क्‍या इस मिसरे पर जिसमें ई की मात्रा को ( बाकी ) क़ाफिया बनाया जाये और 'हैं अभी तक गांव में'' को रदीफ बना कर काम किया जाये । बहर तो बहुत सीधी है । हां ये हो सकता है कि कुछ लोगों को बहुवचन से परेशानी हो और वे एकवचन में काम करना चाहें 'इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में'' जैसा कुछ । बताइये कि क्‍या किया जा सकता है । ये भी हो सकता है कि दोनों मिसरों पर काम हो । जिसको एकवचन के साथ सहजता लग रही हो वो एकवचन पर काम करे और जिसे बहुवचन पर काम करना हो वो उस प्रकार करे ।

और अंत में एक बात ये कि दूसरों की तरह मुझे भी धनुष द्वारा गाया गया गीत कोलावरी बहुत बहुत पसंद आया है । उसकी बीट्स के कारण । कई बार सुन चुका हूं और अभी भी सुन रहा हूं ।

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गुरुवार, 3 नवंबर 2011

दीपावली का तरही मुशायरा पिछले सभी मुशायरों में सबसे सफल आयोजन रहा है । आज सुनिये श्री तिलकराज जी की तीन ग़ज़लें ।

दीपावली का मुशायरा अपनी पूरी सफलता के साथ गुजरा है । जिस प्रकार लोगों ने बढ़ चढ़ कर कमेंट किये और जिस प्रकार से लोगों ने ग़ज़लें कहीं उससे ये तो तय हो गया कि अब ये ब्‍लाग एक कम्‍यूनिटी ब्‍लाग बन चुका है । ये सबका है । जिस प्रकार से लम्‍बी लम्‍बी विस्‍तृत टिप्‍पणियां आईं उससे मुशायरे का आनंद दुगना हो गया । और अब पूरे मुशायरे की एक पीडीएफ पत्रिका डिज़ाइन की जा रही है । प्रयास ये किया जा रहा है कि पत्रिका भी मुशायरे की ही तरह से जानदार और शानदार हो । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के अभी ग़ज़ल कह नहीं पाये हैं सो आज तिलक जी की ये तीन ग़ज़लें समापन की घोषणा हैं । और हां भभ्‍भड़ कवि को छोड़ा नहीं जा रहा है वे जल्‍द ही अपनी ग़ज़ल के साथ आएंगे ।

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( भाई दूज के तिलक के बाद परी और अंकित में मिठाई को लेकर जारी बहस )

Tilak Raj Kapoor 

श्री तिलक राज कपूर जी

तरही तो नहीं लेकिन एक प्रयास किया है मिलता जुलता। इस प्रयास में काफि़या दुगन में प्रयोग किया है और इस प्रकार कि काफि़या का शब्द दोनों जगह एक ही रखा है।
दूसरी पंक्ति की अदायगी कुछ यूँ है कि: फ़ायलातुन्, मफ़ा के बाद विराम लेकर यलुन् फ़ालुन् पढ़ना है। इसमें अगर कोई प्रयोग आपत्तिजनक है तो जानना चाहूँगा। 'झरे' का प्रयोग देशज रूप में है जैसा कि नीरज साहब ने 'स्वप्न  झरे फूल से' में किया था; अनुमत्य़ है कि नहीं, जानना चाहूँगा। मत्ले के शेर में मिसरा-ए-सानी में वाक्य रचना में कोई दोष हो तो जानना चाहूँगा। सुना तो है लोगों को यह कहते कि 'फ़ख्र करता हूँ' लेकिन अधिक सहज लगता है 'मुझे फ़ख्र है'। काफि़या के लिये मुनासिब सभी शब्द लेने का प्रयास किया है। 'मरे' शब्द का प्रयोग केवल इसलिये किया है कि यह भी प्रयोग का अंश है वरना ये शब्द शायरी में इस रूप में काफि़या के अनुकूल नहीं है ऐसी मेरी समझ है। ये ग़ज़ल एक प्रयोग भर है छोटी बह्र में काफि़या दुगन में लेते हुए वाक्य  रचना का एक उदाहरण देने का।
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ख्वाब तो थे हरे, हरे हर सू
शाख़ से जब झरे, झरे हर सू।
वक्त  का फ़ेर, लोग कहते हैं
अब हमें ही 'अरे', 'अरे' हर सू।
लफ़्ज़ तेरे, ज़ुबॉं रहे मेरी
बोल निकलें खरे, खरे हर सू।
हो गये वो जवॉं, समझ लीजे
रह रहे हैं परे, परे हर सू।
ये चला कौन जो सभी देखे
नैन ऑंसू भरे, भरे हर सू।
शम्अ को जो समझ नहीं पाये
वो पतिंगे मरे, मरे हर सू।
हर किसी को समझ मिले ऐसी
पाप करते डरे, डरे हर सू।

है 'सियासत', मिज़ाज़ बकरी का
जो दिखा, वो चरे, चरे हर सू।
थाम लूँ अंगुलियॉं खुदा तेरी
और जीवन तरे, तरे हर सू।
रौशनी राह में बिछाने को
दीप उसने धरे, धरे हर सू।
हुक्म तेरा, अदा करे जब तो
फ़ख्र 'राही' करे, करे हर सू।

वाह वाह तिलक जी सुंदर प्रयोग है । हां एक बात ये कि 'झरे' शब्‍द बिल्‍कुल प्रयोग किया जा सकता है । हिंदी में तो झरे का बहुतायत प्रयोग होता है । पिछले दिनों कहीं किसी ग़ज़ल में इस शब्‍द को लेकर असहमति जताई गई थी किन्‍तु मैं उस असहमती से पूरी तरह असहमत था । झरे शब्‍द हिंदी का देशज शब्‍द है और अपने मूल 'झड़े' की तुलना में अधिक सुंदर है । झड़े को अन्‍य संदर्भ में प्रयोग किया जाता है जहां पर सुंदरता की आवश्‍यकता नहीं हो जैसे ''बाल झड़ गये '' । किन्‍तु यदि सुंदर परिमल वाक्‍य बनाना हो तो झड़े नहीं लेंगे झरे ही लेंगे जैसे ''झर गये हारसिंगार'' ।इसलिये झरे बिल्‍कुल सही है । वहां उस ग़ज़ल में भी था जहां आपत्‍ती लगाई गई थी और यहां भी सही है । बाकी भी जिन बातों को लेकर आपने भूमिका में कहा है, मेरे विचार से वे भी आपत्‍तीजनक नहीं हैं सब ठीक हैं । 

Tilak Raj Kapoor 

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इसके अतिरिक्त  तरही से अलग दो प्रयास और किये हैं जो निम्नानुसार हैं:
एक ग़ज़ल रिश्तों की ज़मीन पर

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और क्या चाहिये मुझे हर सू
अम्न् औ चैन बस रहे हर सू।
वो बसा है हरेक ज़र्रे में
हम उसे ढूँढते फिरे हर सू।
पुरसुकूँ प्यार से भरे रिश्ते
भीड़ में आज खो गये हर सू।
सोचता हूँ बसूँ कहॉं जाकर
काश होते न हाशिये हर सू।
आप रिश्ता निभा नहीं पाये
और बदनाम हम हुए हर सू।
फूल ही फूल बीज कर हमको
खार ही खार क्यूँ  चुभे हर सू।
एक आवाज़ नाम लेती सी
काश 'राही' तुझे मिले हर सू।
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Tilak Raj Kapoor 

एक ग़ज़ल ज़मीनी हालात् पर:

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लोग कुछ हौसले भरे हर सू
मुठ्ठियॉं तान कर चले हर सू।
मैं मसीहा किसे यहॉं समझूँ
हाथ हैं खून से सने हर सू।
वायदे जो न पूर्ण कर पाये
वोट वो मॉंगते दिखे हर सू।

ऑंत खाली लिये नहीं दिखता
शह्र में दीप जल गये हर सू।
कान से कान तक चला क्या  है
बँट गये लोग, एक थे हर सू।
शह्र ये दौड़ते नहीं थकता
ख्वाहिशें ख्‍वाहिशें लिये हर सू।
प्यास धरती की बुझ नहीं पाई,
मेघ तो थे दिखे घने हर सू।
हर दिशा से उठे हज़ारों सुर,
कल तलक थे यही दबे हर सू।
रहनुमा मान लूँ किसे 'राही'
मूल्य ही आज गिर गये हर सू।

अहा तीनों ही ग़ज़लें आनंद दे रहीं हैं । समापन के लिये इससे अच्‍छा और क्‍या हो सकता था । दुगन काफिये के साथ की एक सुंदर ग़ज़ल और उसके बाद दो अलग अलग मूड पर लिखी हुई ग़ज़लें और क्‍या चाहिये हमें । चलिये तो विधिवत समापन घोषित करते हैं हम दीपावली की तरही का । दाद देते रहिये ।

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( हाजमोला की ज़रूरत पड़ने ही वाली है । )

बुधवार, 2 नवंबर 2011

दीपावली का मुशायरा कुछ और रचनाएं जो कि बाकी रह गईं हैं उनके साथ चलते हैं देव प्रबोधनी एकादशी तक अर्थात दीपपर्व के समापन तक । श्री द्विजेन्‍द्र द्विज जी का एक गीत, दिगम्‍बर नासवा तथा अंकित सफर की एक और ग़ज़ल ।

इस बार की दीपावली का त्‍यौहार बहुत व्‍यस्‍तता में बीता । कई सारे काम एक साथ करने को थे । कुछ हुए कुछ नहीं हुए । खैर, अधूरे कामों को पूरा करने का ही तो नाम जिंदगी है । जो काम अधूरे हैं वे फिर पूरे करने का अवसर मिलता है और उनको पूरा करने की कोशिश की जाती है । इस बार का तरही बहुत सुंदर तरीके से हुआ । कुछ और ग़ज़लें, गीत जो कि बाकी रह गये हैं उनके साथ आइये हम चलते हैं देव उठनी ग्‍यारस की ओर जो कि दीपपर्व का अधिकारिक समापन होता है ।

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पंखुरी का मध्‍यप्रदेश दिवस पर किया गया कत्‍थक नृत्‍य

और आइये अब सुनते हैं श्री द्विजेन्‍द्र द्विज जी का एक गीत,  दिगम्‍बर नासवा तथा अंकित सफर की एक और ग़ज़ल जो दूसरे भावों के साथ है ।

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श्री द्विजेन्‍द्र द्विज जी

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हर नया दिन हो एक दीप-उत्सव
गो अमावस की रात काली है
सर बुलन्द आज है उजाले का
घुप्प , काले, घने अँधेरे ने
अपनी गर्दन झुका- झुका ली है
फिर दियों की छटा निराली है
अब के फिर आ गई दिवाली है
जगमगाया है आज हर कोना
जैसे कण-कण चमक रहा सोना
दीपमाला पहन ली गलियों ने
आँगन-आँगन में अल्पनाएँ हैं
अल्पनाओं की इन लकीरों में
प्रिय के आने की कल्पनाएँ हैं
फूल ओढ़े हुए हैं दीवारें
द्वार-आँगन सजे-सजाये हैं
सारी दुनिया ने ऐसे मिलजुल कर
आज घी के दिए जलाये हैं
काट बनवास जैसे चौदह बरस
राम अयोध्या को लौट आये हैं
हैं उमंगों की मन में फुलझड़ियाँ
हौसले हैं हवाईयों जैसे
रॉकेटों की उड़ान तो देखो
फुलझड़ी की ये शान तो देखो
इन अनारों की जान तो देखो
रोशनी के मचान तो देखो
ज्योतिपुंजों की आन तो देखो
पर्व के वलवले निराले हैं
लौ के ये सिलसिले निराले हैं
मुँह छिपाता फिरे है अँधियारा
नाच उट्ठा है आज उजियारा
फिरकियाँ रोशनी की नाची हैं
रात के घुप्प काले सीने पर
पुतलियाँ रोशनी की नाची हैं
ज्योति की जीत है अँधेरे पर
तितलियाँ रोशनी की नाची हैं
घी उमंगों का धैर्य की बाती
जगमगाए सदा ही मन-दीपक
तेल जीवट का लक्ष्य की बाती
खिलखिलाए सदा ही मन-दीपक
हर क़दम हर घड़ी रहे रौशन
आपकी ज़िन्दगी उजालों से
रहती दुनिया तलक रहे कायम
दोस्तो ! दोस्ती उजालों से
हर अँधेरे को जीतने के लिए
धैर्य की नग़्मगी रहे मन में
आस की चाँदनी रहे मन में
सत्य की रौशनी रहे मन में
आस्था की जड़ी रहे मन में
आँगन-आँगन में अल्पनाएँ हों
जिनकी चित्रावली रहे मन में
हर नया दिन हो एक दीप-उत्सव
हर्ष की इक नदी रहे मन में
अगली दीपावली के आने तक
रोज़ दीपावली रहे मन में

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श्री दिगम्‍बर नासवा

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आसमां से लहू गिरे हर सू
मौत का झुनझुना बजे हर सू
आज इंसान क्यों नहीं मिलता   
आदमी आदमी मिले हर सू
कौन बारूद ले उड़ा देखो
धूल दहशत की है उड़े हर सू
बुखमरी का यहाँ ये आलम है
मौत चेहरे पे है दिखे हर सू
चाँद गोली से हो गया जख्मी 
शबनमी चाँदनी झरे हर सू
 
तेरे आने की की सुगबुगाहट है
दीप खुशियों के जल उठे हर सू

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अंकित सफ़र

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क़र्ज़ रातों का तार के हर सू
एक सूरज नया उगे हर सू
तेरे हाथों का लम्स पाते ही
एक सिहरन जगे जगे हर सू
मेरे स्वेटर की इस बुनावट में
प्यार के धागे हैं लगे हर सू
खेल दुनिया रचे है रिश्तों के
जिंदगानी के वास्ते हर सू

ख़त्म आखिर सवाल होंगे क्या?
मौत के इक जवाब से हर सू

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तीनों की नये रंगों की रचनाओं का आनंद लीजिये और दाद देते रहिये । अगले अंक में श्री तिलकराज जी की तीन ग़ज़लों के साथ समापन करेंगे हम दीपावली की तरही का अधिकारिक रूप से ।

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पंखुरी के कत्‍थक से प्रसन्‍न मंत्री श्री करण सिंह वर्मा ने उसे दुलार किया ।