Friday, 26 October, 2007

प्रथम विश्‍व ब्‍लागिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन की सफलता की सभी को बधाई सभी कवियों को प्रमाण पत्र भेजे जा चुके हैं केवल संजय पटेल और वीना जी को छोड़ कर उनके ई पते उपलब्‍ध नहीं थे

संजय बेंगाणी हम तालियाँ पीट रहें है.

काकेश इस सफल सम्मेलन के लिये बधाइयाँ ...खूब तालियाँ बजायें हमने भी.. अब दीपावली वाले सम्मेलन में मिलते हैं फिर.

कंचन सिंह चौहान समीर जी हमने तो सोच रखा था कि नही बजाएंगे तालियाँ, क्यों भला ज़रूरी है क्या कि आप हमारी कविता से खुश हों तो हम भी खुश हों, लेकिन रोक नही पा रहे खुद को, तड़ तड़ तड़ तड़, आवाज़ें सुनाई दे रही हैं न। वाक़ई बहुत अच्छी रचना।
एक पागल सी चिड़िया कैसे एक घर बसाने का पागलपन करती है, और कुछ न कर के भी बहुत कुछ कर जाती है, वाह आपकी कल्पना को बधाई।
मीनाक्षी जी की पंक्तियाँ-
बड़ी बड़ी बातें नही चाहिए , जीवन उलझाने के लिए
छोटी-छोटी बातें ही चाहिए , प्रेम भाव लाने के लिए !
प्रेम व्यवसाय में उतरने वालों के लिये, छोटा लेकिन अचूक नुस्खा। फिर तालियाँ।
वीना जी की कविता
निकले चंदा रात मुस्कराए
झूम-झूम इठलाती है
तारों से आंचल भरकर
फिर दुल्हन सी शरमाती है
की कौन सी पंक्ति चुनी जाये हम समझ नही पा रहे, पूरी कविता ही एक अद्भूत भावुक कल्पना का नमूना।
तड़ तड़ तड़ तड़
सुनीता जी के तो क्या कहने ही है, और जोगलिखी ने भी हम श्रोताओं कौ खुश किया
अरविंद जी क्या बात है
चान्दनी ये तो जानती होगी
रोशनी चान्द से हुई होगी .
वाह वाह
बुरे बख्तों मे साथ छोड गयी
बेवफाओं के घर पली होगी.
बहुत खूब
आगे आगे चान्दनी ,पीछे पीछे चान्द
सीधे आंगन तक घुसे सभी छतों को फान्द.
भई वाह! तालियाँ तो आप हमारी सुन ही रहे होंगे।
और अब अंत में संचालक महोदय हमारे माननीय गुरू जी। क्या बात है! क्या बात है! इसीलिये कहा जाता है कि गुरू तो फिर गुरू ही होता है।
चांदनी बुला रही है सांझ से मुंडेर पर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर
ना ना तालियाँ नही बज रहीं, हम तो बस मगन हो कर सुन रहे हैं, ताली बजाने की सुध किसे है?
दूर कोई गा रहा है रस भीगा गीत रे
आ गया है लौट कर किसी के मन का मीत रे
कह रही है चांदनी के तू भी अब न देर कर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर
क्या बात है, जल्दी में बनाई तो ऐसी बनी कहीं बैठ कर ना दी होती तो हम सब को मंच से भागना ही पड़ जाता!
सच ही कहा
विश्‍व का पहला ब्‍लागीय शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन सफल रहा है
बधाई! बधाई!

sunita (shanoo) सुबीर जी मै तो सोच भी नही सकती थी नेट पर इतनी खूबसूरती से सम्मेलन हो रहा है...किस किस की तारीफ़ करूं सभी कवि एक से बढ़ कर एक हैं...आप सभी को सफ़ल कवि सम्मेलन की बहुत-बहुत बधाई...हम भी आते है दीपावली पर दीपमाला को साथ लेकर...
बहुत-बहुत शुक्रिया...आप सभी का...और हमारे गुरूदेव का..
सुनीता(शानू)

जोगलिखी संजय पटेल की सुबीर भाई...
काव्य पाठ तो हो गया पेमेंट ड्राफ़्ट से भेजेंगे या सीधे अकाउंट में जमा कर वाएंगे.मज़ाक कर रहा हूँ.आपने अपने ब्लॉग में शुमार कर लिया..साधुवाद.
संचालक : सभी को बधाई और ये भी कि सभी को प्रशस्‍ति पत्र भेजे जा चुके हैं बस संजय पटेल और वीना जी का ई पता उपलब्‍ध नहीं होने के कारण नहीं भेजे गये हैं । अगर हो सके तो अपने प्रशस्‍ति पत्रों को अपने ब्‍लाग पर स्‍थान दें । दीवाली पर हम आडियो कवि सम्‍मेलन करवाऐं तो कैसा रहेगा अपने विचार जरूर दें । और वो किस प्रकार हो सकता हैं वो भी बताएं ।

Thursday, 25 October, 2007

और सुनीता जी और संजय जी तथा अरविंद चतुर्वेदी की इन सुंदर कविताओं के साथ समापन होता है विश्‍व के पहले ब्‍लागीय शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन का

संचालक : विश्‍व का पहला ब्‍लागीय शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन सफल रहा है श्रोता भी ख़ूब आए और कवि भी कवियित्रिओं ने कवियों को पछाड़ दिया है अंत में प्रस्‍तुत हैं सुनीता शानू और संजय पटेल

sunita (shanoo) गुरूदेव आप बुलायें हम न आयें...लिजिये पेश है एक तुरंत बनाया गीत...
जब पहली बार किसी ने इजहार किया था मुझसे,
तब रोक न पाई खुद को प्यार किया था उसने...
चुप रहकर ही खाई थी, वो प्यार भरी कसमें,
आँखो ही आँखो में जब इकरार किया था हमने...
गंगा-जमुना सा पावन बंधन बांधा था हमने,
देवो नें जब श्लोक पढें, मेघ लगे बरसने...
जन्म-जन्म का गठ-बंधन टूट न पाये पल में,
छोड़ न देना साथ पिया,रहना मेरी नजर में...

संचालक : तालियां तालियां एक सुदर कविता के लिये और अब आ रहे हैं जोग लिखी के संजय पटेल

जोगलिखी संजय पटेल की 

चाँद सुहाता है
बुलाता है
गीत गाता है
पगले...
क्यों बीत जाता है
पूरा का पूरा क्यों
रोज़ नहीं आता है
करता है कुछ और
कुछ और बताता है
मौन रहता है तू
फ़िर भी कितना कुछ कह जाता है
पर ये तो बता दे
प्रेम से तेरा क्या नाता है
सच का
या
छल का
बता दे देख
नहीं तो तेरा एक और प्रेमी
रूठ जाता है

संचालक : और अब एक कवि जो बहुत देर से अपनी बारी की प्रतिक्षा कर रहे हैं पर कुछ देर से उनका नंबर आ रहा है । आ रहे हैं चांदनी के दोहे लेकर श्री अरविंद चतुर्वेदी जी जोरदार तालियां बजाएं इनके लिये

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi पहले एक गज़ल के कुछ् शेर :
चान्दनी ये तो जानती होगी
रोशनी चान्द से हुई होगी .
चलो सूरज को जगायें फिर से
इन अन्धेरों में कुछ कमी होगी
आंख में इंतिहा नमी की थी
बादलों से उधार ली होगी
दोस्तों ने उसे दिये धोखे
बात दौलत की ही रही होगी
बुरे बख्तों मे साथ छोड गयी
बेवफाओं के घर पली होगी.

.....और अब कुछ चान्दनी के दोहे ..
आगे आगे चान्दनी ,पीछे पीछे चान्द
सीधे आंगन तक घुसे सभी छतों को फान्द.
हाथ उठाकर ,रेंग कर बच्चा करता मांग
फुदके फुदके चान्दनी, हाथ ना आवे चान्द.
ठंडी ठंडी चान्दनी, चान्दी चान्दी रेत
लद गये दिन आसाढ के, सावन के संकेत्
कहते हैं कि शरद पूर्णिमा पर रात में चान्द से अमृत गिरता है. ख़ीर बनायें, रात को खुले में रखें, और सुबह खायें. आनन्द ही आनन्द....

कवियों की चकल्‍लस :

कंचन सिंह चौहान अरे गुरू जी बड़े दिन बाद प्रशंसा मिली! शुक्रिया!

Udan Tashtari तालियाँ...तालियाँ----मीनाक्षी जी और कंचन जी के लिये.
दोनों ही हमारी बारी में इन तालियों को याद रखें कृप्या. यह भी उधार का स्वरुप होती हैं. :)
वैसे न भी बजायें तो आप दोनों ने इतना बेहतरीन प्रस्तुत किया है कि हमें तो बजाना ही था.

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi समीर भाई की तालियों पर मेरी भी तालियां.
वैसे चिडिया के गीत पर तो ढेरों तालियां बनती ही हैं.
बहुत ही आनन्द आया. बधाई

मीनाक्षी अरे यह तो सचमुच का काव्य सम्मेलन है बस यहां तालियों की आवाज़ सुनने के लिए आँखें बन्द करनी पड़ेगीं.
कंचन को अगर अरविन्द जी चिडिया कह रहे है तो ज़रूर वे छोटी गुड़िया ही होगी... राधा की ही यादें अक्सर राधा तक ले जाती है क्या?
यह पंक्ति दिल मे उतर गई. शुभकामनाएँ
सबको मेरा धन्यवाद !

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi मेरी क्या मजाल कि एक कवियित्री को चिडिया कहू?
आपने शायद 'मिस' कर दिया,समीर भाई ने 'पागल चिडिया" शीर्षक से कविता सुनायी थी.
मै उसी चिडिया का जिक्र कर रहा था.

मीनाक्षी :) :) :) :) (अपनी गलती पर मुस्कराने के अलावा कोई चारा नहीं)

sunita (shanoo) वाह गुरुदेव :)
हम देखें जहाँ-जँहा,
आप मिलते वहाँ-वहाँ
हमे भी बुलाईये न आज आप संचालक है मंच पर और शिष्य को ही भूल गये...बहुत समय से हम सुबीर भाई का ब्लोग देख ही नही पाये...आज सब्सक्राईब कर ही लिया है...बैठे-बिठायें कवि सम्मेलन का लुत्फ़ उठायेंगे...:)
सुनीता(शानू)

संचालक : भई बहुत ही सुंदर कविता के साथ आज के कवि सम्‍मेलन का समापन हुआ है । अलस भोर तक हमने इस कवि सम्‍मेलन को चलाया है और अब हम इस आशा के साथ विदा ले रहे हैं कि जल्‍द ही दीपावली पर एक काव्‍य महोत्‍सव का आयोजन करेंगें आशा है सभी तब तक दीपावली पर अपनी कविता तैयार कर लेंगें ।

और माड़साब अपनी कविता पढ़ने के बाद मंच की बागडोर दे रहे हैं समीर लाल जी को जो आगे के कवि सम्‍मेलन का संचालन करेंगें

Udan Tashtari अवश्य ले ली जायेगी बागड़ोर संचालन की. विश्वास व्यक्त करने का आभार. और संचालन संभालने के साथ ही आमंत्रित हैं माड़साब अपने काव्‍य पाठ के लिये
माड़साब :  आज ही जल्‍दी में कविता लिखी है चांद या चांदनी का जिक्र ज़रूरी था इसलिये नई ही लिखनी पड़ी है अभी मीटर पे कसी नहीं गई है उधर एक कवि सम्‍मेलन में भी जाना है सो जल्‍दी में दे रहे हैं । आगे समीर जी संभालेंगें इस कवि सम्‍मेलन की डोर बल्कि संभाल चुके भी हैं

चांदनी बुला रही है सांझ से मुंडेर पर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर

दूर कोई गा रहा है रस भीगा गीत रे
ओ गया है लौट कर किसी के मन का मीत रे
कह रही है चांदनी के तू भी अब न देर कर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर

घुल गई हवा में आज मदमाती  गंध है
इठला के चल रही ये कैसे मंद मंद है 
चल चल के, थम थम के, पग को फेर फेरकर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर 

पुरवा के हाथों से आया संदेशा है
मद माती रजनी में सजनी ने न्यौता है
भेजा है पीपल के पात पर उकेर कर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर

पात पर लिखा है बैरी चाँद मुंह चिढ़ाता है
पुरवा का झौंका भी छेड़ छेड ज़ाता है
हर कोई सता रहा है आज मोहे घेर कर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर

मदमाती पूनम की चूनर महकाई है
साजन को सजनी की याद फिर दिलाई है
रात की रानी ने अपनी खुशबुएं बिखेर कर 

चांदनी बुला रही है सांझ से मुंडेर पर
प्रेम से मनुहार भरे स्वर में टेर टेर कर

धन्‍यवाद आपकी तालियों के लिये ।

दिल थाम के बैठिये अब बारी आ रही है सब की प्‍यारी शरारती उड़न तश्‍तरी की ब्‍लागिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन में जिस कवि का सबको इंतेज़ार था वो आ रहे हैं तालियों से स्‍वागत कीजिये समीर लाल का

संचालक : जैसे खाने के साथ चटनी की तलब हमेशा ही बनी रहती है वैसे ही ब्‍लाग हों और हमारी नटखट उड़न तश्‍तरी न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता दो लाइन के साथ उनको बुलाता हूं

कविता के इस आंगन में अपनी कविताएं तुम पटको

चमगादड़ की क्‍या मेहमानी हम लटके तुम भी लटको

आइये समीर लाल जी स्‍वागत है आपका

Udan Tashtari वाह वाह देर से आये मगर आनन्द आ गया. अब हमारी बारी. तो पहले यह सुनें-क्या एक ही सुनाना है या जब तक माईक वापस न छीन लिया जाये, याने जैसा आम तौर पर होता है :) ???
यह एक जीवन दर्शन पर आधारित रचना पर ध्यान चाहूँगा-ताली हर मुक्तक के बीच में, अंत में और शुरु में-कहीं भी बजाई जा सकती है. कोई नियम में बंधा न महसूस करे.
वो इक पागल सी चिड़िया
घने घनघोर जंगल में, बहारें खिलखिलाती हैं
लहर की देख चंचलता, नदी भी मुस्कराती है
वहीं कुछ दूर पेड़ों की पनाहों में सिमट करके
वो इक पागल सी चिड़िया भी, मेरे ही गीत गाती है.
कभी वो डाल पर बैठे, कभी वो उड़ भी जाती है
जुटा लाई है कुछ तिनके, उन्हीं से घर बनाती है
शाम ढलने को आई है, जरा आराम भी कर ले
वो इक पागल सी चिड़िया भी, मेरे ही गीत गाती है.
अभी कुछ रोज बीते हैं, मिला इक और साथी है
नीड़ में अब बहारें हैं, चहकती बात आती है
लाई है चोंच में भरके, उन्हें अब कुछ खिलाने को
वो इक पागल सी चिड़िया भी, मेरे ही गीत गाती है.
बड़े नाजों से पाला है, उन्हें उड़ना सिखाती है
बचाना खुद को कैसे है, यही वो गुर बताती है
उड़े आकाश में प्यारे, अकेली आज फिर बैठी
वो इक पागल सी चिड़िया भी, मेरे ही गीत गाती है.
संचालक : भई बहुत बढि़या समीर जी हम भी जानते हैं कि कौन सी चिडि़या की बात आप कर रहे हैं ( भाभी को नहीं बताएंगें वादा रहा )

Udan Tashtari  सारथी जी और अनूप जी दोनों ने ही बेहतरीन कविता पढ़ीं हैं दोनों ही बहुत बेहतरीन.  चलने दिजिये इस कवि सम्मेलन को जोरों में.
संचालक : आपसे पहले बीना जी और मीनाक्षी तथा कंचन भी पढ़ चुकी हैं ।

Udan Tashtari वाह वीना जी..बधाई...वाह मीनाक्षी  जी..बधाई...आप दोनों ने ही शरद पूर्णिमा के कवि सम्‍मेलन को सार्थक कर दिया है तालियाँ...तालियाँ----मीनाक्षी जी और कंचन और वीना जी के लिये.
दोनों ही हमारी बारी में इन तालियों को याद रखें कृप्या. यह भी उधार का स्वरुप होती हैं. :)
वैसे न भी बजायें तो आप दोनों ने इतना बेहतरीन प्रस्तुत किया है कि हमें तो बजाना ही था.
कंचन जी का दूसरा दौर भी हो गया और हमारा अभी नम्बर आना बाकी है. क्या करें-
अक्सर देर कर देता हूँ मैं.(मुनीर नियाजी)

 संचालक : जारी है ब्‍लागिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन देते रहिये अपनी कविताएं और उनको देखते रहिये कवि सम्‍मेलन में । रात 9 बजे माड़साब संचालन खत्‍म करके सचमुच के कवि सम्‍मेलन में चले जाऐंगें उसके बाद संचालन संभलेंगें समीर लाल जो अपने ब्‍लाग पर कविताओं को प्रका‍शित करके कवि सम्‍मेलन को रात्रि तक चलाऐंगें ।

ब्‍लागीय शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन अब कवियित्री सममेलन होता जा रहा है अब आ रहीं हैं वीना जी और दूसरे दौर में कंचन जी भी

संचालक :  एक नई कवियित्री वीना जी अपनी बहुत सुंदर कविता के साथ आ रहीं हैं तालियों के साथ स्‍वागत करें
वीना मेरी भी एक कविता पेश है---
निकले चंदा रात मुस्कराए
झूम-झूम इठलाती है
तारों से आंचल भरकर
फिर दुल्हन सी शरमाती है
दूध सी उजली, निर्मल, कोमल
चांदनी रात मन भाती है
चम-चम करते रेत के हीरे
किरणों के हार पहनाती है
झिलमिल चांदनी चमके इत-उत
मन में उल्लास जगाए है
चांद की शीतलता भी अब
मन में आग लगाए है
बचपन की वो चंचलता
जा पहुंची अल्हड़ यौवन में
चंदा-चांदनी लुक-छुप खेलें
हर घर के कोने-आंगन में
रेगिस्तान की तपती भूमि
शीतलता पाती है अब
रेत का आभास जिसे था
चमक-चमक जाती है अब
तपते रेगिस्तान को रात ने
फिर से शीतल बनाया है
रेत को भी चंद्र किरण ने
चांदी सा चमकाया है
नदियों के धारे मुस्काए
चम-चम चमके तारों से
धवल चांदनी फैली इत-उत
शोभित है मनुहारों से
गंगा के आंचल पर चमके
ब्रह्मांड का गगन मंडल
शीतल, धवल चांदनी में अब
दूध सा श्वेत लगे है जल
बच्चा मांगे मां से अपनी
चंद्र खिलौना ला दो ना
हाथ बढ़ाकर उसे बुलाता
चंदा मामा आओ ना
जहां-जहां जाता है चंदा
वहीं चांदनी जाती है
एक पल को साथ न छूटे
यही चांदनी चाहती है
एक रात मिली अरमानों की
अगले क्षण भय जुदाई का
धीरे-धीरे छुपता है चंदा
साथ मिला हरजाई का
धीरे-धीरे घटता चंद्रमा
द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी को
निशा कालिमा डस जाएगी
प्रेमी-प्रियतम चंदा को

संचालक : और दूसरे दौर में पुन: स्‍वागत करें कंचन जी का

कंचन सिंह चौहान गुरू जी एक और कविता याद आ गई, जाते जाते। असल में हम खालिस रूमानी कविता मुद्दतों में एक या दो बार ही लिख पाये होगे उन दो-तीन कविताओ में से एक कविता आपके लिये लाई हूँ, जिसे मैने १९९४ लिखा था,उस उम्र में जब किशोरावास्था जाने की तैयारी कर रही थी। कविता इस तरह है-
देख रहे हैं ऐसा सपना जो सच होगा कभी नही,
हम जाने को कहते हैं और वो कहते हैं अभी नही!
ढूढ़ रही हैं उनकी आँखें भरी भीड़ में मुझको ही,
और हमरी आँखें देखें निर्निमेष सी उनको ही,
और अचानक ही हम दोनो एक दूजे से मिलते है,
आँखें सब कुछ कह जाती है , मगर ज़बानें खुली नही।
दूर कहीं सूरज ढलता हो, छत पर हम दो, बस हम दो,
एक टक वो देखें हो मुझको और मेरी नज़रें उनको,
दिल की धड़कन हम दोनो की तेज़ ही होती जाती है,
कहे हृदय अब नयन झुका लो, मगर निगाहें झुकी नही।

कवि सम्‍मेलन जारी हैं भेजते रहें कविताएं ब्‍लागिया कवि सम्‍मेलन में ।

और अब ब्‍लगिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन के मंच पर आ रहीं हैं दो कवियित्रियां कंचन चौहन और मीनाक्षी जी तालियों से स्‍वागत करें इन दोनों का

संचालक : आज का ब्‍लागिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन सफल रहा है और अब दो कवियित्रियां भी आ रहीं हैं काव्‍य पाठ के लिये सबसे पहले आमंत्रित हैं मीनाक्षी

मीनाक्षी अपने को कवि या कवयित्री कहने में संकोच होता है, शायद उस लक्ष्य तक पहुँचने मे समय है फिर भी कलम और मेरा नाता बहुत पुराना है ---
एक अघोषित भाव –
अग्नि का एक कण चाहिए , ज्ञान की ज्योति जलाने के लिए
स्वाति नक्षत्र की एक बूँद चाहिए, प्रेम की प्यास मिटाने के लिए
हिमालय का इक खण्ड चाहिए, घृणा की आग बुझाने के लिए
ममता भरा हाथ चाहिए , करुणा का भाव जगाने के लिए
बड़ी बड़ी बातें नही चाहिए , जीवन उलझाने के लिए
छोटी-छोटी बातें ही चाहिए , प्रेम भाव लाने के लिए !

 

संचालक :तालियां मीनाक्षी की कविता केलिये ( कवियित्रियों के लिये तो श्रोताओं से कहना भी नहीं पड़ता के ताली बजाओ )

और अब आ रहीं हैं कंचन सिंह चौहान इनके लिये चार पंक्तियां जिसको देखो वो मीत हो जाए , सारा आलम पुनीत हो जाए, तुमको लय छंद की ज़रूरत क्‍या, जो भी गा दो वो गीत हो जाए  आ रहीं हैं कंचन

कंचन सिंह चौहान अरे गुरू जी बिना किसी तैयारी के ही कवि सम्मेलन में बुला लिया, शिष्या का पहला पर्फार्मेंस है ये तो ध्यान दिया होता....स्मृति के आधार पर लिख रही हूँ...... चूँकि आज महारास की रात है तो, बात कृष्ण की ही करती हूँ
स्वर्ण नगरिया तेरी द्वारिका, कोने-कोने सुख समृद्धि,
फिर भी कभी कभी स्मृतियाँ, गोकुल तक ले जाती है क्या?
दूध दही से पूरित तो है, रत्न जड़ित ये स्वर्ण कटोरे,
भाँति भाँति के व्यंजन ले कर दास खड़े दोनो कर जोड़े,
लेकिन वो माटी की हाँड़ी, वो मईया का दही बिलोना,
फिर से माखन आज चुराऊँ ये इच्छा हो जाती है क्या?
बाहों में है सत्यभाम और सुखद प्रणय है रुक्मिणि के संग,
एक नही त्रय शतक नारियाँ, स्वर्ग अप्सरा से जिनके रंग।
लेकिन वो निश्चल सी ग्वालिन, प्रथम प्रेम की वो अनुभुति,
राधा की ही यादें अक्सर राधा तक ले जाती है क्या?
संचालक: जोरदार तालियां बजाइये कंचन के लिये और कवि सम्‍मेलन जारी है भेजते रहिये अपनी कविताएं और बनाए रहिये सिलसिले को ।

Wednesday, 24 October, 2007

ब्‍लागिया शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन में श्री रमेश हठीला के बाद कविता पढ़ने आ रहे हैं श्री अनूप भार्गव और श्री संजीव सारथी । श्रोताओं से अनुरोध है कि जोरदार तालियों से दोनों का स्‍वागत करें

सजीव सारथीवाह सुबीर जी बहुत बढ़िया महफ़िल जमाई है आपने एक शेर मैं भी अर्ज़ कर दूँ -
चुपके से रात हो गयी दिन के उजालों में,
चुपके से रात हो गयी दिन के उजालों में,
वो चाँद बन कर आ गए , मेरे ख्यालों में.
और एक क्षणिका भी -
चाँद को देखे रोज,
लाखों चकोरी ऑंखें,
इसीलिए कुदरत ने लगाया,
है गोरे मुखड़े पे चाँद के
एक नज़र का टीका -
काला

संचालक : और अब आ रहे हैं वरिष्‍ठ कवि श्री अनूप भार्गव जी जोरदार तालियों से स्‍वागत करें

अनूप भार्गव अब जब आप नें आमंत्रित कर ही दिया है तो एक गज़लनुमा कविता पर गौर फ़रमायें जो आप से सीखना शुरु करने से पहले लिखी थी । बहर , वज़्न आदि सब गलत होंगे लेकिन क्यों कि यह सब से पहला गज़ल का प्रयास था , इसलिये मुझे प्रिय है । एक बार पहले भी टिप्पणी में लिखने की कोशिश की थी लेकिन शायद आप नें देखी नहीं ।
---
परिधि के उस पार देखो
इक नया विस्तार देखो ।
तूलिकायें हाथ में हैं
चित्र का आकार देखो ।
रूढियां, सीमा नहीं हैं
इक नया संसार देखो
यूं न थक के हार मानो
जिन्दगी उपहार देखो ।
उंगलियाँ जब भी उठाओ
स्वयं का व्यवहार देखो
मंजिलें जब खोखली हों
तुम नया आधार देखो ।
हाँ, मुझे पूरा यकीं है
स्वप्न को साकार देखो ।

श्रोता की टिप्‍पणी

आलोक वाह, कविता का जवाब कविता से।

संचालक : कविताएं देते रहिये हम दूसरा दौर भी चलाऐंगें अत: जो दे चुके हैं वे दूसरे दौर के लिये भी कविताएं दें ।

आज महारास की है शरद पूर्णिमा। चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥ शरद पूर्णिमा पर आयोजित इस कवि सम्‍मेलन में टिप्‍पणियों के माध्‍यम से काव्‍य पाठ करें । प्रारंभ कर रहें हैं श्री रमेश हठीला अपनी कविता और कुछ मुक्‍तकों से ।

आज शरद पूर्णिमा है और ये दिन हम कवियों के लिये खास दिन होता है आज कविता की बातें होती हैं और कवि सम्‍मेलन होते हैं पहले जयपुर में एक भव्‍य आयोजन गीत चांदनी  भी आज के दिन होता था जाने आज कल होता है या नहीं । मैंने बताया था कि मेरे मि्त्र श्री रमेश हठीला जी का काव्‍य संग्रह बंजारे गीत प्रकाशित हो गया है । मधुर कंठ से गीत गाने वाले श्री हठीला गीत भी भावप्रवण ही लिखते हैं । तो आज इस ब्‍लाग पर शरद पूर्णिमा के अवसर पर एक कवि सम्‍मेलन का आयोजन किया जा रहा है जिसका प्रारंभ मैं श्री हठीला की सद्य प्रकाशित बंजारे गीत से कुछ मुक्‍तक और एक सुंदर गीत जो सभी चांदनी पर हैं के साथ कर रहा हूं आप सब भी शरदोत्‍सव पर अपनी कविताएं इस कवि सम्‍मेलन में टिप्‍पणियों के माध्‍यम से प्रस्‍तुत करें ताकि ये आज का हमारा ब्‍लागिया कवि सम्‍मेलन सफल हो सके । घोषित कवि हैं उड़नतश्‍तरी, कंचन चौहान, बी नागरानी देवी, अनूप भार्गव, अभिनव शुक्‍ला,  और अघोष्ति कवि वे सभी हैं जो आज काव्‍य पाठ करना चाहते हैं । संचालन तो जाहिर सी बात है कि माड़साब ही कर रहे हैं जो टिप्‍पणियां दिन भर में मिलेंगीं वे पोस्‍ट के रूप में प्रस्‍तुत की जाएंगीं । तो प्रस्‍तुत है पहले कवि श्री रमेश हठीला अपने गीत ओर मुक्‍तकों के साथ ।

आज महारास की है शरद पूर्णिमा।
चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥

कृष्ण के पा अधर वेणू होगी मुखर।
चांद को देख व्याकुल है सिंधू लहर।
पग थिरकने लगे मौन जुन्हाई के।
फड़ फड़ाने लगे पंख पुरवाई के।
नीला-नीला गगन और धवल चन्द्रमा॥
चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥

हैं सजल आज वसुधा के पुलकित नयन।
झूमेंगें नाचेगें राधिका के चरण।
जाने क्यों हो गई यामिनी बावरी।
जादू करने लगी मदभरी बांसुरी।
पलकें बोझिल हुईं देख वो भंगिमा॥
चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥ 

धार अमृत की फिर हो गये ओस कण।
कसमसाने लगा आज वातावरण।
करने को मन मुदित आ गई है शरद।
अब विगत हो गये बरखा के क्षण सुखद् ।
बांहों में भर रहा धरती को असामां॥
चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥

आया मधुमास तो मौन मुखरित हुआ।
चूड़ी पेंजन कंगनवा से गुंजित हुआ।
मेहंदी चढ़ कर हथेली दहकने लगी।
सांसें पी का परस पा बहकने लगी।
नैन बोझिल हुए मुख पे थी लालिमा॥
पूर्णिमा, पूर्णिमा, पूर्णिमा, पूर्णिमा॥

आज महारास की है शरद पूर्णिमा।
चांद को देख कर छुप गई कालिमा॥

मुक्‍तक

1

अम्बर के अंगना खिली शुभ्र धवल चांदनी।
झिलमिल झिलमिल करती चुस्त चपल चाँदनी।
चम्पतिया चंदा का आलिगंन करने को।
देहरी लाज की उलाँघकरती पहल चाँदनी॥

2

इठलाती बलखाती मुस्काती चाँदनी।
अंबर की चौसर पर बिछ जाती चाँदनी।
चुगल खोर चंदा की मटमैली पाती पर।
प्यार का पयाम नित्य लिखवाती चाँदनी॥

3

ओढ़े हुए चूनरिया तार तार चाँदनी।
चुपके चुपके चंदा से करती प्यार चाँदनी।
मुस्काते, सकुचाते, शरमाते, इठलाते।
खुद को चन्द्र दर्पण में रही निहार चाँदनी॥

4

चन्द्र कश्ती छोटी सी यात्री है चाँदनी।
नील नदी के तट पर उतरी है चाँदनी ।
कलियों पे शबनम को मुस्काता देखकर।
मोती के दानों सी बिखरी है चाँदनी॥

5

धरती के अंगना में उतरी है चाँदनी।
चोटी कजरी टप्पा ठुमरी है चाँदनी।
कलियों को शबनम पर मुस्काता देखकर।
यहाँ वहाँ मोती सी बिखरी है चाँदनी॥

Tuesday, 23 October, 2007

मेरे कानों में चुपके से सदाएं आ के देती हैं, ख़बर उनकी मुझे हरदम हवाएं आके देती हैं, तड़प के गिरती हैं बारिश की बूंदें मेरे आंगन में, संदेशा उनके रोने का घटाएं आके देती हैं

आजकल क्‍लास में उपस्थिति कुछ कम चल रही है ऐसा लगता है कि माड़साब को अब कोई दूसरा काम देखना पड़ेगा। एक मित्र ने सलाह भी दी है कि अब आप ग़ज़ल को छोड़कर कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर की क्‍लास चालू कर दों। अगर धंधे की ये ही हालत रही तो फिर उस पर भी सोचना पड़ेगा । कल की क्‍लास में केवल दो ही छात्र आए थे अब दो से क्‍या होता है उतने में तो घर में ही नहीं पड़ता । हार्डवेयर की क्‍लास शुरू करने के बारे में माड़साब सोच रहे तो हैं पर अब बुढ़ापे में धंधा बदलने में डर भी लग रहा है।

चलिये कल जहां पर छोड़ा था वहीं से करते हैं आज आगे शुरू । कल हम त्रिकल तक पहुचे थे और आज उससे आगे की बात करते हैं ।

चौकल :-  चौकल का मतलब उस तरह का रुक्‍न जिसमें कि चार मात्राएं होती हों । उसके पांच प्रकार होते हैं ।

1: चार लघु मात्राएं और चारों ही अपने आप में स्‍वतंत्र हों । फएलतु में ऐसा ही है और चारों ही मात्राएं अपने आप में स्‍वतंत्र हैं । इसके उदाहरण शायरी में कम ही आते हैं क्‍योंकि चारो मात्राएं अगर एक के बाद एक लघु आएंगी तो उच्‍चारण में समस्‍या आ जाएगी ।

2: एक गुरू और फिर दो लघु मात्राएं फाएलु । अब इसमें दो तरह से हो सकता है चार लघु मात्राएं भी हो सकती हैं मगर उनमें से पहली दो आपस में संयुक्‍त होकर एक दीर्घ बना रही हों और आगे की दो स्‍वतंत्र हों जैसे तुम न तुम्‍हारी याद  में तुम न तु  को अगर देखें तो उसमें दो लघु तुम  मिल कर एक दीर्घ बना रहे हैं और फिर  न  ओर तु  दोनों ही स्‍वतंत्र हैं । या फिर ये भी हो सकता है कि पहला दीर्घ हो और बाद में दो स्‍वतंत्र लघु आ रहे हों । जैसे काम न हुआ  में काम न   को देखें यहां  का  एक दीर्घ है और  म  ओर   ये दोनों ही स्‍वतंत्र हैं । मगर चाहे हम  तुम न तु  कहें या  काम न  कहें दोनों ही सूरत में वज्‍़न तो वही रहेगा फाएलु ।

3: दो लघु पहले फिर एक दीर्घ फएलुन।  अब इसमें भी दो प्रकार से हो सकता है पहला तो ये कि शुरू के दो स्‍वतंत्र लघु हो और फिर बाद में दो लघु ऐसे आ रहे हों जो कि आपस में संयुक्‍त होकर एक दीर्घ बना रहें हों । जैसे न सनम  को अगर देखें तो इसमें भी बात वही है कि वैसे तो चारों ही लघु हैं पर पहले दो  न  और   ये दोनों ही स्‍वतंत्र हैं और बाद के  नम  मिलकर दीर्घ हो गए हैं अत: वज्‍़न वही है फएलुन ।  दूसरा ये भी हो सकता है कि दो लघु हों और फिर एक दीर्घ आ गया हो जैसे न सुना  अब इसमें शुरू के दो   और सु  ये दोनों तो स्‍वतंत्र हैं पर बाद में ना दीर्घ है पर वज्‍़न वही है फएलुन ।

4: एक लघु एक गुरू और फिर ऐ लघु फऊलु । अब इसमें भी दो प्रकार से हो सकता है पहला तो वही कि आप के पास चारों ही मात्राएं लघु हों पर उनमें से बीच की दो मात्राएं मिल कर दीर्घ हो रही हों  । जैसे  न तुम न हम  में न तुम न  को देखें वैसे तो चारों ही लघु हैं पर बीच की दो  तुम  जो हैं वो मिलकर दीर्घ हो रही हैं जबकि दोनों तरफ की   न  जो हैं वो स्‍वतंत्र हैं । दूसरा तरीका ये भी हो सकता हैं कि बीच में एक सचमुच की दीर्घ ही हो जैसे मिला न  में मि लघु है फिर ला  दीर्घ आ गया है और फिर   एक बार फिर लघु है दोनों ही हालत में वज्‍़न वही है फऊलु ।

5:  दा गुरू मात्राएं फालुन ।  इसमें कई तरीके हो सकते हैं पहला तो ये कि चारों ही लघु हो पर दो दो लघु मिल कर दो दीर्घ में बदल रहे हों जैसे हम तुम में वैसे तो चार लघु मात्राएं हैं पर हम मिलकर एक दीर्घ बना रहा है और तुम मिलकर एक दीर्घ बना रहा है । दूसरा ये कि शुरू में एक दीर्घ हो फिर दो लघु ऐसे हों जो मिलकर एक दीर्घ बन रहे हों  जैसे ला हम  को देखें यहां पर पहला ला तो सीधा दीर्घ ही है और बाद में हम जो है वो वैसे तो दो लघु हैं पर मिलकर एक दीर्घ बना रहे हैं अत: वज्‍़न वही है फालुन ।  तीसरा ये भी हो सकता है कि पहले दो लघु हों जो मिलकर एक दीर्घ बना रहे हों और फिर एक दीर्घ आ रहा हों जैसे हमला  में शुरू के दो और   जो हैं वो वैसे तो लघु हैं पर मिलकर एक दीर्घ बना रहे हैं । बाद में जो ला  हैं वो ता दीर्घ ही है अत: वज्‍़न वही रहा फालुन । चौथ ये भी हो सकता है कि दोनों सचुमुच के ही दीर्घ हों जैसे जाना  में जा  और ना  दोनों ही दीर्घ हैं और वज्‍़न वही है फालुन ।

आज के लिये इतना ही कल हम आगे चलेंगें और पंचकल की बात करेंगें । उडनतश्‍तरी का भारत आगमन हो रहा है ये जान कर प्रसन्‍नता हुई अगर पूर्व में पता होता तो हम कवि सम्‍मेलन को कुछ बाद में रख लेते खैर कार्यक्रम तो होते ही रहते हैं और आशा है हम उड़नतश्‍तरी को किसी न किसी कार्यक्रम में ज़रूर बुलाएंगें ।

Monday, 22 October, 2007

पहले गंभीर चिन्‍तन मनन कीजिये, तब कलम को उठाकर सृजन कीजिये, ओस की बूंद से प्‍यास बुझती नहीं, सागरों को उठा आचमन कीजिये

पहली ही पंक्ति मैं जैसे साहित्‍य का पूरा का पूरा ज्ञान समा गया है । पहले गंभीर चिंतन मनन कीजिये फिर कलम को उठाकर सृजन की‍जिये। यश कमाने की हो कामना जो तुम्‍हें जिंदगी को जलाकर हवन कीजिये।

काफी दिनों से कक्षा बंद थी और आज जब उड़न तश्‍तरी ने कहा कि कक्षा क्‍यों बंद है तो आज पुन: शुरू की जा रही है । दरअस्‍ल में कुछ समस्‍याएं आ जाती हैं और उनके कारण ही कभी कभी काम बंद हो जाता है । उधर अभी ये हो गया है कि हमारे विद्युत मंडल ने पुन: कटौती प्रारंभ कर दी है जो समय ब्‍लाग पर भटकने का तय था वो मंडल की भेंट चढ़ गया है । अब तीन घंटे की कटौती के बाद समय ही नहीं होता कि काम किया जाए सो कुछ काम कम हो रहा है । फिर भी प्रयास करूंगा कि कक्षाएं जारी रहें आगे भगवान...... उफ़ क्षमा करें विद्युत मंडल की मर्जी ।

आज हम वार्णिक गुणों की बात करते हैं ।

हिंदी में जैसे नगण, सगण, जगण, भगण, रगण, तगण, यगण, मगण होते हैं वहीं सब कुछ उर्दू में भी चलता है ।

रुक्‍न मात्रा का योग हिंदी में क्रम वार्णिक गुण
फ़इल 3 1 1 1 लाम लाम लाम नगण
फ़एलुन 4 1 1 2 लाम लाम गाफ सगण
फऊलु 4 1 2 1 लाम गाफ लाम जगण
फाएलु 4 2 1 1 गाफ लाम लाम भगण
फाएलुन 5 2 1 2 गाम लाफ गाम रगण
मफऊलु 5 2 2 1 गाफ गाफ लाम तगण
फऊलुन 5 1 2 2  लाम गाफ गाफ यगण
मफऊलुन 6 2 2 2 गाफ गाफ गाफ  मगण

 

अब इनके ही आधार पर हम रुक्‍न बनाते हैं । जैसे ऊपर कुछ रुक्‍न हैं जिनकी मात्राएं क्रमश: तीन चार पांच तथा छ: हैं । केवल हो क्‍या रहा हैं कि दीर्घ ( गाफ) और लघु ( गाम) के स्‍थानों में परिवर्तन होने के कारण ही ये सारा खेल हो रहा है । एक मात्रा को कल कहा जाता है और मात्राओं का विन्‍यास ही मात्रिक गुण कहलाता है ।

दोकल: दो हर्फी रुक्‍न को दो कल भी कहा जात है और ये दो प्रकार के ही होते हैं । 1 एक गुरू मात्रा जैसे फा या फे । और या कि दो लघु मात्राऐं जैसे अब कब आदि । उर्दू में फा और अब दोंनो का ही बज्‍़न समान है और ये दोनों ही दो हर्फी हैं ।

2 दूसरा वो जब दो लघु मात्राएं तो हों पर दोनों ही स्‍वतंत्र हो  अब या कब  की तरह मिल कर दीर्घ न बन रहीं हों । मैं न मिलूंगी  में विन्‍यास है 2 1 1 2 2   बीच में जो  न और मि  हैं वो दोनों हांलकि दो लघु हैं पर मिलकर संयुक्‍त नहीं हो रहे हैं अत: इनको अलग अलग ही गिना जाएगा ।

त्रिकल : तीन हर्फी रुक्‍न को त्रिकल कहा जाता है । ये तीन प्रकार के हो सकते हैं ।

1  तीन लघु मात्राएं जैसे फइल  और अगर उदाहरण देख्‍ना चाहें तो काम न हुआ  में  म न हु  का जो विन्‍यास है वह यही है

2   एक गुरू और दो लघु मात्राएं फाअ  और उदाहरण आम, काम, जाम, बंद,   आदि। हम एक गुरू की जगह पर दो लघु भी ले सकते हैं बशर्ते वे संयुक्‍त हो रहे हों जैसे बंद में  ब  ओर आधा   दोंनों मिल कर एक दीर्घ बन रहे हैं । अब एक महत्‍वपूर्ण बात देखें । ऊपर फइल में क्‍यों उसको एक अलग विन्‍यास दिया गया है केवल इसलिये क्‍योंकि वहां पर  काम न हुआ  में  म  स्‍वतंत्र है किसी के साथ संयुक्‍त हो नहीं सकता । फिर   एक अलग ही अक्षर है और हुआ का हु स्‍वतंत्र है ।  

3  एक लघु और फिर एक गुरू मात्रा फऊ  उदाहरण कभी, नहीं, मिला, समर, किधर, आद‍ि । एक गुरू मात्रा की जगह दो लघु भी हो सकती हैं पर वे संयुक्‍त होनी चाहिये । जैसे हमने किधर  को भी लिया है क्‍योंकि कि लघु हो रहा है और दो लघु   और   मिल कर एक दीर्घ बना रहे हैं ।  महत्‍वपूर्ण बात ये हैं कि वज्‍़न गिनते समय ये ध्‍यान रखना चाहिये कि कौन से दो लघु मिलकर एक दीर्घ हो रहे हैं और कौन से नहीं हो रहे हैं । वज्‍़