शनिवार, 6 अक्तूबर 2007

हम ले के अपना माल जो मेले में आ गए, सारे दुकानदार दुकानें बढ़ा गए, बस्‍ती के क़त्‍ले आम पर निकली न आह थी, ख़ुद पर लगी जो चोट तो दरिया बहा गए

बहुत सीधी सादी सी ग़ज़ल है और अगर कहा जाए कि इसमें बड़ी ही नफासत के साथ बात कही जा रही है । हस्‍ती साहब की ग़ज़ल है और जैसा कि मैंने पिछली क्‍लास में लिखा था कि आप भी उन गज़लों पर जोर लगाएं जो आपके हाथ में आ जाती हैं और विशेष कर उच्‍चारण के साथ ही तकतीई करें कई बार हम बड़ी और छोटी मात्रा पकड़ने में भूल कर जाते हैं और फिर किसी भी जगह पर मात खा जाते हैं । जैसे ऊपर की ही बात कही जाए तो साफ नज़र आ रहा है कि ग़ज़ल 2212-2212-2212-12 के वज्‍़न  पर है । मगर याद रखें ये गज़लों कि तिलस्‍मी दुनिया है यहां पर जो होता है वो दिखता नहीं है और जो दिख्‍ता है वो होता नहीं है । ये ग़ज़ल मुझे सबसे होनहार छात्र अभिनव ने भेजी है और अभिनव ने भी 2212 2212 2212 12 की ही मात्रा निकाल के भेजी है पर वहीं चूक हो गई मैंने कहा है कि एक शे'र से ग़ज़ल की बहर का पता नहीं चलता है आने वाले शे'रों को देखने पर ही पता चलता है कि शाइर ने क्‍या बहर ली है आगे हमें ये देखना पड़ेगा कि जो गुरू यहां पर है उसके जगह पर आगे अगर उसी स्‍थान पर लघु आ रहा है तो साफ है शाइर ने उसे गिराया हुआ है। जैसे अगर अभिनव अगर देख लेते कि दूसरा रुक्‍न जो उन्‍होंने निकाला है 2212 मुस्‍तफएलुन वो दूसरे मिसरे में सारे दुकानदार दुकानें बढ़ा गए में पकड़ आ रहा है जहां लिखा है न दा र दु मतलब 1211 मुफाएलु  और यही सही वज्‍़न है । पढ़ते समय यदि आप ध्‍यान दें तो अपना माल जो  में ना और जो  पर मिसरा उला में वज़न नहीं दिया जा रहा हे अत: वो दोनों ही लघु हैं ।

मगर एक बात तो अच्‍छी है और वो ये कि अभिनव ने प्रयास बहुत अच्‍छा किया और लगभग लगभग मुकाम पर पहुच ही गए थे । जब मैं सिखाड़ी था तब मैंने ( कान पकड़ते हुए ) शहरयार साहब की एक ग़ज़ल में दोष निकाल कर अपने गुरू को दिखाया तो उन्‍होने कहा देखों ये बात सही है कि तुम अपने ढंग से मात्रा गिन रहे हो पर ध्‍यान रखो कि शहरयार जैसे शाइर को क्‍या वो दोष नहीं दिखा होगा जो तुमको दखि रहा है । तब उनहोंने कहा था कि पूरी ग़ज़ल पढ़ कर बहर का पता लगता है । जैसे ग़ालिब की गज़ल है दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्‍या है, आखिर इस दर्द की दवा क्‍या है  अगर इसको तख्‍ती करेंगें तो हैरान हो जाऐंगें कि क्‍या गा़लिब जी भी । मगर वास्‍तव में तो ये एक खूबसूरती से निभाई गई ग़ज़ल है जिसकी मात्रा गिनने में दिमाग के टांके टूट जाते हैं । और जब पता लगता हे कि गा़लिब साहब ने किस खूबसूरती से निर्वाह किया है तो एक ही बात निकलती हे वाह वाह। हां ये बात भी है कि कई बड़े नाम वालों को ही बहर का ज्ञान नहीं है और ऐसे में उनकी ग़ज़लों में दोष पकड़ा सकते हैं । मगर गा़लिब या हस्‍ती या शहरयार साहब जैसे लोग तो बहरों की चलती फिरती पाठशाला थे  या हैं ।

अब इस पर काम करें बस्‍ती के कत्‍ले आम पे निकली न आह थी

लालालला ललालल लालालला लला

2212     1211    2212   12

बस्‍ 2 ती 21 कत्‍ 2

मुस्‍तफएलुन

121  प 1

मुफाएलु

निक 2 ली 212

मुस्‍तफएलुन

1 थी 2

फलुन

खुद को लगी जो चोट तो दरिया बहा गए

खुद 2 को 21 गी 2

मुस्‍तफएलुन

1 चो 211

मुफाएलु

दरि 2 या 21 हा 2

मुस्‍तफएलुन

गए

फलुन  

वैसे अभिनव ने कुछ काम अच्‍छा किया है जैसे  एक ग़ज़ल की बहर निकालना

बशीर बद्रः (लालालला लालालला लालालला लालालला)
सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
जिस पर हमा री आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

कुछ अपना लिखना

ये दुनिया नीर की बदली है तो नीरज गुरूजी हैं,
हमें सिखला रहे लेखन सुलभ धीरज गुरूजी हैं,
नवोदित मंच का सम्मान खुद इससे बढ़ा होगा,
बहुत शुभकामनाएँ आपको पंकज गुरूजी हैं,

इन शेरों की तख्तीः
बहरः
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
ललालाला ललालाला ललालाला ललालाला
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
------
ये दुनिया नी - र की बदली - है तो नीरज - गुरूजी हैं,
हमें सिखला - रहे लेखन - सुलभ धीरज - गुरूजी हैं,
नवोदित मं - च का सम्मा - न खुद इससे - बढ़ा होगा,
बहुत शुभका- मनाएँ आ - पको पंकज - गुरूजी हैं,

बस यही बात है जो आखिर में बहर की नब्‍ज पकड़वा देगी ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही आवश्‍यक जानकारी दी है भाई आपने, नये कवियों और गीदड को शेर समझ बैठने वालों के लिए यह एक यादगार पाठ साबित होगा, यदि वे इसे आत्‍मसाध करें ।

    धन्‍यवाद

    'आरंभ' छत्‍तीसगढ का स्‍पंदन

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  2. यस सर,

    आज के होम वर्क के रूप में आपके द्वारा बताई गई ग़ालिब चचा की ग़जल के साथ ज़ोर आज़माइश करी है। दिमाग के टाँके बहरहाल टूटे नहीं हैं पर झनझना ज़रूर रहे हैं अतः काफी संभावनाएँ हैं कि ग़लत बहर निकली हो। कृपया बताइएगा कि सही है या नहीं।

    इस ग़ज़ल की बहर निकली है।
    २१२२ - १२ - १२२२
    लाललाला - लला - ललालाला
    फाएलातुन - फलुन - मुफाईलुन

    दिल-ए-नादाँ - तुझे - हुआ क्या है
    आ ख़िर इस दर् - द की - दवा क्या है

    हम हैं मुश्ता - क़ औ - र वो बेज़ार
    या इलाही - ये मा - जरा क्या है

    मैं भी मुँह में - ज़बा - न रखता हूँ
    काश पूछो - कि मुद् - दुआ क्या है

    जब कि तुझ बिन - नहीं - कुई मौजूद
    फिर ये हंगा - म ऐ - ख़ुदा क्या है

    ये परी चेह - र लो - ग कैसे हैं
    ग़म्ज़ा-ओ-इश् - व-ओ- अदा क्या है

    सब्ज़ा-ओ-गुल - कहाँ - से आये हैं
    अब्र क्या ची - ज़ है - हवा क्या है

    हमको उनसे - वफ़ा - की है उम्मीद
    जो नहीं जा - नते - वफ़ा क्या है

    हाँ भला कर - तेरा - भला होगा
    और दरवे - श की - सदा क्या है

    जान तुम पर - निसा - र करता हूँ
    मैं नहीं जा - नता - दुआ क्या है

    मैंने माना - कि कुछ - नहीं 'ग़ालिब'
    मुफ़्त हाथ आ - ये तो - बुरा क्या है

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  3. Whether you can tell me How many total Bahars are there? and from where I can get them? Is there any site where they are listed? or can you please send me
    kavi kulwant
    kavi_kulwant@yahoo.com
    http://kavikulwant.blogspot.com

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  4. मास्साब कल घर जा के अपनी गज़लों की तकीतई करते रहे, पता चला कि बिना मतलब में ही हम अपने को कवि माने पड़े हैं, वो तो कोई भी सही नही हैं, फिर सोचा कि चलो सबकी बहरें सही कर लिया जाये तो वो तो बाप रे रात बीत गई लेकिन गज़ल न बनी, अब बताइये क्या करें ...हम तो बड़ी मुश्किल में पड़ गए, अब किस मुँह से अपने को कवि कहेंगे?

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  5. Maaf kijiyega Hindi mein na likh payi hoon.
    Par is workshop mein to gyan ka poora bhandaar hai.

    Abhinav ne kafi Home Work kiya hai aur sambhavna sahi ki or hi hongi.
    2122, 1212,22
    Faailaatun, mufailun failun
    aur
    इस ग़ज़ल की बहर निकली है।
    २१२२ - १२ - १२२२
    लाललाला - लला - ललालाला
    फाएलातुन - फलुन - मुफाईलुन
    Ismein koi fark hai to bataiyega.

    Bahut hi mutasir hui hoon is link se.

    daad ke saath

    Devi Nangrani

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