गुरुवार, 25 अक्तूबर 2007

ब्‍लागीय शरद पूर्णिमा कवि सम्‍मेलन अब कवियित्री सममेलन होता जा रहा है अब आ रहीं हैं वीना जी और दूसरे दौर में कंचन जी भी

संचालक :  एक नई कवियित्री वीना जी अपनी बहुत सुंदर कविता के साथ आ रहीं हैं तालियों के साथ स्‍वागत करें
वीना मेरी भी एक कविता पेश है---
निकले चंदा रात मुस्कराए
झूम-झूम इठलाती है
तारों से आंचल भरकर
फिर दुल्हन सी शरमाती है
दूध सी उजली, निर्मल, कोमल
चांदनी रात मन भाती है
चम-चम करते रेत के हीरे
किरणों के हार पहनाती है
झिलमिल चांदनी चमके इत-उत
मन में उल्लास जगाए है
चांद की शीतलता भी अब
मन में आग लगाए है
बचपन की वो चंचलता
जा पहुंची अल्हड़ यौवन में
चंदा-चांदनी लुक-छुप खेलें
हर घर के कोने-आंगन में
रेगिस्तान की तपती भूमि
शीतलता पाती है अब
रेत का आभास जिसे था
चमक-चमक जाती है अब
तपते रेगिस्तान को रात ने
फिर से शीतल बनाया है
रेत को भी चंद्र किरण ने
चांदी सा चमकाया है
नदियों के धारे मुस्काए
चम-चम चमके तारों से
धवल चांदनी फैली इत-उत
शोभित है मनुहारों से
गंगा के आंचल पर चमके
ब्रह्मांड का गगन मंडल
शीतल, धवल चांदनी में अब
दूध सा श्वेत लगे है जल
बच्चा मांगे मां से अपनी
चंद्र खिलौना ला दो ना
हाथ बढ़ाकर उसे बुलाता
चंदा मामा आओ ना
जहां-जहां जाता है चंदा
वहीं चांदनी जाती है
एक पल को साथ न छूटे
यही चांदनी चाहती है
एक रात मिली अरमानों की
अगले क्षण भय जुदाई का
धीरे-धीरे छुपता है चंदा
साथ मिला हरजाई का
धीरे-धीरे घटता चंद्रमा
द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी को
निशा कालिमा डस जाएगी
प्रेमी-प्रियतम चंदा को

संचालक : और दूसरे दौर में पुन: स्‍वागत करें कंचन जी का

कंचन सिंह चौहान गुरू जी एक और कविता याद आ गई, जाते जाते। असल में हम खालिस रूमानी कविता मुद्दतों में एक या दो बार ही लिख पाये होगे उन दो-तीन कविताओ में से एक कविता आपके लिये लाई हूँ, जिसे मैने १९९४ लिखा था,उस उम्र में जब किशोरावास्था जाने की तैयारी कर रही थी। कविता इस तरह है-
देख रहे हैं ऐसा सपना जो सच होगा कभी नही,
हम जाने को कहते हैं और वो कहते हैं अभी नही!
ढूढ़ रही हैं उनकी आँखें भरी भीड़ में मुझको ही,
और हमरी आँखें देखें निर्निमेष सी उनको ही,
और अचानक ही हम दोनो एक दूजे से मिलते है,
आँखें सब कुछ कह जाती है , मगर ज़बानें खुली नही।
दूर कहीं सूरज ढलता हो, छत पर हम दो, बस हम दो,
एक टक वो देखें हो मुझको और मेरी नज़रें उनको,
दिल की धड़कन हम दोनो की तेज़ ही होती जाती है,
कहे हृदय अब नयन झुका लो, मगर निगाहें झुकी नही।

कवि सम्‍मेलन जारी हैं भेजते रहें कविताएं ब्‍लागिया कवि सम्‍मेलन में ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वीना जी..बधाई...

    कंचन जी का दूसरा दौर भी हो गया और हमारा अभी नम्बर आना बाकी है. क्या करें-

    अक्सर देर कर देता हूँ मैं.(मुनीर नियाजी)

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  2. गुरु जी सदर प्रणाम,
    मैं भी इस कवि सम्मलेन में शामिल होना चाहता हूँ क्या करना होगा मुझे ... कृपया सुझाव दे...

    आपका विनीत
    अर्श

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