सोमवार, 22 अक्तूबर 2007

भंतेलाल जी भटियारे : एक वरिष्‍ठ पत्रकार के जीवन वृत्‍त का गीदड़ावलोकन

मित्रों हमने भंतेलाल वरिष्ठ पत्रकार तो लिख दिया, पर हमें स्वयं को पता नहीं कि भंतेलाल के बीच ये वरिष्ठ कब और कैसे आ गया, पर चूंकि सब कहते हैं तो हमें भी कहना पड़ेगा। भंते और हमारे परिवार का काफी गहरा रिश्ता रहा है, और वो रिश्ता भी एसे, कि कक्षा छ: में वे हमारे साथ पढ़े, और बाद में हमारे सभी छोटे भाईयों का उन्होने कक्षा छ: में ही साथ दिया, हमारे सबसे छोटे भाई को छठी से सातवीं में बिदा करने के बाद उन्होने पढ़ाई से भी विदा ले ली, जाहिर सी बात थी हमारे बच्चों का साथ देने के लिए काफी ज्यादा रूकना पड़ता। हाँ तो हमारे प्यारे ''भंतेलाल छठी में छ: बार फेल'' को अंतत: मूंगफली का ठेला लगाना पड़ा, पार्ट टाइम में समाचार पत्रा बांटने का कार्य भी प्ररंभ कर दिया। एक दिन अचानक भंतेलाल हमारे पास आए और बोले ''दद्दा हम पत्रकार बनने का सोच रहे है'' हमारा आश्चर्य सारी सीमाऐं तोड़ गया हमने कहा ''भंते हमने अपनी पूरी पीढ़ी को तुम्हारे साथ कक्षा छ: में समय गुजारते अपनी इन्ही आंखों से देखा है, और वहाँ से सीधे मूंगफली के ठेले पर स्थानांतरित होते देखा हैं, हमारे साथ मजाक मत करों'' । भंते कुछ सीरियस हो गये बोले ''दद्दा ये तुमसे किसने कह दिया कि पत्रकार बनने के लिए पढ़ा लिखा होना आवश्यक है, आवश्यकता होती है केवल समाचार पत्रों से जुड़े रहने की, तो वो तो हम कई सालों से जुड़े हैं'' अब पुन: हमारे आश्चर्य चकित होने की बारी थी हमने पूछा ''भंते तुम समाचार पत्रों से जुड़े हो हमे पता ही नहीं था  भला बताओ तो कैसे और कब से जुड़े हो ? ''भंतेलाल इस तरह मुस्‍कुराए मानो पोखरन के तीसरे विस्फोट का रहस्य खोलने जा रहे हों, बोले ''दद्दा हम दस सालों से पेपर बांटने का कार्य कर  रहे हैं, और पेपर में बांधकर ही तो हम मूँगफलियाँ बेचते हैं, तो जुड़े के नहीं हम पेपर से? हमे पत्रकारिता के बारे में सभी कुछ पता है।'' ''हमारा आश्चर्य अभी भी भंतेलाल की पत्रकार वाली मूर्ती को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था, अत: हमने पुन: पूछा ''पर भंते तुम्हारे इतने मनमोहक व्यक्तित्व का साक्षात अवलोकन करने के पश्चात तुम्हें पत्रकार बनाएगा कौन सा समाचार पत्रा ? ''भंते आज मुस्कुराहटों का कुछ अतिरिक्त कोटा लेकर आए थे, हल्की मुस्कुराहट के साथ बोले ''एक समाचार पत्र है जो हमें अपना संवाददाता नियुक्त कर रहा हैं ''शाम की बंदूक'' हमने विस्मय से कहा ''बड़ा हिंसक नाम है, क्या संपादक सीधे चंबल के बीहड़ों से चला आ रहा है, और इस समाचार पत्र को खरीदेगा कौन ? हमने तो आज तक इसमें मूंगफली तक नहीं खाई''। भंते भगवान बुध्द की तरह मंद मंद मुस्कुरा रहे थे बोले ''दद्दा हमें तो शक हो रहा है, कि तुम सचमुच पढ़े लिखे हो भी या नहीं, अरे शहर में पचास सरकारी दफ्तर हैं, पचास प्रतियाँ तो वहाँ बँट जाऐंगी, और भगवान की दया से हमारे शहर में नेताओं की भी कमी नहीं है, अब उन्हें न्यूज छपवानी है तो पेपर तो लेना ही पड़ेगा, और फिर तुम्हारे जैसे मित्र भी तो हैं जो हमें मना नहीं करेंगे'' हमारी उत्सुकता फिर भी शांत नहीं हुई थी अत: पुन: पूछा ''भंते तुम तो अब भी हिंदी के मामले में अ-इमली का, म-टमाटर का, और क-खरगोश का हो, तुम्हारा हस्तलेख विश्व का कोई भी व्यक्ति नहीं पहचान सकता है, कि किस भाषा में लिखा गया है, तुम्हारी हस्तलिखी देखने में ऐसी लगती है, कि या तो ये मोहन जोदड़ो या हड़प्पा की खुदाई में निकले शिलालेख हैं, या फिर कोई स्याही में भीगा चींटा शराब पीकर कागज पर चल दिया हो, इतनी सारी विशेषताओं के बाद तुम समाचार किस तरह बनाओगे?'' भंते हिकारत से हमारी तरफ देखते हुये बोले ''पत्रकार को समाचार नहीं बनाने पड़ते, जिसे छपवाना होता है वो खुद अपना समाचार टाईप करवा कर लाता है, हमें तो बस भेजना होता है''। हमने सोचा अब भंते से और अधिक बहस करना फिजूल है, कर लेने दो प्रयास, आखिर को पत्रकार बनना इतना आसान काम भी नहीं है। खैर साहब काफी दिन गुजर गए और हम ये भी भूल गए कि भंते ने पत्रकार बनने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था, हम यही सोचते थे कि भंतेलाल पत्रकारिता से पुन: मूंगफली के ठेले पर आ गए होंगे। अचानक एक दिन हमने समाचार पत्र खोला तो यूं लगा मानो समाचार पत्र में से किसी हाथ ने निकल कर हमें जबरदस्त घूंसा मार दिया है। समाचार पत्र में भंते की फुल वीभत्स मुस्कुराहट युक्त फोटो छपी थी, साथ में लिखा था ''कल फलाने मंत्री श्री भंतेलाल वरिष्ठ पत्रकार को पत्रकारिता पुरूस्कार से सम्मानित करेंगे। उस दिन से ही हम अपनी किस्मत को कोस रहे हैं, काश हम भी कक्षा छठवीं में छ: बार फेल हो गए होते तो आज हम भी वरिष्ठ होते।

( नोट : ये केवल एक व्‍यंग्‍य लेख है यदि आप भी पत्रकार हैं और भंतेलाल जी से आपके कुछ गुण मिलते हैं तो उसमें हमारी कोई ग़लती नहीं है )

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन!!! बहुत दूर कहीं मार की है.

    वैसे तो आप छटवीं पास होने के बावजूद भी वरिष्ठ हो लिये हैं: वरिष्ठ माड़साब!!

    क्लास काहे बंद है आजकल?

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  2. वाह वाह, अभी अभी आपकी इस रचना का सस्वर पाठ किया है, आपने जिन उपमाओं का प्रयोग किया है, उन्हें सुनने के बाद यहाँ उपस्थित सभी लोगों का हंस हंस कर बुरा हाल हो गया है। मुझे तो ऐसा लगने लगा है कि आप ग़ज़लकार ज्यादा अच्छे हैं या व्यंग्यकार। बहुत उतकृष्ट रचना पोस्ट की है आपने। यदि आपका कोई व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुआ हो तो कृपया सूचित कीजिएगा।

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