गुरुवार, 11 अक्तूबर 2007

आज मुझे बिल्‍कुल एहसास नहीं हुआ कि मेरे मित्र के बिना ही मैं अपना जन्‍म दिन मना रहा हूं । वे मित्र जिन्‍होंने फरवरी में आत्‍महत्‍या कर ली थी ।

आज जब सुब्‍ह आफिस आया तो मन उदास था और वो इसलिये कि अपने मित्र मोहन राय के बिना आज का जन्‍म दिन मुझे बहुत सूना लग रहा था । मोहन राय जिनको मैं प्‍यार से चच्‍चा कहता था । वे भी कवि थे उनके दो काव्‍य संग्रह गुलमोहर के तले और झील का पानी प्रकाशित हो चुके थे । अच्‍छे खासे इंसान थे बैंक में मैनेजर थे । और मेरे बहुत अजी़ज दोस्‍त थे । मगर जाने क्‍या हुआ साइटिका के दर्द से ही हार गए और एक रात जब दर्द हद से गुज़र गया तो पंखे से लटक कर जान दे दी । मैं आज उदास इसलिये था कि मेरे जन्‍म दिन पर सबसे पहला फोन उन्‍हीं का आता था '' हां भैया जी जन्‍मदिन मुबारक हो ,खूब छाए हुए हो आजकल '' और उसके बाद आफिस में एक बड़ी सी माला और मिठाई का डब्‍बा लेकर आने वाले भी वे पहले होते थे । घूम घूम कर मेरे सारे छात्रों को बताते कि आज तुम्‍हारे सर का जन्‍मदिन है । और फिर शाम को कविता का आयोजन रखते । मगर आज वो नहीं थे ।

सुब्‍ह जब आफिस आया तो सबसे पहले ब्‍लाग देखा तो वे सारी‍ टिप्‍पणियां मिलीं जो पूर्व की पोस्टिंग में डाल चुका हूं । फिर अचानक फोन की घंटी बजी मुझे बताया गया कि किन्‍हीं अभिनव का फोन है मेरा इस नाम का कोई स्‍थानीय परिचित तो नहीं है अत: समझ गया कि कौन अभिनव है। मैं अभिभूत हो गया अभिनव से बात करके मुझे लगा कि वो बात सही है कि ईश्‍वर एक दरवाज़ा बंद करता है तो दो खोल देता है । अमेरिका से आए अभिनव के फोन ने  मोहन राय जी के दुख को कम कर दिया और मुझे सामान्‍य कर दिया ।  फिर टिप्‍पणियां भी दिन भर मिलती रहीं । और वो टिप्‍पणी जो मुझे कंचन के ग्रीटिंग पर मिली वो यूं थी

मेरे ब्लॉग पर जब आपने अपने मित्र और जन्म दिवस की चर्चा एक साथ की थी तभी से आपके जन्मदिन की प्रतीक्षा कर रही थी, आपके वो मित्र जो सबसे पहले आपको शुभकामनाएं देते थे, मुझे पता है आज वो आपको बहुत याद आ रहे होंगे, कोई व्यक्ति किसी का स्थानापन्न हो जाता तो व्यक्ति और वस्तु में अंतर ही क्या रह जाता.... परंतु समझियेगा कि उन्ही की प्रेरणा से मैं आपको शुभकामनाएं दे रही हूँ, मैं कई बार अपने को इसी तरह खुश कर लेती हूँ।
मेरी छोटी सी लेकिन सच्ची शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये। जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़

कंचन

संजय बेंगाणी हम शायद बधाई देने से चुक गये. कृपया स्वीकार करें

दीपक श्रीवास्तव मेरी तरफ़ से भी बधाई हो

Manish देर से ही सही पर जन्मदिन की ढ़ेर सारी बधाई ! बहुत अच्छी तरह आपने सब से एपने ज्ञान को बाँटा है। लगे रहें।

Raviratlami
मेरी भी हार्दिक बधाईयाँ स्वाकारें.

कंचन सिंह चौहान गुरू जी आज सच में गाड़ी पंक्चर हो गई थी और आप तो जानते ही हैं कि हम कार्यालय में ही कक्षा attand कर पाते हैं , तो थोड़ी देर हो गई लेकिन स्वीकार कर लीजिये मेरी शुभकामनाएं
वो बड़ी सी शख्सियत है, मेरी छोटी सी दुआ,
वो है खुद में नूर और मैं एक पतली सी शुआ।
ऐ खुदा उनको न हो मालूम पर देना असर,
दूर रखना चश्म-ए-बद से, छू न पाए बद्दुआ।
अभी बस ताज़ा ताज़ा लिखा गुरू जी, अपनी तरफ से बहरें भी गिन ली हैं और दुआ भी मन से की है।
जनमदिन मुबारक

Udan Tashtari हमारे प्रिय माड़साब को जन्म दिन की बहुत सारी बधाईयाँ.
कोई और होता तो हम भी कविता सौगात में देते मगर आपका क्या-लगे छड़ी चलाने तो डर के मारे सिर्फ गद्य में बधाई भर दे रहे हैं, इस में बहर और काफिये का कोई लफड़ा नहीं है.
अनेकों शुभकामनायें. आप यूँ ही ज्ञान बांटते रहें, यही कामना है. यू ट्यूब पर भी आपको सुन कर आनन्द आ गया.
केक खिलाईये

राकेश खंडेलवाल ज्ञान के यूँ खज़ाने लुटाते रहें
सीखने सब यहाँ रोज आते रहें
ये जनमदिन मुबारक रहे साल भर
हर सुबह हम यही गुनगुनाते रहें
आप गज़लों की डोरी संभाले रहें
और हम गीत आकर सुनाते रहें
आपके पंथ में रोज दीपावली
के हज़ारों दिये जगमगाते रहें
शुभकामनायें

Neeraj Rohilla हम भी किलास में आये थे इसीलिये उपस्थित कह कर जा रहे हैं, होमवर्क करके अगली बार फ़िर हाजिरी लगायेंगे ।
हमारे प्यारे मास्साब को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें, एक कविता लिखी थी कक्षा १२ में जन्मदिन पर वो आपको समर्पित है ।
कल तसस्वुर में तुम याद आये,
आज जन्मदिन की सौगात लाते,
सोचा क्या दूँ तुमको मैं उपहार,
लिख कर लाया हूँ शब्द दो-चार,
शब्द भावनाओं के मोती हैं कोमल,
सरिता के समान स्वच्छ निर्मल
उत्साह और उमंग की नाव में सवार,
दोनों हाथों से थाम जीवन की पतवार,
करो तुम जीवन की मुश्किल सब पार,
जन्मदिन की शुभकामनायें बार-बार ।
अब छडी न घुमा दीजियेगा, बता रहे हैं कक्षा १२ में लिखी थी :-)

अभिनव ग़ज़लों की खुशबू से जग महकाते उस्ताद जी,
जन्मदिवस की आपको बहुत मुबारकबाद जी,
अभी अभी यू ट्यूब पर देखे हमने वीडियो,
अद्भुत सुंदर वाह वाह स्वीकारिए दाद जी,

धन्‍यवाद आप सभी को आप ने मेरे मित्र का दुख मुझे महसूस नहीं होने दिया । और जन्‍म दिन को उल्‍लास से भर दिया । विशेषकर अभिनव तुमको धन्‍यवाद तुमने मुझे मेरे उस विश्‍वास पर फिर कायम कर दिया कि दुनिया में सारे रिश्‍ते पैसे के आस पास ही नहीं होते और भी कुछ रिश्‍ते होते हैं जो पैसों की सीमा से कहीं परे होते हैं । आप सभी का आभार मेरे पास सचमुच में आज शब्‍द नहीं हैं इसलिये उधार के शब्‍दों से काम चला रहा हूं

अहसान मेरे दिल पे तुम्‍हारा है दोस्‍तों

ये दिल तुम्‍हारे प्‍यार का मारा है दोस्‍तों

4 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी तरफ़ से भी शुभकामनायें।

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  2. सुबीर जी,
    साल गिरह की अनेकोँ शुभ कामनाएँ -- हिन्दी ब्लोग - जात से देखिये ना, कितने अच्छे, सच्चे मित्र मिल रहे हैँ तो आप अपने दोस्त को याद कर के उदास ना हो इयेगा ...उनकी आत्मा को शाँति मिले ये प्रार्थना करियेगा. हर प्रश्न का उत्तर हमेँ नहीँ मिलता.अन्यथा जीवन सँपूर्ण हो जाये !
    -- स - स्नेह -- लावण्या

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  3. आपके मित्र मोहन राय जी के विषय में जानकर अफसोस हुआ. यह जीवन ऐसा ही है, माड़साब.चलता जाता है.

    अब मूड़ फ्रेश करके फिर क्लास पर आ जायें.छड़ी लाना मत भूलियेगा.

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  4. आप से गज़ल सीखना शुरु करनें से पहले ये लिखने का प्रयास किया था । बहर, काफ़िया, वज़्न आदि ठीक नहीं लगते । आप को आप के जन्मदिन पर सादर समर्पित है :


    परिधि के उस पार देखो
    इक नया विस्तार देखो ।

    तूलिकायें हाथ में हैं
    चित्र का आकार देखो ।

    रूढियां, सीमा नहीं हैं
    इक नया संसार देखो

    यूं न थक के हार मानो
    जिन्दगी उपहार देखो ।

    उंगलियाँ जब भी उठाओ
    स्वयं का व्यवहार देखो

    मंजिलें जब खोखली हों
    तुम नया आधार देखो ।

    हाँ, मुझे पूरा यकीं है
    स्वप्न को साकार देखो ।
    --

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