गुरुवार, 4 अक्तूबर 2007

गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं, अभी मस्जि़द के दरवाज़े पे मायें रोज़ आती हैं , ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला

ये सच है नफ़रतों की आग़ ने सब कुछ जला डाला
मगर उम्‍मीद की ठंडी हवायें रोज़ आती हैं
राना साहब ने ग़ज़ल को लेकर एक सबसे अच्‍छा काम किया है और वो ये है कि उन्‍होंने ग़ज़ल को आम आदमी के समझ में आ जान वाली शै: बना दिया है । और वास्‍तव में आज जो गज़ल़ की लोकप्रियता है वो इसी के चलते है । अन्‍यथा तो हम जानते हैं कि साहित्‍य का क्‍या हाल है इन दिनों ।
ख़ैर कुछ ग़ज़लें कहीं पढ़ते हुए अच्‍छी मिल जाती हैं तो आपके साथ बांट लेता हूं । कभी कभी गुस्‍सा भी आता है जब छात्र अनपस्थित होते हैं तो ।
चलिये अब कुछ आगे चला जाए हम बहर की बात शुरू कर रहे हैं और एक क्‍लास उस पर हो भी चुकी है । ये माना जाए कि अभी हम मात्रा का संतुलन ही साधना सीख रहे हैं । और ये जानना चाह रहे हैं कि किस प्रकार से मात्रा गिनी जती है । ग़ज़ल का सबसे मुश्किल काम ये ही है कि आप मात्रा की गणना ठीक प्रकार से कर पाएं ।
शेर के टुकड़ों को वज़न की तराज़ू पर तौलने को तकतीई कहा जाता है ये मैं पहले भी बता चुका हूं । आइये अब इसी बारे में तफ़सील से बात की जाए । दरअसल में तकतीई करना ही वो गुण है जो किसी की म़ुकम्‍मल शाइर बनता है और तकतीई करना मतलब रोज़ और अभ्‍यास के साथ करना ये ही आपको पूर्ण बनाता है । जो इस घोड़े को काबू कर लेता है ग़ज़ल का संसार उसकी मुट्ठी में होता है । तो देखा जाए तो शे'र के टुकड़ों को बहर की तराज़ू पर तौलने की प्रक्रिया ही तकतीई है । हालंकि पहले की कक्षाओं में हम तकतीई करना काफी देख चुके हैं मकर फिर भी उदाहरण के लिये हम एक बार और देखें और वो इसलिये क‍ि अब आप ख़ुद भी ये करना सीखें कम अ स कम अपने रुक्‍न तो निकालना सीख ही लें ।
अब जैसे आप से कहा जाए कि ऊपर के राना जी के शे'र की तकतीई करो तो आपको सबसे पहले तो उसके कम से कम दो शे'र चाहिये वो इसलिये कि कभी कभी केवल एक ही शे'र से बहर का ठीक अनुमान नहीं लगता है । अगर आप बिल्‍कुल ठीक बहर निकालना चाहते हैं तो तकतीई के लिये कम अ स कम दो शे'र लें । ऐसा इसलिये कि यहां पर लघु का दीर्घ और दीर्घ का लघु होता रहता है अब आप को कभी कभी धोखा हो सकता है इसलिये दो शे'र की तकतीई करके शंका को दूर कर लें ।
गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
इसकी तकतीई करें
गले मिलने क आपस में दुआयें रो ज़ आती हैं
मतलब बात साफ है कि पूरे शे'र में एक ही तरह रुक्‍न हैं शे'र में एक ही रुक्‍न मुफाईलुन या 1222 आ रहा है । तकतीई करते समय हम गिरे हुए दीर्घ को लघु उच्‍चारण ही लिखते हैं जैसे ऊपर क आपस में लिखते समय को को लिखा गया है ।
आगे देखें
अभी मस्जि़द क दर वाज़े प मायें रो ज़ आती हैं
1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2
मु फा ई लुन मु फा ई लुन मु फा ई लुन मु फा ई लुन
अब यहां पर क्‍या हुआ है कि मस और जि़द दोनों को तोड़ कर अलग कर दिया गया है । पे मायें को प मायें लिखा है क्‍योंकि वज्‍़न वही कह रहा है ।
आप इस को लेकर मश्‍क करें अभ्‍यास करें क्‍योंकि मैं चाहता हूं कि आप कौ भी ये कला आए ताकि आप भी बड़े नाम वाले शाइरों को कह सकें कि जनाब ये आपका शे'र तो मीटर से बाहर जा रहा है । और इसके लिये तकतीई करना सबसे अच्‍छा काम है करते रहो जो शेर मिले उसे कस डालो तख्‍ती पर और करडालो उसका पोस्‍टमार्टम डरो नहीं । क्‍योंकि जो डर गया वो ...........। मैंने भी यही किया जो शे'र हाथ में आता उसको कस देता और निकाल लेता उसका वज्‍़न ।कभी ग़लत होता कभी सही और फिर धीरे धीरे ठीक होता गया । आप को आज ये अतिरिक्‍त कक्षा कल की तैयारी के लिये दे रहा हूं ।
एक ख़ुश्‍ख़बरी है दो अक्‍टूबर को शहर की संस्‍था नवोदित कला मंच ने मास्‍साब को साहित्‍य विद् सम्‍मान प्रदान किया है । सभी छात्रों को इस अवसर पर नुक्‍ती बांटी जा रही है जाते समय भैन जी से लेते हुए जाएं । और उड़नतश्‍तरी का ध्‍यान रखें पन्‍द्रह अगस्‍त पर जब नुक्‍ती बांटी जा रही थी तो दूसरी बार फ्राक पहन कर आकर ले गया था ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ कल का ही मामला दोहराया है आज के लेक्‍चर में वो इसलिये कि मुझे लगता है कि तकतीई करना अभी आ नहीं रहा है । वो एक बार आ जाएगा तो बहर निकालना तो आसान है ।

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  2. बाकी तो अभी दफ्तर से फुरसत हो कर कोर्स पूरा करता हूँ बस इसलिये जल्दी में आया कि आपको साहित्‍य विद् सम्‍मान से सम्मानित किया गया तो मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई दे दूँ. आप सम्मानित हुए, हम सब सम्मानित हुए. नुक्ति का पैकेट भैन जी से लेकर निकलता हूँ. दफ्तर में खा लूँगा. :)

    आपको ऐसे ही अनेकों सम्मान मिलते रहें, इस हेतु हार्दिक शुभकामनायें.

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  3. सुबीर जी आप बहुत अच्छा काम कर रहें हैं. उर्दू का शौक हमें भी है पर कभी सीख नहीं पाये. अब आपके मदरसे में दाखिला मिल जाए तो ये हसरत भी पूरी हो जाए.

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  4. Waah Pahunch kar paaya samunder mein aur taalab ka antar kya hai.
    Mubarak ho

    Shubhkamnaon ke saath

    Devi Nangrani

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  5. यस सर,

    आज के होम वर्क के रूप में कुछ शेरों की तख्ती कर रहा हूँ।

    बशीर बद्रः (लालालला लालालला लालालला लालालला)
    सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं
    मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
    देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
    मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
    जिस पर हमा री आँख ने मोती बिछाये रात भर
    भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

    भाई वाह, बशीर बद्र साहब का क्लास अलग है, एक एक शेर जैसे मोती पिरोया हो माला में। इन शेरों का मीटर नापते समय ऐसा लगा मानो इनकी सुंदरता का असल एहसास हुआ हो। बहर तो जैसे बह रही है इनमें।

    दुष्यंत कुमारः (लाललाला लाललाला लाललाला)
    बाढ़ की सं भावनाएँ सामने हैं,
    और नदियों के किनारे घर बने हैं,
    आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन,
    इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं,
    जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,
    हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं,
    दुष्यंत कुमार के शेरों में जो तल्खी होती है वह गजब ढ़ाती है। "इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं," भाई क्या गहरी बात कह गए हैं। इनके शेर भी बहुत सुंदर लगे और तख्ती करने में बड़ा आनंद आया।

    और अब आज की क्लास की बहर पर कुछ शेर लिखने की कोशिश कर रहा हूँ,

    ये दुनिया नीर की बदली है तो नीरज गुरूजी हैं,
    हमें सिखला रहे लेखन सुलभ धीरज गुरूजी हैं,

    नवोदित मंच का सम्मान खुद इससे बढ़ा होगा,
    बहुत शुभकामनाएँ आपको पंकज गुरूजी हैं,


    इन शेरों की तख्तीः
    बहरः
    १२२२ १२२२ १२२२ १२२२
    ललालाला ललालाला ललालाला ललालाला
    मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन
    ------
    ये दुनिया नी - र की बदली - है तो नीरज - गुरूजी हैं,
    हमें सिखला - रहे लेखन - सुलभ धीरज - गुरूजी हैं,

    नवोदित मं - च का सम्मा - न खुद इससे - बढ़ा होगा,
    बहुत शुभका- मनाएँ आ - पको पंकज - गुरूजी हैं,

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  6. आदरणीय गुरुवर,

    इधर हस्ती साहब की एक ग़ज़ल पर ज़ोर आज़माइश कर रहे थे कि लगा मानो हमनें बहर की गड़बड़ी पकड़ ली हो। कृपया बताइएगा कि क्या यह सचमुच गड़बड़ी है यह हमारी भूल है। शेर कुछ इस तरह हैं,

    हम ले के अपना माल जो मेले में आ गए,
    सारे दुकानदार दुकानें बढ़ा गए,
    बस्ती के कत्ले-आम पे निकली न आह भी,
    खुद को लगी जो वोट तो दरिया बहा गए।

    इसमें मतले के मिसरा-ए-सानी के दूसरे रुक्म में कुछ गड़बड़ी लग रही है।
    इस ग़ज़ल की मूल बहर है
    लालालला लालालला लालालला लला
    हम ले के अप - ना माल जो - मेले में आ - गए,
    सारे दुका - नदार दु - कानें बढ़ा - गए,

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  7. बधाई हो मास्साब! हमने पाठ पढ़ लिया है, अभी होमवर्क बाकी है।

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  8. आप को इस सम्मान पर बधाई हो । आजकल कुछ व्यस्तता चल रही है । होमवर्क हो नहीं पा रहा । बाद में ओवरटाइम कर के पूरा कर लेंगे ।

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