Monday, 31 December, 2007

ये कमर छत्तीस से अड़तीस हो गइ सात में, देखना होगा कि जायेगी कहाँ तक आठ में, है हमारे पास जो कुछ वो गुलामी से मिला, मेरे बच्चों को पढाया जा रहा है पाठ में,

TEPA2

नए साल की सभी को शुभकामनाएं हों आप सभी के लिये नया साल सुखद हो और आपके लिये वो सभी रास्‍ते खोल दे जिनको आप खोलना चाह रहे हैं । 2008 के बारे में कहा जा रहा है कि ये काल का साल है पर हम कवि हैं हमारा तो ये ही कहना है कि जो कुछ भी होगा अच्‍छा होगा और सर्वे भवन्‍तु सुखिन: की कामना हमारे मन में हमेशा रहती है । नय साल जो कि हमें कुछ नया करने की प्रेरणा देता है और हमें याद दिलाता है कि जो काम पिछले साल में अधूरे रह गए हैं उनको पूरा करना है साथ में कुछ नए संक्‍ल्‍पों के साथ कुछ और स्‍वप्‍न भी देखने हैं, स्‍वप्‍न जो कि हम अपनी आंखों में संजोएं और प्रयत्‍न करने की राह पर चलें की वो पूरे हों । हम आशाओं के नए दीप जलाकर इस नए साल का स्‍वागत करें । अभिनव  का कहना है कि  ये कमर छत्‍तीस से अड़तीस हो गई सात में, देखना होगा कि जाएगी कहां तक आठ में । मेरा कहना है कि यूं ही दो इंच्‍ा हर साल तरक्‍की भी करो । एक और नया साल अपनी सुनहरी किरणों के साथ आ गया है हम सब हर साल की तरफ आशा भरी नजरों से देखते हैं और सोचते हैं कि देखें ये नया साल हमारे लिये वो सारे स्‍वप्‍न लेकर आया है कि नहीं जो हम देखना चाह रहे हैं । गा़लिब ने कहा था इक बराहमन ने कहा है कि ये साल अच्‍छा है ।

TEPA1

आज मुशायरा है और केवल तीन ही कवियों की ग़ज़लें मिलीं हैं उनको ही आज लगाया जाएगा । किसी शायर की ये पंक्तियां याद आ रही हैं। 

बर्फ छाए तो पहाड़ों को नशा छाता है ,

गीत चलने से चरागों को नशा आता है,

साल गुज़रा है मियां तुम गए गुज़रे न लगो,

जनवरी नाम से हर साल नया आता है ।

रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्‍छा है

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्‍छा है ।

मुशायरा जारी रहेगा ब्रेक के बाद

Sunday, 30 December, 2007

एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया, झुलसाता जेठ मास, शरद चांदनी उदास, सिसकी भरते सावन का अंर्तघट रीत गया, एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया

और देखते ही देखते एक और बरस बीत गया । हमारे जीवन का एक और साल चला गया । युगों से ये ही होता आ रहा है और न जाने कब तक ये ही चलता रहेगा । साल आते रहेगें और जाते रहेंगें । हम आज जहां पर हैं कल वहां पर हमारे बच्‍चे होंगें और परसों उनके भी बच्‍चे होंगें । हममे से कई ऐसे होंगें जिनको आने वाले समय में भी याद रखा जाएगा और कई ऐसे भी होंगें जो गुमनाम ही चले जाऐंगें । हममे से ही शायद कोई ऐसा कवि आएगा जो कि हो सकता है मीरा सूर कबीर की तरह अमर हो जाएगा । बरसों बाद भी उसकी कविताएं गुनगुनाती रहेंगीं । आज जैसे हम ग़ालिब को और तुलसी को गाते हैं उस तरह शायद हममे से कोई कवि ऐसा हो जिसे हमारे बाद आने वाली पीढियां गाएं । आज मैंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता को मुखड़े में लगाया है मुझे अटल जी की कुछ कविताएं बहुत पसंद हैं । एक उनकी कविता है टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्‍वर पत्‍थर की छाती में उग आया नव अंकुर  ये भी मुझे खास तौर पर पसंद है । कहते हैं कि कविता की मौत नहीं होती है वो तो सदियों तक जिंदा रहती है और अपनी पहचान बनाए रखती है आज हम किसी भी रूप में तुलसी को कबीर को गाते ही हैं । कविता हर समय का सबसे सशक्‍त हथियार है वो आपरेशन करने वाला औजार भी है और फिर घाव पर लगाया जाने वाला मरहम भी वही है । कविता ने मानव को स्‍वर दिया है हम कल्‍पना नहीं कर सकते कि तब क्‍या होगा जब कविता मर जाएगी । मैं ये बात इसलिये कह रहा हूं कि आज भी कविता संकट में है और आने वाला समय तो और भी कष्‍टदायक होना है । कविता विरोध करने का सबसे सशक्‍त तरीका है । कविता तलवार की तरह से घाव नहीं करती कविता तो सूई की तरस से धंस जाती है और टीसती रहती है । शायद इसीलिये राजनीति को कविता पसंद नहीं आती है ।

आज कविता की बात इसलिये कर रहा हूं कि कविता ने पिछले साल मुझे कई अच्‍छे मित्र दिये हैं मेरे फलक को और विस्‍तृत कर दिया है । और इस साल के प्रारंभ में हिंद युग्‍म पर भी मैं ग़ज़ल की और कविता की नियमित कक्षाएं प्रारंभ करने जा रहो हूं । यहां पर ब्‍लाग पर तो काफी आगे हम आ चुके हैं और काफी विद्यार्थी काफी अच्‍छा लिखने लगे हैं । मगर अभी भी ऐसा लगता है कि और भी कुछ किया जाना बाकी है । अपने ब्‍लाग पर ग़ज़ल की कक्षाएं प्रारंभ करते समय मुझे ज्ञात नहीं था कि ये कक्षाएं मुझे कितने नए लोगों तक पहुंचा देंगीं । प्रारंभ मे तो मैं भी गंभीर नहीं था पर जैसे जैसे लोग जुड़ते गए कारवां बनता गया और आज हम एक परिवार की तरह से हैं । अभी कुछ दिनों पहले यहां के दैनिक जागरण ने हमारी ग़जल की क्‍क्षाओं पर विशेष समाचार बनाया था । जिसमें सभी विद्यार्थियों का भी उल्‍लेख था एक दो दिन में मैं उस समाचार को स्‍कैन करके लगाऊंगा ताकि सभी उसे देख लें । रवि रतलामी जी  ने अनुरोध किया है  कि मैं हार्डवेयर पर भी एक ब्‍लाग प्रारंभ करके वहां पर कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर का ज्ञान देना प्रारंभ करूं । मेरी भी इच्‍छा है पर क्‍या करा जाए समय की सीमा है मैं प्रात: का जो थोड़ा सा समय है वही दे सकता हूं । फिर भी प्रयास करूंगा कि कुछ कक्षाएं उस पर चालू कर  सकूं ।

पिछले साल ने मुझे काफी कुछ दिया है । पिछले साल में मेरी दस कहानियां और इतने ही व्‍यंग्‍य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए और चर्चित भी हुए । कवि सम्‍मेलनों में भी पसंद किया गया और पत्रकार के रूप में कुछ कहानियों को प्रमुख चैनलों पर स्‍थान मिला । उसके अलावा आप सभी से जो परिचय हुआ वो तो साल की सबसे बड़ी उपलब्‍धी है । एक साल ठीक तरीके से ग़ुज़र रहा है । हालंकि व्‍यवसाय में परेशानी का साल रहा । व्‍यवसाय ठीक नहीं चल रहा है क्‍योंकि आजकल कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण केन्‍द्रों की बाढ़ सी आ गई है । उस पर ये भी नहीं देखा जाता कि सिखाने वाले को खुद भी आता है या नहीं । हो सकता है कि 2008 में व्‍यवसाय को नया मोड़ देना पड़े । हालंकि जो कोर्स हम चलाते हैं उसमें हार्डवेयर, नेटवर्किंग और ग्राफिक्‍स एनीमेशन जैसे विषय हैं पर फिर भी वो बात नहीं आ पा रही है जो आनी चाहिये । शायद छोटी जगह पर काम करने का ड्रा बैक है ये ।

कल मुशायरा है कुछ ही लोगों की कविताएं आईं हैं आज तक जिनकी भी आ जाएंगी उनको लेकर ही कल का मुशायरा होगा । और फिर नए साल में हम प्रारंभ करेंगें बहरों का ज्ञान । अभी मैं क्‍लासों को इसलिये बंद रखे हूं क्‍योंकि अभी छुट्टी का समय चल रहा है सभी लोग परिवारों के साथ हालिडे मना रहे हैं और ऐसे में बहरों का महत्‍वपूर्ण सेशन शुरू करने से उनको नुकसान होगा । तो हमने भी हालीडे घोष्ति कर रखा है । आप सब को आने वाले 2008 की शुभकामनाएं । आपका ही पंकज सुबीर ।

Thursday, 27 December, 2007

जूलियट, सोहनी, लैला या हीर होती है , शम्‍अ होती है धुंए की लकीर होती है, बाद सदियों के कोई इन्दिरा सी है आती, और सदियों में कोई बेनज़ीर होती है

बेऩजीर अलविदा तुमको । तुम उस दौर की नेता रहीं हों जब शायद मेरे उम्र के लोगों के मूंछों के कल्‍ले फूट रहे थे । हम जिनके लिये उस समय कपिल देव, अमिताभ बच्‍चन, राजीव गांधी जैसे हीरो हुआ करते थे ठीक उसी समय तुमने भी 1988 में पाकिस्‍तान की बागडोर संभाली थी । मुझे याद आता है कि उस समय भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और किसी शायर ने कहा था

रश्‍क आता है तेरी किस्‍मत पर क्‍या तेरे हाथ को लकीर मिली

और सब नेमतें तो हासिल थीं अब पड़ोसन भी बेनज़ीर मिली

  और आज तुमको विदा भी देना पड़ गया । सृष्टि का नियम है  आए हैं सो जाएंगे राजा रंक फ़क़ीर  मगर कभी कभी किसी का जाना ऐसा होता है जो कि चुभता रहता है टीस देता रहता है सदियों तक । वैसे हमारा भारतीय उप महाद्वीप तो सदियों से अपने नेताओं की हत्‍या करता रहा है । तुम को हम कैसे बख्‍श देते जब हमने महात्‍मा गांधी को तक नहीं बख्‍शा जब हम उस बूढ़े और कृशकाय शरीर में गोलियां उतार सकते हैं तो फिर तो हम किसी को भी मार सकते हैं । हम भारतीय उपमहाद्वीप के लोग जिनहोंने 30 जनवरी 1948 को अपने ही राष्‍ट्रपिता की हत्‍या कर दी और उसके बाद हमारी दाढ़ में जो खून लगा वो अभी भी हमसे हत्‍याएं करवा ही रहा है । 16 अक्‍टूबर 1951 को लियाकत अली खान की हत्‍या कर दी गई । 25 सितम्‍बर 1959 को श्रीलंका के राष्‍ट्रपति सोलोमन भंडारनायके की हत्‍या हुई । और ये सलिसिला चलता ही रहा । 15 अगस्‍त 1975 को बांग्‍लादेश ने अपने ही जन्‍मदाता को मार डाला 1971 में बांग्‍लादेश को बनाने में सबसे महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शेश मुजीबुर्रहमान को भी मार डाला गया । 31 अक्‍टूबर 1984 मेरी पीढ़ी के लोगों को इसलिये याद है कि हम जो उस समय सोलह सत्रह साल की उम्र में थे हम सबने देखा था कि कैसे किसी देश के शासक की हत्‍या हो जाती है । इंदिरा गांधी जिसको दुर्गा की संज्ञा दी गई उसी दुर्गा को हमने मार डाला । 21 मई 1991 को बेटा भी मां की राह पर चल दिया और राजीव गांधी की भी हत्‍या हो गई । 1 मई 1993 को श्रीलंका में राष्‍ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा की हत्‍या हुई तो 1 जून 2001 को नेपाल नरेश और उनकी पत्‍नी एंश्‍वर्या केा मार डाला गया और अब की बार तुम्‍हारी बारी थी बेनज़ीर ।

तुमको किसी व्‍यक्ति ने नहीं मारा बल्कि विचारधारा ने मारा है और हम लाख किसी को पकड़ कर फांसी पर लटका दें मगर हम जानते हैं क‍ि रक्‍त बीजों को फांसी पर लटकाने से कुछ नहीं होता हैं । विचारधारा जब तक जिंदा है तब तक तो रक्‍तबीज पैदा होते ही रहेंगें । अगर आज गांधी फिर से जन्‍म लें तो क्‍या हम ये सोच कर निचिंत हो सकते हैं कि अब तो कुछ नहीं हो सकता क्‍योंकि हमने तो गांधी के हत्‍यारे को बरसों पहले ही फासी दे दी थी । नहीं हो सकते क्‍योंकि हत्‍यारे तो हर युग में जन्‍म लेते रहेंगें ।

मैं तुमको सलाम करता हूं इसलिये क्‍योंकि तुम जानतीं थीं कि तुम्‍हारी हत्‍या हो जाएगी उसके बाद भी लौट कर आईं । ये हिम्‍मत एक स्‍त्री ही दिखा सकती है । तुमको याद होगी झांसी की रानी लक्ष्‍मी बाई वो जो कर गईं वो काम भी केवल एक स्‍त्री ही कर सकती थी । हम पुरुष तो जन्‍म से ही कायर होते हैं । हम तो अवसर ढूंढते हैं कि कहां से भाग जा सकता है । तुम ने जान की परवाह न करके वो करने का प्रयास किया जो पाकिस्‍तान की जनता के लिये अभी सबसे जरूरी काम था । 

तुम्‍हारा जाना पूरे महाद्वीप के लिये नुकसान की बात है क्‍योंकि तुम्‍हारा रहना स्थिरता का प्रतीक था पाककिस्‍तान में । मेरे गुरू कहते हैं कि अगर आपका पड़ोसी सुख से है तो आपको भी सुख होगा । मैं तुम्‍हारी बहादुरी को प्रणाम करता हूं पिंकी । भारत और पाकिस्‍तान जो 1948 में अलग हुए उसके बाद की कड़वाहट को कभी भुला नहीं पाए हें और आज तक भी शत्रु बने हुए हैं पर उस शत्रुता को परिणाम दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है ।  पिंकी  तुम अब जब नहीं हो तो मैं तुमको बता दूं कि किशोर अवस्‍था में जो टूटा सा आकर्षण होता है कच्‍चा सा मोह होता है वो मुझे भी हुआ था और वो आकर्षण हुआ था फिल्‍म अभिनेत्री  रेखा  के प्रति   अपनी एक अध्‍यापिका के प्रति और शायद तुम्‍हारे प्रति भी । इसीलिये तुम्‍हारा जाना आज पीड़ादायी लग रहा है। एक बार फिर तुम्‍हारी बहादुरी को प्रणाम करता हूं पिंकी

Sunday, 23 December, 2007

परदेश में प्‍यासे से कभी ज़ात न पूछो, उलझन है पुरानी तो नई बात न पूछो, रातें न हमें दे सको अपनी तो सितारों, फि़र हमने गुज़ारी है कहां रात न पूछो

माड़साब को तो कुछ नहीं हुआ था पर माड़साब के पीसी को वायरसों ने घेर लिया था । माड़साब को पिछले कुछ दिनों से डाउनलोडिंग को शौक चर्रा रहा था । बीस दिनों में पांच छ: जीबी के साफ्टवेयर डाउनलोड कर लिये हांलकि एक एंटी वायरस डला था  जो कि अच्‍छा माना जाता है पर कहीं कुछ गड़बड़ हो गई और समस्‍या आ गई । खैर अब माड़साब ने एक साथ चार साफ्टवेयर डाल लिये हैं एक ट्रोजन का एक स्‍पाय वेयर का एक वायरस को और एक डिफेंडर । और हां माड़साब ने पूरी तैयारी कर ली है नए साल के मुशायरे की सभी छात्र छात्राएं एक दो दिनों में अपनी ग़ज़लें भेज दें और अपना सुंदर सा चित्र एवं विवरण भी, माड़साब प्रयास कर रहे हैं कि सभी ग़ज़लों को किसी मशहूर हस्‍ती से प्रस्‍तुत करवाएं । मगर ये तभी हो पाएगा जब समय पर ग़ज़लें प्राप्‍त हो जाएंगी अर्थात 28 तक ।

आज माड़साब ने हिंदी के एक बड़े कवि श्री गोपाल सिंह जी नेपाली का मुक्‍तक लगाया है । मुक्‍तक एक अलग विधा है हालंकि देखा ये जाता है कि मुक्‍तक भी अधिकांश बहर में ही होते हैं । मगर फिर भी ऐसा नियम नहीं हैं कि हिंदी का मुक्‍तक बहर पर हो क्‍योंकि हिंदी के काव्‍य के अपने नियम हैं वहां पर पढ़ने के तरीके पर ही ज्‍यादा काम होता है । गोपाल सिंह जी को जिन्‍होंने सुना है वो जानते होंगें कि नेपाली जी का हिंदी कविता में क्‍या योगदान है ।

आज हम रुक्‍न को समापन कर लेंगें और उसके बाद ही हम प्रारंभ कर पाएंगें अपना बहर का कार्य । हालंकि बहरों को लेकर मुझे अभी भी थोड़ी सी पशोपेश है कि ब्‍लाग पर डालूं या नियमित विद्यार्थियों को ईमेल से ही बताऊं । वो इसलिये कि जो नियमित नहीं हैं उनको कैसे ज्ञान मिल सकता है । नियमित का मतलब ये कि जो भले ही रोज हाजिरी न लगाएं पर चार पांच दिनों में तो आते रहें हों । अन्‍यथा तो मैं ये जानता हूं कि कई ऐसे भी हैं जो नियमित तो पढ़ रहे होंगें पर जिनके पास एक टिप्‍पणी लगाने का समय नहीं होगा । ये हम हिन्‍दुस्‍तानियों की एक विशेषता है हम आभार व्‍यक्‍त करने में और क्षमा मांगने में अपने को छोटा महसूस करते हैं । मेरे पास कम्‍प्‍यूटर सुधरने आते हैं उनमें से कई मेरे परिचितों के भी होते हैं उनमें से कई ऐसे हैं जो जाते समय पेमेंट का पूछते भी नहीं है कि भई आपने काम किया तो कुछ पैमेंट तो नहीं हुआ । कई बार ऐसा होता है कि घंटे भर की मेहनत के बाद आदमी बिना कुछ कहे मतलब कि धन्‍यवाद भी कहे बगैर कम्‍प्‍यूटर ले जाता है । और माड़साब के सहयोगी सोनू और सनी उसके बाद माड़साब की ही क्‍लास ले लेते हैं ।

खैर चलिये हम तो आज अपनी क्‍लास को समाप्‍त कर लेते हैं ।

बात रुक्‍न की चल रही थी ।

सप्‍तकल : इसमें हम छ: रुक्‍न देख चुके थे और अब तीन बाकी हैं ।

7:- मुफतएलान 21121 एक दीर्घ फिर दो स्‍वतंत्र लघु फिर एक दीर्घ फिर एक लघु

इसके भी निम्‍न तरीके हो सकते हैं

आप मगर न 2, 1, 1, 11,1

शहृ र मगर न 11,1,1,11,1

शहृ र कहीं न 11,1,1,2,1

आप कहीं न 2,1, 1, 2, 1

ये रुक्‍न कम मिलता है सामान्‍य तौर पर ग़ज़लों में ।

8:- मफाएलान 12121 एक लघु ए‍क दीर्घ एक लघु एक दीर्घ एक लघु

कितने तरीके हो सकते हैं इसके

न आम ख़ास 1,2,1,2,1

न शहृ र खास 1,11,1,2,1

न शहृ र वज्‍़न 1,11,1,11,1

न आम शहृ र 1,2,1,11,1

9 :- मफऊलान 2,2,2,1 इसका विन्‍यास भी लगभग वही होता है जो पिछली कक्षा के मफऊलातु का था पर दोनों में क्‍या फर्क होता है ये हम बहरों में देखेंगें ।

तो इस तरह से हमने देखा कि रुक्‍न कुल इतने होते हैं ।

1 दो कल दो प्रकार के

2 तीनकल में तीन प्रकार के

3 चौकल में पांच प्रकार के

4 पंचकल में आठ प्रकार के

5 षटकल में आठ प्रकार के चलन में (होते तो अधिक है)

6 सप्‍त कल में नौ प्रकार के चलन में ( होते अधिक हैं)

नोट : कुछ एक दो प्रकार के अष्‍टकल भी चलन में होते हैं बहुत मामूली से तो हम कल उनकी भी बात कर लें गें । हां माड़साब ने मुशायरे का आयोजन गंभीरता से किया है अत: ध्‍यान रखें कि 28 तक आप सब की ग़ज़लें मिल जानी चाहिये । और साथ में परिचय तथा फोटो भी क्‍योंकि ब्‍लाग पर सभी के फोटो नहीं हैं ।

Tuesday, 18 December, 2007

कभी विकल हो जाता हूं जब रातों को तन्‍हाई से, अपना मन बहलाता हूं तब यादों की श‍हनाई से, जब भी मुझे अकेला पाया तेरी सुधियां गमक उठीं, शयन कक्ष हो गया सुगंधित यादों की पुरवाई से

कभी कभ जब कक्षा में विद्यार्थी नहीं आते हैं तो फिर माड़साब भी नाराज़ हो जाते हैं और नाराज़ होकर फिर वे अगले दिन कक्षा नहीं लेते हैं कुछ ऐसा ही हुआ था कल कि माड़साब ने देखा कि सोमवार की कक्षा किसी ने अटेंड नहीं की एक अभिनव को छोड़कर तो माड़साब ने मंगलवार की कक्षा खुद ही गोल कर दी । अभिनव की एक ग़ज़ल कक्षा में आ चुकी है और उस पर काम करना बाकी है उधर अनूप जी की ग़ज़ल तो हो चुकी है पर उस पर कुछ और शे'र मिले हैं जो कि अनूप जी ने ही भेजे हैं उन पर भी एक दिन चर्चा होनी है । आप लोगों को फिर से याद दिलाया ज रहा है कि नववर्ष के उपलक्ष में एक मुशायरा आयोजित किया गया है जो कि सकारात्‍मक सोच से भरी हुई ग़ज़लों का होगा आप सब उसके लिये अभी से ग़ज़लें दे दें क्‍योंकि देर से आई हुई ग़ज़लों पर इसलिये काम नहीं हो पाएगा क्‍योंकि माड़साब की ऐसी इच्‍छा है कि इस बार ग़ज़लों पर काम करके उनको ध्‍वनि के रूप में ब्‍लाग पर डाला जाएग और कुछ चित्र भी उन पर बनवाएग जाऐं । आज जबलपुर के शायर आचार्य भगवत दुबे की एक सुंदर सी हिंदी ग़ज़ल का मतला और एक शे'र लगाया है । इसका एक और भी शे'र है जो कि मुझे बहुत पंसद है वो कुछ यूं हैं तुम आओ या न आओ पर यादों को आने देना, कितना सुख मिलता है मुझको यादों की पहुनाई से ।

चलिये बातें तो बहुत हो चुकी हैं आज कुछ काम की भी बात भी हो जाए क्‍योंकि वो ही खास है । इन दिनों में अपने गुरू श्रद्धेय नारायण कासट के काव्‍य संग्रह पर काम कर रहा हूं शिवना प्रकाशन से वो संग्रह मैं प्रकाशित करने  जा रहा हूं । श्री कासट ने कम लिखा है पर हम जैसों को लिखने के लिये खूब प्रेरित किया है । भवानी दादा परसाई जी नीरज जी बालकवि बैरागी जी कैफ भोपाली जैसे लोगों के साथ काम किया है उन्‍होंने । आजकल वे रीढ़ की हड्डी की समस्‍या के कारण बिस्‍तर पर हैं और चल फिर नहीं सकते हैं । अपने प्रकाशन से उनकी पुस्‍तक निकाल कर मैं कृतार्थ महसूस कर रहा हूं अपने को । ये शिवना की अगली पुस्‍तक है जिसका नाम रखा गया है टुकुर-टुकुर चांदनी

सप्‍तकल

हमने इसमें चार प्रकार देख लिये थे  और अब हम पांचवे की ओर चलते हैं ।

5:- मफ़ाएलतुन 12112 एक लघु फिर एक दीर्घ फिर दो स्‍वतंत्र लघु और अंत में एक दीर्घ ( उच्‍चारण में मफाईलतुन जैसी ध्‍वनि होगी पर भिन्‍नता ये है कि उसमें 1222 है मतलब तीसरी दीर्घ है और यहां पर 12112 है जो तीसरी और चौथी लघु हैं वे संयुक्‍त न होकर अलग अलग हैं )

उदाहरण देखें

1 न जान मगर 1,2,1,1,11

2 न जान कहीं 1,2,1,1,2

3 न तुम न हमें 1,11,1,1,2

4 न तुम न डगर 1,11,1,1,11

अब सबसे पहले तो ये देखें कि हालंकि पहली दीर्घ के बाद दो लघु मात्राएं आ रहीं हैं और फिर उसके बाद में फिर से दो लघु और फिर से दो लघु मगर बीच की दो लघु को यहां पर कामा लगाकर अलग कर दिया गया है क्‍योंकि ये एक दूसरे को समर्थन देकर गठजोड़ की सरकार नहीं बना रहे हैं । न तुम न डगर  को देखें इसमें  न  लघु है फिर आया  तुम  ये दोनों लघु मिलकर बना रहे हैं एक दीर्घ और फिर आया एक और लघु   जो कि स्‍वतंत्र है हालंकि उसके बाद एक लघु और है   मगर वो वाम दलों की तरह बाहर से भी समर्थन नहीं दे रहा है । और इसीलिये  न  और   ये दोनों मिलकर एक दीर्घ नहीं बन पा रहे हैं । फिर आ रहा है डगर  का गर  जो कि दो लघु तो हैं पर वे एक दूसरे को समर्थन देकर गठजोड़ की सरकार बना रहे हैं और इसलिये उनको एक दीर्घ कहा जा रहा है ।

6:- मफ़ऊलातु 2221 प्रारंभ की तीन मात्राएं दीर्घ और फिर एक लघु मात्रा

उदाहरण देखें

1 हम तुम आज 11,11,2,1

2 तोड़ो आज 2,2,2,1

3 हम तुम कब न 11,11,11,1

4 तोड़ो दिल न 2,2,11,1

5 हम हैं आज 11,2,2,1

6 हैं हम आज 2,11,2,1

7 जो हम तुम न 2,11,11,1

8 हम हैं तुम न 11,2,11,1

मतलब कुलमिलाकर बात वही है कि कैसे भी करके प्रारंभ की जो तीन मात्राएं हैं उनको दीर्घ होना है और आखिर की एक लघु हो ।  हम तुम कब कसम  को अगर देखें तो हम 11, तुम 11, कब 11,  और फिर जो कसम शब्‍द आ रहा है उसका भी   जो है वो इस वाले रुक्‍न में गिना जाएगा और सम  जो है वो अगले रुक्‍न में चला जाएगा । मतलब ये कि रुक्‍न बनाते समय शब्‍दों को तोड़ा भी जा सकता है आधा शब्‍द एक रुक्‍न में और आधा दूसरे में होगा । जैसे  हम तुम कब क़सम खाकर चले थे ये बताओ  में

2221, हम तुम कब क

2221 सम खाकर च

2221 ले थे ये ब

22 ताओ 

चलिये आज के लिये इतना ही बहुत हैं ।

एक बात जो मैं गंभीरता से सोच रहा हूं वो ये कि अब बहरों को लेकर जो काम होना है वो मैं ब्‍लाग पर न करके उन छात्रों और छात्राओं के साथ ई मेल के द्वारा करूं जो अभी तक की क्‍लासों में गंभीर रहे हैं तथा जिनमें सीखने की ललक है । मैं नहीं चाहता कि जिन लोगों ने अभी तक मेहनत की हे उनको अलग से न देखा जाए । तो मेरा विचार ये है कि बहरों को ब्‍लाग पर प्राकशित न करके उनको विद्यार्थियों के ईमेल में सीधे भेजा जाऐ उन विघार्थियों के जो कि अभी तक गंभीरता से पढ़ाई कर रहे हैं । मैा इस विषय में गंभीर हूं और अभी तक की कक्षाओं का विवरण तलाश रहा हूं कि  कितने विद्यार्थियों ने गंभीरता से क्‍लासें अटेंड की हैं । आप भी बताएं कि क्‍या करना चाहिये ।

Sunday, 16 December, 2007

मिरे मासूम सपने अश्‍क बनकर थरथराये हैं, मेरी मुट्ठी में सूखे फूल हैं, ख़ुश्‍बू के साये हैं ।

आजकल माड़साब को पढ़ाने में मज़ा आ रहा है और वो इसलिये क्‍योंकि आजकल विद्यार्थी गण काफी रुची ले रहे हैं और कुछ नए एउमीशन भी मिल गए हैं । अब ये तो सब ही चाहते हैं कि क्‍लास भरी रहे हैं । उड़नतश्‍तरी इन दिनों भारत में है और परसों रात में माड़साब के पास फोन आया था उड़नतश्‍तरी इस सप्‍ताह में सीहोर में उतरने वाली है और माड़साब उस दिन सीहोर में एक कार्यक्रम का आयोजन करने के विचार में हैं जिसकी जानकारी आप सभी को मिल जाएगी और माड़साब की इच्‍छा है कि उस दिन कुछ आन लाइन भी किया जाए और उस दिन के आयोजन मं एक दो कव‍ि आनलाइन पाठ भी करें अब देखें क्‍या हो पाता है उस दिन ।

वैसे तो काफी दूसरा काम है करने को अभिनव की ग़जल को पोस्‍ट मार्टम करना है और अनूप जी की जो ग़ज़ल अब मिली है उस पर भी कुछ कहना है पर आज नहीं क्‍योंकि आज तो हम दो दिन की छुट्टी से निपट कर बैठै हैं तो आज तो सबसे पहले हम आज का पाठ शुरू करते हैं । सब बच्‍चे अपनी किताबें खोलें और सप्‍तकल के रुक्‍नों वाला पृष्‍ठ खोल लें हमने आखिरी क्‍लास में जहां पर छोड़ा था हम वहीं से आगे बढ़ने वाले हैं ।

3:- मफ़ाईलुन 1222 एक लघु और फिर तीन दीर्घ लगातार ललालाला

अब इसको भी देख में कि ये कितने प्रकार से हो सकता है ।

न जा भाई 1222

न हम भाई 1,11,2,2

न भाई तुम 1,2,2,11

हमें तुमने 1,2,11,2

हमें तुम सब 1,2,11,11

न हम सब ने 1,11,11,2

न हमने सब 1,11,2,11

न तुम हम कल 1,11,11,11

तो ये कुल मिलाकर आठ प्राकर से हो सकता है कि बज्‍़न वही हो मफ़ाईलुन और विन्‍यास अलग अलग हो । अब इस विन्‍यास को अगर देखें तो सबमें अलग अलग है पर अगर हम उच्‍चारण करके देखेंगें तो हम पाऐंगे कि उच्‍चारण में वज्‍़न की समानता साफ आ रही है । अर्थात पहली मात्रा तो लघु है और बाद में तीन दीर्घ आ रही हैं और इन के कारण कुल जोड़ हो रहा है सात और इसीलिये ये भी सप्‍तकल का एक उदाहरण है ।

4:- मुतफाएलुन 2212 लालालला

इसके विन्‍यास भी देखें जाएं कि कितने हो सकते हैं ।

जाना नहीं 2,2,1,2

तुमने नहीं 11,2,1,2

जो हम नहीं 2,11,1,2

जाना न तुम 2,2,1,11

हम तुम नहीं 11,11,1,2

हमको न तुम 11,2,1,11

जो हम न तुम 2,11,1,11

अब हम न तुम 11,11,1,11

वहीं आठ प्राकर के विन्‍यास यहां पर भी निकल के आ रहे हैं और वज्‍़न यहां पर भी समान हैं लेकिन मात्राओं का वितरण अलग अलग तरह से हो रहा है । हम ये ध्‍यान रखें कि चाहे कुछ भी लेकिन अगर ध्‍वनि में हमें सात मात्राऐं मिल रही हैं आैर विन्‍यास लालालला हो रहा है तो फिर वो मुतफाएलुन रुक्‍न ही है ।

रुक्‍नों की कुछ क्‍लासें और बची हैं फिर हम सीधें आऐंगें बहरों पर जो कि सबसे दुर्लभ बात हैं और हम ये जान लें कि वो ही सबसे गंभीर विषय होगा । एक बात जो मैं बार बार कहता आ रहा हूं कि बहरों का ज्ञान खोलना वैसा ही होगा जैसे कि कोई तिलस्‍म खुलने जो रहा हो क्‍योंकि ये एक छुपा हुआ रहस्‍य है 1

अच्‍छा एक बात तो हम भारतीयों का कभी नहीं छूटती भले ही हम कहीं पर भी बस जाऐं और वो ये कि अगर बिजली का बिल भरने की आखिरी तारीख 16 दिसम्‍बर है और अगर हम दस दिसम्‍बर को बिजली कार्यालय में खड़े हैं जेब में पैसे भी हैं बिल भी रखा है तो भी नहीं भरते ''' अभी तो छ: दिन है अभी क्‍यों भरें '' । जबकि आज कार्यालय पर बिल्‍‍कुल भीड़ नहीं है आराम से भर सकतें हैं पर नहीं साहब आखिरी तारीख को धक्‍का मुक्‍की में ही भरेंगें । पिंटू के स्‍कूल की फीस भी आखिरी दिन ही जमा होती है और टेलीफोन का बिल वो तो हम जब तक वहां से फोन नहीं आत तब तक नहीं भरते । ये बातें मैं इसलिये कर रहा हूं  कि मैंने संसद पर हमले को लेकर सबसे कहा था कि कुछ पंक्तियां दीजियेगा और ये बात काफी पहले कह दी थी मगर कुछ पंक्तियां जो आईं वो उसी दिन आंईं जब उनको लगाना मुश्किल था ।

अब तेरह दिन पहले कह रहा हूं कि नए साल पर सब एक पूरी ग़ज़ल लिख कर प्रस्‍तुत करें । ग़ज़ल पूरी तरह से सकारात्‍मक सोच से भरी हो हम नए साल की शुरूआत नकारात्‍मक सोच से नहीं कर सकते ।  गज़ल में मतला और पांच या सात शे'र निकालें । जो नहीं करेंगें उनको कक्षा में सवालों के जवाब नहीं दिये जाऐंगें और उनकी समस्‍याओं पर विचार नहीं किया जाएगा । ग़ज़ल बिजली के बिल की तरह से आखिर तारीख को जमा न करें । जैसे ही हो वैसे जमा करवा दें  ।

Thursday, 13 December, 2007

उलझा हुआ हूँ वक्त के बोझिल सवाल में, पत्थर निकल रहे हैं बहुत आज दाल में, मुद्दत से कह रहे हैं जो मंदिर बनाएँगे, उनसे सड़क न एक बनी पाँच साल में।

काफी बातें हो गईं हैं पिछले दिनों में और चूंकि आज सप्‍ताह का अंतिम कार्य दिवस है अत: आज हम कुछ पढ़ाई वगैरह कर लें क्‍योंकि फिर आने वाले दो दिनों में तो छुट्टी रहनी है सप्‍ताहांत की । आज मैंने अपने होनहार छात्र अभिनव की ग़ज़ल को अपने मुखड़ें में लगाया है । और बाद में पूरी ग़जल़ भी दूंगा जो कि कुछ दोष युक्‍त है । मेर हिसाब से अब तो अभिनव को ऐसी ग़लतियां नहीं करनी चाहिये और एक बात और धयान में रख्‍नी चाहिये कि जो चीज़ आप प्रकाशित करने जा रहे हैं उस पर तो विशेष ध्‍यान इसलिये भी रखना चाहिये कि एक बार प्रकाशित होने के बाद तो वो लोगों के सामने आ जाएगी और उसके बाद तो फिश्र आप उसमें कुछ भी नहीं कर सकते हैं । ख़ैर हमने अनूप जी की ग़ज़ल को सुधार लिया है और अब अभिनव की बारी है उसमें अनूप जी की ग़ज़ल के मुकाबले में काफी जियादा दोष हैं । पहले ग़ज़ल को देख लें और फिर उस पर दो दिनों तक काम करें । और अभिनव एक काम करों कोने में खड़े हो जाओ और सौ बार जोर जोर से बोलो '' माड़साब अब ग़लती नहीं करूंगा '' ।

उलझा हुआ हूँ वक्त के बोझिल सवाल में,
पत्थर निकल रहे हैं बहुत आज दाल में,
गिद्धों को उसने टीम का सरदार कर दिया,
लो फंस गई भोली सी चिरइया भी जाल में,
बाबर को नहीं देखा है मैंने कभी मगर,
मस्जिद ज़रूर देखी है इक ख़स्ता हाल में,
मुद्दत से कह रहे हैं जो मंदिर बनाएँगे,
उनसे सड़क न एक बनी पाँच साल में।

चलिये आज का सबक शुरू करते हैं आज हमको सप्‍तक की बात करनी है और फिर कुछ सवालों की भी बात करनी है जो कि छात्रों ने उठाए हैं ।

सप्‍तकल : सप्‍तकल का मतलब ही स्‍पष्‍ट है क‍ि वे रुक्‍न जिनमें कि सात मात्राएं हो। वैसे तो इसमें काफी ज्‍यादा तरतीब हो सकती हैं पर उर्दू शायरी में उनमें से केवल नौ को ही प्रयोग किया जाता है ।

1:- फ़ाएलातुन 2122 लाललाला  एक गुरू फिर एक लघु फिर दो दीर्घ

इसके भी दो प्रकार हो सकते हैं

अ: एक तो ये कि जैसा कि कहा गया है वैसा ही हो अर्थात पहले एक दीर्घ आ रहा हो फिर एक लघु आए और फिर दो दीर्घ आऐं । जैसे नाम आया  को अगर देखें तो इसमें ना एक दीर्घ है फिर आ रहा है   जो कि एक लघु है और उसके बाद एक दीर्घ और फिर या  एक और दीर्घ ।

ब:  या फिर ऐसा भी हो सकता है कि सातों ही लघु हों और उनमें से पहली और दूसरी संयुक्‍त होकर दीर्घ बन जाए फिर तीसरी स्‍वतेत्र लघु हो और फिर चौथी और पांचवी तथा छठी और सातवी मिलकर दीर्घ बना रही हो।  या फिर इतने प्रकार हो सकते हैं

तुम न हमसे 11,1,11,2

तुम न हमदम 11,1,11,11

तुम न जाकर 11,1,2,11

पास आकर 2,1,2,11

पास हमको 2,1,11,2

तुम न तोड़ो 11,1,2,2

जा न हमदम 2,1,11,11

अब इन सबमें वज्‍़न तो वही है फ़ाएलातुन या फिर लाललाला या फिर 2122 मगर विन्‍यास में परिवर्तन लेकिन ध्‍यान रखना है कि विन्‍यास से कुछ भी नहीं होता है जो होता है वो तो वज्‍़न से होता है और यहां पर वो वज्‍़न ही है जो इन सात और एक ऊपर के आठवें को एक ही रुकन में रख रहा हे ।

2 :- मुसतफ़एलुन 2212 लालालला दो गुरू फिर एक लघु और फिर एक दीर्घ

अब इसमें भी इतने विन्‍यास हो सकते हैं

जाना नहीं 2,2,1,2

जाना न तुम 2,2,1,11

अपना नहीं 11,2,1,2

बाहर नहीं 2,11,1,2

अब हम न तुम 11,11,1,11

ना हम न तुम 2,11,1,11

हम तुम कहीं 11,11,1,2

हमने सनम 11,2,1,11
अब ये भी वैसे तो आठ विन्‍यास हैं पर इन आठों में वज़न वहीं है मुसतफएलुन या लालालला या 2212 , केवल विन्‍यास को पकड़ने का ही तो खेल है और उसके बाद तो कुछ भी नहीं है । 

अब चलिये कुछ प्रश्‍नों पर बात करलें

Devi Nangraniनिराला अंदाज़ हैऔर सुगम भी. क्या ऐसा हो सकता है कि इस्किएक फाइल हो और हम जब चाहें वहां जाकर फिर फिर इसका लाभ उठा सकें. अभिनव कि बात से मैं बिल्कुल शामिल रे हूँ. क्या अपनी लिखी ग़ज़ल को दुरुस्त करने के लिए इस मंच कि मदद ली जा सकती है.

माड़साब :- क्‍यों नहीं अगर मन में दुविधा हो तो सेकेंड ओपिनियन तो हर जगह काम करती है ।

अजय कानोडिया सर जी
यहाँ पर मैं अपना एक सवाल फिर दोहरा रहा हूँ |
जैसा आपने पिछले अंक में दिया गया शेर का वजन निकला है
ति र हा थ स कुछ म र हक म ज रा न भ ला ह हु आ न बु रा ह हु आ
112 112 112 112 112 112 112 112
फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन
यहाँ पर आपने यह कैसे तय किया कि इस वजन में आप ३ मात्राओ को मिला कर रुकान निकालेंगे ?
४ मात्राए क्यों नहीं ? इस तरह
११२१ १२११ २११२ ११२१ १२११ २११२
ऐसा करने से वजन एकदम बदल जाएगा |

माड़साब :- ग़ज़ल में तय बहरें हैं और उन पर ही काम होता है कुल मिलाकर सारा परिदृष्‍य उनके ही अासपास घूमता है सो हमें वज्‍़न को बहर के हिसाब से ही निकालना होात है वो जो किसी बहर पर आता हो । अभी आने वाली कक्षाओं में जब बहर आएगी तो आप समझ जाऐं गें ।

रिपुदमन पचौरी
सुबीर जी,
यह बतलाएं कि ...
खवाब को साकार देखो = यह वज़न के हिसाब से सही क्यों है? ( क्या इस में, ’खव’ के लिए,जल्दी पढ़ने वाला फ़ामूला लगाया गया है ?)
आइना = के स्थान पर आरसी शब्द का प्रयोग किया जा सकता है ?
पोस्ट अभी पढ़ी है, सो .. कुछ समय दें आज की गज़ल का बहर जल्दी ही लिख कर जमा कर दूंगा।
मंगल कामनाएं

माड़साब :- पुरानी कक्षाओं के नोट्स लें समझ आ जाएगा ।

नीरज गोस्वामी गुरूजी
आप की पुरानी पोस्ट देख रहा था लेकिन उनमें से कौनसी सीखने के लिहाज़ से पढी जायें ये बता दीजिये. बहुत उपकार होगा. यूँ तो खोजने में ही बहुत वक्त जाएगा. आप मुझे तारीख या पोस्ट का शीर्षक बता दीजिये.
नीरज

माड़साब :- आप वे सभी देखें जिसमें वज्‍़न की बात कही गई है ।

अभिनव आदरणीय गुरुदेव पूरे दो घंटे लगे इस क्लास को पूरा करने में.
आपका बहुत धन्यवाद, मुझे नही लगता है की बड़े शायरों के उस्ताद भी उनको कभी इतने विस्तार से ग़ज़ल की बारीकियों को समझाते होंगे. अब इसके बाद भी यदि हम ग़लत ग़ज़ल लिखें तो फिर सारा दोष हमारी अल्पज्ञता का ही होगा.

माड़साब :- धन्‍यवाद आप सभीका ।

Wednesday, 12 December, 2007

दे के अपनी जान तुम महफूज़ हमको कर गए, पर वतन के रहनुमा अपनी जुबा से फिर गए, आसमां पर जो तिरंगा शान से तुमने रखा, रंग उसके बादलों से नीर बन कर गिर गए

आज तेरह दिसम्‍बर है और आज संसद भवन को बचाने में जो आठ जवान श्री जगदीश प्रसाद यादव, सुश्री कमलेश कुमारी, श्री मतबार सिंह नेगी, श्री नानक चंद, श्री रामपाल, श्री ओमप्रकाश, श्री घनश्‍याम, और श्री बिजेंद्र सिंह शहीद हुए थे उनको मेरा नमन आज उनके लिये केवल एक छात्र अजय कनोदिया ने ही अपने श्रद्धा सुमन भेजे हैं जो मैंने आज के मुखड़े में लगाए हैं । अपनी भी चार पंक्तियां उनको देता हूं

समंदर को सुखा डालें वो कुछ ऐसे शरारे थे

हमारे आसमां के सबसे चमकीले सितारे थे

घिरी संकट में जब संसद थी तब उन आठ वीरों ने

लहू देकर के मां के दूध के कर्जे उतारे थे

मित्रों काफी बहस के बाद कुछ अच्‍छी बातें सामने आईं हैं और ये लगने लगा है कि अब विद्यार्थी सचमुच गंभीर हैं अपने अध्‍ययन को लेकर । अनपू जी की जिसे ग़जल को लेकर हमने बात की है उसमें कुछ शे'र अच्‍छे निकल आए हैं । विशेषकर दो चोटी बांध कर लाल रिब्‍बन का फूल उसमें कस कर कक्षा में नाक पोंछती हुई आने वाली कंचन ने एक शे'र अच्‍छी निकाला है । और स्‍वयं अनूप जी का भी कहना है कि

सुबीर जी:
मुझे भी कंचन जी का मिसरा अच्छा लगा । ’आइना इक बार देखो’ में कविता होने की बात से भी सहमत हूँ । कंचन जी , क्या ये शेर मैं आप से ले सकता हूँ ?
अजय के मिसरे में ’कल्पना साकार देखो’ बहर में तो है लेकिन अर्थ वह नहीं आ रहा है जो मैं कहना चाहता था ।
अभिनव ने सुझाया :
मन में था विश्वास पूरा,
लो सपन साकार देखो,
इसे बदल कर इस तरह से कहें तो ?
मन में हो विश्वास पूरा
हर सपन साकार देखो ।
मेरे दोस्त घनश्याम गुप्ता जी नें जब यह गज़ल पढी थी तो कई शेर जोड़े थे जिस में से एक मुझे याद आ गया :
हाँ नहीं है ना नहीं है
मौन अत्याचार देखो ।
कल बैठे बैठे यूँ ही बहर और मात्राओं की प्रैक्टिस के लिये एक शेर लिखा :
इक पुरानी सी गज़ल के
अब नये अशआर देख&#