शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

परिधि के उस पार देखो, इक नया विस्‍तार देखो, रूढि़यां सीमा नहीं हैं, इक नया संसार देखो

आज हम वरिष्‍ठ कवि अनूप भार्गव जी की एक सुंदर सी हिंदी ग़ज़ल के साथ काम करेंगें । ये ग़ज़ल छोटी बहर की है और अनूप जी ने बहुत ही सुंदर शे'र निकाले हैं इसमें । पर जैसा कि उन्‍होंने खुद ही कहा है कि ये उनके प्रारंभिक दौर की ग़ज़ल है अत: इसमें दो छोटी छोटी समस्‍याएं हैं आइये देखते हैं कि वे क्‍या हैं । ये ग़ज़ल आपको यहां पर मिलेगी आओ कि कोई ख्‍़वाब बुनें 

परिधि के उस पार देखो 2122, 2122 फाएलातुन-फाएलातुन
इक नया विस्तार देखो ।2122, 2122 फाएलातुन-फाएलातुन
तूलिकायें हाथ में हैं ।  2122, 2122 फाएलातुन-फाएलातुन
चित्र का आकार देखो । 2122, 2122 फाएलातुन-फाएलातुन
रूढियां, सीमा नहीं हैं । 2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
इक नया संसार देखो ।  2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
यूं न थक के हार मानो।  2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
जिन्दगी उपहार देखो ।  2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
उंगलियाँ जब भी उठाओ ।  2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
स्वयं का व्यवहार देखो। यहां पर समस्‍या आ रही है
मंजिलें जब खोखली हों । 2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
तुम नया आधार देखो । 2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
हाँ, मुझे पूरा यकीं है। 2122, 2122 फाएलातुन;फाएलातुन
स्वप्न को साकार देखो । यहां पर समस्‍या आ रही है

फा

ला

तुन

फा

ला

तुन

परि धि के उस पा दे खो
इक या विस्‍ ता दे खो
तू लि का एं हा में हैं
चित् का का दे खो
रू ढि़ यां सी मा हीं हैं
इक या सन्‍ सा दे खो
यूं थक के हा मा नो
जिन्‍ गी उप हा दे खो
उंग लि यां जब भी ठा
स्‍व यम् का व्‍यव हा दे खो
मन्‍ जि लें जब खो लीं हों
तुम या धा दे खो
हां मु झे पू रा कीं है
स्‍व प्‍न को सा का दे खो


ये एक ख़ूबसूरत सी छोटी सी बहर है जिसका नाम है बहरे रमल मुरब्‍बा सालिम  और जिसका वज्‍़न है फाएलातुन-फाएलातुन या फिर 2122-2122 इसका एक उदाहरण देखें रंज उठाकर दिल फंसाकर, जा मिला दुश्‍मन से दिलबर । ये एक अच्‍छी बहर है जिसपर अनूप जी ने काफी अच्‍छा काम किया है और काफी शे'र ख़ूबसूरती से निकाले हैं मगर दो शे'रों के मिसरा सानी में कुछ अड़चन नज़र आ रही है । क्‍या है ये आपको देखना है बाकी की पूरी की पूरी ग़ज़ल ही वज्‍़न में है कहीं पर कोई भी कमी नहीं है । आपको ये लग सकता है कि चित्र का आकार देखो  में बहर ग़लत हो गई है पर जनाब चित्र को उच्‍चारण में चित् र  कहा जाता है और इसलिये ये सही हो जाएगा । चित् 2, र 1 । और इसी प्रकार मंजिलें जब खोखलीं हों  में वास्‍तव में होता है मन्‍ जि लें जब, 2 1 2 2  मतलब हमारा काम पूरा हो गया है । और यही होगा इक नया संसार देखो  में इक 2 न 1 या 2 सन्‍ 2 सा 2 र 1 दे 2 खो 2 
अब बात करें समस्‍या की जैसा कि अनूप जी ने शारद पूर्णिमा के कवि सम्‍मेलन में कहा था कि ये उनकी शुरू के दौर की ग़ज़ल है अत: इतनी छोटी सी दो समस्‍याएं होना तो आम है । स्‍वयं का व्‍यवहार देखो  में जो स्‍वयं शब्‍द है वो अड़चन कर रहा है बाद का तो सब ठीक है । स्‍वयं का वज्‍़न होता है स्‍व 2, यम् 2  और हमको चाहिये प्रारंभ में 2 1  जबकि स्‍वयं  के कारण प्रारंभ में 22 रहा है । और बहर फाईलातुन  हो रही है । बिल्‍कुल एसी ही समस्‍या हो रही है स्‍वप्‍न को साकार देखो  में जहां पर स्‍वप्‍न अड़चन कर रहा है । उसका वज्‍़न है स्‍व 2, प्‍न 2 मतलब वही स्‍वयम् वाली ही समस्‍या है बहर फाएलातुन की जगह फाईलातुन हो रही है । हमें दोनों ही मिसरों में स्‍वप्‍न और स्‍वयम्  को किसी दूसरे शब्‍दों  से विस्‍थापित करना होगा किनसे ये आपको देखना है । हालंकि उच्‍चारण में यदि शीघ्रता से पढ़ा जाए तो स्‍वप्‍  को एक दीर्घ और न  को एक लघु करके हम बहर में तो ला सकते हैं जैसा कि व्‍यवहार देखो  में व्‍यव के साथ किया है इन तीनों को इतनी शीघ्रता से पढ़ा जाता है कि तीनों मिलकर एक दीर्घ के समान वज्‍़न पैदा करते हैं । स्‍वप्‍न  में वैसा नहीं किया जा सकता क्‍योंकि व्‍यव  में उच्‍चारण की सहजता है स्‍वप्‍न में प्रवाह नहीं है अत: अच्‍छा होगा कि हम दूसरा ही शब्‍द ले लें ।
चलिये क्‍लास फिर से शुरू हो गईं हैं पुराने छात्र लौटने लगे हैं और कुछ नए छात्र भी आ रहे हैं । नीरज और अजय जैसे नए छात्र शामिल हुए हैं मैं इनको कहना चाहूंगा कि ब्‍लाग की पुरानी पोस्टिंग ज़रूर पढ़ लें ताकि उनको समझने में आसानी हो सके । कुलावत जी ने पूछा है कि बहरें कितनी होती हैं और उनकी सूची दे दें मैं उनसे कहना चाहता हूं कि वे थोड़ा इंतेज़ार करें कक्षाओं में आने वाले समय में बहरों के बारे में विस्‍तार से आना ही है । और एक बात मैं कहना चाहता हूं कि जब बहरों के बारे में बताना प्रारंभ किया जाएगा तो वो वैसा ही होगा जैसा किसी रहस्‍य पर से पर्दा उठने जैसा । क्‍योंकि बहरों को इतना ज्‍यादा छुपा और गोपनीय रखा गया है कि आम लिखने वाला वहां तक नहीं पहुंच पाता है। तो कुलावत जी से अनुरोध है कि प्रतीक्षा करें मैं समय से पहले बता नहीं सकता क्‍योंकि अध्‍यापन की मर्यादा से बंधा हूं । और मैं द्रोणाचार्य नहीं हूं कि अर्जुन को पूरी विद्या दे दूं और एकलव्‍य का अंगेठी कटवा लूं । नीरज जी के ब्‍लाग की ग़ज़लें मैंने पढ़ीं और कह सकता हूं कि अगर इन ग़ज़लों को व्‍याकरण का सहारा और मिल जाए तो ये और खिल जाऐंगीं, हालंकि ये अभी भी अच्‍छी हैं ।

अभिनव ने कल के मुखड़े पर कसरत की है बिना छड़ी की परवाह किये, अच्‍छी बात है पर ग़लती पर  छड़ी तो पड़ेगी अनूप ने ये कसरत की है

मेरी मेहनत का नतीज़ा है मगर उसका है,
छांव उसकी है, समर उसके, शज़र उसका है,
इसकी बुनियाद में मेरा भी लहू है लेकिन,
जब वो चाहेगा ये कह देगा कि घर उसका है,
संभावित बहरः
२१२२ - २१२२ - २१२२ - २२
लाललाला - लाललाला - लाललाला - लाला
फाएलातुन - फाएलातुन - फाएलातुन - फालुन

बीच के दो रुक्‍न ठीक नहीं निकाले हैं । दोनों में एक दीर्घ ऐसा है जिसे लघु हो जाना चाहिये बात बन जाएगी कौन बनेगा ये उसीके नीचे वाले शे'र में देखें ।

कंचन केवल क्‍लास में आकर ता  करके भग जा रहीं हैं ये ग़लत बात है । माड़साब अगर होमवर्क दें तो उसको करना भी है नहीं तो माड़साब किसी दिन धे छड़ी-धे छड़ी  कर देंगे। देवी नागरानी जी ने और अभिनव ने मन को छू लेने वाली टिप्‍पणियां की हैं वास्‍तव में जिसे कहा जाऐ कि अभिभूत करने वाली बात है । अभिनव ने जो कहा है उसीके साथ्‍ बात का विराम देता हूं

जब तक नहीं बनें नई ग़ज़लों के सिकंदर,
तब तक रहेंगे आपकी क्लासों में बराबर,
फिर आपके स्कूल में टीचर की नौकरी,
करते हुए सिखाएँगे दुनिया को यही स्वर।

11 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी इच्‍छा है कि मेरे उदाहरण रंज उठाकर दिल फंसाकर जा मिला दुश्‍मन से दिलबर पर आप आपत्ति ज़रूर लें कि ये तो ग़लत है

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  2. सर जी

    हाजिर हूँ


    मैंने उदहारण वाले शेर की बहर निकलने की कोशिश की , और मुझे वह २१२२ २१२२ ही मिली , इस में कोई आपत्ति नहं लगती, जैसे की आपने कहा | या मैं बहर ग़लत निकल रहा हूँ



    रंज उठाकर दिल फंसाकर,

    २1 २२ २१ २ 2

    जा मिला दुश्‍मन से दिलबर

    २ १२ २ २ १ २ २


    रं ज उठा कर दी ल फंसा कर
    २ १ २ २ २ १ २ २

    जा मि ला दुश मन से दिल बार

    २ १ २ २ २ १ २ २


    एक शेर लिखने की कोशिश की है गुरूजी , आप बताए की बहर में है या नहीं

    उसने रात सपनो में आने की कसम खाई थी
    कसम झूठी थी, पर निभाने की कसम खाई थी


    उसने रात सपनो में आने की कसम खाई थी
    २ १ २ १ २२ १ २२ २ २ १ २२२

    २२२१ २२१२ २२२१ २२२

    कसम झूठी थी, पर निभाने की कसम खाई थी
    २1 २1 २ २ १२२ २ २१ २२ २

    २१२1 २२१२ २२२१ २२२


    सादर
    अजय

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  3. आपकी विवेचना और समझाईश के ढंग को देखकर अच्छा लगा। निःसंदेह पल्ले कुछ कम पडा पर फिर भी आपसे सीखने की हसरत है।

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  4. यस सर, आज अनूप जी वाली बहर पर ही कुछ ऊट पटांग लिखा है, शायद मीटर ठीक बन गया है परंतु अर्थ और भाव की दृष्टि से बडी़ हल्की पंक्तियाँ लग रही हैं, जो भी हो। होमवर्क जमा कर रहा हूँ।

    आँसुओं की खाद हो जा,
    चीखती फरियाद हो जा,

    हो भी जा उस्ताद हो जा,
    इश्क में बरबाद हो जा,

    रात भर तो जग चुका हूँ,
    ऐ सबक अब याद हो जा,

    सिर पे मेरे पांव रख ले,
    या तू मेरे बाद हो जा,

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  5. सुबीर जी
    सबसे पहले तो ब्लॉग पर आने का शुक्रिया. आप ने अपनी कोई निशानी नहीं छोड़ी वहां तो लगा की आप आए ही नहीं हैं. मुझे इस बात का एहसास है की मेरी ग़ज़लों में व्याकरण की अशुधियाँ हैं लेकिन क्या और कहाँ ये बताने वाला कोई नहीं. आप की पुरानी पोस्ट से कोशिश करूँगा कुछ सीखने की क्यों की यूँ अचानक पाठ के बीच से सीखने की कोशिश कामयाब होती नज़र नहीं आ रही. कुछ पल्ले पढता और बहुत कुछ छूट जाता है. इसमें आप की तरफ़ से कोई कमी नहीं है अगर सीखने वाला कमज़ोर हो तो गुरु का क्या दोष?
    सब कुछ नहीं तो क्या कुछ तो हासिल होगा ही आप की क्लास से ,इसलिए आप का साथ छोड़ने वाला नहीं मैं अब.
    नीरज

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  6. iss class me naam kaisey likhvaatey hain...?kripyaa kar koi bataye mujhey bhi." anaadii huun,khilaadii ban naa chahtii huun"

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  7. गुरू जी हम जब तक होमवर्क करके घर से लाते है, पता चलता है कि बाकी सब के सब होमवर्क चेक करा चुके और दूसरी क्लास भी चालू हो गई, उस दिन पहले मुर्गी ही बनी रही जब उठी तो सोचा घर से होमवर्क कर के लाऊँगी, ईतनी मेहनत कर के जब आये तो आप आगे चले गये थे, अब आज भी वही होने वाला है लग रहा। अब छड़ी खाएंगे बैक बेंचर्स की तरह और क्या..?

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  8. आपकी क्लास का आनंद ही कुछ और है, मैं भी मौजूद रहता हूँ एकलव्य की तरह

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  9. Der se aayi par durust aayi

    वोट को लेकर मुंह फेरे
    आज की सरकार देखो.

    आदमी के नाम पर ये
    लोगों का व्यहवार देखो.

    दिन सुनहरे रात चाँदी
    रचना का यह सार देखो.

    कितने पापड़ बेले देवी
    वक्त की दरकार देखो.

    देवी

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  10. मेरा प्रयास

    उंगलियाँ जब भी उठाओ ।
    अपना खुद व्यवहार देखो।

    हाँ, मुझे पूरा यकीं है
    सपने वो साकार देखो या
    सपने बस साकार देखो.
    बस क्षितिज के पार देखो. anoop ki gazal ke sher


    देवी
    Kuch aur sher
    झूठ सच को छल रहा जो
    नफरतों सा प्यार देखो.

    लैला मजनू को थी हासिल
    इश्क की वो मार देखो.

    मतला हो सकता है क्या?
    इश्क की वो मार देखो
    मजनू का बस प्यार देखो.

    देवी

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  11. रिपुदमन पचौरी11 दिसंबर 2007 को 10:10 pm

    नमस्कार,

    हम रिपुदमन हैं। आपके बारे में कविवर अभिनव से ज्ञात हुआ। अत: आपके साथ रहकर कुछ सीखने की इच्छा है। अगर आप होमवर्क की कापियां जांचते हुए थके न हों और कक्षा में अभी कुछ कुर्सियां खालीं हों तो हम को भी सीखने का अवसर दें(वैसे कुर्सी ना भी हों तो कोई बात नहीं हम ज़मीन पर बैठ कर पढ़ने के आदी हैं)

    यह कक्षा कब आरंभ हुई थी व सबसे पहले कहाँ से शुरू करें अगर यह लिख भेजें तो स्वयं का मंगल जानूं।

    शेष शुभ
    रिपुदमन पचौरी

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