गुरुवार, 13 दिसंबर 2007

दे के अपनी जान तुम महफूज़ हमको कर गए, पर वतन के रहनुमा अपनी जुबा से फिर गए, आसमां पर जो तिरंगा शान से तुमने रखा, रंग उसके बादलों से नीर बन कर गिर गए

आज तेरह दिसम्‍बर है और आज संसद भवन को बचाने में जो आठ जवान श्री जगदीश प्रसाद यादव, सुश्री कमलेश कुमारी, श्री मतबार सिंह नेगी, श्री नानक चंद, श्री रामपाल, श्री ओमप्रकाश, श्री घनश्‍याम, और श्री बिजेंद्र सिंह शहीद हुए थे उनको मेरा नमन आज उनके लिये केवल एक छात्र अजय कनोदिया ने ही अपने श्रद्धा सुमन भेजे हैं जो मैंने आज के मुखड़े में लगाए हैं । अपनी भी चार पंक्तियां उनको देता हूं

समंदर को सुखा डालें वो कुछ ऐसे शरारे थे

हमारे आसमां के सबसे चमकीले सितारे थे

घिरी संकट में जब संसद थी तब उन आठ वीरों ने

लहू देकर के मां के दूध के कर्जे उतारे थे

मित्रों काफी बहस के बाद कुछ अच्‍छी बातें सामने आईं हैं और ये लगने लगा है कि अब विद्यार्थी सचमुच गंभीर हैं अपने अध्‍ययन को लेकर । अनपू जी की जिसे ग़जल को लेकर हमने बात की है उसमें कुछ शे'र अच्‍छे निकल आए हैं । विशेषकर दो चोटी बांध कर लाल रिब्‍बन का फूल उसमें कस कर कक्षा में नाक पोंछती हुई आने वाली कंचन ने एक शे'र अच्‍छी निकाला है । और स्‍वयं अनूप जी का भी कहना है कि

सुबीर जी:
मुझे भी कंचन जी का मिसरा अच्छा लगा । ’आइना इक बार देखो’ में कविता होने की बात से भी सहमत हूँ । कंचन जी , क्या ये शेर मैं आप से ले सकता हूँ ?
अजय के मिसरे में ’कल्पना साकार देखो’ बहर में तो है लेकिन अर्थ वह नहीं आ रहा है जो मैं कहना चाहता था ।
अभिनव ने सुझाया :
मन में था विश्वास पूरा,
लो सपन साकार देखो,
इसे बदल कर इस तरह से कहें तो ?
मन में हो विश्वास पूरा
हर सपन साकार देखो ।
मेरे दोस्त घनश्याम गुप्ता जी नें जब यह गज़ल पढी थी तो कई शेर जोड़े थे जिस में से एक मुझे याद आ गया :
हाँ नहीं है ना नहीं है
मौन अत्याचार देखो ।
कल बैठे बैठे यूँ ही बहर और मात्राओं की प्रैक्टिस के लिये एक शेर लिखा :
इक पुरानी सी गज़ल के
अब नये अशआर देखो ।

कंचन जी आप तो मुकाबला जीत गईं भई अब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अनूप जी को शे'र का उपयोग करने की स्‍वीकृति प्रदान करें । शे'र दो और भ अच्‍छे निकले हैं मन में हो विश्‍वास पूरा हर सपन साकार देखो और इक पुरानी सी ग़ज़ल के कुछ नये अशआर देखो  अनूप जी की ग़ज़ल अब समृद्ध हो गई है  हां नहीं है ना नहीं है  वाला शे'र अपने आप को पूरी तरहा से अभिव्‍यक्‍त नहीं कर पा रहा है इसके दोनों  मिसरे अलग अलग जा रहे हैं ।   इसमें ये पता नहीं चल रहा है कि मिसरा उला किस तरफ इशारा कर रहा है ।  हां करो मत, ना करो मत  किया जाए तो फिर दोनों में तारतम्‍य आ जाएगा । आज मैं इस शे'र के बहाने से ही कुछ ग़ज़ल की बारिकियों की बात करता हूं ।  हां नहीं है ना नहीं है  ये है मिसरा उला और इसके अनुसार किसी ऐसे स्‍थान की चर्चा हो रही है जहां पर ना तो हां है और ना ही ना है और अचानक ही मिसरा सानी व्‍यक्ति को संबोधित करने लगता है और कहता है  मौन अत्‍याचार देखो इसको तरतीब का एब कहा जाता है । जिसमें दोनों मिसरे एक दूसरे को ठीक तरह से जोड़ कर ना रख पा रहे हों । याद रखें मैंने पहले भी कहा है कि आपका मिसरा सानी ही आपकी पूरी क्षमता मांगता है कुछ ऐसा हो कि लोग बरबस वाह कर उठें । अब मैंने जो मिसरा उला लिया है उसमें पहले ही से हम व्‍यक्ति को संबोधित कर रहे हैं कि  हां करो मत, ना करो मत और फिर जब हम कहते हैं कि मौन अत्‍याचार देखो  तो बात पूरी हो जाती है ।  मैं एक बात यहीं पर स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि मैं कड़वा कहूंगा और ग़लत को ग़लत कहूंगा क्‍योंकि अगर वो नहीं किया तो मैं सिखा ही नहीं पाऊंगा । मिसरा सानी और मिसरा उला में तारतम्‍य न हो तो उस शे'र को फाड़ कर फैंक दें और दूसरा लिख लें ।  मिसरा सानी यहां पर यूं भी हो सकता था हां न करिये, ना न करिये  मगर इसमें दो समस्‍याएं आ रहीं हैं पहला तो ये कि  ना  और दोनों ऐ के बाद ऐक आ रहे हैं जो कि एब माना जाता है और दूसरा ये कि मिसरा सानी में देखो  कहा गया है और मिसरा ऊला कह रहा हे करिये  संबोधन का फर्क आ रहा है जो ठीक नहीं माना जाता और सुनने में भी लगेगा कि आपके पास दूसरा विकल्‍प नहीं था शायद । तो अनूप जी आप अगर उस शे'र को भी शामिल करना चाहें तो इस तरह ये ही करें  हां करो मत, ना करो मत, मौन अत्‍याचार देखो  और कंचन के शे'र में अगर उर्दू के आइने से आपको समस्‍या ना हो तो वो तो अच्‍छा है ही ।

कल से ही कुछ अच्‍छे शब्‍द सुनने को मिल रहे हैं ईकविता पर अनूप जी ने भ एक शब्‍द पोस्‍ट मार्टम का अच्‍छा प्रयोग किया है

इस के अलावा आजकल पंकज सुबीर जी अपने ब्लौग पर 'गज़ल' के बारे में बहुत अच्छा सिखा रहे हैं । अभी हाल ही में उन्होनें मेरी एक पुरानी गज़ल  का बहुत अच्छा 'पोस्ट मार्टम' किया है ऊपर वाले "लिंक' पर दे , दो शेरों में मात्राओं का दोष उन्होनें बहुत अच्छे तरीके से समझाया है । साथ में टिप्पणियां भी पढें जिस में काफ़ी लोगों ने कसरत की है , उन दोषों को सुधारने की । मेरे अनुसार यदि आप को गज़ल के बारे में यदि वास्तव में रुची है तो इस ब्लौग को ज़रूर पढें ।अनूप भार्गव

कल की ग़ज़ल कि जिसके बारे में मैंने कहा थ कि ये विचित्र किंतु सत्‍य टाइप की ग़ज़ल है की तकतीई देखें , देखें कि किस प्रकार से कितनी सारी दीर्घ मात्राऐं लघु हो गईं हैं

 

ति र हा थ स कुछ म र हक म ज रा न भ ला ह हु आ न बु रा ह हु आ
112 112 112 112 112 112 112 112
फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन
क ह तुझ स र की ब न गर च बु रा न भ ला ह हु आ न बु रा ह हु आ
112 112 112 112 112 112 112 112
फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन
               
               

ये ग़ज़ल बहरे मुतदारिक मखबून सोलह रुक्‍नी है

अभिनव ने कुछ निकालने का प्रयास किया था

भाग - ३ : आज के मुखड़े की बहर
१२२ - २१२ - १२२ - २१२ - ११२ - ११२ - ११२ - ११२
फऊलुन - फाएलुन - फऊलुन - फाएलुन - फएलुन - फएलुन - फएलुन - फएलुन
तिरे हा - थों से कुछ - मिरे हक - में ज़रा - न भला - ही हुआ - न बुरा - ही हुआ,
कहा तुझ - से रकी - बों नें गर - चे बुरा - न भला - ही हुआ - न बुरा - ही हुआ,

आज तेरह दिसम्‍बर है और आज संसद भवन को बचाने में जो आठ जवान श्री जगदीश प्रसाद यादव, सुश्री कमलेश कुमारी, श्री मतबार सिंह नेगी, श्री नानक चंद, श्री रामपाल, श्री ओमप्रकाश, श्री घनश्‍याम, और श्री बिजेंद्र सिंह शहीद हुए थे उनको मेरा नमन

3 टिप्‍पणियां:

  1. सर जी

    यहाँ पर मैं अपना एक सवाल फिर दोहरा रहा हूँ |

    जैसा आपने पिछले अंक में दिया गया शेर का वजन निकला है

    ति र हा थ स कुछ म र हक म ज रा न भ ला ह हु आ न बु रा ह हु आ
    112 112 112 112 112 112 112 112
    फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन फएलुन


    यहाँ पर आपने यह कैसे तय किया कि इस वजन में आप ३ मात्राओ को मिला कर रुकान निकालेंगे ?

    ४ मात्राए क्यों नहीं ? इस तरह

    ११२१ १२११ २११२ ११२१ १२११ २११२


    ऐसा करने से वजन एकदम बदल जाएगा |



    सादर
    अजय कानोडिया

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  2. भाग -१ : संसद भवन के वीरों को श्रद्धांजलि

    रंग में डूबा हुआ संसद भवन देखो ज़रा,
    आ रही है रोशनी की इक किरण देखो ज़रा,

    हो अगर खुशबू बहुत ज़्यादा तितलियाँ देख कर,
    मालियों को भूल जाता है चमन देखो ज़रा,

    जो गए हैं छोड़ कर रोता हुआ संसार को,
    सिर झुका कर हम उन्हें करते नमन देखो ज़रा.

    भाग - २ : कुछ क्लास पहले का होमवर्क

    बहर: १२२२ - १२२२ - १२२

    पता तक भी - नही बदला - हमारा,
    वही घर है - वही क़स्बा - हमारा,

    किसी जानिब - नही खुलते - दरीचे,
    कहीं जाता - नही रास्ता - हमारा,

    वही ठहरी - हुई कश्ती - है अपनी,
    वही ठहरा - हुआ दरिया - हमारा.

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  3. मेरे देश के नौजवानों को मेरी श्रधांजलि

    मिरे देश के नौजवानों को अरपन
    दिखे जिसमें भारत यही है वो दर्पण
    निछावर करे जाँ, लहू से जो सींचे
    महकती वो सांसें, महकता वो गुलशन
    देवी नागरानी

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