Friday, 28 September, 2007

मुहब्‍बत की झूठी कहानी पे रोए बड़ी चोट खाई जवानी पे रोए । कभीसोचा है कि ये गाना गुनगुनाने में इतना आसान क्‍यों लगता हैं सोच कर देखें

सबसे पहले तो बात की जाए अनूप जी की अनूप जी ने आते ही पहले तो मुर्गाबने और फिर ऐसा काम किया कि माड़साब ने 'धे छड़ी-धे छड़ी' लाल कर दिया । जनाब फरमा रहे थे
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
प्यार में हद से गुजर जाने का मज़ा क्या जाने
अब इसमें अगर देखा जाए तो
प्‍या फा, र-ए, में-ला, हद-तुन (फाएलातुन)
से-फ, गु-ए, ज़र-ला, जा-तुन (फएलातुन)
अब आएगा असली मजा
ने-फा, का-फ, म-ए, जा-ला, क्‍या-तुन ( भोत ही गुड भैया आपने तो एक नया ही आविष्‍कार कर दिया है फाफएलातुन) छड़ी छड़ी छड़ी और सजा ये है कि उड़न तश्‍तरी को कंधे पर उठाकर स्‍कूल के पांच चक्‍कर लगाओ ।
दरअसल में एक पूरा का पूरा दीर्घ बढ़ रहा है यहां पर । और खयाल में भी कमजोरी है दिल मे हौले से समाना और प्‍यार में हद से गुजर जाना दोनों दो विपरीत बातें हैं ( लगता है कि मुझे एक ब्‍लाग और शुरू करना पड़ेगा जहां पर प्‍यार के मूलभूत तत्‍व और उसकी नीतिगत विशेषताएं बतानी पड़ेगी ) । ध्‍यान में रखें एक बात कि हुआ है समाने पर खेल अत: आप गुज़र जाने तो ले ही नहीं सकते क्‍योंकि उसमें जाने से ठीक पहले एक दीर्घ गुज़र का ज़र आ रहा है अत: बात फेल हो रही है । आपको जो काफिये लेना हें वे समाने, दिखाने, बताने जैसे ही लेने है और अगर आप जाने माने भी लेना चाहते हैं तो उसके ठीक पहले लघु होना चाहिये दीर्घ नहीं । जैसे
वादा कर कर, के न आने, का मज़ा क्‍या, जाने
अब यहां क्‍या हुआ आने के ठीक पहले आ रहा है जो कि एक लघु है इसलिये ये चल गया है । जहां जहां मैंने कामा लगाए हैं वो रुक्‍न हैं फाएलातुन-फएलातुन-फएलातुल-फालुन
आप भी ऐसा करें कि जब गज़ल लिखें तो यही कामा की पद्धति अपनाएं उससे क्‍या होगा कि आपको ख़द को ही समझ आएगा । कि मात्रा की घट बढ़ कहां पर हो रही है । एक रुक्‍न लिखें और कामा लगा दें ।
अभिनव said...
मुद्दत हुई थी सामने मुर्गा बने हुए,
स्कूल मेरे सामने फिर आके जम गया,
बहर तो ठीक है पर आपको स्‍कूल की जगह पर इसकूल लिखना होगा तो बात बनेगी । क्‍योंक‍ि आपने शुरुआत की है मुद दत से दो दीर्घ से इस और कू से वज्‍न मिल जाएगा ।
नीरज ने लिखा है
राह में गर कहीं वो जो आयें नजर,
देख के उनको नजरे चुराता हूँ मैं
जानता हूँ वो मेरा मुकद्दर नहीं,
उनको पाने की हसरत मिटाता हूँ मैं
दिल में आंसू लबों पे तबस्सुम लिए
दर्द लेके हंसी बाँट आता हूँ मैं
इसको दोनो तरह से चीर फाड़ करने काकाम छात्रों को दिया जाता है पूरा विश्‍लेष्‍ण करें कि इसमें बहर के दोष हैं ये नहीं । खयालों की कमजोरी कहां कहां पर आ रही है । (हिंट -दूसरे शे'र को जरूर देखें ) और हां हो सके तो इसका मतला बनाने का काम करें । ये एक ज़रूरी होमवर्क है सभीको कल संडे की छुट्टी में करने के बाद सोमवार के पहले कापी जमा करवानी हैं । सोमवार से हम बहरों की क्‍लासें चालू करेंगें । ये मेरा अनुरोध है कि नीरज के शे'रों को कापी में उतार कर उनका दिल से पोस्‍टमार्टम करें और फिर उनका उत्‍तर निकालें कि खयाल और बहर में कहां कमजोरी है और रुक्‍न भी निकाल के बताएं । खयाल की कमजोरी पर ज्‍यादा ध्‍यान दें वही महत्‍व पूर्ण है ।
होम वर्क क्रमांक 2
आपने फिल्‍म मुगले आजुम का गीत सुना होगा
मुहब्‍बत, की झूठी, कहानी, पे रोए
बड़ी चो, ट खाई, जवानी, पे रोए
ये ग़ज़ल के प्रारंभिक छात्रों के लिये सबसे आसान बहर है बहरे मुतकारबि मुसमन सालिम
वज्‍़न है
फऊलुन-फऊलुन-फऊलुन-फऊलुन
122-122-122-122
इस पर कसरत करें ये गाने में भी आसान बहर है । काफिया रदीफ ये ना लें मतलब कहानी पे रोए की जगह कुछ और करें
ये सबसे आसान बहर है कुछ भी कहें
मुझे गुल के हंसने पे आता है रोना
के इस तरह हंसने की खू थी किसी की
पर इस पर काम ज़रूर करें अगर कर पाए तो हम सोमवार से प्रारंभ करेंगे बहर का सफर ।

लता मंगेशकर महोत्‍सव : अठहत्‍तर वर्ष में इतनी मीठी आवाज़ ये सरस्‍वती का चमत्‍कार नहीं है तो ओर क्‍या है

लता जी की महत्ता, एक बार हमारे पड़ौसियों ने सिद्ध कर दी थी, जब उन्होंने कहा, कि लता मंगेशकर दे दो, कश्मीर ले लो परन्तु उन्हें यह नहीं पता था, कि भारत के लिये जितना काश्मीर आवश्यक है, भारतवासियों के लिए उतनी ही लता मंगेशकर आवश्यक है। लता जी जब संसद हॉल में खड़ी होकर सारे जहाँ से अच्छा गाती हैं, तो संसद हॉल स्तब्ध खड़ा होकर, इस महान्‌ गायिका के स्वर का जादू महसूस करता है। मुझे याद है, जब लता जी १४ अगस्त, १९९७ की रात्राी १२ बजे, संसद हॉल में सारे जहां से अच्छा गा रही थीं, तब देश के कोने कोने से आये सांसद और गणमान्य जन उन्हें बच्चों की सी उत्सुकता से, खड़े हो हो कर देख रहे थे। लताजी, राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार लेते समय जब कहती हैं, कि मैं नेहरू जी की स्मृति में ऐ मेरे वतन के लोगों की चंद पंक्तियों गाऊँगी, तो उपस्थित भद्रजन इस तरह तालियाँ पीटते हैं, मानों कोई कुबेर का खजाना मिलने वाला हो।
लता जी एक बार एक गीत की रिकडिर्ंग कर रहीं थीं, शाम की फ्लाइट से उन्हें लंदन भी जाना था, लगभग दस बार रिहर्सल के बाद, संगीतकार, रिकार्डिंस्ट सभी सन्तुष्ट थे, पर लता जी सन्तुष्ट नहीं थीं, उन्होंने कहा, इसे फायनल मत करना, मैं लन्दन से लोट कर फिर रिकर्डिंग करुंगी। सचमुच वह लंदन से लौंटीं, और गीत की पुनः रिकर्डिंग की, और पूरी तरह सन्तुष्ट होने के बाद ही गीत को फायनल किया, इसी कारण तो लता-लता है। २८ सितम्बर 07 को लता जी उम्र के ७8 वर्ष पूर्ण कर लेंगीं, कितनी ही अभिनेत्रिायाँ जिन्हें लता जी ने स्वर दिये, दौड़ से बाहर होकर घर बैठी हैं, उनकी पुत्रिायाँ फिल्मों में काम कर रही हैं, लता जी उन्हें भी स्वर दे रही हैं। हमारी तो ईश्वर से यही प्रार्थना है, कि तीसरी पीढ़ी भी जब फिल्मों में आये, तो लता जी उसे भी स्वर प्रदान करें। सचमुच हम भाग्यवान हैं, कि इतना महान्‌ कलाकार अपनी अमृतवाणाी से हमें सरोबार किये हुये है। दिल से में लता जी, गुलज+ार और ए. आर. रेहमान की त्रिावेणी ने मधुर गीत जिया जले की उत्पत्ति की है, वन्दे मातरम्‌ ९८ के गीत क्या नाम है अपना जहाँ में खड़े हैं कहाँ पर हम में लता जी की सवालिया आवाज में, जो अवसाद झलकता है, वह हम भारत वासियों को खुद पर सोचने के लिये मजबूर करता है, हालांकि लता जी के गीतों में अवसाद बहुत कम नजर आता है।
लता जी की आवाज+ इस नश्वर संसार की एक अनश्वर शैः है। राज बब्बर जब फिल्म कर्मयोद्धा बना रहे थे, तब उसमें लता जी का एक खूबसूरत गीत था, परन्तु जिस आडियो कम्पनी द्वारा कैसेट जारी किया जाना था, वहाँ एक गायिका का एकाधिकार था, अतः उस गीत को, उसकी आवाज में डब किये जाने का प्रस्ताव आया, परन्तु राज बब्बर नहीं माने, आखिर उस फिल्म का ऑडियो कैसेट तो जारी हुआ, परन्तु उसका कोई प्रचार नहीं हुआ। किसी ने जब राज बब्बर से पूछा, कि अपने निर्माता के रूप में अपनी पहली फिल्म के साथ, ऐसा क्यों होने दिया ? तो उनका जवाब था - ''जब से मैंने होश संभाना, तब से ही यह आवाज मेरे साथ हम सफ़र की तरह चल रही है, अब जब मैं निर्माता बन रहा था, मेरा सबसे बड़ा सपना यही था, कि लता जी मेरी फिल्म में गीत गायें।

Thursday, 27 September, 2007

लता मंगेशकर महोत्‍सव : सन्‍नाटों की गायिका लता मंगेशकर के वे गीत आपने सुने हैं क्‍या जो उन्‍होंने प्रेतात्‍माओं के लिये गाए हैं

अठहत्तर वर्ष की उम्र में भी उतने ही सधे हुए सुर और वही दिव्य आवाज यह चमत्कार नहीं तो और क्या है? सादगी की ग़ज़ल मुझे ख़बर है वो मेरा नहीं पराया था सुनकर देखिए क्या आपको कही से भी लगता है, कि यह स्वर एक अठहत्तर वर्ष की महिला का है। फिल्म लगान का अपूर्व भजन, ओ पालनहारे क्या आपको वर्षों पूर्व के कालजयी गीत अल्ला तेरो नाम की याद नही दिलाता। लता जी को मिला भारत रत्न वास्तव में हम सब संगीत रसिकों का सम्मान है, हम जो लता जी की आवाज की उंगली पकड़ कर खड़े हुए, बड़े हुए, चलना सीखा, और आज भी चल रहे है, उसी नूर की बूंद के साए में जों बकौल गुलजार साहब सदियों से बहा करती है । लता मंगेशकर और गुलजर ने मिलकर कुछ ऐसी रचनायें दी हैं, जो सुनने में किसी दूसरे संसार की लगती हैं। दरअसल गुलजार की शायरी इतनी दूरूह होती है, कि अगर उसे कोई सरल आवाज न मिले, तो वह और जटिल हो जाती है, लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने इसलिये जब गुलजार को गुनगुनाया, तो जटिल पहेलियों सी शायरी को बिलकुल आसान बना डाला। अब तेरे बिना जिंदगी से कोई शिक़वा के अर्थ की भूलभुलैया में फसेंगे, तो गाने का मजा नहीं ले पायेंगे। फिल्म लेकिन जिसका निर्माण लता जी ने स्वयं किया था, के गीत काफी लोकप्रिय हुये थे। यारा सीली सीली बिरहा की रात का जलना एक कठिन शब्दों और गूढार्थ से भरी हुई रचना थी, परन्तु लता जी की आवाज, और हृदयनाथ मंगेशकर के २१ वीं सदी के संगीत ने, उसे अमर बना दिया।
मेरे विचार में लता जी सन्नाटों की गायिका हैं, इसलिये भटकती आत्माओं पर फिल्माये गये उनके गीत, सर्वाधिक लोकप्रिय हुये हैं। एच. एम. व्ही. ने लताजी के रूहानी गीतों के, अलग से दो कैसेट निकाले थे, जिसमें सारे गीत एक से बढ़ कर एक थे। रात के सन्नाटे की बात हो, या किसी अतृप्त आत्मा की पुकार हो, अगर लताजी की स्वर लहरी उसमें हो, तो ऐसा लगता है, सब कुछ सच है।वो भले ही कहीं दीप जले कहीं दिल हो , झूम झूम ढलती रात हो , नैना बरसे रिमझिम रिमझिम हो या बहारों की मंजिल का अदभुत गीत निगाहें क्‍यों भटकती हैं हो । फिल्म सिलसिला का वह गीत नीला आसमां सो गया सुनने में ऐसा लगता है, मानो सचमुच रात के अंधेरे में नीला आसमां, कहीं क्षितिज के उस पार सोया पड़ा है, इसी गाने के अंतरे याद की वादी में गूंजे बीते अफसाने में लता जी की आवाज ने जो गूंज, या प्रतिध्वनि पैदा की है, उसने इस गीत को, और इसकी पंक्तियों को निनाद से भर दिया था। सन्नाटो में गूंजने की क्षमता, उतनी बेहतरीन हेमन्त कुमार के अलावा, और किसी गायक या गायिका में दिखाई नहीं देती।

लता मंगेशकर महोत्‍सव - संजय जी की बात को उधार लेकर कह रहा हूं विश्‍व की सबसे सुरीली आवाज तुम जियो हजारों साल



प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर ने एक फिल्म में संगीत दिया था, ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित, १९६० में प्रदर्शित फिल्म अनुराधा, इस फिल्म में लता जी ने चार गीत गाये थे जाने कैसे सपनों में, हाय रे वो दिन क्यों ना आए, कैसे दिन बीते और साँवरे साँवरे चार विभिन्न मूड, और चार विभिन्न रागों, तिलक श्याम, जन समोहिनी, मौज खमाज और भैरवी में निबद्ध इन गीतों को सुनकर, इनमें सर्वश्रेष्ठ का चयन करना मुश्किल हो गया था। एक अद्धितीय संगीतज्ञ, और एक बेजोड़ गायिका के अद्भुत मेल से उत्पन्न ये गीत, भारतीय चित्रापट संगीत की एक अमूल्य विरासत है। लोकप्रियता की दृष्टि से हाय रे वो दिन क्यों न आए सबसे लोकप्रिय हुआ था। कैसा संयोग है, भारतीय सिने संगीत के इतिहास में लता के अभ्युदय के पश्चात्‌, जब भी कोई दुर्लभ रचना बनती है, तब लता उससे जुड़ी नजर आती है। एक वर्तमान की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी का कहना है, कि जब भी कोई संगीतकार किसी खूबसूरत धुन की रचना करता है, तब उसकी सबसे पहली तमन्ना होती है, उसे लता जी ही गायें।
लता मंगेशकर की सबसे बड़ी विशेषता है, उनका आलाप, कभी आंखे बन्द कर लता जी का आलाप सुनिये, ऐसा लगता है, शरीर भारहीन होकर ऊपर उठता चला जा रहा है। फिल्म लेकिन की कालजयी रचना सुनिये जी अरज हमार के प्रारंभ का आलाप सुनिए, कितना विशुद्ध, ऐसा लगता है मानों निखालिस शहद की बूंद, कानों के रास्ते रूह में समाती चली जा रही है। फिल्म आनंद मठ के गीत वन्दे मातरम्‌ में लता जी के आलाप अद्धितीय हैं। आशा जी ने एक बार बताया था, कि लता दीदी के साथ मुझे उत्सव में एक गीत गाना था मन क्यों बहका, लता दीदी ने आलाप प्रारंभ किया, फिर मुझे गाना था, मगर मैं उस आलाप में ऐसी खोई, कि कुछ ध्यान ही नहीं रहा, क्या गाना है ?
लता मंगेशकर ने कितने गीत गाये हैं ? यह तो हमेशा से विवाद का विषय रहा है, परन्तु यह बात तो तय है, कि उन्होंने कभी स्तरहीन नहीं गाया। राजकपूर की फिल्मों की सबसे आवश्यक शर्त थी, लता मंगेशकर की आवाज, फिल्म संगम का गीत बुड्ढा मिल गया गाने के लिये लता जी राजी नहीं हो रही थीं, राज साहब केवल लता जी से ही गाना गवाना चाहते थे, काफी जद्दोजहद के बाद लता जी ने वह गीत गाया, पर विरोध स्वरूप वह फिल्म आज तक नहीं देखी। इसे भी एक संयोग ही कहा जाएगा, कि राज साहब द्वारा निर्मित सबसे बड़ी फ्लाप, या शायद उनकी एकमात्रा फ्लाप फिल्म, क्लासिक मेरा नाम जोकर में लता जी की आवाज नही थी। यह आर. के. की एकमात्रा फिल्म थी, जिसमें लता जी शामिल नहीं थीं, ऐसे ही एक संगीतकार ने जिन्हें लता जी राखी बांधती थीं, लता जी के सामने एक डिस्को गीत गाने का प्रस्ताव रखा, लता जी ने अस्वीकार कर दिया, जब लता जी उन्हें राखी बांधने गयीं, तब उन संगीतकार ने, उनसे वह गीत गाने का अनुरोध किया, और लता जी को गाना पड़ा। लता जी ने, लगभग सभी भारतीय भाषाओं में गीत गाये, तथा इस कारण उनका नाम गिनीज बुक में भी दर्ज हुआ है, उन्होंने आज तक अंग्रेजी में कोई गीत नहीं गाया। आज भी, साल में एक-आध बार ही, लता जी की आवाज किसी फिल्म में सुनने मिलती है, परन्तु जब भी मिलती है, इतनी सम्पूर्णता होती है, कि सारी कमी पूरी हो जाती है।
प्रसिद्ध तबला वादक उस्ताद जाक़िर हुसैन ने अपनी सर्वश्रेष्ठ पसंद, लता जी के एक डुयेट गीत को बताया था, जिसमें दोनों आवाजें लताजी की ही थीं, हुसैन साहब ने कहा था, कि मुख्य स्वर के पीछे चलता हुआ, लता जी का ही आलाप ऐसा लगता है, मानों सितारों में गूंज रहा हो, वह गीत था, फिल्म बहारों क सपने का क्या जानूं सनम। ''कुमार गंधर्व साहब को हमेशा शिकायत रही, कि फिल्म वालों ने लता को हमेशा, ऊँची पट्टी के गाने ही दिये, परन्तु एक गाना ऐसा भी था लता जी का, जो बहुत नीचे स्वरों में गाया गया, और बहुत खूबसूरत ढंग से गाया है, फिल्म अनुपमा का ये गीत कुछ दिल ने कहा सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के पसंदीदा गीतों में पहले नम्बर पर है।

भारत रत्न लता मंगेशकर : नूर की बूंद है सदियों से बहा करती है।

आज से ५९ वर्ष पूर्व, जब देश आजादी की पहली वर्षगांठ मना रहा था, तब एक आवाज चुपचाप से अपनी मौजूदगी का एहसास करा रही थी, हालाँकि सिने संगीत में उस आवाज का पर्दापण तो आजादी के भी लगभग पाँच वर्ष पूर्व हो चुका था, परन्तु 1948 में अचानक उस आवाज ने सारे देश को चमंत्कृत करके रख दिया था, वो गीत था आएगा आने वाला, और फिल्म थी महल। परदे पर भारतीय रजत पट की वीनस मधुबाला, अतृप्त आत्मा का एक छलावा भरा किरदार निभा रही थी, और एक रूहानी आवाज अपनी गूँज से, सारे माहौल को रहस्यमय बना रही थी। कितना बड़ा वरदान है ईश्वर का हम पर, कि आज पचास से अधिक वर्षो के बाद भी वही लता मंगेशकर अपनी जादू भरी आवाज से हमें मदहोश कर रही हैं मुझे ख़बर है वो मेरा नहीं पराया था ‘सादगी’ एलबम में । लता जी को भारत रत्न सम्मान दिया जाना वास्तव में, धन्यवाद ज्ञापन है, उन लाखों करोंड़ों संगीत रसिकों की और से जिन्हें लता जी की दिव्य आवाज तथा जादुई सुरों ने परमानंद की अनुभूति करवाई है।
लगभग 78 वर्ष पूर्व - 28 सितम्बर, 1929 को, रात दस बज कर सैंतालीस मिनट पर, इन्दौर में जब पंडित दीनानाथ जी मंगेशकर के यहां कन्यारत्न की प्राप्ती हुई थी, तब न तो पंडित जी, और ना इन्दौर वासी जानते थे, कि इस शनिवार के दिन ने, उन्हें कैसी गौरवमयी उपलब्धि से जोड़ दिया है। इन्दौर की फिजा में जिस नवजात कन्या का रूदन गूंज रहा है, उसी के कंठ से निकले स्वर, एक दिन सारे भारत, बल्कि सारे विश्व की फिजा में गूंजेगें। पंडित दीनानाथ मंगेशकर, भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक जाना पहचाना नाम थे, अतः उस कन्या के रक्त में सुरों की झंकार तो विरासत में आई थी।
लता जी ने अपने पिता से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान प्राप्त करना प्रारंभ किया, उस उम्र में, जबकि बच्चियाँ अपने खिलौने की दुनिया में सीमित रहती हैं, पंडित जी अपने देहान्त के समय, शास्त्रीय संगीत की विरासत, और तीन बहनों एवं एक भाई का बोझ, अपनी ज्येष्ठ पुत्री के किशोर कंधो पर छोड़ गये थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, पूंजी के नाम पर बस वे सुर थे, जो पंडित जी अपनी संतानों के कंठ में छोड गये थे। आशा जी ने एक बार किसी इन्टरव्यू में कहा था, कि संघर्ष के उन दिनों में लता दीदी और मैं, पैदल ही रिकार्डिंग स्टूडियो जाया करते थे, तब गर्मी के दिनों में मुंबई की सड़कों का तारकोल पिघला हुआ होता था, अतः हमारी चप्पलों में चिपक जाया करता था, लता दीदी कहीं बैठकर अपनी, और मेरी चप्पलों से तारकोल छुड़ातीं, और फिर हम चल देते। संघर्षो से जूझने का यही वह साहस है, जिसने लता जी को यहां लाकर खड़ा कर दिया। आप आंखे बन्द कर कल्पना कीजिये, एक सीधी -साधी सी, दुबली पतली लड़की सड़क किनारे बैठी, हाथो में पत्थर लिये, अपनी और अपनी बहन की चप्पलों पर लगा तारकोल छुडा रही है, और फिर सोचिंए, आज की लता मंगेशकर के बारे में, एक संघर्ष गाथा, विजय गाथा में कैसे बदली, आप स्वयं जान जायेंगे। लताजी के लिये फिल्मों में पार्श्वगायन उस समय एक मजबूरी थी, क्योंकि सारे परिवार का बोझ उन पर था, परन्तु कौन जानता था, कि यही मजबूरी भारतीय संगीत प्रेमियों के लिये, माँ सरस्वती का सबसे बड़ा वरदान साबित होगी।
ये लता जी के उन पचास गीतों की सूची है जो मैंने छांट कर छ: साल पहले कादम्बिनी में प्रकाशित की थी । और उस पर लता जी का पत्र भी मुझे मिला था जिसमें उन्‍होंने लिखा था कि मैं आपके कार्य की प्रशंसा करती हूं कि आपने इतनी मेहनत करके ये गीत छांटे हैं ।
एकल फिल्मी
(सर्वश्रेष्ठ सामूहिक प्रभाव वाले गीत)
1हमने देखी है ...- खामोशी
2आप यूं फासलों से... - शंकर हुसैन
3दिल और उनकी ...- प्रेम पर्वत
4माई री मै कासे ... - दस्तक
5खेलो न मेरे दिल से - हकीकत
6दिल तो है...- मुकद्दर का सिकन्दर
7तू चन्दा ... - रेशमा और शेरा
8अजनबी कौन हो तुम - स्वीकार किया मैंने
9ये मुलाकात एक बहाना है - ख़ानदान
10दिखाई दिये यूं - बाजार
युगल फिल्मी
(सर्वश्रेष्ठ सामूहिक प्रभाव वाले गीत)
1तेरे बिना जिन्दगी...- आँधी
2कभी कभी मेरे ... - कभी कभी
3गुलमोहर गर ...- देवता
4सिमटी हुई ये ... - चम्बल की कसम
5मुझे छू रही हैं... -स्वयंवर
6पत्ता-पत्ता ...- एक नजर
7एक प्यार का ...- शोर
8बीती ना बिताई... -परिचय
9दिल ढूंढता है ...- मौसम
10ये कहां आ गये ...-सिलसिला
गैर फिल्मी
1चाला वाही देस - (चाला वाही देस)
2ए मेरे वतन के लोगों -
3निसदिन बरसत नैन - (निस दिन बरसत नैन हमारे)
4मैं केवल तुम्हारे लिए - (प्रेम भक्ति मुक्ति)
5सांझ भई घर आ जा रे पिया
6दर्द से मेरा दामन (सजदा)
7ठुमक चलत रामचन्द्र - (राम रतन धन पायो)
8अनगिनती हैं तेरे नाम - (अटल छत्रा सच्चा दरबार)
9आकाश के उस पार भी - (ए मेरे वतन के लोगो)
10राम का गुणगान करिए - (राम श्याम गुणगान)
सर्वकालिक महान गीत (एकल)
1अल्ला तेरो नाम...- हम दोनों
2मोरा गोरा रंग... - बंदिनी
3मोहे भूल गए...- बेजू बावरा
4रसिक बलमा...-चोरी-चोरी
5हाये रे वो दिन...-अनुराधा
6लग जा गले ...-वो कौन थी?
7ओ सजना बरखा-परख
8ये जिन्दगी उसी...-अनारकली
9आजा रे परदेसी-मधुमती
10है इसी में प्यार...-अनपढ़
सर्वकालिक महान गीत (युगल)
1दिल की गिरह ...- रात और दिन
2तुम गगन के... - सती-सावित्री
3तू गंगा की...- बेजू बावरा
4जरा सामने...-जनम जनम के फेरे
5नैन सो नैन...-झनक झनक पायल बाजे
6प्‍यार हुआ इकरार ...-श्री 420
7वो जब याद आये-पारसमणी
8दमभर जो उधर...-अवारा
9चलो दिलदार-पाकीजा
10ओ मेरे सनम...-संगम

Wednesday, 26 September, 2007

दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने, रात आंखों में बिताने का मज़ा क्‍या जाने

अभी मेरे हाथ में एक मशहूर कवि की ग़ज़ल आई है जो उनहोंने मेरे एक मित्र के पास सुधारने के लिये भेजी थी । वो ग़ज़ल मैं यहां पर इसलिये दे रहा हूं कि जब मैंने उसको पढ़ा तो मुझे लगा कि इससे अच्‍छा तो मेरी क्‍लास केछात्र लिख रहे हैं । होंगें वो एक बड़े कवि और शाइर लेकिन मुझे नहीं लगता कि उस ग़ज़ल में कोई बात है । उस पर ये कि इतना बड़ा नाम होकर भी वे अपनी गज़ल़ में रंग नहीं भर पाए । यहां पर वो ग़ज़ल भी केवल अपने छात्रों का उत्‍साह वर्द्धन करने के लिये दे रहा हूं । ताकि आप भी जान लें दो बातें पहली ये कि बड़े नाम वाले भी जो कुछ लिखते हैं वो सुधरने से पहले कैसा होता है ( सुधरने से पहले का अर्थ, जहां पर वे अपना लिखा हुआ दुरुस्‍त करने भेजते हैं वहां से सुधरने के पहले ) । दूसरा ये कि आप तो उससे अच्‍छा ही लिख रहे हैं सो लगे रहें । उन बड़े नाम की ग़ज़लें मेरे अभिन्‍न मित्र के पास सुधरने आती हैं । मैं यहां पर किसी वादे के कारण ना तो अपने मित्र का नाम लेना चाहूंगा ना ही उन बड़े कवि का । बस इतना जान लें कि वे इतने बड़े हैं कि इनके शे'र कोट किये जाते हैं । पर कोट होने वाले शे'र सुधरने से पहले कैसे होते हैं वो भी जान लें
अपने वचनों से फि़र गया है वो
मेरी नज़रों से गिर गया है वो
पहले मतले की ही बात करें वज्‍़न की बात नहीं करें केवल ख़याल की बात करें तो कोई नई बात नहीं कही गई है । कुछ भी ऐसा नहीं है जो वाह वाह करवा दे । अगर बात कुछ ऐसी होती 'ख़ुद की नज़रों से गिर गया है वो ' तो रंग पैदा होता । मगर उसके लिये मिसरा उला को भी बदलना पड़ता ।
अब एक और शे'र देखें जिसमें हिंदी के व्‍याकरण का सीधा दोष है
मंडली मित्र की समझता है
अपने दुश्‍मन से घिर गया है वो
अब यहां पर तो उड़न तश्‍तरी जैसा रोज पिटने वाला छात्र भी एक हाथ से चड्डी संभालते हुए और कोहनी से नाक पोंछते हुए बता देगा कि 'माड़साब हम बताएं इनने ग़लत लिखा है , मंडली मित्रों की होती हेगी, मित्र की नहीं मंडली का अर्थ बहुवचन होता है । और आदमी घिरता है दुश्‍मनों से ना कि एक दुश्‍मन से ' ।
ख़ैर मैं उस पर और ज्‍़यादा बात नहीं करना चाहता क्‍योंकि वो मेरा वादा है किसी से ।
चलिये होमवर्क की बात करें
दो संटी खाकर उड़न तश्‍तरी लाइन पर आ गई और दो ( ख़याल और बहर ) में से एक चीज़ को तो पकड़ा बहर को ।
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
अश्क आँखों से चुराने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
फूल बालों मे सजाने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
ओस गालों से हटाने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
प्यार का कर्ज चुकाने का मजा क्या जाने
माड़साब घोषित करते हैं कि सभी शे'र बहर में हैं हालंकि इनमें ख़याल की भारी कमी है ( प्‍यार का कर्ज, ये क्‍या होता है )। केवल पहला शे'र ही कुछ हद तक ठीक है हालंकि उसको भी अच्‍छा नहीं कहा जा सकता । महत्‍वपूर्ण बात ये है कि वज्‍़न निकालना छात्रों को आने लग पड़ा है । अश्‍ का मतलब दीर्घ, का मतलब लघु, आं का मतलब दीर्घ, खों का मतलब दीर्घ, फाएलातुन
फिर से गिरा हुआ दीर्घ अर्थात लघु, चु का अर्थ लघु, रा का अर्थ दीर्घ, और ने का अर्थ दीर्घ ये हो गया फएलातुन
फिर वही का मजा क्‍या जाने जिसका वज्‍़न हम पहले भी निकाल चुके है फएलातुन-फालुन
कुछ लोग जानना चाह रहे हैं कि ये दीर्घ का कैसे पता चले कि ये नेता (गिर कर लघु हो गया है) हो गया है या फिर कवि ( दीर्घ ही है ) ही है । इसका पता आलाप से चलता है अगर किसी दीर्घ के बाद आलाप लेने की गुंजाइश नहीं आ रही है और हम उसको तुरंत खत्‍म कर के आगे बढ़ रहे हैं तो इसका मतलब वो गिरा हुआ है । लंबा आलाप दीर्घ पर ही लगता है ।
कंचन सिंह चौहान ने कहा
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
रात आँखों में बिताने का मज़ा क्या जाने
जो हवा रोज बुझाती है दिये कितने ही
वो मिरे घर के अंधेरों की सज़क क्या जाने?
हालंकि माड़साब ने इसे अभी तक सबसे ज्‍यादा नंबर दिये हैं । मतले को क्‍योंकि दूसरा शे'र तो टाइप की गड़बड़ी से कुछ का कुछ हो गया है, मगर ये तो तय है कि रात आंखों में बिताने का मज़ा क्‍या जाने ने मिसरा उला को मुकम्‍मल कर दिया है ( गुंजाइश अभी भी है ) दूसरा शे'र कुछ ऐसे होना था
जो हवा रोज़ बुझाती है दिये कितने ही
वो कोई दीप जलाने का मज़ा क्‍या जाने
अभी अभिनव और अनूप की कापियां नहीं आईं हैं शायद उड़न तश्‍तरी की पिटाई से डर गए हैं दोनों । हां एक नई छात्रा (शायद छात्रा) की कापी भी आई है
parul k said...
मै भी कुछ हिम्मत करूं
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
अश्क़ पलकों मे बुझाने का मज़ा क्या जाने ।
बहर की तो समस्‍या नहीं है पर मिसरा सानी सानी नहीं हो पाया है । और प्रयास करें आ जाएगा । अभिनव और अनूप दोनों कल जब क्‍लास में आएं तो पहले बाहर मुर्गा बनें दस मिनिट तक फिर अंदर आएं । और अभिनव कल की क्‍लास में अपनी हाफ पैंट में सुतली बांध कर आया था जो उड़नतश्‍तरी ने पीछे से काट दी थी और जब अभिनव जवाब देने के लिये खड़ा हुआ था तो ::::::::: एसी घटना से बचने के लिये अभिनव सुतली की जगह बिजली का कापर वाला तार बांध कर आया करे ।
सूचना हें
1 मेरे समाचारो वाले ब्‍लाग पर कथादेश के मीडिया अंक के बारे में प्रकाशित है यदि आप वहां कुछ भेजना चाहें तो पढ़ लें ।

Tuesday, 25 September, 2007

दिल में हौले से समाने का मज़ा क्‍या जाने ये एक ग़ज़ल का मिसरा है जिसने काफी लोगों को परेशान कर रखा है कि ये पूरा कैसे हो

दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,
प्यार का फर्ज़ निभाने का मज़ा क्या जाने,
ये ग़ज़ल मुझे अभिनव ने भेजी थी और मैंने देखा कि उसमें बात पूरी नहीं हो पा रही है । मिसरा उला कह रहा है कि ''दिल में हौले से समाने का मज़ा क्‍या जाने'' अच्‍छी बात है । और एक बढि़या सा प्रयोग हो भी रहा है । मगर मिसरा सानी में आकर ठ़ुस्‍स मतलब बात बिल्‍कुल ही खत्‍म हो गई है ।
'' प्‍यार का फर्ज निभाने का मज़ा क्‍या जाने '' । अब फर्ज तो होता है बेटे का बाप का मां का मगर प्‍यार का फर्ज नहीं होता प्‍यार तो बहुत ऊपर की शै: है
अब मैंने पहले तो उसका वज्‍़न निकाला जो निकला
फाएलातुन-फएलातुन-फएलातुन-फालुन
SISS-IISS-IISS-SS
या फिर यूं भी कहें कि
लाललाला-लललाला-लललाला-लाला
ये एक मु‍श्किल बहर है जिसका नाम है बहरे रमल मुसम्‍मन मख़बून मुसक्‍कन
अब आप इसका एक उदाहरण भी देख लें
ख़ुश्‍क पत्‍तों पे मेरा नाम यक़ीनन होगा
मैंने इक उम्र ग़ुज़ारी है शजरकारी में

ये उसी बहर का शे'र है
अब इस पर मशक्‍कत की उड़न तश्‍तरी ने , अनूप जी ने और ख़ुद अभिनव ने भी कुछ इस प्रकार से
अभिनव said...
आपकी बात पूर्णतः सत्य है, वो पंक्ति भर्ती की ही थी। उसे परिवर्तित करने का प्रयास किया है।
सामने कुछ ना जताने का मज़ा क्या जाने,
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,
मगर बात कुछ जमी नहीं ''सामने कुछ न जताने का मज़ा क्‍या जाने '' से भी कुछ मज़ा नहीं आया ।
फिर कहा अनूप जी ने
अभिनव की गज़ल के मतले को अगर ऐसे लिखें तो
:दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,
आंख चुपके से चुराने का मज़ा क्या जाने
,
बात वही रही मगर हां ये सबसे अच्‍छा प्रयास ज़रूर था ।
Udan Tashtari said...
मास्साबयह पुराने वाले होमवर्क को देखियेगा। कुछ बात जंचती दिखती है
क्या:
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्‍या जाने
जाग के रातों को गंवाने का मज़ा क्या जाने।या
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्‍या जाने
ख्वाब से रातों को सजाने का मज़ा क्या जाने।
दोनों ही बार उड़न तश्‍तरी बहर से बाहर उड़ गई और मास्‍साब ने दो छड़ी लगाईं हाथ पर ।
अनूप जी ने फिर प्रयास किया
अनूप भार्गव said...
सुबीर जी:आप ने ठीक कहा ,
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,
आंख चुपके से चुराने का मज़ा क्या जाने,
दूसरी पंक्ति अभी भी भरती की लग रही है ।
एक और प्रयास देखिये
:दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,
आंख में खवाब सजाने का मज़ा क्या जाने ।
या
खवाब आँखो में सजाने का मज़ा क्या जाने ।
बात जम नहीं रही , फ़िर भी .....
अनूप जी की अच्‍छी बात ये हैं कि हर बार वे बहर में ही रहे हालंकि बात फिर भी वो नहीं बन पा रही है जिस पर वाह वाह किया जा सके । अब पहले तो ये जान लें कि वज्‍़न कैसे निकाला गया है ।
दिल-फा(दीर्घ), में-ए( उच्‍चारण केवल 'म' गिरकर होने से लघु), हौ-ला ( दीर्घ), ले-तुन ( दीर्घ)
से-फ़ ( से गिरकर सि हो गया है तो लघु), स- ए (लघु दोनों लघु अलग हैं इसलिये मिल कर दीर्घ नहीं हुए ) , मा- ला (दीर्घ), ने- तुन(दीर्घ)
का- फ ( लघु उच्‍चारण में गिरने से ), म- ए(लघु), ज़ा- ला (दीर्घ), क्‍या- तुन ( आधा क या में मिला तो एक दीर्घ), जा- फा (दीर्घ), ने- लुन(दीर्घ)
ये पूरा वज्‍़न हैं इसका पहला रुक्‍न है फाएलातुन मतलब आपको दीर्घ-लघु-दीर्घ-दीर्घ की बंदिश है और वैसा अनूप ने लिया भी है दिल में हौ ले । दूसरा रुक्‍न है फएलातुन मतलब लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ की बंदिश है ये वो दो लघु हैं जो अलग अलग होने के कारण आपस में मिल कर दीर्घ नहीं होंगें। जैसे अनूप ने कहा से स मा ने अब से उच्‍चारण में केवल सि की ध्‍वनी देता हैंऔर इस कारण लघु है और चूंकि ये समाने का अंग नहीं है इसलिये समाने के में नहीं मिलेगा और दोनों अलग रहेंगें ।
फिर अगला रुक्‍न वही है फएलातुन मतलब लघु-लघु-दीर्घ-दीर्घ और अनूप ने कहा का म ज़ा क्‍या यहां पर का गिरकर केवल की ही ध्‍वनि दे रहा है और मज़ा का उससे गठजोड़ करने को तैयार नहीं है सो दोनों अलग अलग हैं । हां आखिर में क्‍या में आधा क्‍ मिला या में और एक दीर्घ मिला । अंत में आया रुक्‍न फालुन मतलब दो दीर्घ जैसा कुछ । और अनूप ने कहा जा ने दोनों को वज्‍़न देकर पढ़ा गया सो दोनों दीर्घ ही हुए । इस तरह बनी बहरे रमल मुसम्‍मन मख़बून मुसक्‍कन
अब ये तो बात हुई व्‍याकरण की चलिये अब बात को हल करिये और दिल में हौले से समाने का मज़ा क्‍या जाने पर एक बढि़या सी गिरह लगाइये और इसका साथी मिसरा तलाश कीजिये कुछ ऐसा कि मज़ा आ जाए । सब प्रयास करें वे भी जो कंचन सिंह चौहान said...
present sir! केवल उपस्थिति दर्ज करवा कर भाग रहे हैं । उड़न तश्‍तरी के हाथ में पड़ी बेंत का असर कम हो गया होगा तो वो फिर से कोशिश करें । दर्द हो रहा हो तो हल्‍दी चूना लगवा लें पर काम कर के दिखाएं क्‍लास में खी खी करने से काम नहीं चलेगा । और हां सब लोग ये भी देखें कि उड़न तश्‍तरी की किस ग़लती पर बेंत पड़ी है शे'र में से वो ग़लती भी छांट कर बताएं ।

Sunday, 23 September, 2007

लोग करते ही रहे मिसयूज़ हम तुम क्‍या करें, जिन्‍दगी ने कर दिया रिफ्यूज हम तुम क्‍या करें, आज फिर जज्‍़बात में बहते गए दरिया बने, जिस्‍म भी कहते रहे

चीखने पर थीं कहां पाबंदियां पर चुप रहे
यूं हुकूमत ने किया है यूज़ हम तुम क्‍या करें
एक बादल की तरह फैली खुशी थी सामने
आते आते हो गई रिड्यूज हम तुम क्‍या करें
कितनी आसानी से पढ़ लेता है वो अख़बार को
वो नहीं रखता ज़हन में न्‍यूज़ हम तुम्‍ा क्‍या करें

दोस्‍तों कई बार बात चलती है टिप्‍पणियों की और वही बात आती है कि हम टिप्‍पणियां देने में इतने कंजूस क्‍यों हें । दरअस्‍ल में ये हमारी आदत है । मैं भी पहले सोचता था कि जब कोई मेरी बात सुन ही नहीं रहा है तो मैं क्‍यों चिल्‍लाऊं दरअस्‍ल में मैं सोचता था कि मेरा लिखा व्‍यर्थ ही जा रहा है पर जब मैंने साइट मीटर लगाया तो देखा कि लोग आ रहे हैं मेरे ब्‍लाग पर और अच्‍छी संख्‍या में आ रहे हैं ठीक है टिप्‍पणियां नहीं छोड्रकर जा रहे पर आ तो रहे हैं ना हो सकता है कि मेरा लिखना अभी उतना प्रभावी नहीं हो रहा हो कि उस पर कोई टिप्‍पणी की जाए ।
खैर चलिये काफिया समापन आज करना है ताकि फिर हम आगे की दिशा में बढ़ सकें
कुछ और मात्राएं जो रह गईं हैं वो ये हैं ऊ, ऊं, ए, एं, ओ, ओं,
1: अहमद फ़राज़ साहब का शे'र है
क्‍या ऐसे कम सुख़न से कोई गुफ़्तगू करे
जो मुस्‍तकिल सूकूत से दिल को लहू करे
अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख्‍़म खाइये
ता जि़न्‍दगी ये दिल न कोई आरज़ू करे
अब यहां पर ऊ को ही काफिया बनाया गया है और उसके अनुसार ही शे'र निकाले जा रहे हें ।
2 : लेकिन ये भी हो सकता है कि ऊ को अं की मात्रा के साथ संयुक्‍त कर दिया गया हो उस हालत में आपको काफिये वैसे ही ढूंढने होंगें ।
हालंकि इस तरह के उदाहरण कम हैं और अगर हैं भी तो उनमें ऊं खुद ही मौजूद है
कितने पिये हैं दर्द के आंसू बताऊं क्‍या
ये दास्‍ताने ग़म भी किसी को सुनाऊं क्‍या
न्‍यू जर्सी अमेरिका में रहने वालीं बी नागरानी देवी की ये ग़ज़ल है
दीवानगी में कट गए मौसम बहार के
अब पतझरों के खौफ से दामन बचाऊं क्‍या
अब यहां पर ऊ तो है पर अं के साथ है इसलिये आपको उसको निभाना पडे़गा ही ।
3 : जब ऊ किसी एक ही अक्षर के साथ मतले में आ रहा हो
जैसे
ऊपर का मतला ही अगर ऐसा होता
ख़ुद को गवां के कौन तेरी जुस्‍तजू करे
ता-जि़न्‍दगी ये दिल न कोई आरज़ू करे
अब इसमें आप फंस गए हैं क्‍योंकि आपने ऊ को ज़ के साथ संयुक्‍त कर दिया है अब आपको काफिये ऐसे ही लेने होंगें जिनमें ज़ू हो या जू हो । मसलन आरज़ू, जुस्‍तज़ू, वुज़ू आदि
4 : दोहराव का मामला
नागरानी जी की गज़ल़ में जो बात है वो ये भी है कि वहां पर काफिया दरअस्‍ल में 'आउं' है य दोहराव का मामला है । आपने मतले में ऊं के पहले एक ख़ास अक्षर का दोहराव कर लिया है जो आ की मात्रा अब आप को उसको निभाना ही है ।
और जो कहीं आपने और ज्‍यादा कुछ कठिन कर लिया तो वो य होगा कि आपने एक अक्षर की भी बंदिश बांध ली
जैस्‍ो
कितने पिए हैं दर्द के आंसू बताऊं क्‍या
ये दास्‍ताने ग़म से किसीको सताऊं क्‍या
अब आप बुरी तरह से फंस गए हें क्‍योंकि आपने 'ताऊं' की बहुत मुश्किल बंदशि ले ली है जिसको निभाना बहुत मुश्किल हो जाएगा ।
आज बस इतना ही क्‍योंकि मुझे कहीं जाना है
अभिनव के मतले
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने,प्यार का फर्ज़ निभाने का मज़ा क्या जा