शनिवार, 1 सितंबर 2007

चलिये आज कुछ ग़ज़ल से संबंधित शब्‍दों की व्‍याख्‍या की जाए

मुझे भी नहीं पता था कि ये काम मुझे इतना रुचने लगेगा और न ही ये पता था कि इतने सारे छात्र भी मिल जाएंगें । अच्‍छा लग रहा है अब मुझे बस हाजिरी बराबर भरते रहें और हां अपने प्रश्‍न ज़रूर भेजते रहें ताकि मुझे भी पता लगे कि बच्‍चे सीख रहे हैं समझ रहे हैं ।
शेर : वास्‍तव में उसको लेकर काफी उलझन होती है कि ये ग़ज़ल वाला शेर है या कि जंगल वाला मगर ये उलझन केवल देवनागरी में ही है क्‍योंकि उर्दू में तो दोनों शेरों को लिखने और उनके उच्‍चारण में अंतर होता है । ग़ज़ल वाले शेर को उर्दू में कुछ ( लगभग) इस तरह से उच्‍चारित किया जाता है ' श्रएर' इसलिये वहां फ़र्क़ होता है वास्‍तव में उसे श्रएर कहेंगे तो जंगल के शेर से अंतर ख़ुद ही हो जाएगा । ये श्रएर जो होता है ये हिंदी के पद के समान ही होता है इसकी दो लाइनें होती हैं इन दोनो लाइनों को मिसरा कहा जाता है श्रएर की पहली लाइन होती है 'मिसरा उला' और दूसरी लाइन को कहते हैं 'मिसरा सानी' दो मिसरों से मिल कर एक श्रएर बनता है । अब जैसे उदाहरण के लिये ये श्रएर देखें 'मत कहो आकाश में कोहरा घना है, ये किसी की व्‍यक्तिगत आलोचना है ' इसमें 'मत कहो आकाश में कोहरा घना है ' ये मिसरा उला है और ' ये किसी की व्‍यक्तिगत आलोचना है' ये मिसरा सानी है । तो याद रखें जब भी आप श्रएर कहें तो उसमें जो दो मिसरे होंगें उनमें से उपर का मिसरा जो कि पहला होता है उसे मिसरा उला कहते हैं और जिसमें आप बात को ख़त्‍म करते हैं तुक मिलाते हैं वो होता हैं मिसरा सानी । एक अकेले मिसरे को श्रएर नहीं कह सकते हैं । वो अभी मुकम्‍मल नहीं है ।
क़ाफिया : क़ाफिया ग़ज़ल की जान होता है । दरअसल में जिस अक्षर या शब्‍द या मात्रा को आप तुक मिलाने के लिये रखते हैं वो होता है क़ाफिया । जैसे ग़ालिब की ग़ज़ल है ' दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्‍या है, आखि़र इस दर्द की दवा क्‍या है ' अब यहां पर आप देखेंगें कि 'क्‍या है' स्थिर है और पूरी ग़ज़ल में स्थिर ही रहेगा वहीं दवा, हुआ जैसे शब्‍द परिवर्तन में आ रहे हैं । ये क़ाफिया है 'हमको उनसे वफ़ा की है उमीद जो नहीं जानते वफ़ा क्‍या है ' वफा क़ाफिया है ये हर श्रएर में बदल जाना चाहिये । ऐसा नहीं है कि एक बार लगाए गए क़ाफिये को फि़र से दोहरा नहीं सकते पर वैसा करने में आपके शब्‍द कोश की ग़रीबी का पता चलता है मगर करने वाले करते हैं 'दिल के अरमां आंसुओं में बह गए हम वफा कर के भी तन्‍हा रह गए, ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मग़र फ़ासले जो दरमियां थे रह गए' इसमें रह क़ाफिया फि़र आया है क़ायदे में ऐसा नहीं करना चाहिये हर श्रएर में नया क़ाफि़या होना चाहिये ताकि दुनिया को पता चले कि आपका शब्‍दकोश कितना समृद्ध है और ग़ज़ल में सुनने वाले बस ये ही तो प्रतीक्षा करते हैं कि अगले श्रएर में क्‍या क़ाफिया आने वाला है । ग़ज़ल के ठीक पहले श्रएर के दोनों मिसरों में क़ाफिया होता है इस श्रएर को कहा जाता ग़ज़ल का मतला शाइर यहीं से शुरूआत करता है ग़ज़ल का मतला अर्ज़ है । क़ायदे में तो मतला एक ही होगा किंतु यदि आगे का कोई श्रएर भी ऐसा आ रहा है जिसमें दोनों मिसरों में काफिया है तो उसको हुस्‍ने मतला कहा जाता है वैसे मतला एक ही होता है पर बाज शाइर एक से ज्‍़यादा भी मतले रखते हैं । ग़ज़ल का पहला श्रएर जो कुछ भी था उसकी ही तुक आगे के श्रएरों के मिसरा सानी में मिलानी है । एक और चीज़ है जो स्थिर है ग़ालिब के श्रएर में दवा क्‍या है, हुआ क्‍या है में क्‍या है स्थिर है ये 'क्‍या है' पूरी ग़ज़ल में स्थिर रहाना है इसको रद्दीफ़ कहते हैं इसको आप चाह कर भी नहीं बदल सकते । अर्थात क़ाफिया वो जिसको हर श्रएर में बदलना है मगर उच्‍चारण समान होना चाहिये और रद्दीफ़ वो जिसको स्थिर ही रहना है कहीं बदलाव नहीं हो ना है । रद्दीफ़ क़ाफिये के बाद ही होता है । जैसे ''मुहब्‍बत की झूठी कहानी पे रोए, बड़ी चोट खाई जवानी पे रोए' यहां पर ' पे रोए' रद्दीफ़ है पूरी ग़ज़ल में ये ही चलना है कहानी और जवानी क़ाफिया है जिसका निर्वाहन पूरी ग़ज़ल में पे रोए के साथ होगा मेहरबानी पे रोए, जिंदगानी पे रोए, आदि आदि । तो आज का सबक क़ाफिया हर श्रएर में बदलेगा पर उसका उच्‍चारण वही रहेगा जो मतले में है और रद्दीफ़ पूरी ग़ज़ल में वैसा का वैसा ही चलेगा कोई बदलाव नहीं । अच्‍छा बच्‍चों आज का सबक याद कर लेना मास्‍साब कल रविवार की छ़ुट्टी के बा सोमवार को मिलेंगें इंशाअल्‍लाह। उड़न तश्‍तरी ने अपने ब्‍लाग की पंक्तियों को मास्‍साब के कहने पर दुरुस्‍त कर लिया उनको मिलते हैं 10 नंबर ( हम लोग के दादा मुनी वाले) ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. १० नम्बर मिल गये, वाह!!

    मास्साब, क्या आप इसको टाईप करते समय:

    'मत कहो आकाश में कोहरा घना है, ये किसी की व्‍यक्तिगत आलोचना है

    कि जगह दो लाईन में कर सकते हैं:

    'मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
    ये किसी की व्‍यक्तिगत आलोचना है

    एवं अगर बीब बीच में पैराग्राफ बना दें तो पढ़ने में सहूलियत होगी. साथ ही ध्यान देने योग्य शब्द जैसे मतला, काफिया, रद्दीफ आगि बोल्ड कर दें.

    सुझाव है बस, सहूलियत आप देखें.

    हमें तो अच्छा ही है कि क्लास में भी पढ़ रहे हैं और मास्साब की घर की ट्यूशन भी लगवा ली है. :) ज्यादा नम्बर मिलेंगे. सोमवार को आयेंगे अब.

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  2. बहुत ही कठिन काम हाथ में लिया है आपने । आप गजल की आधारभूत बातें बता रहे हैं । व्‍याकरण जैसा मामला है । बार-बार पढने पर भ तनिक कठिनाई से समझ आ पा रहा है । आपके 'सागर' में से एक बूंद भी ले पाया तो धन्‍य भाग मेरे ।

    तहेदिल से शुक्रिया ।

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  3. आप के इस प्रयास के लिये धन्यवाद ।

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  4. जी ..
    समझ गया ,,,

    श्रएर
    मिसरा उला
    मिसरा सानी
    रदीफ
    काफिया
    मकता
    हुस्ने मिसरा भी समझ आ गया ...
    थोड़ा उदाहरण कम लगे ... उड़नतश्तरी जी से सहमत हूँ .. नमस्ते

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