गुरुवार, 13 सितंबर 2007

उड़न तश्‍तरी ने क्‍या ख़ूब ग़ज़ल कही है, दिल ख़ुश कर दिया है ' धर्म का ले नाम चलती है यहां पर जो हवा, पेड़ उसमें एक मैं जड़ से उखड़ता रह गया ' वाह वाह

उड़न तश्‍तरी के बारे में अब मुझे ऐसा लगने लगा है कि ये जितने बाहर दिखाई देते हैं उससे कहीं ज्‍़यादा अंदर हैं और ये अचानक ही कुछ कुछ कर के चौंका देते हैं । अब जैसे मेरे डांटने पर इन्‍होंने एक ग़ज़ल लिख दी है, अब इसको वैसा ही कहेंगें कि कोई बदमाश बच्‍चा कुछ कम न कर रहा हो और डांटने पर अचानक उठे और ताजमहल बनाकर ले आए कि लो ये बना लिया है मैंने ।
शब्द मोती से पिरोकर, गीत गढ़ता रह गया। पी मिलन की आस में, लेकिन बिछुड़ता रह गया.शेर उसने जो लिखे, दिल को थामें हाथ में काम सारे छोड़ कर, मैं उनको पढ़ता रह गया. धर्म का ले नाम चलती है यहाँ पर जो हवा पेड़ उसमें एक मैं, जड़ से उखड़ता रह गया. फैल करके सो सकूँ मैं, वो जगह हासिल नहीं ठंड का बस नाम लेकर, मैं सिकुड़ता रह गया. घूमता फिरता फिरा पर कुछ हुआ हासिल नहीं प्यार पाने को समीरा, बस तड़पता रह गया.
हालंकि अभी भी कुछ समस्‍याएं हैं जैसे बिछ़ुड़ता रह गया कहना कुछ खल रहा है क्‍योंकि वाक्‍य में बिछ़ड़ता का प्रयोग सही नहीं है साफ लग रहा है कि भर्ती का शब्‍द है । मगर एक बात जो अच्‍छी है वो ये है कि पूरी की पूरी ग़ज़ल एक जगह को छोडंकर बहर में है । वो एक जगह है शे'र उसने जो लिखे दिल को थामे हाथ में में बीच में एक दीर्घ की कमी हो रही है इसलिये बहर बाहर हो रहा है हां अगर उसमें एक थे लगा दें तो बात बन जाएगी शे'र उसने जो लिखे थे दिल को थामे हाथ में
में बात बन गई । मगर बात फिर भी वही है कि पहला मिसरा भर्ती का लग रहा है उसमें कुछ सुधार की गुंजाइश है ।
कुछ उदाहरण देता हूं कि कैसे सुधार होगा
शे'र उसने जो लिखे थे बेवफाई पर मिरी
या
शे'र उसने जो लिखे थे खून में उंगली डुबा
या
शे'र उसने जो लिखे अश्‍कों में काजल घोलकर
या
शे'र दीवारों पे उसने खून से थे जो लिखे
ये कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह से मिसरा उला और मिसरा सानी में मिलान होना चाहिये आपका पहला मिसरा दूसरे को जस्टिफाई नहीं कर रहा है ।
हां एक जगह पर घूमता फिरता फिरा में भी कुछ खल रहा है फिरता फिरा दो बार फिर आना अच्‍छा नहीं है । इसको या तो ढूंड़ता फिरता रहा करें या घूमता फिरता रहा करें ।

मज़े की बात ये है कि माससाब ने कल जिस बहर को जि़क्र किया था फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलुन ये पूरी ग़ज़ल उसी बहर पर है ।
ग़ज़ल तो अभिनव ने भी निकाली है जो नीचे है
फाएलातुन फाएलातुन फाएलातुन फाएलुन,मैंने तेरे को सुना है अब तू मेरे को भी सुन,नौकरी करती हुई महिला नें खुश होकर कहा,चार स्वेटर बुनती हूँ मैं तीन स्वेटर तू भी बुन,बोले तो अब अपुन भी लिक्खेगा बुमाबुम ग़जल,तू समझ के बोल वा वा क्या रे मामू सिर न धुन
ग़ज़ल तो ये भी पूरी ही बहर में है केवल एक मिसरा बाहर गया है बोले तो अब अपुन भी लिक्‍खेगा बुमाबुम ग़ज़ल इसमें काफी दोष हैं उसको ऐसे कर लें तो बात बन जाएगी
अब तो लिक्‍खेगा अपुन भी ख़ूब बूमाबुम ग़ज़ल
इन्‍होंने कुछ प्रश्‍न भी किये हैं
एक प्रश्न है, जैसे यदि दूसरे शेर को देखें तो इसमें, "होकर कहा," और "तू भी बुन," में भी क्या कुछ मात्राओं को मिलाने की कोशिश होनी चाहिए। और क्या मात्रा जोड़ने का जो तरीका नीचे दिया है २ - दीर्घ और १ - लघु, क्या ये सही है। उस हिसाब से तो ये शेर बहर के बिलकुल बाहर हो गया। आपका क्या विचार है।नौकरी करती हुई महिला नें खुश होकर कहा,२१२ ११२ १२ ११२ २ ११ २११ १२चार स्वेटर बुनती हूँ मैं तीन स्वेटर तू भी बुन,२१ १२११ ११२ २ २ २१ १२११ २ २ ११
और कुद ऐसे ही सवाल उठाए हैं अनूप भार्गव जी ने भी
१। जब लघु और दीर्घ का ही अन्तर करना है तो दीर्घ के लिये इतने सारे 'फ़ा', 'ला', 'तुन','लुन' आदि का और लघु के लिये 'ए' या 'इ' का प्रयोग क्यों ? आप का ला ल ला ला वाला ही अच्छा और सरल है । २. क्या सभी दीर्घ और सभी लघु एक समान होते हैं या उन में भी अन्तर होता है ?३. जब दो लघु एक साथ हों तो क्या वह हमेशा 'दीर्घ' बन जाते हैं ?४. आधे अक्षर का वज़्न कैसे गिना जायेगा जैसे बस्ती , सस्ता, आदि में ?५. राजगोपाल जी की गज़ल में मुझे मात्रा गिनते समय कुछ गलतियां लग रही हैं , ज़रूर मेरी ही अज्ञानता है गिनने में लेकिन आप पुष्टी करें । जैसे गाँव भर की धूप को हंस कर उठा लेता था वो,इस में २१२२-२१२२-२१२२-२१२ कैसे हुए ?गाँव भर की- धूप को हंस- कर उठा ले-ता था वो,२१२२-२१२२-२१२२-२२२ हुए ना ?
ये सारे सवाल बहर को लेकर हैं मैं हालंकि अभी बहर की बात करना नहीं चाहता था पर कल से मैंने कर दी है सो आज इन सवालों के जवाब पर केवल कुछ के
नौकरी करती हुई महिला ने ख़ुश होकर कहा
इसका वज्‍़न यूं होगा
नौ-दीर्घ, क-लघु, री-दीर्घ, कर-लघुलघु-दीर्घ मतलब फाएलातुन
ती-दीर्घ, हु-लघु, ई-दीर्घ, महि-लघुलघु-दीर्घ मतलब फाएलातुन
ला-दीर्घ, ने-( यहां पर ने उच्‍चारण में गिरने के कारण लघु है) लघु, ख़ुश-लघुलघु-दीर्घ, हो-दीर्घ मतलब वही फाएलातुन
कर-लघुलघु-दीर्घ, क-लघु, हा-दीर्घ मतलब फाएलुन
अब बात अनूप जी को भी समझ में आ गई होगी कि उस ग़ज़ल में ता था वो ये तीन मात्राएं जो दिखने में दीर्घ हैं इनमें था को मैंने लघु क्‍यों माना है । दरअसल में ग़ज़ल ध्‍वनियों को खेल है पढ़ते समय जैसा उच्‍चारण होना है वैसा ही मात्रा गणन होगा
अब यहां पढ़ते समय था को गिरा दिया जाता है और कुछ ऐसा पढ़ा जात है
ता थ वो मतलब था को पढ़ते समय केवल की ही ध्‍वनि निकलती है उसलिये उसे लघु माना जाता है मैंने पहले ही कहा था कि ग़ज़ल में काफी स्‍वतंत्रता है ये केवल ध्‍वनि पर चलती है इसीलिये कहीं कहा जाता है दीवार मतलब दीर्घ-दीर्घ-लघु और कही यही बेचारी दीवार हो जाती है दिवार ।
इसलिये ही कहता हूं की अगर आपके अंदर रिदम है तो गज़ल़ को पहले अपनी रिदम पर बैठा कर देखो अगर वो फिट आ रही है तो मतलब सब ठीक है ।
आधा अक्षर अपने उच्‍चारण के हिसाब से संयुक्‍त हो जाता है जैसे तुम्‍हारे में तु अकेला है पर आधा म्‍ मिल गया हे हा और उसका उच्‍चारण अब म्‍हा है मतलब दीर्घ । आपने जो सस्‍ता के बारे में पूछा है तो बता दूं यहां है सस्‍ ता छोटा स बड़े स में मिल कर एक दीर्घ हो गया है । आप अपने आप ही उच्‍चारण से पकड़ सकते हैं कि कौन सा आधा किस में मिल रहा है ।
खैर मैं चाहता हूं कि ज़ल्‍दी से अपनी कक्षा फिर से चालू कर दूं बेचारा इंतेज़ार कर रहा है ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. यस सर,
    सच कहूँ मैंने अनेक पुस्तकें उठा कर मीटर के भेद समझने का प्रयास किया। पर आज पहली बार ऐसा अनुभव हो रहा है कि कुछ कुछ समझ में आना प्रारंभ हुआ है। आपको अनेक धन्यवाद गुरुवर। आज के होम वर्क के रूप में कुछ लिखने के प्रयास कर रहा हूँ।

    कुछ तो आग लगाने निकले,
    कुछ वो आग बुझाने निकले,

    कुछ बस केवल देख तमाशा,
    अपना दिल बहलाने निकले,

    पहले पढ़ी नमाज़ जुमे की,
    फिर वो गाँव उड़ाने निकले,

    राम नाम जपते महलों में,
    रावण के तहखाने निकले,

    गांधीजी को गाली देकर,
    अपना रौब बढ़ाने निकले,

    सूरज को जल अर्पण करके,
    साहब दफ्तर जाने निकले,

    दोपहरी में खाने निकले,
    संध्या को मयखाने निकले,

    थोड़ी पीकर होश में आए,
    चावल बड़े पुराने निकले।

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  2. मास्साब,

    नम्बर नहीं दिये?? :)

    तारीफ के लिये बहुत शुक्रिया. आप बहुत अच्छी क्लास ले रहे हैं. कुछ कुछ समझ भी आने लगा है. आपकी क्लास के बारे में लिखते हुए आपके बाये अनुसार यह गजल ठीक करके अपने ब्लॉग पर डाल दूँ क्या?

    नम्बर नहीं देंगे तो बच्चे शैतानी करेंगे, देखिये इस तरह की:

    प्यार में भभका जमाने, कार इक मैं ला रहा हूँ
    तू मुझे अपना बना ले, गीत इक मैं गा रहा हूँ.

    कल अगर जिंदा बचा तो और कुछ वादे करुँगा
    दिन दहाडे बाप से मैं, तेरे मिलने आ रहा हूँ.

    दम दिखाते फिर रहे क्यूँ, भाई तेरे हर तरफ
    ठोंक देंगे आज उनको, गुंडे मैं भिजवा रहा हूँ.


    इसमें भी ’आ’ का काफिया इस्तेमाल करने की कोशिश की है, मास्साब और रद्दीफ ’रहा हूँ’..:)

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  3. आप की बात समझ आ रही है :-)
    अभिनव की गज़ल में कुछ जोड़ने की कोशिश :

    खुद को दोस्त कहा करते थे
    वक्त पड़ा अनजाने निकले

    भोली भाली सी सूरत थी
    पर वो बड़े सयाने निकले

    हमसे दूर चले जाने के
    कितने नये बहाने निकले

    आंधी के थमने पर देखा
    बस्ती में वीराने निकले

    और अब समीर भाई नाराज़ न हों जाये , इसलिये एक शेर उन की भी गज़ल में :

    तेरे मेरे बीच में रिश्ता नया कायम करें
    तेरे अब्बा को ससुर मैं आज कहने आ रहा हूँ :-)

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  4. waah sir ji such me isse achcha aur saaf mene kahi nahi pada thanks sir ji

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