गुरुवार, 27 सितंबर 2007

दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने, रात आंखों में बिताने का मज़ा क्‍या जाने

अभी मेरे हाथ में एक मशहूर कवि की ग़ज़ल आई है जो उनहोंने मेरे एक मित्र के पास सुधारने के लिये भेजी थी । वो ग़ज़ल मैं यहां पर इसलिये दे रहा हूं कि जब मैंने उसको पढ़ा तो मुझे लगा कि इससे अच्‍छा तो मेरी क्‍लास केछात्र लिख रहे हैं । होंगें वो एक बड़े कवि और शाइर लेकिन मुझे नहीं लगता कि उस ग़ज़ल में कोई बात है । उस पर ये कि इतना बड़ा नाम होकर भी वे अपनी गज़ल़ में रंग नहीं भर पाए । यहां पर वो ग़ज़ल भी केवल अपने छात्रों का उत्‍साह वर्द्धन करने के लिये दे रहा हूं । ताकि आप भी जान लें दो बातें पहली ये कि बड़े नाम वाले भी जो कुछ लिखते हैं वो सुधरने से पहले कैसा होता है ( सुधरने से पहले का अर्थ, जहां पर वे अपना लिखा हुआ दुरुस्‍त करने भेजते हैं वहां से सुधरने के पहले ) । दूसरा ये कि आप तो उससे अच्‍छा ही लिख रहे हैं सो लगे रहें । उन बड़े नाम की ग़ज़लें मेरे अभिन्‍न मित्र के पास सुधरने आती हैं । मैं यहां पर किसी वादे के कारण ना तो अपने मित्र का नाम लेना चाहूंगा ना ही उन बड़े कवि का । बस इतना जान लें कि वे इतने बड़े हैं कि इनके शे'र कोट किये जाते हैं । पर कोट होने वाले शे'र सुधरने से पहले कैसे होते हैं वो भी जान लें
अपने वचनों से फि़र गया है वो
मेरी नज़रों से गिर गया है वो
पहले मतले की ही बात करें वज्‍़न की बात नहीं करें केवल ख़याल की बात करें तो कोई नई बात नहीं कही गई है । कुछ भी ऐसा नहीं है जो वाह वाह करवा दे । अगर बात कुछ ऐसी होती 'ख़ुद की नज़रों से गिर गया है वो ' तो रंग पैदा होता । मगर उसके लिये मिसरा उला को भी बदलना पड़ता ।
अब एक और शे'र देखें जिसमें हिंदी के व्‍याकरण का सीधा दोष है
मंडली मित्र की समझता है
अपने दुश्‍मन से घिर गया है वो
अब यहां पर तो उड़न तश्‍तरी जैसा रोज पिटने वाला छात्र भी एक हाथ से चड्डी संभालते हुए और कोहनी से नाक पोंछते हुए बता देगा कि 'माड़साब हम बताएं इनने ग़लत लिखा है , मंडली मित्रों की होती हेगी, मित्र की नहीं मंडली का अर्थ बहुवचन होता है । और आदमी घिरता है दुश्‍मनों से ना कि एक दुश्‍मन से ' ।
ख़ैर मैं उस पर और ज्‍़यादा बात नहीं करना चाहता क्‍योंकि वो मेरा वादा है किसी से ।
चलिये होमवर्क की बात करें
दो संटी खाकर उड़न तश्‍तरी लाइन पर आ गई और दो ( ख़याल और बहर ) में से एक चीज़ को तो पकड़ा बहर को ।
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
अश्क आँखों से चुराने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
फूल बालों मे सजाने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
ओस गालों से हटाने का मजा क्या जाने
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
प्यार का कर्ज चुकाने का मजा क्या जाने
माड़साब घोषित करते हैं कि सभी शे'र बहर में हैं हालंकि इनमें ख़याल की भारी कमी है ( प्‍यार का कर्ज, ये क्‍या होता है )। केवल पहला शे'र ही कुछ हद तक ठीक है हालंकि उसको भी अच्‍छा नहीं कहा जा सकता । महत्‍वपूर्ण बात ये है कि वज्‍़न निकालना छात्रों को आने लग पड़ा है । अश्‍ का मतलब दीर्घ, का मतलब लघु, आं का मतलब दीर्घ, खों का मतलब दीर्घ, फाएलातुन
फिर से गिरा हुआ दीर्घ अर्थात लघु, चु का अर्थ लघु, रा का अर्थ दीर्घ, और ने का अर्थ दीर्घ ये हो गया फएलातुन
फिर वही का मजा क्‍या जाने जिसका वज्‍़न हम पहले भी निकाल चुके है फएलातुन-फालुन
कुछ लोग जानना चाह रहे हैं कि ये दीर्घ का कैसे पता चले कि ये नेता (गिर कर लघु हो गया है) हो गया है या फिर कवि ( दीर्घ ही है ) ही है । इसका पता आलाप से चलता है अगर किसी दीर्घ के बाद आलाप लेने की गुंजाइश नहीं आ रही है और हम उसको तुरंत खत्‍म कर के आगे बढ़ रहे हैं तो इसका मतलब वो गिरा हुआ है । लंबा आलाप दीर्घ पर ही लगता है ।
कंचन सिंह चौहान ने कहा
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
रात आँखों में बिताने का मज़ा क्या जाने
जो हवा रोज बुझाती है दिये कितने ही
वो मिरे घर के अंधेरों की सज़क क्या जाने?
हालंकि माड़साब ने इसे अभी तक सबसे ज्‍यादा नंबर दिये हैं । मतले को क्‍योंकि दूसरा शे'र तो टाइप की गड़बड़ी से कुछ का कुछ हो गया है, मगर ये तो तय है कि रात आंखों में बिताने का मज़ा क्‍या जाने ने मिसरा उला को मुकम्‍मल कर दिया है ( गुंजाइश अभी भी है ) दूसरा शे'र कुछ ऐसे होना था
जो हवा रोज़ बुझाती है दिये कितने ही
वो कोई दीप जलाने का मज़ा क्‍या जाने
अभी अभिनव और अनूप की कापियां नहीं आईं हैं शायद उड़न तश्‍तरी की पिटाई से डर गए हैं दोनों । हां एक नई छात्रा (शायद छात्रा) की कापी भी आई है
parul k said...
मै भी कुछ हिम्मत करूं
दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
अश्क़ पलकों मे बुझाने का मज़ा क्या जाने ।
बहर की तो समस्‍या नहीं है पर मिसरा सानी सानी नहीं हो पाया है । और प्रयास करें आ जाएगा । अभिनव और अनूप दोनों कल जब क्‍लास में आएं तो पहले बाहर मुर्गा बनें दस मिनिट तक फिर अंदर आएं । और अभिनव कल की क्‍लास में अपनी हाफ पैंट में सुतली बांध कर आया था जो उड़नतश्‍तरी ने पीछे से काट दी थी और जब अभिनव जवाब देने के लिये खड़ा हुआ था तो ::::::::: एसी घटना से बचने के लिये अभिनव सुतली की जगह बिजली का कापर वाला तार बांध कर आया करे ।
सूचना हें
1 मेरे समाचारो वाले ब्‍लाग पर कथादेश के मीडिया अंक के बारे में प्रकाशित है यदि आप वहां कुछ भेजना चाहें तो पढ़ लें ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अरे मास्साब आज तो बड़ा भाग्यशाली दिन है, अभी अभी पद्म श्री के०पी० सक्सेना कई कई बार सर पर हाथ धर कर आशीर्वाद दिया कि अगले वर्ष तक तुम्हारी कम से कम ५ पत्रिकाओं मे लेख प्रकाशित हो जाएंगे और इधर मास्साब ने भी सबदे ज्यादा नं० दे दिये, आज तो अम्मा बहुत बड़ाई करेंगी।

    और मास्साब हम बताये थे न कि कार्यालय बंद हो रहा था, इसीलिये कुछ का कुछ टाइप हो गया आप तो समझ ही रहे होंगे न कि वो सज़क नही, सज़ा है।

    और मास्साब हम कुछ जादा ही खुश हैं न इस लिये थोड़ा जादा बोले जा रहे हैं, लेकिन एक और बात बताएं... वो जो हमने मिसरा लिखा था न, उसमें हम थोड़ा सूफियाना हो गये थे औ हम न अपनी तरफ से ऊपर वाले के लिये लिखे थे, कि जइसे मास्साब वो रोज कितने लोगो की बत्ती गुल कर देता है, है न ? लेकिन उसे क्या पता कि कुछ घरों में हमेशा के लिये अंधेरा हो जाता है। ऊ का जाने कि कितना मुश्किल होता है अंधेरों से लड़ना।

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  2. मास्साब्जी,

    हमने भी एक प्रयास किया है, लेकिन एक सम्स्या आ गयी है ।

    गजल लिख्ने चले थे, लेकिन मतला छोडकर बाकी शेर लिख लिये हैं ।

    कुछ मतला सुझाईये, वर्ना अप्ने शिष्यों को एक इम्तिहान के रूप में ही दे दीजिये ।

    कुछ इस प्रकार लिखा है

    मतला गायब है, बाकी शेर इस प्रकार हैं ।


    राह में गर कहीं वो जो आयें नजर,
    देख के उनको नजरे चुराता हूँ मैं

    जानता हूँ वो मेरा मुकद्दर नहीं,
    उनको पाने की हसरत मिटाता हूँ मैं

    दिल में आंसू लबों पे तबस्सुम लिए
    दर्द लेके हंसी बाँट आता हूँ मैं |

    अब छडी पडेगी हाथ पर या शाबासी मिलेगी ये तो भगवान ही जाने, अपने से तो बहर, रदिफ़ और काफ़िया निभाने की कोशिश की है । :-)

    आपका नालायक शिष्य,

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  3. आज आराम है. कोई होम वर्क नहीं. खूब खेल रहे हैं.

    नीरज को तो छड़ी पड़ना लगभग तय ही सा दिख रही है.अजब मजा आयेगा-आते ही स्वागत बैंत से. :)

    अनूप जी और अभिनव तो डर के मारे आ ही नही रहे अभी तक. पहले मुर्गा जो बनना है. हा हा!! अब मजा आया.

    और कंचन जी की तारीफ हो गई तो बहुत खूश दिख रही है मगर मास्स्साब एक दिन बीस नम्बर देकर अगले दिन ५० नम्बर काटते हैं और सजा अलग से. संभल कर रहियेगा.

    इनका फेवरेट स्टूडेंट वाला सिस्टम नहीं है.

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  4. सुबीर जी:
    दस मिनिट तक क्लास के बाह्र मुर्गा बननें की ट्रिक काम कर गई लगता है ।
    >दिल में हौले से समाने का मज़ा क्या जाने
    >प्यार में हद से गुजर जाने का मज़ा क्या जाने
    अब पता नहीं बहर वहर बैठी या नहीं , हमें तो अच्छा लगा, आगे आप बतायें ।

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  5. यस सर,

    एक हाथ से कान पकड़े हुए, एक हाथ से ही टाईप कर रहा हूँ। अगली बार होमवर्क जमा करने से पहले रिवाइज़ अवश्य करूँगा।

    मुद्दत हुई थी सामने मुर्गा बने हुए,
    स्कूल मेरे सामने फिर आके जम गया,

    बाकी क्लासेज़ भी मिस हो गई हैं, वहाँ अभी हाजरी लगा कर आता हूँ।

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