बुधवार, 1 जून 2011

खींच के मारा किसी ने आसमाँ पे आज पत्थर सुबह की डाली से टूटी गर्मियों की ये दोपहरी. आज ग्रीष्‍म तरही मुशायरे में सुनते हैं दिगम्‍बर नासवा की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल.

तरही मुशायरे में इस बार जो ग़ज़लें मिली हैं उनको सुनकर मन को बहुत सुकून हो रहा है. इस बार ऐसा लग रहा है कि सारी ग़जल़ें पूरे मन से लिखी गईं हैं . ग्रीष्‍म्‍ का अपना एक आनंद है जो कि इन ग़ज़लों के साथ मिल कर दुगना हो रहा है. वैसे तो हर एक ऋतु का अपना आनंद होता है. मुझे याद पड़ता है जब मैं छोटा था तो पत्रिकाओं में किसी पेंट बनाने वाली कंपनी के विज्ञापन छपते थे जिनमें हर ऋतु के आधार पर क्‍लासिकल पेंटिंग लगी होतीं थीं, आज उन विज्ञापनों को तलाश करता हूं मगर वे मिलते नहीं है. अद्भुत होते थे वे  विज्ञापन. और इसी बीच कल ये भी हुआ कि दोपहर बाद तेज़ लू ने चपेट लिया, रात भर बुखार में बीती. कल ही हमारे शहर में बाबा रामदेव आये, चुन चुन कर शहर के सारे करोड़पतियों के घर गये और उनसे भ्रष्‍टाचार मिटाने में सहयोग मांगा. रात्रि विश्राम एक करोड़पति ठेकेदार के घर किया, भ्रष्‍टाचार मिटाने के लिये. आज के दोनों ही चित्र श्री बब्‍बल गुरू के सौजन्‍य से दिये जा रहे हैं जिन्‍होंने खास तौर से इस तरही के लिये ये दोनों चित्र कल ही लिये हैं.

ग्रीष्‍म तरही मुशायरा

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और सन्‍नाटे में डूबी   गर्मियों की ये  दुपहरी   

आज हम तरही में सुनने जा रहे हैं दिगम्‍बर नासवा की एक बहुत ही सुंदर ग़ज़ल. ग़ज़ल में कुछ प्रयोग बहुत ही जानदार किये गये हैं.

digambar दिगम्‍बर नासवा

digamber naswah1 गुरुदेव फोटो तो लगा दिया है ... टोपी का राज़ आपको पता है (वैसे इतनी साफ़ खोपड़ी भी नहीं है .. हा..हा..) ... साथ में पत्नी है ... (शादी के बाद अकेले का क्या परिचय) ...

बार बार चेतावनी मिल रही है पूरा परिचय और फोटो भेजें ... तो बच्चों की भी फोटो भेज रहा हूँ ... अब बच्चे हैं तो रोमांस करते हुवे कबाब में हड्डी तो बनेंगे नहीं ... इसलिए अलग से दोनों बेटियों की फोटो भेज रहा हूँ ... फोटो एडिट नहीं कर पाया इसलिए एक अँगरेज़ की फोटो भी साथ आ गयी ... वो रिश्ते में कुछ नहीं लगता  ... बड़ी बिटिया का नाम मध्यमा और छोटी का नाम वृंदा है ...

digamber naswa madhyma vrinda1

बाकी परिचय के नाम पर कुछ ख़ास नहीं .... फरीदाबाद का निवासी, CA हूँ, पिछले 11 वर्ष से दुबई में रह रहा हूँ ... जीवन के हर लम्हे को ताज़ा लम्हे की तरह जीना चाता हूँ ... वैसे इस बात में विशवास करता हूँ की परिचय वो होता है जो आपके लिए दूसरे कहें ...

मेरी रचना प्रक्रिया ....  मुझे लगता है की लिखान एक स्वत : क्रिया है. कहीं भी, कभी भी कुछ दिमाग़ में आ जाता है और चेतना वर्तमान माहौल से शून्य हो कर रचना में भटकने लगती है ... कभी कभी आस पास बिखरी बातें, गुज़रा वक़्त, सामाजिक परिवेश या कोई शब्द भी लिखने को प्रेरित कर जाता है. एक बार जब रचना का आरंभ हो जाता है तो जो मन में आता है उसे उसी प्रवाह में लिखते जाना ही रचना को जन्म देता है ...  इसलिए बहुत सी बार मेरी ग़ज़लें बहर में नही रह पातीं क्योंकि विद्रोही मन शब्द या अर्थ बदलने को मुश्किल से तैयार होता है.

तरही ग़ज़ल

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तेज़ तीखी तिलमिलाती गर्मियों की ये दोपहरी
बादलों से कब है हारी गर्मियों की ये दोपहरी


पेड़ पौधे घास गमले फिर से मुरझाने लगे हैं  
क्या करे छाया बिचारी गर्मियों की ये दोपहरी 


तुम न आए, आ गया सूरज सरों पे आँख मलता  
साथ है किस्मत की मारी गर्मियों की ये दोपहरी


जल गये पत्ते, नदी सूखी, हवा ने ली खुमारी
आसमाँ ने जब उतारी गर्मियों की ये दोपहरी

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फिर कहाँ तुमको मिलेगा सर पे ये सूरज पिघलता
उफ़ खुदा की दस्तकारी गर्मियों की ये दोपहरी


फालसे तरबूज़ मीठे आम ले कर आ गयी है
आज पैसे कल उधारी गर्मियों की ये दोपहरी


देखता ही रह गया खामोश दरवाज़ा किसी का
''और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी''


तू नहीं आई अँधेरा छा गया सूनी गली में
तू जो रूठी मुझसे रूठी गर्मियों की ये दोपहरी
 


खींच के मारा किसी ने आसमाँ पे आज पत्थर  
सुबह की डाली से टूटी गर्मियों की ये दोपहरी

खींच के मारा किसी ने आसमां पे आज पत्‍थर, सुब्‍ह की डाली से टूटी गर्मियों की ये दुपहरी, उफ क्‍या कह दिया गया है इस शेर में. अहा विशुद्ध आनंद का शेर है, बुनावट में भी और बनावट में भी. आज पैसे कल उधारी, काफिया का जबरदस्‍त प्रयोग है. दरअसल में काफिया दो प्रकार के होते हैं एक जबरदस्‍त काफिया और एक जबरदस्‍ती काफिया. ये काफिया जबरदस्‍त है. फिर कहां तुमको मिलेगा सर पे ये सूरज पिघलता, देखता ही रहा गया खामोश दरवाज़ा किसी का, बहुत ही सुंदर टोटके लगाये गये हैं मिसरों में.  मगर शेर तो वही है खींच के मारा किसी ने आसमां पे आज पत्‍थर, अहा ग़ज़ब का प्रयोग है और दोनों मिसरों में बला का संयोजन है.

तो लीजिये आनंद इस शानदार ग़ज़ल का और मिलते हैं अगले अंक में एक और शायर के साथ.

17 टिप्‍पणियां:

  1. ज़बरदस्त! एक से बढ़कर एक शेअ`र हैं इस ग़ज़ल में... बहुत ज्यादा पसंद आई...

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  2. वाकई शानदार ग़ज़ल है। हर शे’र शानदार है। मगर खींच के मारा वाला शे’र वाकई ग़ज़ल की जान है। बहुत बहुत बधाई दिगंबर नासवा जी को।

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  3. दिगंबर भाई की ग़ज़ल हो और आप पढ़ते वक्त चौंके नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता. वो अपनी ग़ज़लों में हमेशा कुछ ऐसी बात ले आते हैं के सिवा दांतों तले अंगुली दबाने के दूसरा कोई रास्ता ही नहीं बचता. जहाँ न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि वाली उक्ति को पूर्णतः चरितार्थ करते हैं दिगंबर जी. अब इस तरही वाली ग़ज़ल की बात करते हैं, खींच के मारा...शेर में जो मंज़र उन्होंने पेश किया है वो हैरान कर देने वाला है और दर्शाता है की उनकी सोच की उड़ान कितनी ऊंची है. ऐसी पागल कर देने वाली ग़ज़लों को पढ़ के कोई क्या दाद देगा ? कुछ ग़ज़लें जिन्हें पढ़ कर हम हतप्रभ रह जाएँ, दाद से बहुत ऊपर की चीज़ होती हैं . जियो दिगंबर भाई जियो और हमेशा अपने अनूठे प्यारे से परिवार के साथ हँसते खेलते रहो ये ही दिल से दुआ कर रहा हूँ.

    नीरज

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  4. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. वाकई इस बार तरही में कमाल हो रहा है. बहुत खूबसूरत गज़लें आ रही हैं. ये गज़ल भी कमाल है.
    बहुत खूबसूरत मतला है. और फिर "पेड़ पौधे घास गमले फिर से मुरझाने लगे हैं, क्या करे छाया बिचारी.." वाह. "जल गए पत्ते नदी सूखी हवा ने ली खुमारी..", बहुत खूब. "उफ़ खुदा की दस्तकारी..", "तू जो रूठी.." बहुत ही खूसूरत शेर हैं. और फिर "खींच के मारा किसी ने आसमां पे आज पत्थर.." की तो जितनी तारीफ़ करें कम होगी.
    इतनी खूबसूरत गज़ल के लिए दिगंबर भाई के बहुत बहुत बधाई...

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  6. कुछ लोगों का नाम पढ़ते ही लगता है कि आज ज़रूर कुछ अच्छा मिलेगा पढ़ने को और वो हमेशा खरे भी उतरते हैं, इनमे से एक हैं दिगंबर नासवा जी।

    बेहतरीन ग़ज़ल....!

    मतला ही सुंदर

    फिर क्या करे छाया बिचारी.... वाह, क्या बेचारगी है छाया के अस्तित्व की तलाश में असफलता की।

    तुम ना आये आ गया सूरज सरों पर आँख मलता.... जो बात नही कही गयी वो भी कितनी खूबसूरती से समझ में आई कि इंतज़ार असल में रात भर किया गया है।

    खुदा की दस्तकारी शब्द बहुत अच्छा और अलग प्रयोग है, इस शेर में।

    फिर गिरह...क्या चित्र उभर के आता है। चित्रकार होती तो इस एक शेर पर कोई पेंटिंग बना देती।

    तू जो रूठा मुझसे रूठी..... क्या बात है....!!

    और जिसकी तारीफ गुरू जी करें वो शेर तो खास होगा ही होगा।

    शुक्रिया दिगंबर जी, इस ग़ज़ल के लिये जिसने आनंदित कर दिया।

    बस एख बात नही समझ में आई ये प्रथमा का नाम मध्यमा क्यो है... ????? हा हा हा

    दोनो बच्चियाँ बहुत प्यारी लग रही है !!

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  7. परिचय का आभार, पढ़कर तो बढ़ा ही आनन्द आता है दिगंबर जी को।

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  8. आचार्य जी आप तकलीफ में भी रंग बिखेर देते हैं. आपका और शाहर का समाचार सुन यही कहूँगा.
    -
    नासवा जी इस शानदार को ग़ज़ल को पढ़ा और मैं कहीं खो गया. क्या कहूँ कैसे कहूँ एक बार फिर से पढता हूँ.

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  9. फरीदाबाद वाले दिगंबर नासवा भाई पगड़ी में खूब जाँच रहे हैं|

    गत दिनों आप के ब्लॉग "स्वप्न मेरे' पर आप के गीत "पुराने गीत बेटी जब कभी भी गुनगुनाती है" तथा ग़ज़ल "वो हो गये बच्चों से - पर, माँ-बाप हैं फिर भी" का भरपूर आनंद लिया और अब ये ग़ज़ल भई वाह!!!!!!!!!!!!!!!!!

    इस ग़ज़ल में चौथे रुक्न का निर्वाह ख़ासा प्रभावित करता है, बेलाग, एक दम स्वच्छंद सा| एक एक शेर पर आप ने बाक़ायदा काफ़ी मशक्कत की है| भावों को बखूबी तराशा है| आख़िरी वाले शेर को तो भाई सभी ने सर आँखों पे बिठाया है तो हम कौन खेत की मूली हैं............वो है ही अलहदा|

    दिगंबर भाई .............ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद

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  10. bahut hi behatrin gajal.aek-aek sher jaandaar hai.main aapke blog main pahali baar aai hoon aaker bahut achcha lagaa.badhaai aapko.




    please visit my blog and leave acomment.thanks.

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  11. बेहतरीन गज़ल , हर शे'र एक से बढ कर एक, इनमें से मक्ता मुझे सबसे ज़ियादा प्रभावित किया है। साथ ये भी कहना चाहूंगा ही चौथे मिसरे की दूसरी पंक्ति " आसमां ने जब उतारी गर्मियों की ये दुपहरी" में मुझे gender की ग़लती का अहसास हो रहा है। नासवा जी को लख लख बधाई।
    (आसमां से जब भी उतरी गर्मियों की ये दुपहरी शायद एक अल्टरनेटीव हो सकता है)

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  12. दिगम्‍बर भाई, कमाल कर दिया। 'खींच के मारा किसी ने ....' मोहक प्रयोग है। जब सभी पत्‍थर से अंबियॉं और जामुन गिराने में लगे थे तब आपने सुब्‍ह की डाली से जो गर्मियों की दुपहरी तोड़ी वह वास्‍तव में अद्भुत प्रयोग है।
    दानी साहब, एक बार फिर देखें, ठीक तो है। दुपहरी खुद नहीं उतरी, आस्‍मॉं ने उतारी।
    पूरी ग़ज़ल खूबसूरत है।

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  13. एक से एक बढ़ कर शेर लिखे हैं. तुम न आये
    बेहद खूबसूरत.
    पिछले दिनों पढ़ी सारी गज़लें, चाहे अंकित की, गौतम की या नवीनजी की--ऐसे नये खयालात के जेवर पहने हैं जो आसानी से गज़लों में नहीं उतारे जाते.

    इन शायरों को ऐसी सुन्दर गज़लों के लिये और पंकजजी को इन्हें लिखवाने के लिये हार्दिक बधाई

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  14. दिगम्बर जी, कमाल कर दिया है. बहुत खूब ग़ज़ल कही है. हर एक शेर लाजवाब है, किसी एक कोट करना मुश्किल हो रहा है. "पेड़ पौधे घास गमले.........", "तुम न आए, आ गया ..........", "जल गये पत्ते, नदी सूखी,........", "फिर कहाँ तुमको मिलेगा.........", "फालसे तरबूज़ मीठे ...........", "देखता ही रह गया..........", "खींच के मारा किसी ने................" खुदबखुद बोल रहे हैं. इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरों बधाइयाँ.

    इस बार की गर्मियां एक अलग ही आनंद दे रही हैं.

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  15. गुरुदेव ... आपका और गुरुकुल के सभी साथियों का धन्यवाद है जो इतना अच्छा मंच प्रदान कर रहे हैं जहाँ सीखने के साथ साथ दिखाने का भी मौका मिल रहा है ...

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  16. वाह जी वाह....साफे में तो छा गया यह बंदा....क्या कहें..आनन्दम!!!


    पढ़ तो ले रहे हैं मगर टिप्पणी न कर पाने की मजबूरी आप समझ सकते हैं मास्स्साब...आप स्थितियों से वाखिब हैं अतः क्षमाप्रार्थी. अन्यथा न ले. आनन्द हम ले ही रहे हैं जो उद्देश्य है.

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  17. वेसे तो दिगंबर जी को ऑनलाइन चैट पर ही बधाई दे चुका हूँ ! और ख़ास बात ये कहना चाहता हूँ की बहुत कम समय में इतनी खुबसूरत ग़ज़ल कह लेना अपने आप में क़ाबलियत है ! बेहद मक़बूल शायरी की है इन्होने ! हर शे'र पर आह वाह निकल रहा है बरबस ही !
    तुम न आये और तू न आई दो ऐसे बिम्ब पर इन्होने शे'र कहे हैं की वाह सोच में बैठा हूँ !
    सर पे ये सूरज पिघलता और आ गया सूरज सरों पर इन दोनों शे'रों में भी जिस तरह से काफिये का निर्वाह किया है इन्होने और शे'र को कमाल का बनाया है उफ्फ्फ्फ़
    वाकई उस्तादाना शे'र हर शे'र ...
    कुलमिलाकर कहूँ तो ठोस शायरी की गई है !
    अर्श

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