शनिवार, 11 जून 2011

बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ मन में अधूरी और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी, आइये आज सुनते हैं शार्दुला दीदी का एक सुंदर गीत और छुटकी अनन्‍या की एक ग़ज़ल.

जैसा कि मैंने कहा था कि अब तरही समापन पर आ रही है अगले सप्‍ताह हम इसका समापन कर देंगें. इस बार की तरही में एक बात ये अच्‍छी हुई है कि लगभग सभीके परिचय आदि आ गये हैं, उससे ये होगा कि यदि इस पूरे तरही मुशायरे को एक पीडीएफ या फिर एक छोटी सी पुस्‍तक के रूप में लाने की सोची जाये तो वो एक अच्‍छा विचार हो सकता है. अगले सप्‍ताह जब हम समापन की और होंगें तब तक शायद देश भर में मानसून की दस्‍तक हो चुकी होगी और गर्मियों का भी समापन हो रहा होगा. इस बार तरही के चक्‍क्‍र में गर्मियां कैसे बीत गईं पता ही नहीं चला. पता ही नहीं चला कि जून भी आधा बीत गया है. आइये आज सुनते हैं दो सुंदर रचनाएं एक गीत और एक ग़जल़.

ग्रीष्‍म तरही मुशायरा 
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और सन्‍नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

 

shardula didi 

शार्दुला नोगजा दीदी

सबसे पहले हम सुनते हैं एक बहुत ही सुंदर सा गीत शार्दुला दीदी द्वारा भेजा हुआ, इन दिनों वे काफी व्‍यस्‍त हैं किसी प्रोजेक्‍ट में लेकिन उसके बाद भी उन्‍होंने ये गीत लिख भेजा है तरही के लिये. आइये सुनते हैं ये गीत.

गीत

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बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ मन में अधूरी

और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

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कौन जाने भाव मन का गीत में कब जा ढलेगा,

बावला सा दौड़ता ये वक्त कब मद्दम चलेगा,

था समय उजली शमीजें पहन कर आती थी गरमी,

जामुनी आँखों में रसमय स्‍वप्‍न की भीगी सी नरमी,

आज हेल्मेट , स्वेद धारे कर्म की काया सुनहरी ,

रेडियोएक्टिव कण उठाती गर्मियों की ये दुपहरी.

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बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ मन में अधूरी

और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

एक ही बंद है गीत में लेकिन कमाल का है, बंद की पहली चार पंक्तियां तो मानो चांदनी को धूप के पानी में घोल कर चंदन की कलम से लिखी गईं हैं. अतीत की सुंदरता को तलाशना ही कविता की एक बड़ी विशेषता होती है और चारों पंक्तियों में वो सुंदरता अपने चरम पर है. जामुनी आंखों में रसमय स्‍वप्‍न की भीगी सी नरमी, उफ क्‍या पंक्ति है, जामुनी आंखों और रसमय स्‍वप्‍न की भीगी सी नरमी की क्‍या कहें. काश गीत में एक दो बंद और होते.

 

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अनन्या सिंह ( हिमांशी )

अनन्‍या सिंह 'हिमांशी' हमारे मुशायरे में दूसरी बार आ रही है, इससे पहले ये दीपावली के मुशायरे में एक बार आ चुकी है. बच्‍ची ने अभी दसवीं बोर्ड की परीक्षा ही पास की है और बहुत अच्‍छे नंबरों से पास की है.  हिमांशी ने भी हालांकि दुपहरी को ही काफिया बना कर गैर मुरद्दफ ग़ज़ल कही है, लेकिन उसकी उम्र को देखा जाये तो बहुत ही प्रभावशाली ग़ज़ल कही है ( कह सकते हैं कि कविता का भविष्‍य बहुत अच्‍छा है ), हिमांशी के पास होने की खुशी में धमाकेदार पार्टी देने की बात उसकी  कंचन बुआ ने की तो थी लेकिन कंचन की याददाश्‍त कमजोर है क्‍या करें. आइये सुनते हैं  हिमांशी की ग़ज़ल.

तरही ग़ज़ल

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उफ हमारी जान ले लें, सूनी सँकरी गलियाँ शहरी,

और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की ये दुपहरी।

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मन को भाये, बारिशों की रिमझिमाती सी फुहारें,

और कँपती सर्दियों में सूर्य की किरणें सुनहरी।

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शाम हो आई है, फिर भी ठौर को उड़ते परिंदे,

सूर्य जो डूबा है, तो क्या ? जिंदगी ये कब है ठहरी।

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बिन खता के जिसने हमको बेवफा ठहरा दिया है,

उनसे पूछो कब करी थी, पिछली यारी कोई गहरी।

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जो नज़र नीची किये, लिपटी हया की चादरों में

उस नई दुल्हन को लागे शांत, कोमल ये दुपहरी।

शाम हो आई है फिर भी ठौर को उड़ते परिंदे, सूर्य जो डूबा है तो क्‍या जिंदगी ये कब है ठहरी, बहुत बड़ी बात कह गई है छोटी सी गुडि़या. एक और बात खास ये है कि मतले में ही जो गिरह बांधी है वो बहुत ही स्‍पष्‍ट तरीके से बांधी है दोनों मिसरों में गिरह कहीं दिख नहीं रही है. मन को भाये में गरमी से ज्‍यादा बाकी की दोनों ऋतुओं को पसंद करने का शेर भी सुंदर है.

तो सुनते रहिये दोनों रचनाओं को और इंतज़ार कीजिये अगले सप्‍ताह समापन का.

23 टिप्‍पणियां:

  1. वाह. शार्दुला जी के गीत की पहली दो लाइने पढ़ कर ही मन झूम गया..."बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ.." बहुत सुंदर! "था समय उजली शमीजें पहन कर आती थी गर्मी.." बहुत खूब. "जामुनी आँखों में रसमय स्वपन..", "कौन जाने भाव मन का गईं में कब जा ढलेगा, बावला सा दौड़ता ये वक्त कब मद्धम चलगा.." लाजवाब! इतने सुंदर गीत के लिए बहुत बहुत बधाई और ढेरों दाद.

    हिमांशी कि गज़ल पढ़ कर कर निशब्द हूँ. होनहार बिरवान के.. इतनी सी बच्ची और इतने बड़े बड़े शेर? जब हमारी उम्र की होगी तब? "शाम हो आई है, फिर भी ठौर को उड़ते परिंदे.." बहुत ही खूबसूरत शेर. "बिन खता के जिसने हमको बेवफा ठहरा दिया है.", "जो नज़र नीची किये लिपटी हया की चादरों में.." लाजवाब हैं. गिरह वाला शेर भी गजब का है. बहुत बहुत बधाई और ढेरों दाद.

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  2. अज हेल्मेट स्वेद---- वाह शर्दूला जी , लाजवाब । आपने गर्मियों की दुपहरी भी आनन्द से भर दी।
    जामुनी आँखों --- इस से मुझे अर्श का जामुनी लडकियों वाला शेर याद आ गया।
    और हिमांशी???? हैरानी हो रही है इस छोटी सी उम्र मे इतनी अच्छी गज़ल---
    जो गज़ल नीची किये---
    वाह बहुत सुन्दर
    शाम हो आयी है----
    पूरी गज़ल बहुत अच्छी लगी हिमांशी को बधाई। और मुझे लगता है ये आपकी शिष्य है। शुभकामनायें।

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  3. बेहद सुंदर रचना...अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर

    हंसी के फव्‍वारे

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  4. शार्दुल जी का गीत सुन कर सच में झूम उठा मन ... शुरुआत, मध्य और अंत ... सभी पंक्तियाँ सीधे दिल को छू कर गुज़रती हैं ... अनन्या की उम्र और शेरों की परिपक्वता देख कर लगता है की बहुत नाम कमाएँगी वो इस क्षेत्र में ...

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  5. शार्दूला जी के गीत की पहली ही पंक्ति में मन अटक कर रह गया। बहुत ही सुंदर गीत लिखा है। अनन्या जी उम्र के हिसाब से ये ग़ज़ल वाकई बहुत अच्छी है। इनका भविष्य बहुत उज्जवल है। दोनों ही कवियत्रियों को बहुत बहुत बधाई।

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  6. शार्दूला जी का गीत बहुत खूबसूरत बन पड़ा है, और यह तब जबकि बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियॉं मन में अधूरी। अगर ये पूरी घूमतीं तो शायद दो एक बंद और जुड़कर आनंद को बढ़ाते।

    सोचता है मन अकेला, सूर्य आखिर कब थकेगा
    रात्रि के आग़ोश में विश्राम आखिर कब करेगा
    हो गये हैं बिन तुम्हारे, स्‍वेद से ये वस्‍त्र भारी
    आयेगी कब द्वार मेरे, चांदनी, चंदा तुम्‍हारी।
    सुब्‍ह के भूले पथिक घर सॉंझ तक तुम आ ही जाओ,
    मन कुलॉंचे भर रहा है, बाट पर है दृष्टि ठहरी
    और सन्‍नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी।

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  7. हिमांशी की ग़ज़ल से एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि इनके ख़याल स्‍पष्‍ट हैं और उनके लिये शब्‍द भी हैं इनके पास। पंकज भाई से सहमत हूँ कि जि़दग़ी ये कब है ठहरी का चिंतन स्‍तर इस उम्र में आना शायराना भविष्‍य की ओर स्‍पष्‍ट इशारा है। अच्‍छी संभावनायें हैं।

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  8. dono hi rachanaaye bahut hi sunder bhav liye hain,garmi ki doophari ka achcha vivran deti hui saarthak rachnaayen.badhaai sweekaren.




    please visit my blog b.thanks.

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  9. शार्दूला जी की पंक्तियाँ तरही की सारी ग़ज़लों पर भारी हैं.हमें शार्दूला जी को पढने का अवसर आपके ब्लॉग पर मिलता है और जब जब मिलता है हमारी उन्हें और पढने की प्यास जगा देता है...वो विलक्षण कव्येत्री हैं इसमें कोई दो राय नहीं है...इस बेजोड़ कविता के लिए उनकी जितनी भी प्रशंशा की जाए कम है...

    अनन्या (हिमांशी) की पहली रचना जो दीपावली के दौरान हुई तरही में पढ़ी थी अभी तक याद है...इतने लम्बे अरसे बाद उसे पढना बहुत प्रीतिकर लग रहा है...मैंने तब भी कहा था और अब भी कह रहा हूँ के हिमांशी ग़ज़ल का सुनहरा भविष्य है...बेहद करीने से सजे शब्द और भाव उनकी इस ग़ज़ल को बार बार पढने को मजबूर करते हैं...वाह...आनंद ही नहीं परमानंद की प्राप्ति हुई है आज.

    नीरज

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  10. दोनों गजलों ने नये आयाम दिये गर्मियों को।

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  11. ये तरही का खुशनुमा दौर ही है जहाँ एक साथ विभिन्न आयुवर्ग के रचनाकारों द्वारा गर्मियों के मौसम के साथ खूबसूरती से कदमताल करते हुए सुना जा रहा है. ये आनादोत्सव सा है. पिछले ढेर महीने से जिस प्रकार जीवंत संचालन किया जा रहा है इस पर कोई टिप्पणी करना हमारे शब्द सीमा के बाहर है.

    शार्दूला दीदी की रचनाओं का इन्तजार रहता है. कम ही सही पर जब भी उन्हें सुनने को मिलता है एक ख़ास असर होता है. मैंने पहले भी देखा है वे किस प्रकार स्थूल दृश्यों को अपने मन के भावों से मिलाकर सुन्दरतम पंक्तियाँ रच देती हैं.
    आज के गीत भी लाजवाब हैं. उनके एक शेर अचानक से याद आ गए, "ये ग़ज़ल तो है सहमी हुई गोरैया, बुलाऊं न आये भगाऊं न भागे.."
    आज के गीत के छोटे से पैरा में बहुत कुछ कह दिया और बहुत कुछ न कह पाने की मजबूरी भी दिख रही है.
    "बेअसर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ मन में अधूरी...." इस पर क्या दाद दूं मैं.

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  12. हाँ अनन्या याद है मुझे पिछले साल ढेर साल पहले पुराने अंको में पढ़ा था. जब अनन्या जी के पास गुरु बुआ और ऊपर उनके गुरु भैया हैं तो भविष्य तो सुनहरा होने की सौ फीसदी गारंटी है. वाकई हैरान किया है आज जब इनकी ग़ज़ल सुना तो. "और काँपती सर्दियों में सूर्य की किरणे सुनहरी" ये शेर तो ख़ास प्रभावित किया है. क्या गज़ब काम्बिनेशन है आज की इस दोपहरी में. बस ऐसे ही आप लिखती रहो.

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  13. शार्दुला जी का मतला बेहतरीन है व अनन्या के सारे अ्शसार उम्दा लगे।

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  14. बे असर पंखे सी घूमें पंक्तियाँ मन में अधूरी
    और सन्नाटे में डूबी घर्मियों की ये दुपहरी

    गीत का यह मुखड़ा मन में जैसे बैठ गया है ! शार्दूला दीदी की लेखनी के बारे कह नहीं पाउँगा !

    और फिर इधर हिमांशी चौंका रही है , इस उम्र में इतनी गहरी बात गजलों में डाल कर ! माध्यमिक परीक्षा में अछे नंबर से पास पर ख़ास तौर से बधाई !

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  15. Beasar pankhe se .. aha kya panktiyan baandhi hai .. pankhe se panktiyon ka jodna bahut khoob.. khoob geet likha hai Shardula ji ne..maza aa gaya padhkar ..

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  16. Beasar pankhe se .. aha kya panktiyan baandhi hai .. pankhe se panktiyon ka jodna bahut khoob.. khoob geet likha hai Shardula ji ne..maza aa gaya padhkar ..

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  17. Ananya ka ye sher bhi khoob pasand aaya.. bin khata ke jisne .. waah waah..

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  18. शार्दूला दी ने मतला वो ज़ोरदार बाँधा है कि देर तक मन उसी के असर में घूमे और बेअसर होने में कुछ दिन लगें.... :)

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  19. शार्दूला दी ने मतला वो ज़ोरदार बाँधा है कि देर तक मन उसी के असर में घूमे और बेअसर होने में कुछ दिन लगें।

    अनन्या जीनियस लड़की है, मगर बुआ की से उसने कविता के साथ साथ आलस भी ले लिया है, इसलिये बुआ नाराज़ हैं उस से और पार्टी का विचार रद्द कर दिया। वो अच्छे नंबर ले कर पास हुई है, ये सच है, मगर बुआ को ये पता है कि अच्छे नंबर तो वो कभी भी ला सकती है, अगर उसने थोड़ा और मेहनत की होती तो वो बहुत अच्छे नंबर लाती....!!

    मगर ये सच है कि उसका मतला...फिर शाम हो आई है, फिर भी ठौर को ढूँढ़े परिंदे और बिन खता के जिसने हमको वाले शेर पढ़ कर बुआ को अपनी गद्दी हिलती सी जान पड़ी थी।

    जब उसने ये गज़ल, जिसमे रद्दीफ नही लगाया था, क्योंकि बुआ ने उम्र को देखते हुए इतनी छूट दे दी थी, सुनाई, तब तक बुआ ने एक भी शेर नही लिखा था। और सुनने के बाद बुआ को अपनी गद्दी हिलती सी नज़र आई और रात २ बजे तक बैठ कर वो तरही लिखी गई, जिसे सबने पढ़ा। तो हाँ ये कहा जा सकता है कि इस बार की तरही लिखवाने का श्रेय मिस अनन्या को ही.....!!

    शुभाशीष।

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  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  21. शार्दुला जी और अनन्या जी को बहुत बहुत बधाई| दोनो की लेखनी में धार स्पष्ट महसूस की जा सकती है|

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  22. शार्दुला जी का गीत...छोटा है मगर पूरा है...वाह!! और हिंमाशी की रचना बहुत पसंद आई...बधाई.

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