बुधवार, 18 मई 2011

शाम आँगन में खड़ी कब से, मगर छत पर अभी तक पालथी मारे है बैठी गर्मियों की ये दुपहरी, धीरे धीरे आगे बढ़ते हैं हम और आज सुनते हैं लेफ्टिनेंट कर्नल गौतम राजरिशी से तरही ग़ज़ल ।

इस बार तो गर्मियों की दुपहरी वास्‍तव में साहित्‍य के रस से सराबोर हो रही है । हमारे यहां पर कल 46 से 47 तापमान हो गया था । और उसके बीच में चलता हुआ ये तरही मुशायरा, ऐसा लग रहा है जैसे किसी नीम के पेड़ की घनेरी छांव में आकर बैठ गये हों । इस बार की ग़ज़लें इतनी अच्‍छी और सुंदर आईं हैं कि बस ऐसा लगता है कि सुनते ही रहो । अभी तो ऐसा लग नहीं रहा है कि प्रतिदिन वाला कार्यक्रम करना होगा । फिर भी देखते हैं कि क्‍या हो सकता है । अगली बार के तरही में एक परिवर्तन ये होगा कि ठीक पहली तरही ग़ज़ल के साथ ही समस्‍त रचनाकारों की सूची भी लगा दी जायेगी जिनकी ग़जल़ें आने वाली हैं ( या जिनकी अंतिम तिथि तक ग़ज़लें मिल गईं हैं ) और उस सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा । 

ग्रीष्‍म तरही मुशायरा

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और सन्‍नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

खैर आज तो हम सुनने जा रहे हैं अब बाकायदा स्‍थापित ग़ज़लकार, लेफ्टिनेंट कर्नल गौतम राजरिशी से तरही ग़ज़ल ।

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लेफ्टिनेंट कर्नल गौतम राजरिशी

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जन्म विख्यात कवि-कहानीकार राजकमल और साहित्य-अकादमी विजेता मायानन्द मिश्र के गाँव जैसे शहर सहरसा में...सन पचहत्तर के मार्च महीने की दसवीं तारीख को| दो बेटियों के बाद दादी और चाचियों के ताने से उकतायी माँ गई थी मांगने एक बेटे को विख्यात उग्रतारा के द्वारे| राजकमल को पढ़ने और जानने वाले जानते होंगे की उनका निवास-स्थान महिषी की विख्यात उग्रतारा देवी के मंदिर के ठीक बगल में है| ...तो सबसे ये कहता फिरता हूँ कि कविता का आशीर्वाद साक्षात राजकमल से लिए पैदा हुआ था मैं तो...इतना जरूर है कि उनका तेवर मेरी रचनाएँ अभी तक ढूंढ रही हैं खुद में| बचपन बारहवी कक्षा तक गाँव में बीता|

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बड़ा होकर बहुत सारा कुछ इकट्ठा बनाना चाहता था जैसे कि शेरलाक होम्स, मोहम्मद रफी, फैन्टम, सुपरमैन, यूरी गैगरीन, पेले, गावस्कर, मिथुन चक्रवर्ती, सिकंदर{वो मुकद्दर का सिकंदर वाला}, सरफिरा वैज्ञानिक,  सुभाष चंद्र बोस, भूत{सचमुच}....ऐसे ही बहुत सारा कुछ एक साथ बन जाना चाहता था| इस फेहरिश्त में शायर कहीं भी शामिल न था उस वक्त| माँ मुझे मेरे मामाओं की तरह इंजीनियर बनते देखना चाहती थी और पापा खुद की तरह डाक्टर| इसी बीच दूरदर्शन पर गोविंद निहलानी की "विजेता" देख ली| नौवीं कक्षा में था| मुझे नहीं पता, किसी एक फिल्म ने किसी एक शख्स की जिंदगी बदल दी हो| "विजेता" ने मुझे वो बना दिया जो हूँ मैं| उस फिल्म के बाद से एन डी ए में शामिल होने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि बस....| माँ-पापा को दिखाने की खातिर आई आई टी भी निकाला, लेकिन उसे तजकर एनडीए जाना चुना|  चार साल के प्रशिक्षण के पश्चात सेना के इन्फैन्ट्री शाखा में| तेरह साल के सैन्य-काल में नौ साल तो कश्मीर में बीत गए| एक साल के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति-सेना के साथ कांगो में ...फिलहाल कश्मीर में कहीं पदस्थापित|

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गौतम और तनया ( लाड़ली पीहू) गौतम, संजीता और पीहू

फ़िराक गोरखपुरी के इस शेर को अपना ब्रह्म-वाक्य मानता हूँ "पाल ले इक रोग नादां ज़िंदगी के वास्ते, सिर्फ सेहत के सहारे ज़िंदगी कटती नहीं"...कई रोग पाल रखे हैं...पढ़ना, किताबें खरीदना, कामिक्स इकट्ठे करना{मेरे पास कुछ दुर्लभ कामिक्स हैं जिन्हें बोली लगाऊँ तो हजारों में बिके}, मेरा रायल एनफील्ड, कंप्यूटर पे गेमिंग, दौड़ना...फिर लिखना तो है ही| छुटपन में कादंबिनी की समस्या-पूर्ति में दो बार पुरुस्कार जीत कर खुद को बड़का कवि समझने लगा| भ्रम टूटा सालों बाद जब मुझे मेरे उस्ताद पंकज सुबीर से मुलाक़ात हुई| फिल वक्त मुल्क की तमाम पत्रिकाओं में चालीस से ऊपर ग़ज़ल छपने की खुशी पचा नहीं पा रहा हूँ| बदहजमी का पूरा अंदेशा है...ऊपर से तुक्का ये कि तीन कहानियाँ भी छप गई हैं बड़ी पत्रिकाओं में| समय से पहले अपने उस्ताद से कह दिया है कि पर्ची लिख दें अच्छी सी दवाई की, वर्ना ये खुशी वाली बदहजमी मेरे लेखन की ऐसी की तैसी करने वाली है| उस्ताद हैं कि पर्ची लिखने के बजाय और मुझे चने के झाड़ पे चढ़ाते रहते हैं|

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सारे गुरुकुल की लाड़ली पीहू ( एक मुकम्‍मल ग़ज़ल )

तरही ग़ज़ल

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सुबह से ही धौंस देती गर्मियों की ये दुपहरी

ढ़ीठ है कमबख़्त कितनी गर्मियों की ये दुपहरी

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धप से आ टपकी मसहरी पर फुदकती खिड़कियों से

बिस्तरे तकिये जलाती गर्मियों की ये दुपहरी

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बादलों का ताकते हैं रास्ते खामोश सूरज

और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की ये दुपहरी

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ताश के पत्ते खुले दालान पर, अब 'छुट्टियों' संग

खेलती है तीन पत्ती गर्मियों की ये दुपहरी

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लीचियों के रस में डूबी आम के छिलके बिखेरे

बेल के शरबत सी महकी गर्मियों की ये दुपहरी

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शाम आँगन में खड़ी कब से, मगर छत पर अभी तक

पालथी मारे है बैठी गर्मियों की ये दुपहरी

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चाँद के माथे से टपकेगा पसीना रात भर अब

दे गई है ऐसी धमकी गर्मियों की ये दुपहरी

मतला और उस पर मतले का मिसरा सानी जिस प्रकार से रवानगी के साथ कहा गया है वो आनंद उत्‍पन्‍न कर रहा है । मतले का मिसरा सानी एक उदाहरण है कि बड़े रदीफों को पूरी रवानगी के साथ यदि मिसरे में बांधना हो तो ऐसे बांधना होगा । इसको तहत में यदि पढ़ों तो अहा रस ही रस पैदा कर दे ये मिसरा । और एक शेर है शाम आंगन में खड़ी है, ये भी सुंदर शेर है इसमें जिस प्रकार शाम और दोपहर का रिश्‍ता दर्शाया है वो ग़ज़ब है । और आखिरी शेर तो है ही कमाल का । हर शायर अपनी लेखनी का प्रभामंडल लेकर चलता है और यदि उसके शेरों में उसका प्रभामंडल नहीं हो तो आनंद ही नहीं आता । गौतम की ये गज़ल बता रही है कि क्‍यों पिछले दो सालों में देश की हर बड़ी पत्रिका ने इस शायर की 40 से अधिक ग़ज़लें छापी हैं ।

तो लेते रहिये आनंद तरही का और देते रहिये दाद । मिलते हैं अगले अंक में एक और शायर से ।

26 टिप्‍पणियां:

  1. परिचय पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. तस्वीरें बहुत सुंदर हैं. एक वर्दी वाली तस्वीर भी बनती थी!
    गज़ल बहुत ही खूबसूरत है. मतला तो बहुत ही अच्छा लगा. "धप से आ टपकी.." आहा. "ताश के पत्ते खुले दालान पर..", "लीचियों के रस में..". बहुत ही बढ़िया!
    "शाम आँगन में खड़ी कब से.." लाजवाब! "चाँद के माथे से टपकेगा पसीना.."
    गर्मियों की दुपहरी का इतना सुंदर चित्र खींचा है कि एक एक शेर ज़ेह्न में एक तस्वीर बना देता है. जितनी भी तारीफ़ करें कम होगी. बहुत बहुत बधाई.

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  2. @ पंकज सुबीर जी ,
    आपकी कलम से, लेफ्ट कर्नल गौतम राजरिशी का परिवार परिचय अच्छा लगा ! विभिन्न ब्लोग्स पर विनम्र गौतम की रचनाएं और प्रतिक्रियाएं पढता रहता हूँ ! निस्संदेह वे उन लोगों में से एक हैं जिनके कारण ब्लॉग जगत में बने रहने का दिल करता है ! उनको और उनके परिवार को सस्नेह शुभकामनायें....

    और आप तो गुरु परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी हैं ही, कम उम्र में जो ख्याति और सम्मान आपने अर्जित किया है वह दुर्लभ है !
    आपके माता पिता को मेरा सादर नमन !
    सस्नेह

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  3. बेहतरीन ग़ज़ल है, जितनी भी तारीफ़ की जाएं कम है... गौतम जी और उनके परिवार के बारे में इतना कुछ जानकार अच्छा लगा..

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  4. बेहतरीन ग़ज़ल, हर शे’र अच्छा है। पूरी ग़ज़ल में कहीं भी पकड़ ढीली नहीं होने दी है गौतम जी ने। उनके बारे में इतना कुछ जानकर अच्छा लगा। गौतम जी को हार्दिक बधाई। सुबह से ही धौंस देती... वाह, लाजवाब।

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  5. गौतमजी का ब्लॉग पढ़ता हूँ, परिचय जानकर और भी अछ्छा लगा।

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  6. ये मीठे बोल लेकर कौन चहका,
    नया अंदाज़ है अदबी सुबह का.
    मेरा मन कह रहा है की कहूँ मैं.
    ग़ज़ब निर्वाह है मिसरा तरह का.

    बधाई गौतम राजरिशी जी को.

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  7. लेफ्टिनेंट कर्नल गौतम को एक अदना से सिविलियन शायर का सेल्यूट...जियो बेटा जियो...ऐसी ग़ज़ल कही है के रोम रोम पुलकित हो गया...पता नहीं क्यूँ गौतम हमेशा अपने घर का बच्चा ही लगा है मुझे...अपनी रचनाओं और अपनी बातों से उसने कभी ये एहसास ही नहीं होने दिया के वो ऐसा शख्स है जिस से मैं अभी तक मिला नहीं हूँ...कमाल है...
    अब इस ग़ज़ल पर क्या कहूँ...घिघ्घी सी बंध गयी है इसे पढ़ कर...क्यूँ न बंधे? ऐसी शायरी जिसे पढ़ कर बड़े से बड़े उस्तादों के पसीने छूट जाएँ...हम तो खैर हैं ही किस गिनती में...घिघ्घी तो बंधेगी ही...मुझ नौसिखिये को किन उस्तादों की महफ़िल में बिठा दिया है गुरुदेव...बालों की सफेदी देख भले ही कोई हमारे कलाम पर लिहाज़ से वाह करदे लेकिन हकीकत में शायरी जिस चिड़िया का नाम है उसे गौतम सरीखे नौजवान शायरों के बस में ही पालना है...
    एक एक मिसरा मिश्री की डली सरीखा है...जैसे जैसे डली घुलती है, मिठास मुंह से होती हुई सारे तन बदन में फ़ैल जाती है...वाह गौतम कमाल किया है...तुम्हारी ग़ज़लें अगर पत्रिकाएं नहीं छपेंगी तो बेचारी जाएँगी कहाँ? ऐसी अनमोल शायरी जिसे छपने को मिलेगी वो ही बिना आगा पीछा देखे छाप देगा...तुम्हारा नाम जितना रोशन होगा उसी के अनुपात में हम जैसों का सीना गर्व से फैलेगा...इश्वर से कामना करते हैं के तुम दिन दूनी रात चौगनी तरक्की करो.
    पूरे परिवार को देख आँखें तृप्त हुईं और बिटिया तान्या की तो बात ही निराली है...इतनी प्यारी बिटिया है के सीधे गोद में लेने को दिल मचल उठा है. पूरा परिवार सदा यूँ ही हँसता खेलता रहे...आमीन.

    नीरज

    गुरुदेव बस के नीचे सोते लोगों का चित्र तो...उफ्फ्फ यू माँ...है

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  8. शाम आंगन में खडी कब से मगर छत पर अभी तक, पालथी मारे बैठी गर्मियों की ये दुपहरी।

    नज़ाकत और यथार्थ से लबरेज़ बेहतरीन शे"र राजरिषी जी मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं।

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  9. shaam aanagan me khadi kab se ...sab se khoobsoorat sher ..Gautam ji ko mubarake ...

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  10. पीहू और सजीत को देख कर गर्मियो की दुपहरी का आनन्द ले रहि हून आजकल काम तो होत नही बाये हाथ से लिख रही हून गलतियो की तरफ ध्यान मत दें \ ये तस्वीरे तो सुबीर की ही झलक दे रही है\ अब इस गज़ल उस्ताद के लिये क्या कहून सिवा आशीर्वाद के ये परिवार इसी तरह हसता मुस्कुराता रहे \गज़ल के लिये एक शब्द कमाल्\

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  11. गौतम भैय्या की ज़हर फोटो ही बता रही हैं कि तरही ग़ज़ल भी ज़हर ही होगी.

    जानलेवा मतला लिखा है, इसकिये कश्मीर में गर्मी भी छिपकर और डरकर बैठ गयी है. लफ़्ज़ों का जादू सा है. गिरह भी बहुत खूब बाँधी है, मेरी समझ से अगर मिसरा-ए-उला में 'ताकते' और 'रास्ते' अपने पाले बदल लें तो शेर और खतरू हो जायेगा.

    ताश के पत्ते खुले दालान पर, अब 'छुट्टियों' संग
    खेलती है तीन पत्ती गर्मियों की ये दुपहरी
    वाह वा, उम्दा शेर, उफ्फ्फफ्फ्फ्फ़......................कुछ कहते नहीं बन रहा बस तीन पट्टी खेलने का मन कर रहा है.

    "लीचियों के रस में डूबी आम के................." वाह वा
    "पालथी मारे है बैठी गर्मियों की ये दुपहरी", पालथी शब्द मैंने पहली बार शेर में सुना है. जिंदाबाद गौतम भैय्या.

    "चाँद के माथे से टपकेगा पसीना रात...............", वाह वा

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  12. मेजर भाई नमस्ते
    जॅंच रहे हो भैया बुलेट पर

    पालथी और तीन पत्ती के काफ़िए ग़ज़ब के रहे भाई
    लीचियों के शरबत ने तो वापस मथुरा में भेज दिया
    आख़िरी शेर में ऊमस का बहुत ही प्रशंसनीय शब्दांकन

    बधाई स्वीकार करें बन्धु| आप पंकज जी के प्रिय शिष्य क्यूँ है, आप की ये ग़ज़ल खुद बता रही है| आप से इस तरह की ग़ज़ल की ही उम्मीद थी मुझे|

    इस मुशायरे में आदरणीय कुँवर कुसुमेश जी की टिप्पणी एक सुखद घटना है|

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  13. मोटर सायकिल वाली फोटौ देख करपता चला कि फौजी के बाल कभी सामान्य जनो जैसे भी हुआ करते थे।

    मोहम्मद रफी तो खैर आप बन ही गये ....!

    सारे ही शेर तो अच्छे बने हैं....!!

    धप से आ टपकी

    बहुत अच्छा शेर है

    मगर

    शाम आँगन में खड़ी और दे गई है ऐसी धमकी.....

    बाऽऽऽऽप रे क्या शेर हैं.... ??? क्या बिंब हैं......??? देर तक गूँजने वाले.....!!

    और ये शेर बताते हैं कि आप जहाँ पहुँचे हो, उस जगह के योग्य हो....!!

    हैट तो है नही हेड आफ....

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  14. इतना बहुत है या और मक्खन लगाऊँ :P :P :P

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  15. मज़ा आ गया गौतम जी का परिचय पढ़ कर ... बस एक शिकायत है उनसे जब देहरादून में मिले थे तो भाभी और पिहू से नही मिलाया उन्होने ... खैर फिर कभी ये शिकायत दूर कर लेंगे ... गौतम जी को पढ़ना तो हमेशा ही अच्छा लगा है ... उनका अंदाज़े बयाँ सबसे जुदा है ... शेर तो सब के सब इतने रसीले लग रहे आहियाँ की सचमुच दुबई में बैठे भारत की दोपहरी याद आ गयी .... गार्नल साहब को हमारा सलूट ... जै हिंद ...

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  16. गुरुदेव अगले ७ दीनो तक ब्लॉग जगत से दूर रहना हो शायद ... काम के सिलसिले में मौरीशस के पास एक छोटे से आइलेंड में जाना पड़ रहा है .... २६ को वापसी में सभी ग़ज़लें एक साथ पढ़ुंगा .... तक तक सभी को शुभकामनाएँ ....

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  17. लेफ्टिनेंट कर्नल गौतम राजरिशी जी को खूबसूरत गज़ल के लिये बहुत बहुत मुबारकबाद ......

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  18. पहले ग़ज़ल की बात करूँ या तस्वीरों की कशमकश में हूँ ! ये ब्लैक जैकेट वाली तस्वीर तो होवो वाली है ! फिर इनफिल्ड वाली रौबदार ... कोट वाली शानदार .... भाभी जी और पिहू के साथ वाली असरदार ... फिर सिर्फ पिहू वाली प्यार प्यार ..

    ग़ज़ल में मतले की बात करें तो वाकई शानदार है , एक बार गौतम भाई ने कहा था की मतला वेसे भी जानदार नहीं होता ... तो आज इस बात से इनकार कर रहा हूँ , मतला वाकई जानदार है...
    दूसरे शे'र का उला बेहद खुबसूरत खासकर सानी से ...
    गिरह में आपका अंदाज़ थोडा कम दिख रहा है ...
    ताश के पत्ते वाला शे'र वाकई मुझे अपने गाँव की याद दिला रहा है ! बहुत ही सच्ची बात की है आपने... ये शे'र वाकई अलग है अभी तक के सारी ही ग़ज़लों से इस पूरे तरही में .... बेहद अलग सा शे'र है.
    लीचिओं वाला शे'र वाकई गर्मी की दुपहरी का सौन्दर्यबोध जैसा लग रहा है !
    शाम आँगन वाले शे'र में जो शब्द पालथी का इस्तेमाल आपने किया है वो आपके अंदाज़ को बयान कर रहा है ! ऐसे ही शब्द के इस्तेमाल के बारे में चर्चाएँ चल रही थी !
    यह आखरी शे'र इस बात के लिए जमानत है की आप प्रकृति पर जो बिम्ब खींचते हैं वो मुहर लगा रहा है ! और उसपर काफिये में धमकी शब्द अहा क्या कमाल किया है आपने !
    तो कुल मिलाकर ये कंसीडर करूँ की आपने अपने मन के मुताबिक ग़ज़ल नहीं कही ... या फिर ये कि जो सामने दिख रहा है वो ?
    खैर कुल मिलाकर कहूँ तो ग़ज़ल वाकई उम्दा है ! आपकी इस बात को खारिज भी नहीं किया जा सकता कि आपके मन की नहीं हुई , क्यूंकि आपका ठहराव यही तक तो नहीं है.हमेशा बेहतरी की उम्मीद .... तरही अपने शबाब पर है आज तो ...

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  19. एक एक शेर नगीने की तरह तराशा हुआ।
    'चॉंद के माथे से...' यहॉं तो चॉंद ही माथा है और माथा ही चॉंद।
    खूबसूरत ग़ज़ल।
    जैसे खूबसूरत दृश्‍य इस बार बॉंधे जा रहे हैं, मेरे तो दिमाग़ में ही नहीं आ रहे थे। मज़ा आ रहा है।

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  20. ग़ज़लें तो गौतम जी की बहुत पहले से पढ़ता आ रहा हूँ..उनका कोई जवाब नही होता है आज आपके बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा..देश की सेवा और साहित्य की सेवा में पूर्णतया समर्पित गौतम जी को मेरा प्रणाम है..

    गर्मियों की तरही मुशायरा का कार्यक्रम बहुत ही अच्छा चल रहा है...आज गौतम जी के शेर नें इसे और एक उँचाई प्रदान की..
    इस सुंदर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद..

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  21. आचार्य जी, एक बात तो तय है. इस बार गर्मियों में तरही ग़ज़ल के साथ साथ यादों का खजाना झड़ रहा है.
    रही बात गौतम भैया की तो आज वे बहुत कुछ एक साथ बन ही गए. अब देखिये न ब्लैक जैकेट में वे ................. लग रहे हैं, पीली टी-शर्ट में ................ जंच रहे हैं, लाल कोट में .............. की तरह फब रहे हैं.

    ग़ज़ल के हर इक शेर का जादू, वो क्या कहते हैं - तेरा जादू चल गया.
    ताश के पत्ते खुले दालान पर,
    लीचियों के रस में डूबी .................
    "पालथी मारे है बैठी गर्मियों की ये दुपहरी"
    इस पर क्या कहूँ !!!!!!!!

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  22. इस रंगीन पोस्ट के तो क्या कहने

    हाय.....
    फोटो पे फोटो
    फोटो पे फोटो
    किसी तरह दिल को संभाले आगे बढ़ रहे थे

    धप्प .

    अब तो यहीं बैठेंगे आगे बढ़ना ही नहीं है.. पीहूँ की ये तीन फोटो आगे बढ़ने ही नहीं दे रही है
    बस निहार रहा हूँ
    वैसे ये साडी किसने बांधी है ?
    दिल गार्डन गार्डन हो गया

    अब मन को समझा बुझा कर आगे बढ़ गया हूँ तो मतले ने ही रोक लिया कुछ देर यहाँ भी बैठना पड़ेगा

    ह्म्म्म .....
    बहत समय लग रहा है
    हर शेर अपने पास बैठा ले रहा है और कह रहा है अरे पहले मुझे तो आत्मसात कर लो...

    कुल मिला कर आज की पोस्ट ग़ालिब चचा के एक शेर को बार बार याद दिला रही है

    कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
    ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

    और मुंह से यही निकल रहा है... जिंदाबाद जिंदाबाद

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  23. भारत माता गौतम भाई जैसे जांबाज बेटों की देश भक्ति से सुरक्षित हैं -
    उनकी प्यारी कली सी गुडीया को और बहुरानी को दरों आशिष व स्नेह -
    अब ग़ज़ल की तारीफ़ मे यही कहूंगी के गरमीयों के दिनों को साकार
    कर दिया ..लीची , बेल, आम और शरबत, चाँद की तपिश, सूरज का ताप !
    क्या कुछ नहीं यहां ...बहुत खूब ...आप इसी तरह लिखते रहें ..
    और ' उग्रतारा देवी ' के दर्शन करना चाहती हूँ ...मा को प्रणाम ...
    और आपके परिवार के सभी बड़ों को भी सादर स स्नेह नमस्ते ..
    पंकज भाई [ अनुज - गुरु जी ] एक एक रचनाकारों से परिचित ही नहीं करवा रहे हमे तस्वीरों और उम्दा रचनाओं से अभिभूत भी करवा रहे हैं उनका हार्दिक आभार
    और शाबाशी ....
    आप सब की ,
    - लावण्यादी

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  24. पीहू की मुस्कान से यह मंच और निखर गया है.

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  25. गौतम,सुन्दर और सार्थक कलाम, इस से ज्यादा मैं इस महफ़िल में बोलने का हकदार नहीं हूँ,!
    तुम्हारे कलाम ने मज़बूर कर दिया कि comment लिखा ही जाये,वरना तो सिर्फ़ कलाम पढकर ही लौट जाता था!

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  26. गोलियाँ दागीं कलम ने हाथ में बन रायफ़ल ज्यों
    खूब क्या इज़हार लायी गर्मियों की ये दुपहरी

    हर शेर लाजबाब.आप दोनों को नमन.

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