सोमवार, 9 मई 2011

ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी आइये आज सुनते हैं प्रकाश पाखी की ये संवेदना से भरी हुई ग़ज़ल ।

ये ग़ज़ल जब पढ़ी तो एकबारगी मन भीग सा गया । संवेदना से भरी हुई ग़ज़ल । बहुत ही मार्मिक चित्रण है उस पूरे परिदृश्‍य का जिसे बंटवारा कहते हैं । ये बंटवारा जब भी होता है तो जाने कितने ज़ख्‍़म छोड़ जाता है । फिर वो 1947 का बंटवारा हो या कि एक घर का । हर बंटवारे में एक मां का कलेजा बंट जाता है, हर बंटवारे में एक पिता के बाज़ू बंट जाते हैं । और पीछे रह जाती है एक चुप्‍पी एक उदासी । उस उदासी की स्‍वरों को बहुत ही अच्‍छे तरीके से अपनी गज़ल़ में पिरो दिया है प्रकाश पाखी ने । तो आइये सुनते हैं ये ग़ज़ल ।

ग्रीष्‍म तरही मुशायरा

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और सन्‍नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी

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प्रकाश पाखी

मूलत: थार के रेगिस्तान के बाड़मेर जिले का रहने वाला हूँ...लिखने से ज्यादा पढने का शौक है...रचनात्मक लेखन के नाम पर कुछ कविताएँ ही लिखी है जो आज तक कही प्रकाशित नहीं हुई है..बरसो पहले शैलेश लोढ़ा के साथ काव्य पाठ के लिए आकश वाणी में अपनी प्रस्तुति दी थी...उसके बाद शैलेश लोढ़ा ने कविता करना छोड़ दिया?? उसके बाद मेरी रचनात्मक सृजनात्मकता ध्रुवीय भालू की तरह से शीत निद्रा में चली गयी ....जो आपके अथक प्रयासों से अब जाकर जगी है...इस तरह से सही मायने में मौलिक ,अप्रकाशित और अप्रसारित रहा हूँ...

सरकारी सेवाओं में नौकरी के प्रयासों में सात नौकरियां करने के बाद २००१ से राजस्थान राज्य सेवा में राज्य परिवहन सेवा में चयनित हुआ हूँ.तब से इसी नौकरी में हूँ अभी आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले में पदस्थापित हूँ.कुछ व्यस्तता और कुछ नेट की सुविधा नहीं होने से ब्लोगजगत में केवल आपके ब्लॉग से जुड़ा हूँ.अपना ब्लॉग्गिंग का काम ठप पड़ा है.

prakash pakhi

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प्रकाश पाखी अपनी धर्मपत्नी नितीश के साथ । उनका छोटा बेटा ध्रुव । बड़ा बेटा देवेय और ध्रुव ।

हमारा एक संयुक्त परिवार था..और पिछली गर्मियों में हम भाइयों के बटवारे माताजी पिताजी के सामने हुए थे उसकी चुभन ही तरही में लिख पाया हूँ.मैंने काफी प्रयास किया कि बचपन और गर्मियों से जुडी यादों को तरही का विषय बनाऊ पर सफल नहीं हुआ और कुछ उससे हट कर भावों में आ ही नहीं पाया था. अंतिम तारीख से पहले अपने लिखे को वापस पढ़कर यह सोचा कि भाव जैसे है ठीक है,और जीवन की एक परिस्थिति को बयां करते है जो कमोबेश हर एक के जीवन में कभी न कभी आती है.सो वही लिखकर भेज रहा हूँ.

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बात बंटवारे की लाई गर्मियों की वो दुपहरी

शूल सी दिल में चुभी थी गर्मियों की वो दुपहरी

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रूठकर भौजी चली, इस घर उसे रहना नहीं है

और अम्‍मा संग रोई, गर्मियों की वो दुपहरी

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कांप कुछ बापू रहे थे, माँ का आँचल भीगता था

अपना क्या था, कह रही थी, गर्मियों की वो दुपहरी

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आज तुम जो कर रहे हो, कल तुम्हारे साथ होगा

करनी भरनी सीख देती गर्मियों की वो दुपहरी

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ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे

''और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी''

कांप कुछ बापू रहे थे मां का आंचल भीगता था, बंटवारे का सजीव चित्रण कर दिया है इस मिसरे में । दर्द और पीड़ा की ग़ज़ल है ये । उस तकलीफ़ की ग़ज़ल है जो मां और पिता को होती है, तब जब उनके बेटे एक दूसरे के प्रति मन में विद्वेष लिये अलग होते हैं । ढोर बर्तन और सब घर खेत मन टुकड़े हुए थे, इस मिसरे में बाकी सब के साथ मन को जिस प्रकार गूंथा है वो प्रयोग छू गया है ।

अभी भी कई लोगों का परिचय तथा फोटो प्राप्‍त नहीं हैं ।  जल्‍दी जल्‍दी भेजें ताकि समय पर काम हो सके । कुछ लोगों ने आधारशिला में प्रकाशित कहानी 'नफीसा' पढ़ने की इच्‍छा जताई थी सो वो कहानी ब्‍लाग के साइड रोल पर है वहां से उसे पढ़ सकते हैं ।

24 टिप्‍पणियां:

  1. @प्रकाश भाई,
    आपकी ग़ज़ल का हर शेर एक ऐसा दर्द बयां कर रहा है जिसे सामान्‍यतय: वही समझ सकता है जो उससे गुजरा हो, लेकिन आपके शब्‍द चयन ने उन तक भी दर्द का पूरा पूरा एहसास यथावत पहुँचाया है जो इससे अछूते हैं।
    जो हुआ वो पीड़ादायक तो लगता है लेकिन इसमें भी हरि-इच्‍छा, और हरि-इच्‍छा का सम्‍मान कर आगे का मार्ग बनाना ही जीवन है।

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  2. संवेदना में डूबी, बटवारे का मार्मिक चित्रण करती गज़ल है. "रूठ कर भौजी चली..", "कांप कुछ बापू रहे थे..", "आज तुम कर जो रहे हो..", "ढोर, बर्तन..". बहुत ही बढ़िया शेर कहे हैं.
    प्रकाश जी को इन्टरनेट पर पहले भी पढ़ा है. आज परिचय भी हो गया. बहुत अच्छा लगा.
    प्रकाश जी, इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई और धन्यवाद.

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  3. प्रकाश जी... परिवार बड़े होते हैं ... नया खून जवान होने लगता है तो अक्सर परिवारों में ऐसा होता है .... ये एक ऐसा दर्द है जिससे सभी को कभी न कभी दो चार होना पढ़ता है ... माँ पिता के लिए तो फिर भी ये दुख ही रहता है ... अपने बच्चों को अपनी आँखों के सामने रखने की सज़ा पाते हैं वो अक्सर ऐसे बँटवारों में ...
    हर शेर में एक सचाई है ... बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील ग़ज़ल है ....

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  4. ये जानते हुए के घर का बंटवारा आज के युग की सच्चाई है, जब भी कभी इसका जिक्र सुनता हूँ तो आँखें भर आती हैं...क्या पाते हैं हम अलग हो कर ???...दिल पर हाथ रख कर अगर पूछेंगे तो जवाब मिलेगा शून्य...उस शून्य को पाने के लिए इतनी बड़ी कीमत अदा करते हैं...

    प्रकाश जी ग़ज़ल पढ़ कर दिल भारी हो गया है...ये ग़ज़ल की ताकत ही है जो दिल को इस कदर छू गयी है...मेरी बधाई उनकी इस अविस्मर्णीय ग़ज़ल के लिए.

    नीरज

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  5. प्रकाश जी,
    उस मंज़र की कल्पना मात्र से ही सिहरन हो जाती है. आपने तो, हर शेर आंसुओं से लिखा होगा..........

    एक दर्द भरा मंज़र आँखों के सामने उभर जाता है ये शेर पढ़ के,

    "कांप कुछ बापू रहे थे, माँ का आँचल भीगता था

    अपना क्या था, कह रही थी, गर्मियों की वो दुपहरी"

    "ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे

    और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी''

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  6. गुरुदेव एक बार फिर...गर्मियों की दुपहरी को चित्र से साकार कर दिया है आपने...कौन कहता है चित्र से ग़ज़ल नहीं कही जा सकती ?...कमाल किया है फिर से आपने.

    नीरज

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  7. पाखी जी की गज़ल ने बहुत कुछ याद दिलवा दिया। सच कहा बटवारा घर के साथ साथ दिलों को भी बाँत देता है जिस की तपिश गर्मियों की किसी दुपहरी से कम नही होता। देवेय और ध्रुव बच्चों के नाम बहुत अच्छे लगे।
    काँप कुछ बापू----
    ढोर बर्तन और सब---
    कमाल के शेर हैं। पूरी गज़ल दिल को छू गयी। पाखी जी को सपरिवार शुभकामनायें

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  8. मन भीग गया ये ग़ज़ल पढ़कर। मैं भी अपने घर में दो दो बँटवारे देख चुका हूँ। दादाजी के भाइयों का और पिताजी एवं चाचाजी का। एक एक शे’र दिल का दर्द बयाँ कर रहा है।

    ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे
    इस शे’र में सारा दर्द समेट दिया है पाखी जी ने।

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  9. कितने चित्र खिंच आये नजर के सामने-पंक्तियाँ पढ़ते हुए...

    एक बहुत बेहतरीन और संवेदनशील गज़ल के लिए आभार- बधाई.

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  10. प्रकाश जी की ये गज़ल ना जाने कितने घरों की दास्ताँ बयान कर रही है|यद्यपि दर्द तो बहुत देता है पर मेरे नज़रिए से घर में रोज रोज की कलह से यह बंटवारा ही भला है|बहरहाल यह शेर ही सारी बात कह देता है

    आज तुम जो कर रहे हो, कल तुम्हारे साथ होगा
    करनी भरनी सीख देती गर्मियों की वो दुपहरी

    एक संवेदनशील गज़ल के लिए आपको साधुवाद|

    दोनों बच्चे भी बहुत प्यारे हैं|शुभकामनाएं|

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  11. संवेदनाओं को ग़ज़ल की शक्ल में ढालना मुश्किल काम है, और उस पर ये कि घर के बंटवारे को ! न जाने कितनी दफा पाखी भाई रोये होंगे शे'र बुनते समय ! बंटवारे का पूरा मंज़र ही सबके सामने ला रखा है !

    रूठ कर भौजी चली/ और अम्मा संग रोई गर्मियों की वो दुपहरी ..... ओह क्या शे'र बुना है !

    बात ग़ज़ल की है तो अछि ग़ज़ल के लिए ढेरो बधाई ! मगर जिस मंज़र को आपने झेला है उस पीड़ा के लिए कुछ भी कहना मुश्किल है !

    अर्श

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  12. रूठकर भौजी चली, इस घर उसे रहना नहीं है
    और अम्‍मा संग रोई, गर्मियों की वो दुपहरी

    सब कुछ चल चित्र जैसा प्रस्तुत कर दिया आपने ......और अम्‍मा संग रोई, गर्मियों की ...... बहुत भावुक

    ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे
    ''और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी''

    इस संताप से गुजरे बिना ऐसा कुछ लिख पाना नामुमकिन है

    गज़ल दिल को छू गयी, उम्दा शब्द संयोजन के लिए ढेर सारी दाद कबूल फरमाएं

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  13. प्रकाश जी,
    जैसा कि तिलक जी ने कहा, मैं भी कहना चाहूँगा. आपने ग़ज़ल में जो कुछ और जिस मार्मिक अंदाज में बया किया है ये वही कर सकता है जिसने आँखों से देखा है.

    मन भीग गया, ग़ज़ल आपने ऐसा बुना है जो अपने खूंटे से निकल आपके साथ हो गया और न जाने कितनो के साथ अतित में जुड़ गया होगा.

    तस्वीरे खुल नहीं पा रही है ठहर कर देखता हूँ.

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  14. भाई प्रकाश जी की मार्मिक कविता ने मन को छू लिया . अकसर कविता देवी स्वत: प्रस्फुटन करतीं हैं ..कोइ जरूरी नहीं कि , सुखद स्मृतियाँ ही उभरें ..और अप डूंगरपुर मे हैं जहां मेरे दादा स्व. राजसिंह जी का घर है ..
    स स्नेहाशिष ,
    - लावण्या

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  15. ढोर बर्तन और सब घर, खेत, मन टुकड़े हुए थे
    'और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी'


    बंटवारे का बहुत ही सजीव और मार्मिक चित्रण किया है प्रकाश जी ने..............मेरी और से बहुत बधाई!

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  16. Jजीवन की सच्चाई को गज़ल में ढालने का बेहतरीन काम किया है प्रकाशजी ने.ढोर,बर्तन का प्रयोग इस गज़ल में खूबसूरती का इज़ाफ़ा करता है.

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  17. कमाल के शेर निकाले हैं प्रकाश भाई ने....मन की परतों को छूने वाले शेर|

    प्रकाश भाई से पुराना रिश्ता है अपना तो और जिस तरह से उनकी लेखनी में धीरे धीरे इतना जबरदस्त निखार आते देख रहा हूँ, वो सकूँ पहुंचाता है| भौजी वाले शेर ने गजह तरह से प्रभावित किया....भाभी लिखने पर शेर में वो मजा नहीं रह जाता जो इस भौजी से आ रहा है| अपने आँगन की जानी कितनी कहानियाँ सामने आ गईं| ये तरही इस मुशायरे में सबसे अलग, सबसे अनूठी रहने वाली है|

    ...और इसी बहाने प्रकाश भाई आपके बारे में और जानकारी मिल गई|

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  18. प्रकाश जी.. वाकई काफ़ी भावुक रचना है..इस बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत बधाई..

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  19. जिन दो मिसरों का जिक्र हुआ, वे वाकई कमाल के हैं। इन्हीं से गज़ल जीवंत हो खुद को स्थापित करती है।

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  20. इस गजल को ग्रीष्म के तरही मुशायरे के मिसरे के तय होने के दूसरे दिन लिख दिया था...पर अगले दस दिन केवल सोचता रहा कि इसे भेजू या नहीं...फिर भेज कर फैसला गुरुदेव पर छोड़ दिया...गुरुदेव ने मेरी संवेदनाओ को निखार कर गजल को सुन्दर बना दिया...जैसा उन्होंने पहले मेरी गजलो को किया था.आप सब का शुक्रिया ...
    @आदरणीय तिलक राज साहब,नीरज भाई,अंकित भाई,शुक्रिया!आपकी लेखनी ही हमें हौसला बढ़ाती है....
    @राजीव भरोल साहब,दिगम्बर नासवा साहब,आपने सही कहा आभार..!
    @आदरणीय निर्मला दी,कभी बच्चो को आशीर्वाद देने पधारे!
    @धर्मेन्द्र जी,राणा प्रताप जी,आभार!
    @अर्श भाई,आपने सही कहा...कई बार संवेदनाए अपना रास्ता ढूंढ लेती है.
    @वीनस भाई,
    शुक्रिया!आप बात दिल को लग रही है...
    @सुलभ भाई,दिल से कोई तारीफ़ करे तो हौसला बढ़ता है शुक्रिया,
    @आदरणीय लावण्या दी,डूंगरपुर तो पहचाना ही राजसिह जी से जाना जाता है,आशीर्वाद का शुक्रिया.
    @आदरणीय राकेश जी,आपके गीत के बाद तो कुछ बचता ही नहीं है...जिसकी तारीफ करे...आप जैसो कि हौसला अफजाई से मुझ जैसो को प्रेरणा मिलती है.
    @साहिल जी,और प्रवीण जी का शुक्रिया.
    @गौतम भाई,आजकल आपको भी कम समय मिलता है...पर आप के शब्द ऊर्जा से भरे होते है....
    @विनोद जी देवेन्द्र जी का आभार,
    आपका शुक्रिया अदा करने उदयपुर आया हूँ...:)
    @गुरुदेव ,
    इस बार तरही का मिसरा आगे और गजब की गजले लाने वाला है...
    फिलहाल तरही का आनंद ले रहा हूँ!

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  21. पूरी गज़ल दिल को छू गयी। पाखी जी को सपरिवार शुभकामनायें

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  22. ग़ज़ल हुसनोविसाल का आलाप / प्रलाप न हो कर किसी भी युग में उस युग के आम आदमी के सरोकारों से जुड़ी हुई अभिव्यक्ति होती है| हम से पहले के अग्रजों ने जो अभियान शुरू किया, आप ने उसे एक कदम और आगे बढ़ा दिया है|

    आपकी इस ग़ज़ल ने दिल जीत लिया प्रकाश पाख़ी भाई| बहुत देर से कमेंट देने आया हूँ, मित्रों ने सभी कुछ तो बोल दिया, कुछ बाकी नहीं छोड़ा मेरे लिए|

    फाइलातुन * ४ के वज्ञ वाला ग़ज़ल का ये फ़ॉर्मेट कहन और भाषा के कितने सारे शिल्प मुहैया करा देता है, वो भी आप की इस ग़ज़ल ने साबित किया है| यहाँ व्याकरण बेमानी हो जाती है और कथ्य सर चढ़ कर बोलने लगता है|

    हों न बँटवारे कहीं पर, सब रहें इक साथ मिल कर
    बस यही पैगाम देती गर्मियों की ये दुपहरी

    इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए प्रकाश भाई को ढेरों बधाइयाँ

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  23. रूठ कर भौजी चली इस घर उसे रहना नहीं है,
    और अम्मा संग रोई,गर्मियों की वो दुपहरी।

    लाज़वाब शे"र , मुबारक।

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