शनिवार, 24 जनवरी 2015

आइये आज ज्ञान की देवी सरस्‍वती का पूज करते हैं शब्‍दों से भावों से और विचारों से। पूजा की थाली में गीत की दीपक और द्विपदी की धूप लिये आए हैं श्री राकेश खंडेलवाल जी।

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

आज का दिन साहित्‍यकारों का दिन होता है। क्‍योंकि आज ज्ञान की देवी सरस्‍वती के पूजन का दिवस होता है। आज हम सबके लिए यही प्रार्थना करते हैं कि सबको ज्ञान मिले सबको बुद्धि का वरदान मिले और सबके अंदर साहित्‍य के प्रति अनुराग उत्‍पन्‍न हो।

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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आज वरिष्‍ठ गीतकार और बहुत ही अच्‍छे कवि श्री राकेश खंडेलवाल के साथ हम सब मिलकर करते हैं मां सरस्‍वती की आराधना अपने भावों से विचारों से और शब्‍दों से।

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

भोर की ले पालकी आते दिशाओं के कहारों
के पगों की चाप सुनते स्वप्न में खोई हुई
नीम की शाखाओं से झरती तुहिन की बूँद पीकर
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

पूर्णिमा में ताज पर हो
छाँह तारों की थिरकती
याकि जमाना तीर पर हो
आभ रजती रास करती
झील नैनी में निहारें
हिम शिखर प्रतिबिम्ब अपना
हीरकणियों में जड़ित
इक रूप की छाया दमकती

दूध से हो एक काया संदली धोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

वर्ष के बूढ़े थके हारे
घिसटते पाँव रुककर
देखते थे अधनिमीलित
आँख से वह रूप अनुपम
आगतों की धुन रसीली
कल्पना के चढ़ हिंडोले
छेड़ती थी सांस की
सारंगियों पर कोई सरगम

मोतियों की क्यारियों में रागिनी बोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

एक पंकज पर सिमट कर
क्षीर सागर आ गया हो
खमज,जयवंती कोई
हिंडोल के सँग गा गया हो
देवसलिला  तीर पर
आराधना में हो निमग्ना
श्वेत आँचल ज्योंकि  प्राची का
तनिक लहरा गया हो

या कहारों ने तुषारी, कांवरी ढोई  हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

सोम का हो अर्क आकर
घुल गया वातावरण में
कामना की हों उफानें
कुछ नईं अंत:करण  में
विश्वमित्री भावनाओं का
करे खण्डन  समूचा
रूपगर्वित मेनका के
आचरण के अनुकरण में

पुष्पधन्वा के शरों  में टाँकती कोई सुई
मोगरे के फूल पर है चांदनी सोई हुई

तो आप ये भी चाह रहे हैं कि मेरे जैसा अकिंचन इस गीत की प्रशंसा के लिये शब्‍द जुटाए भी और उन शब्‍दों से प्रशंसा करने की धृष्‍टता भी करे। जो शब्‍द राकेश जी ने इस गीत में टांके हैं उन शब्‍दों के सामने ठहर सकने वाले शब्‍दों को मैं कहां से लाऊं। आचरण के अनुकरण जैसा वाक्‍य रचने वाले रचनाकार के आगे मेरी और मेरे शब्‍दों की क्‍या बिसात । तो मैं भी वही करता हूं जो आप कर रहें हैं कि बस मौन होकर सुनता हूं इस गीत को फिर फिर। 

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

सुबीर संवाद सेवा पर आने वाली मनमोहक रचनायें अपनी महक से सराबोर किये हुये हैं. उस्ताद शायरों की गज़लें पढ़ कर कलम ने सहसा ही एक द्विपदी की दिशा में अग्रसर कर दिया. आपके समक्ष प्रस्तुत है यह द्विपदी

कोई प्रतिमा मरमरी हो दूध की धोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

आजकल तो राम गाड़ी से उतरता ही नहीं
रह गई फिर से शिला में गौतमी सोई हुई

क्यों उसे भगवान मानूँ ये बताओ तो जरा
छोड़ता अर्धांगिनी जो लुम्बिनी सोई हुई

रहनुमा की आँख में उतरी नहीं है आज तक
वर्ष सड़सठ की हुई, शर्मिन्दगी सोई हुई

द्वारका में जिस्म है पर प्राण तो ब्रज में बसे
बाँसुरी में तान ढूँढ़े, रुक्मिणी, सोई हुई

"शीघ्र ही फ़िर जायेंगे दिन" इस कथन की सत्यता
कुम्भकर्णी नींद से जागी नहीं सोई हुई

हो नमन स्वीकार पंकजजी, यहाँ अब मंच पर
नृत्य करती गुनगुनाती चाँदनी सोई हुई

मैं गज़ल कह कर करूँ गुस्ताखियाँ ? संभव नहीं
हो गज़ल में जो निहां शाइस्तगी सोई हुई.

पहली ही द्विपदी से जो भाव उत्‍पन्‍न होते हैं वो पूरी रचना में चलते रहते हैं। कोई प्रतिमा मरमरी में दूध से धोए जाने की बात बहुत सुंदर आई है। और उतना ही सुंदर है राम तथा बुद्ध के बारे में प्रतीकों के माध्‍यम से कहना। बुद्ध का प्रतीक तो वैसे भी मेरे मन के करीब है। और शर्मिंदगी के सड़सठ सालों से सोए होने का प्रतीक भी कमाल का बना है। खूब।

तो आज आनंद लीजिए दोनों रचनाओं का और दाद देते रहिये। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

18 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय राकेश जी, आप के इस मधुर गीत को मेरा शत शत नमन। लेखनी को सलाम।

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  2. ग़ज़ल भी जबरदस्त हुई है। एक से बढ़कर एक अशआर एक माला में बखूबी पिरोए गए हैं। वाह वाह ...!!

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  3. साहित्यानुरागी माँ सरस्वती के लाडले पुत्र आदरणीय राकेश जी की शान में झुके पंकज जी के सर के साथ जो दूसरा सर आप देख रहे हैं न ,वो मेरा है।
    राकेश जी की अद्भुत काव्य रचना और ग़ज़ल की खुमारी से कुछ उबरूं तब कुछ कहूँ। आप और आपकी लेखनी नमन करता हूँ राकेश भाई।

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    1. कमाल है, इस पोस्ट में नीचे कमेंट का आप्शन (नजर) नहीं आ रहा
      खैर, नीरज जी के साथ साझेदारी कर लेते हैं। उनके शब्दों से पूर्ण सहमति रखते हुए राकेश जी को गीत और गजल की प्रस्तुति के लिए बधाई।

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    2. जब जब कभी भोर की किरणें, छिटकी हैं पंकज नीरज से
      शब्दों की डोरी में मैने तब तब उनको पिरो लिया है
      वे ही ढल कर स्वयं छन्द में, एक लड़ी में सँवर गये हैं
      बस उनको ही मित्र आपने गीतों का दे नाम दिया है

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  4. बसंत पंचमी और माँ सरस्वती के पूजन दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...
    राकेश जी की अप्रतिम रचना का असीम आनंद बयान करना आसान नहीं है ... पहले आनद और फिर बहुत कुछ सीखा ही जा सकता है उनसे ...
    नमन है उनकी लेखनी को ... काव्य रस धरा को ...

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    1. एक आशीष मुझको बड़ों ने दिया दूजे वरदान इक शारदा दे गई
      शब्द की वीथियों में उमड़ते हुये, भाव की एक भागीरथी बह गई
      योग मेरा तो इसमें नहीं है अधिक, मैने शब्दों में केवल पिरोया उसे
      मोगरे के सुमन चूमते चूमते बात जो चाँदनी थी मुझे कह गई

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  5. सर्वप्रथम वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं। माँ सरस्वती अपना आशीर्वाद सभी पर बनाए रखे यही कामना।
    राकेश जी ने जो काव्य के अनूठे पुष्प माँ शरद के चरणों में अर्पित किये हैं वे निसंदेह न केवल माँ सरस्वती का आशीष लिए है वरन् हर पढ़ने वाले को भी मोह लेता है। आपके क़लम और क़लाम को प्रणाम
    सादर
    पूजा

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    1. अपनी वीणा मे से तराश मां शारद ने

      सौंपी है मेरे हाथों में जो एक कलम

      वह कलम स्वत: ही लिख देती जो मन आता

      मैं लिखता हूँ, ये तो बस सब्को हुआ भरम

      वह शब्दों में परिवर्तित कैसे कर देती

      जो ओस गिरी होती गुलाब के फूलों पर

      मैं कभी भेद न समझा तब ही कहता हूँ

      मेरे सिर पर केवल मां का आशीष परम.....

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  6. अतिसुन्दर प्रस्तुति !! राकेश जी तो बस राकेश जी हैं !!

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    1. बन्धु आपके शब्द सदा ही मुझे प्रेरणा द्ते आये
      वरना कहाँ हुआ यह संभव एकाकीमन कुछ गा पाये
      मैने तो केवल छन्दों के बाने में उनको बुन डाला
      जीवन की क्यारी में दिन ने शब्दों के जो फूल उगाये

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  7. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (25-01-2015) को "मुखर होती एक मूक वेदना" (चर्चा-1869) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    बसन्तपञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. भोर की ले पालकी आते दिशाओं के कहारों 
    के पगों की चाप सुनते स्वप्न में खोई हुई 
    नीम की शाखाओं से झरती तुहिन की बूँद पीकर 
    मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई
    ===================
    मैं गज़ल कह कर करूँ गुस्ताखियाँ ? संभव नहीं 
    हो ग़ज़ल में जो निहां शाइस्तगी सोई हुई.

    ख़ूबसूरत गीत, बहत ही सुंदर ग़ज़ल, क्या शाइस्तगी से बयान किया है, खण्डेलवाल जी ने. वाह! मुशायरा लूट लिया जनाब.

    (हर्फ दर हर्फ, शब्द दर शब्द नित नई उपमा पहन
    रागिनी बन कर कभी तो रुक्मिणी या गौतमी
    'राकेशी' नौके क़लम से ख़ूबरू पलके संवारे
    मोगरे के फूल पर थी 'चांदनी' सोई हुई)

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    1. हाशमी साहब

      शब्द जितने मुझे कोष ने दे दिये, मैं करीने से उनको लगाता रहा
      स्नेह है आपका, भाव जो बन गया, लेखनी में उतर मेरे आता रहा
      आप जो शब्द के फूल देते मुझे, हार उनका बना आपको दे रहा
      और कुछ तो नहीं, जो कहा आपने गीत मैं बस भी गुनगुनाता रहा.

      हटाएं
  9. जब राकेश जी के गीतों से शुरुआती परिचय हुआ था तो मैं बहुत वाह वाह किया करता था। उसके बाद जैसे जैसे उनमें डूबा मेरी बोलती बंद होती गई। अब तो बस पढ़ता हूँ और आनंद लेता हूँ और याद करता हूँ ट्रांसट्रोमर (२०११ नोबेल) की इन पंक्तियों को

    संगीत ढलान पर बना शीशे का घर है ..........[यहाँ ‘संगीत’ की जगह ‘राकेश जी का गीत’ पढ़ लीजिए बस]
    जहाँ पत्थर उड़ते हैं, पत्थर लुढ़कते हैं
    और पत्थर आर पार निकल जाते हैं
    लेकिन एक भी शीशा नहीं टूटता।

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    1. प्रेरणा सिन्धु देकर गई भाव का
      शब्द तो आप ही आप बन जायेंगे
      होंठ पर बांसुरी मैं रखूं न रखूं
      तान में सुर स्वयं ही समा जायेंगे
      वीन को कर कलम हाथ में दे गई
      शारदे अपने आशीष से रंग मुझे
      उस घड़ी से स्वयं अक्षरों ने कहा
      वाक्य में वे सिमट गीत बन जायेंगे.

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  10. ५१४२. मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई--

    मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई
    यूँ लगे था आँख जैसे लग गई रोई हुई

    सोचती थी चाँद ना घिर जाए बादल में कहीं
    कर रही चिंता यही थी स्वप्न में खोई हुई

    मौन आँसू झर रहे थे चाँदनी के नैन से
    पांखुरी थी मोगरे की अश्रु से धोई हुई

    चार पल की चाँदनी है, है फ़ना होना इसे
    रात भर के वास्ते है चाँद ने ढोई हुई

    हो रहा तू क्यों परेशाँ, है यही क़ुदरत ख़लिश
    ख़त्म होनी है यहाँ हर इक फसल बोई हुई.

    -- महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’
    २८ जनवरी २०१५

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