शनिवार, 17 जनवरी 2015

मकर संक्रांति का पर्व बीत गया सूर्य भी उत्‍तरायण हो गया है आइये आधी आबादी के साथ चलते हैं आगे लावण्‍या शाह जी, शार्दूला नोगजा जी, पूजा भाटिया जी और डिम्‍पल सिरोही जी की ग़ज़लों के साथ।

सूर्य के उत्‍तर की ओर हो जाने को एक प्रतीक माना जाता है कि अब ऊर्जा का समय वापस आ रहा है। वैसे तो पृथ्‍वी के कारण ही सूर्य इस प्रकार उत्‍तर और दक्षिण होता रहता है। हमारी भी वही स्थिति होती है। हम कहते हैं कि हमारी ऊर्जा कम हो रही है शक्ति कम हो रही है, लेकिन असल में तो ऊर्जा के सापेक्ष हमारी स्थिति आगे या पीछे, उत्‍तर या दक्षिण या उत्‍तर होती रहती है। ऊर्जा कभी कम नहीं होती, वो कम हो भी कैसे सकती है। बात केवल सापेक्षता की होती है। मुझे लगता है कि आइंस्‍टीन का सापेक्षता का सिद्धांत जीवन में हर जगह लागू होता है। इसीलिए मुझे लगता है कि किसी एक परम सत्‍य को छोड़ कर बाकी सब कुछ सापेक्ष सत्‍य ही है। जो मेरे लिए सत्‍य है वो किसी और के लिए नहीं है। इसका मतलब ये कि वो मेरा सापेक्ष सत्‍य है। दुनिया भर में सारे युद्ध, सारी लड़ाइयां केवल इसी बात को लेकर तो हैं कि हम केवल अपने सापेक्ष सत्‍य को सच मानते हैं और दूसरे के सापेक्ष सत्‍य के बारे में सोचते भी नहीं हैं। एक दिन कहीं प्रबुद्ध चर्चा में मैंने कहा था कि हिन्‍दु और मुस्लिम के बीच मंदिर मस्जिद का कोई झगड़ा नहीं है, असल में दोनों एक दूसरे के सापेक्ष सत्‍य को पहचान नहीं पा रहे हैं। पुरानी अनपढ़ और अशिक्षित पीढ़ी जानती थी, समझती थी, इसलिए सब मिलजुल कर रहते थे । लेकिन आज की ये भौतिक शास्‍त्र और आइंस्‍टीन को रट रट कर बड़ी हुई पीढ़ी नहीं समझ पा रही है। खैर बात कहां से शुरू हुई और कहां पर पहुंची । लेकिन सापेक्षता के सिद्धांत का मैं अपने जीवन में खूब उपयोग करता हूं। जब किसी से कोई विवाद की स्थिति बनती है तो हमेशा ये जानने की कोशिश करता हूं कि उसका सापेक्ष सच क्‍या है। और कई सारे विवाद होने से पहले ही समाप्‍त हो जाते हैं। 

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

आज के प्रवचन समाप्‍त होते हैं तो आइये आज तीनों कवयित्रिओं के साथ चलते हैं आगे की काव्‍य यात्रा पर । आइये आधी आबादी के साथ चलते हैं आगे लावण्‍या शाह जी, शार्दूला नोगजा जी, पूजा भाटिया जी और डिम्‍पल सिरोही जी की ग़ज़लों के साथ।

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लावण्या शाह

वह मिलन की यामिनी थी अश्रु से धोई हुई
रूठ कर अभिसारिका थी नींद में खोई हुई

ये कहा उसने था मिलने आऊंगा में ईद पर 
अबके इस महताब की होगी न केवल दीद भर
हाय लेकिन वो न आया ईद फीकी रह गई
अनछुई सी देह की सूनी हवेली रह गई
पड़ गया सिंगार फीका उस नई दुल्हन का सब
ले मिलन की आस तारा आखिरी भी डूबा जब

दो नयन में आंसुओं की फ़स्ल थी बोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

लावण्‍या जी की इंतज़ार हमेशा हम सबको इसलिए ही रहता है कि अब उनसे कोई सुंदर सा गीत सुनने को मिलेगा। और इस बार विरह का सुदंर सा गीत लेकर वे आईं हैं। गीत क्‍या है, मानो किसी ने एक रूठ कर सोई हुई अभिसारिका का चित्र बना दिया है। जिस चित्र में ईद है, ईद का चांद है। हवेली है जो इंतज़ार कर रही है कि कोई आए तो वो जगमगा उठे। एक नई दुल्‍हन है जो विवाह के बाद की पहली ईद पर सज संवर के, पूरा सिंगार करके अपने पी की प्रतीक्षा कर रही है जो परदेस कमाने गया है और ईद पर आने का कह के गया है। पर आया नहीं है। सारा सिंगार आंसुओं के खारे खारे पानी  से धुल कर बह रहा है और नायिका रूठ कर सो रही है। देखिये आप भी इस चित्र को और आनंद लीजिए। वाह वाह वाह।

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शार्दूला नोगजा

ज़िन्दगी पथराई, खुशियों की घड़ी सोई हुई
कब कुंवर चूमेगा आ के सुंदरी सोई हुई?

सो नहीं पातीं कपिलवस्तु में व्याकुल नारियाँ
तज गया सिद्दार्थ जब से संगिनी सोई हुई

माफ़ करता है फ़लक इन्सान को सौ बार, फ़िर
छोड़ देता है सुदर्शन शिंजिनी सोई  हुई

ये सियासी जंग वर्णावत में हो, बस्तर में हो
बच निकलते शाह, जलती भीलनी सोई हुई

कर सबर, अपने सिदक तक नेक-बद ख़ुद जायेंगे 
हाँक कर क्या तू जगाता, बन्दगी सोई हुई?

मुस्कुरा, अरुणिम उषा ने पाँव धीमे कर लिए
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

राधिका! ओ राधिका! ओ राधिका! ओ राधिका!
श्याम मथुरा को चले, तू रह गई सोई हुई

क्‍या आपने अंतिम शेर का जादू देखा, राधिका को पुकारने, बार बार पुकारने से शेर क्‍या सौंदर्य से जगमगा उठा है। मैं इस शेर को पढ़ने के बाद ठिठक गया, ठहर गया। कुछ देर तक उलझा रहा । जब होश आया तो लगा कि ये शेर तो जादू कर रहा है। और एक शेर मेरे मन का, सो नहीं पातीं कपिलवस्‍तु में, मिसरा उला के दर्द को ज़रा महसूसिए। उन नारियों के दर्द को महसूसिए तो उस दर्द को भोग रही हैं । उस्‍ताद कहते थे कि जब तुम दूसरों के दर्द को ठीक प्रकार से स्‍वर दे देते हो तो कविता हो जाती है। यहां भी कविता हो गई है। ऐसा ही एक शेर है वर्णावत में भीलनी के जल जाने का शेर। बहुत सुंदर। और हां उतनी ही नाज़ुकी से गिरह का शेर बांधा है। उफ सुबह के पांव धीमे होना । ग़ज़ब। ग़ज़ब। क्‍या दृश्‍य है । वाह वाह वाह ।

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पूजा भाटिया

था वो आँगन मुफलिसी का,थी ख़ुशी सोई हुई
मौत पहरे पर थी ऑ थी ज़िन्दगी सोई हुई

वो नज़ारा देख कर हम हो गए हैरतज़दा
तीरगी की बांह पर थी रौशनी सोई हुई

था तक़ाज़ा वक़्त का सो ख़र्च लफ़्ज़ों को किया
देखना था किस जगह है  ख़ामुशी सोई हुई

रात में देखा था माँ को जागते सोते हुए
अब ये जाना कैसी लगती है परी सोई हुई

बाग़ है ये या किसी शाइर का इक दीवान है
ओस है पत्तों पे या फिर शायरी सोई हुई

ख़्वाब आँखों में थे लेकिन आंसुओं की ओट में
जैसे हो सहरा की आँखों में नमी सोई हुई

हर तरह के चोंचले हैं हर तरफ़ शो ऑफ है
क्या सभी के दिल में है कोई कमी सोई हुई?

शहर भर में ढूंढती फिरती रही शब् भर जिसे
मेरे दिल में ही मिली वो बेबसी सोई हुई

शाख झुक झुक कर ज़मीं छूती रही थी रात भर
"मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई"

पूजा जी का शायद तरही में प्रथम आगमन है लेकिन धमाकेदार आगमन है। ख्‍़वाब आंखों में थे लेकिन आंसुओं की ओट में, इस शेर में मिसरा सानी में सहरा और नमी के प्रतीक बहुत खूबी से इस्‍तेमाल हुए हैं। बहुत सुंदर तरीके से। इसी प्रकार वो नज़ारा देख कर हम हो गए हैरतज़दा वाला शेर है तीरगी की बांह पर रौशनी के सोए होने का सुंदर दृश्‍य रचा गया है। बहुत ही सुदंर तरीके से। रात को देखा था मां को जागते सोते हुए में मां की तुलना परी से की गई है, इससे पहले सारी ग़ज़लों में बेटी की तुलना परी से की गई थी। लेकिन चूंकि ये एक बेटी का शेर है इसलिए परी की तुलना तो मां से होगी ही। गिरह का शेर भी बहुत सुंदर बन पड़ा है। शाखों का झुक कर ज़मीं छूना बहुत सुंदर है। वाह वाह वाह।

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डिम्पल सिरोही

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई
यूं लगा उपवन में कोई हो परी सोई हुई

नींद आ पाती नहीं मुझको किसी भी हाल में
देखती हूं जब मैं भूखी जिंदगी सोई हुई

आंख मलती सी सुबह यूं आई है नववर्ष की
नींद से जागी हो जैसे लाडली सोई हुई

भूलकर शिकवे शिकायत यूं सभी आगे बढ़ो
रह न जाए एक इन्सां की खुशी सोई हुई

नींद से मुझको जगा देती है डिम्पल रात में
दिल में कोई आरज़ू कुचली दबी सोई हुई

डिम्‍पल जी पूर्व में भी अपनी ग़ज़ल लेकर हमारे मुशायरे में आ चुकी हैं, आज उनका एक बार फिर से स्‍वागत है। सबसे पहले बात उस शेर की जिसमें आंख मलती हुई नव वर्ष की सुबह इस प्रकार आ रही है  जैसे नींद से जाग कर लाड़ली चली आ रही हो। बहुत खूब । इसी प्रकार से मतले में ही मिसरा ए तरह पर बहुत सुंदर तरीके से गिरह बांधी गई है। दोनों मिसरे एक दूसरे के पूरक होकर उभर रहे हैं। नींद आ पाती नहीं मुझको किसी भी हाल में शेर उसी सामाजिक सरोकार की बात कर रहा है जिसकी चर्चा हम कल भी कर चुके हैं । अच्‍छा लगता है जब शायर इस प्रकार से सामाजिक सरोकारों की ओर इशारा करता है उनकी चर्चा करता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है डिम्‍पल जी ने । वाह वाह वाह।

तो आनंद लीजिए इन चारों रचनाओं का और दाद देते रहिए। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

76 टिप्‍पणियां:

  1. अनछुई सी देह की सूनी हवेली रह गई,,,बहुत ही खूबसूरत प्रेम मे डूबे इस दिल को छूने वाले गीत के लिए लावण्या जी का बहुत बहुत धन्यवाद ।
    शार्दूला जी के लिए क्या कहूं उनकी पूरी की पूरी गज़ल मेरी अपनी सोच से मिलती हुई।
    सो नहीं पाती, ,,,,,माफ करता है,,,,,,ये सियासी जंग,,,,,वाह वाह वाह,,, इस से ज्यादा सलीकेदार तंजकसी क्या होती,,,,निर्दोष के सजा पाने की सच व्यसनी कमाल,,दिल को छू गई,,,बहुत बहुत शुभकामनाएं शार्दूला जी,,,दिल से दुआएं आपको।
    " था वो आंगन,,,,,वो नजारा देख, ,,,हर तरह के चोचले,,,,,,वाह वाह एक से बढ एक शेर, ,,,शाख झुक झुक कर जमी छूने का क्या बढिया चित्र उकेरा गया कमाल बाकमाल गजल हुई पूजा जी को ढेरो शुभकामनाएं।
    अब बात डिम्पल जी की पिछली बार क्या खनकदार गजल से उन्होने मन मोह लिया था मुझे अभी भी याद है।इस बार भी उनकी गजल धमाकेदार है " नींद आ पाती नही,,,,, भूल कर शिकवे शिकायत वाह वाह वाह खूब सारी दुआएं डिम्पल जी के लिए वैसे भी मेरठ पास है और कुछ नाता मेरा भी मेरठ से रहा है सो डिम्पल जी से थोडा और अपनापन भी महसूस होता है खैर उस से तो नाता नही रचनाओं का,,,सभी रचनाकारों को एक बार फिर शुभकामनाएं मुझे इस ब्लाग की ये पोस्ट सबसे ज्यादा आकर्षित करती है जब पूरे सफेद पर हम ही हम होते है,आयोजक महोदय का धन्यवाद।

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    1. पारुल आपका बहुत शुक्रिया ग़ज़ल पसंद करने के लिये!

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    2. पारूल जी, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। हालांकि यह काफी कठिन था, लेकिन यहां प्रस्तुत सभी की गज़लें पढ़ कर लग ही नहीं रहा। कितनी प्रतिभाएं यहां उपस्थित हैं। मेरी भी एक कोशिश थी आपको पसंद आई, आपका बहुत आभार।

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    3. हार्दिक धन्यवाद पारुल जी:)
      सादर
      पूजा

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    4. आपका हार्दिक धन्यवाद पारूल !

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  2. सबसे पहले सुबीर भैया को तहे दिल से धन्यवाद कि हर तरह की व्यस्तता के बावज़ूद वे तरही का आयोजन करते हैं और हम जैसे नौसिखियों को पूरी क्षद्धा के साथ मौका देते हैं। कई बार ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार में ये एक अकेला मौका होता है जब मैं कुछ लिखने के लिए चार पल चुरा लेती हूँ और फिर से जी जाती हूँ!
    इस तरही में आई कुछ नाज़ुक, कुछ झकझोरती सी ग़ज़लें पढ़ीं तो हैं पर सब पे टिप्पणी लिख नहीं पाई हूँ अब तक!
    सुबीर भैया आपकी पिछली पोस्ट की पुकार भी पढ़ी! आपको फिर लिखुँगी उस पर।
    सादर शार्दुला

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  3. लावण्या दीदी का आगाज़ और अंत दोनों सुंदर! अनछुई सी देह ... बहुत प्यारा बिम्ब! उनकी कविता का वाकई इंतज़ार रहता है।

    पूजा जी को पहली बार पढ़ रही हूँ, शायद इसलिये की सोशल मीडिया पे नहीं हूँ, क्योंकि उनके अश'आर से वे स्थापित लेखिका जान पड़ती हैं! बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है उन्होंने! तीरगी की बाँह में रोशनी का सोना, क्लाउड की सिल्वर लाइनिंग का बिम्ब दे गया! माँ पे लिखा हर लफ़्ज स्वयंसिद्ध होता है... वाह!
    बाग की तुलना किसी शायर के दीवान से करना, नया सा ख्याल।
    सहरा वाला शेर अपनी सोच और बिम्ब चयन के कारण चौंकाने वाला!
    मन की ग्राउडेड न होने को शो अॉफ से जोड़ना गहरी बात। मन खुशी से भर गया पूजा, बहुत बधाई!

    डिम्पल को पहले भी पढ़ा है तहरी में। उनका मकता और नववर्ष वाले शेर बहुत खूबसूरत हैं! आँखे मलते हुए लाडली का जागना ... वाह!

    आप सभी को सुंदर लेखन के लिए धन्यवाद और नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऐं! अब धीरे-धीरे बाकी की तरही पे लिखुँगी!

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    1. दिली शुक्रिया शार्दुला जी
      सादर
      पूजा

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    2. सौ शार्दुला
      ' जोरे कलम और जियादा ' खूब लिखो और यूं ही बेहतरीन लिखो
      सद्भावना और स्नेह
      - लावण्यादी

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    3. आदरणीया और बहुत प्यारी लावण्या दी,
      आपके प्रीतपगे आशीष से मैं धन्य हुई।
      आपका हार्दिक धन्यवाद!
      सादर प्रणाम, शार्दुला

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  4. चिंतन मंथन की प्रेरणा से सम्पन्न भूमिका और आधी आबादी का प्रतिनिधित्व कर रही कवियत्रियों की रचनाओं की बेहतरीन प्रस्तुति के लिए भाई पंकज सुबीर जी को हार्दिक बधाई। रचनाओं और ग़ज़लों पर टिप्पणी के लिए कुछ बचा ही नहीं है सिवाए पंकज जी की बात की अनुमोदन के।
    इस प्रस्तुति की रचनाकारों को हार्दिक बधाई और धन्यवाद।

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    1. द्विज जी आपका हार्दिक धन्यवाद! सत्य ही जब सुबीर भैया विवेचन कर देते हैं तो उसके बाद नया कहने को थोड़ा ही बचता है।

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  5. चाहा तो मैनें बहुत तारीफ में उनकी लिखूं,
    वक्त की उलझन में थी, मैं जरा खोई हुई।
    मैनें आप सभी की गज़लें पढ़ीं, अति सुंदर। पिछली बार कंमेंट्स नहीं दे पाई थी, लेकिन इस बार खुद को नहीं रोक पाई।
    लावण्या जी, बधाई हो आपको इतने सुंदर गीत की रचना के लिए। आप हमेशा बहुत अच्छा लिखती हैं लेकिन इस बार का गीत दिल को छूने वाला गीत है। प्रेम-मिलन, रूठना-मनाना, दीदार-इंतजार नींद और अश्क को बखूबी पिरोया है आपने। ईद और ईद का चांद क्या कहने,हाय वो न आया लेकिन.....वाह। पड़ गया सिंगार फीका..... इंतहा हो गई इंतजार की कितना सुंदर चित्रण आपने प्रस्तुत किया है।
    ÞÞÞÞÞशार्दूला जी बहुत सुंदर गज़ल लेकर इस तरही में शामिल हुर्इं हैं। ये सियासी जंग..... बहुत बढ़िया, आपकी गज़ल का हर शेर बहुत अच्छा है। राधिका, ओ राधिका....वाह, चांदनी को देखकर किस तरह अरूणिम उषा अपने कदम धीमे कर रही है वाह, वाह।
    पूजा जी भले ही पहली बार इस तरही में शामिल हुई हैं, लेकिन बेहतरीन अंदाज और धमक के साथ। 'एवरी क्लाउड हेज ए सिल्वर लाइन' कितने खूबसूरत शब्दों में इसे बयां किया है आपने। बाग है या.... शहर भर में ढूंढती...., झुक झुक कर जमीं.......खूबसूरत।

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    1. डिम्पल आपका हार्दिक धन्यवाद!

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    2. ढेरों शुक्रिया डिम्पल जी और आपकी कविता की परी, लाड़ली यूं ही आबाद रहें।
      भूखे इंसान को भरपेट रोटी मिले, हरेक इंसा को खुशियाँ मिले ये मेरी भी दुआ है !

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    1. माफ कीजिएगा, यह शेर मैनें यूं कहा था एक शब्द लिखने से छूट गया, कृ पया इसे ऐसे पढ़ें। धन्यवाद।
      चाहा तो मैनें बहुत तारीफ में उनकी लिखूं,
      वक्त की उलझन में थी,बस मैं जरा खोई हुई।

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    2. शुक्रिया डिम्पल जी
      सादर
      पूजा

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  7. नारी शक्ति जब भावनाओं में डूब जाती हैं, तो उसकी प्रस्तुति दिल की गहराई तक असर करती है। आदरणीय लावण्या शाह साहिबा का गीत कितना असरदार बना है ईद फीकी रह गई का क्या प्रयोग किया है, वाह वाह वाह
    शार्दूला नोगजा साहिबा की गजल का हर शेर बहुत गहराई लिए हुए है। मुबारकबाद। पूजा भाटिया जी रात में देखा था मां को क्या कहने इसे कहते हैं भावनाओं का सही शब्द चित्रण, ऐसे शेर यादगार हो जाते हैं।
    डिम्पल सिरोही जी, मतला खूबसूरत है, भूखी जिंदगी वाला शेर आपकी कोमल भावनाओं का दर्पण बना है। और नींद से जागी हो जैसे लाडली सोई हुई क्या कहना वाह वाह वाह अल्लाह आपके लेखन में दिन-ब-दिन पुख्तगी और निखार पैदा करे इसी दुआ के साथ।
    शाहिद मिर्जा शाहिद

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    1. धन्यवाद शाहिद साहब।
      सादर
      पूजा

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    2. शाहिद साहब, ग़ज़ल को आपकी सहमति मिली। बहुत शुक्रिया!
      सादर शार्दुला

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    3. आप की ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया ' शाहिद ' साहब !

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  8. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-01-2015) को "सियासत क्यों जीती?" (चर्चा - 1862) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. आदरणीय लावण्या दी,
    वह मिलन की यामिनी थी...
    रूठकर अभिसारिका थी...
    क्या खूबसूरत चित्र है..दिमाग से निकल ही नही रहा है।
    गुरुदेव के तरही आयोजन में ही ऐसे धमाकेदार ग्रैंड प्राइज मिलते है।
    आनंद आज्ञा

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  10. सर्वप्रथम पंकज जी आपका शुक्रिया की आपने अपने परिवार में इतनी आत्मीयता से न केवल परिचय करवाया बल्कि सहृदयता से स्थान भी दिया।
    बहुत धन्यवाद
    सादर
    पूजा

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  11. लावण्या जी का खूबसूरत गीत,शार्दुला जी और डिम्पल जी की पुरअसर ग़ज़ल । एक ही बात जुबां पे आती है पढ़ कर
    वाह वाह वाह
    उम्मीद है मेरी तालियों की आवाज आप सभी तक पहुँच रही होगी।आप तीनों कलमकारों को ढेरों ढेर मुबारकां
    सादर
    पूजा

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    1. बहुत शुक्रिया पूजा!
      लिखती रहिये!
      सादर शार्दुला

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    2. आपका हार्दिक धन्यवाद पूजा
      मोगरे के फूल सी माँ की पवित्र छवि को अपनी रचना में
      चांदनी सा सुकून बख्श स्थान देने से ममता की चांदनी फैला दी है आपने !
      खूब सारी बधाई, आभार और स्नेह
      - लावण्या

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  12. 'पंकजी' कौशिश ने ग़ज़लों से ग़ज़ल कहलायी है
    तरही में 'सापेक्ष' बन , अर्द्धांगिनी सोई हुई।

    लावण्या शाह :
    =========

    विरह के दर्द से गुज़ार कर 'चांदनी' को जिस तरह मोगरे के फूल पर सुलाया है , कमाल की मंज़र कशीं है , सुब्हान अल्लाह !

    शार्दुला नोगजा :
    ==========
    मुस्कुरा, अरुणिम उषा ने पाँव धीमे कर लिए
    मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

    वाह ! क्या नाज़ुक ख़्याली है। शब्दों की बात करे तो 'हिंदी-उर्दू' दो बहने साथ-साथ सोई हुई है. एक फ़ारसी शेर याद आ गया नाज़ुक ख़्याली पर :
    "आहिस्ता ख़िराम , बल्कि मख़िराम
    ज़ैरे क़दमत , हज़ार जान अस्त। "
    (आहिस्ता चलो बल्कि मत चलो,
    तुम्हारे क़दमों के नीचे हज़ार जान है)

    पूजा भाटिया :
    =========
    शाख झुक झुक कर ज़मीं छूती रही थी रात भर
    "मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई"
    पूजा जी ने इस चांदनी का हुस्न इतना बढ़ाया क़ि शाख़ भी सजदा करने को बेताब नज़र आई।

    डिम्पल सिरोही :
    ==========
    मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई
    यूं लगा उपवन में कोई हो परी सोई हुई

    मोगरे के फूल पर सोई चांदनी की 'परी' से अच्छी मिसाल और क्या हो सकती थी ?

    चारों शायराओं के गिरह के ही शेर चुने , ऐसा इत्तेफ़ाक़ से हो गया ! वैसे 'गिरह' बाँधने में महिलाए ही अधिक सक्षम नहीं होती ?

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    1. बहुत शुक्रिया हाशमी साहब! आपकी पंक्तियाँ पढ़ अपने गुरू जी के गीत का आगाज़ याद आ गया:
      "एक ही फूल की पंखुरी हम औ' तुम
      गंध तुम में वही, गंध हम में वही
      तुमने अल्फ़ाज़ में जो कहा हमसुखन
      बात शब्दों में हमने वही है कही"
      आपका हार्दिक धन्यवाद! आभारी हूँ!
      सादर शार्दुला

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    2. आदरणीय हाश्मी साहब
      बहुत शुक्रिया
      सादर
      पूजा

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    3. आप की ज़र्रा नवाज़ी का शुक्रिया हाशमी साहब !

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  13. बहुत सुन्दर , मुशायरे में ग़ज़ल चढ़-बढ़ कर बोल रही है पर आज तो और सुखद अनुभूति हुई जब लावण्या जी के गीत मन-मस्तिष्क पर छाने लगे । बेहतरीन गीत बस थोड़ा कम पढने को मिला । रचना इतनी अच्छी है कि एक बंद कम लगा । आपने मिसरे का भी प्रयोग बड़े प्रभावी ढंग से किया । सुन्दर प्रस्तुति के लिए साधुवाद और हार्दिक बधाई ।

    शार्दूला जी , सुन्दर प्रस्तुति ,आपके सिद्दार्थ के त्याग वर्णन का शेर में ढालना बेहद प्रभावी लगा । वैसे सभी शेर बेहतरीन । अंतिम पंक्ति का अनुप्रास बहुत प्रभावी लगा । हार्दिक बधाई ।


    पूजा जी की लाजवाब प्रस्तुति ग़ज़ल , रात को माँ को देखा ,यह शेर माँ के अलग स्वरूप को बखानती है । सभी शेर क़ाबिलेतारीफ । बधाई स्वीकारें ।

    "भूलकर शिकवे शिकायत यूँ सभी आगे बढ़ो " ,डिम्पल जी ,इंसानियत की बात को बेहद प्रभावशाली और सरल ढंग से पेश किया आपने ।बेहद खूबसूरत शेर बन पड़ा है । "आरजू कुचली हुई " वाला शेर पर भी वाह वाह बनता है । खैर शेर तो सारे ही कमाल के हैं । बधाई और शुभकामनायें ।


    इतनी व्यस्तता में भी पंकज जी ने हम सभी को इतने लाजवाब ग़ज़ल पढने का अवसर दे रहें हैं , उनका बहुत बहुत धन्यवाद । आज की प्रस्तुति भी सराहनीय । एक बेहतरीन मुशायरा । सफलता के लिए हार्दिक बधाई । प्रणाम

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    1. विनोद जी, आपने समय निकाल कर ग़ज़ल पढ़ी और उसमें सौन्दर्य ढ़ूढा! आपका हार्दिक धन्यवाद!
      सादर शार्दुला

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    2. विनोद जी
      हार्दिक धन्यवाद
      सादर
      पूजा

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  14. जिंदगी पथराई हुई खुशियों की घडी सोई हुई
    कब कुंवर चूमेगा आ के सुंदरी सोई हुई

    वाह वाह बहुत सुंदर।प्रेम की चाह आशा और एकरसता से मूक्ति की अभिलाषा प्रतिबिंबित हो रही है।एक सटीक बिम्ब।
    सो नहीं पाती कपिलवस्तु की व्याकुल नारियां
    तज गया सिद्दार्थ जब से संगिनी सोई हुई

    क्या क्या न कह दिया इस शेर ने।वैसे इन शब्दों से शेर रचना निश्चित ही बेहद कठिन काम है।आपने तो सर्वोत्कृष्ट भाव उकेर डाले है।बहुत दिनों तक दिल में रहनेवाला शेर है यह।
    सुदर्शन शिंजिनि और जलती भीलनी उद्धरणों को समाहित कर जब ग़ज़ल आगे बढ़ती है तो स्त्रियों के प्रति परम्परागत भेदभाव सैकड़ों वर्ष की काल यात्रा तय कर के रचना के माध्यम से प्रकट होता प्रतीत होता है।
    अरुणिम ऊषा के धीमे कदमों से चांदनी के सोने को जोड़कर बेहद खूबसूरत चित्र बनाया है
    राधिका ओ राधिका....
    सुभानअल्लाह ....क्या लिख दिया है आपने।
    शार्दुला दी...आपकी ग़ज़ल शानदार है।
    आदरणीय गुरुदेव आपका आभार शानदार शायराओं और उनकी रचनाओं से रूबरू कराने के लिए।
    चलती गाड़ी में मोबाईल से टिप्पणी भेजने में दिक्कत न आ रही होती तो आज की इन चरों रचनाओं पर पुस्तक लिख डालता।
    बधाई आभार।

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    1. प्रकाशजी, आपने चलती गाड़ी में ग़ज़ल पढ़ी, और इतनी उदारतापूर्वक उसपे लिखा! आपका हार्दिक धन्यवाद! मतला 'Sleeping beauty' वाली कहानी की तरफ़ इशारा कर रहा है. आपको अच्छा लगा, मुझे खुशी हुई! अन्य शेर पर भी आपने अनुग्रह किया, आभारी हूँ।
      सादर शार्दुला

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  15. इस पोस्‍ट की प्रस्‍तुति आधी आबादी का प्रतिनिधित्‍व ही नहीं कर रही बाकी़ आधी को चुनौती भी दे रही है। इतनी खूबसूरत गीतात्‍मक अभिव्यक्ति लावण्‍या शाह दीदी और राकेश खण्‍डेलवाल जी की ही सकती है। और चार खूबसूरत ग़ज़ल बोनस में। क्‍या खूबसूरती से नये नये काफि़या प्रयोग किये गये हैं। एक से एक कोमल शेर। नतमस्‍तक हूँ।

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    1. हार्दिक धन्यवाद तिलक जी! आप सब से ही लिखना सीख रहें हैं !
      सादर शार्दुला

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    2. बहुत शुक्रिया तिलक साहब
      सादर
      पूजा

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    3. आपका ढेरों शुक्रिया आपका भाई श्री तिलक जी !

      हटाएं
  16. मौत के पहरे में मुफलिसी के आँगन में जिंदगी का सोना ...वाह वाह पूजा जी क्या बात कही है।

    और तीरगी की बांह पर रौशनी...मुशायरे को रोशन करने वाला शेर लगा।बहुत खूब कहा आपने।

    था तकाजा वक्त का जो खर्च लब्जो को किया
    देखना था किस तरफ खामोशी थी सोई हुई

    बेहद खूबसूरत शेर कमाल की गिरह।वक्त के तकाजों की मजबूरी में लफ्जों को खर्च करते रूहानी ख़ामोशी की तलाश किसे नहीं होती है।बहुत खूब।वाह वाह।
    आँसुओ की ओट में आँखों के ख्वाब...वाह।बहुत सुंदर।
    मुझे जो प्रयोग पसन्द आया है वो है

    हर तरह के चोचले है हर तरफ शो ऑफ़ है
    क्या सभी के दिल में है कोई कमी सोई हुई
    शो ऑफ का प्रयोग दिलचस्प और प्रभावोउत्पादक है।
    माँ में परी को दिखा कर दिल को छू लेने वाला शेर कहा है आपने।
    बाग़ है या ये किसी शायर का दीवान में आपने जो चित्रण किया है उससे ग़ज़लें फूलों से खूबसूरत और खुश्बूदार हो कर मुस्कुराने लगी है।वाह जी वाह।

    दिल में मिली बेबसी और शाख का झुक क्र कहना बहुत खूब
    कहा पूजा जी।
    आपकी मुकम्मल ग़ज़ल से ही लगता है कि आपका तरही में आगमन प्रथम हो सकता है पर है आप मंझी हुई खालिस और कामयाब शायरा।
    दाद कुबूल फरमाएं।

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  17. प्रकाश जी
    बहुत शुक्रिया आपने तफ़सील से ग़ज़ल को पढा। पसंद किया। दिली शुक्रिया।
    सादर
    पूजा

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  18. आदरणीय लावण्या जी का गीत सीधे दिल में उतरता है ... बस आनंद ही लिया जा सकता है .. शब्दों से बयान करना आसन नहीं ...
    शार्दूला जी का हर शेर पुरात इतिहास दर्शन और आज की परिस्थिति को गूंथ कर लिखा गया है जो सीधेर दिल में उतर जाता है ... और जैसा आपने कहा ... अंतिम शेर सच में जादू से असर करता है ... पूरी कथा आँखों से सामने ले आता है ...
    पूजा जी की धमाकेदाएर एंट्री का स्वागत है ... बहुत ही लाजवाब शेरों से सजाया है पूरी ग़ज़ल को ... तीरगी की बांह पर थी और माँ वाले शेर ने तो बहुत ही कमाल किया है सीधे दिल में उतर जाते हैं ... गिरह का शेर भी गज़ब ढाता है ... जोरदार ताली पूजा जी के लिए ...
    आँख मालती सी सुबह ... डिंपल जी ने कमाल किया है इस शेर में ... और आखरी शेर भी बहुत सुन्दर बन पड़ा है ...
    मुशायरा अपने जवानी के दौर में बाखूबी चल रहा है .... कल के कार्यक्रम की अग्रिम बधाई और शुभकामनायें ...

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    1. हौंसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया दिगम्बर जी
      सादर
      पूजा

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    2. आपका ढेरों शुक्रिया आपका दिगम्बर जी !

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    3. हार्दिक धन्यवाद दिगम्बर जी! आप के शब्दों से प्रोत्साहन मिला!
      सादर शार्दुला

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  19. पोस्ट कल ही पढ़ ली थी लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद टिप्पणी करने का समय नहीं निकाल पाया। हर बार सोचा हुआ काम समय पर हो जाये ऐसा होता नहीं।

    आदरणीय लावण्या जी उपस्तिथि ने हमेशा इस प्रकार के तरही मुशायरों में गरिमा प्रदान की है। उनकी लेखनी का जादू सर चढ़ कर बोलता है। अपने मधुर गीत के माध्यम से उन्होंने फिर से पाठकों के दिल के तारों को झंकृत किया है। उनके पास भाषा और भाव का अथाह भण्डार है जो उनकी लेखनी से झरता है। विरहणी की मानसिक दशा का ऐसा सुन्दर वर्णन दुर्लभ है। देह की सूनी हवेली -अपने आप में महा काव्य है। नयनों में आसूओं की फसल का चांदनी के मोगरे के फूल पर सोये होने का दृश्य अद्भुत है। उनकी लेखनी को मैं प्रणाम करता हूँ।

    समझ नहीं पा रहा शार्दुला जी के किस शेर का जिक्र करूँ ? हर शेर अपने में कहानियां समेटे हुए है। " सो नहीं पाती कपिल वस्तु ---" जैसा शेर उनके जैसा कुशल और संवेदनशील व्यक्ति ही लिख सकता है। "जलती हुई भीलनी --" वाला शेर अंदर तक व्यथित कर गया। और फिर गिरह वाला शेर उफ्फ्फ जिसकी ख़ूबसूरती लफ़्ज़ों में बयां नहीं की जा सकती। शार्दुला जी की सोच किस ऊँचाई तक जा सकती है देख कर हैरत में हूँ। राधिका ओ राधिका ओ राधिका वाला शेर जब से पढ़ा है साथ ही नहीं छोड़ रहा। कमाल की ग़ज़ल कही है आपने शार्दुला जी मेरी ढेरों दाद कबूलें।

    पूजा जी की पहली बार इस ब्लॉग की तरही में ग़ज़ल पढ़ कर अनुमान करना आसान हो जाता है कि वो एक सिद्ध हस्त शायरा हैं। मतले से मक्ते तक उन्होंने पूरी ग़ज़ल में अपनी पकड़ बनाये रखी है और एक से बढ़ कर एक यादगार शेर कहें हैं। "तीरगी बांह पर ---" जैसा शेर कोई उस्ताद ही कह सकता है। सुभान अल्लाह।" ओस है पत्तों पे --" लाजवाब शेर बन पड़ा है। शेर जो और आकृष्ट करता है वो है " में आँखों में थे ---" अहह क्या खूबसूरत बात कह दी है वाह। पूजा जी से दुआएं निकल रही हैं। उम्मीद है आने वाली तरहियों में भी आपकी ग़ज़लें मिलेंगी।

    डिम्पल जी की ग़ज़ल युवा सोच से लबरेज़ है। उन्होंने पहले भी अपनी ग़ज़ल से दिल मोह लिया था और इस बार भी वो उसी तेवर नज़र आई हैं । मतले ही में मिसरा ऐ तरही पर कमाल की गिरह बाँधी है। उन्होंने कुछ नए काफिये भी बांधे हैं जो पहले नज़र नहीं आये। ये उनकी सोच की उड़ान का सबूत है। डिम्पल जी से आने वाले कल को बहुत आशाएं हैं। उनका "आँख मल्टी सी सुबह --" साथ लिए जा रहा हूँ। जियो डिम्पल जियो।

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    1. आदरणीय नीरज जी
      आपकी मोगरे की जमीन से देखिये कैसी कैसी ग़ज़लें लहलहा रही है।:)
      आपकी हौंसला अफ़ज़ाई का तहेदिल से शुक्रिया।
      सीख रही हूँ। और आपके आशीर्वाद की दरकार है
      हमेशा रहेगी।
      एक बार फिर बहुत शुक्रिया।
      सादर
      पूजा

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    2. आपका ढेरों शुक्रिया आपका नीरज भाई साहब !

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    3. आदरणीय नीरज जी, जितनी आपकी ग़ज़ल मीठी होती है उतनी ही आपकी प्रशंसा! आपने ग़ज़ल पढ़ी, और इतनी उदारतापूर्वक उसपे लिखा!
      आपका हार्दिक धन्यवाद! आभारी हूँ। अब आपकी ग़ज़ल का इंतज़ार है!
      सादर शार्दुला

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  20. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....

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    1. आपका हार्दिक धन्यवाद!
      सादर शार्दुला

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  21. किस तरह तारीफ़ गज़लों की करूँ सोचू यही
    शब्द की सामर्थ्य मेरी रह गई सोई हुई

    शार्दुला, आशीष तुमने बिम्ब जो ढूँढ़े नये
    कुछ पुराणों की कथायें फ़िर जगीं सोई हुई

    क्या कहूँ लावण्यदी के गीत को मैं अब भला
    हो रही है बन्द मेरी बोलती सोई हुई

    बेबसी पूजा की हो या आरज़ू डिम्पल की हो
    मंच पर रहने न पाई कोई भी सोई हुई

    भाई पंकज, मेहरबानी खूब ये मिसरा चुना
    जाग उट्ठी हर किसी की लेखनी सोई हुई

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    1. शुक्रिया खंडेलवाल साहब
      सादर
      पूजा

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    2. कविराज भाई श्री राकेश खण्डेलवाल जी
      स स्नेह सादर नमस्कार
      आगे यह लिखना है कि ,

      ' विश्व जब नींद में बेसुध रहे
      जो जागता है वही, कवि है !
      अब लेखनी आपकी मुखर हो
      रचें नव - छंद , कविता गीत
      यही हमारी शुभकामनाएं
      संग चांद नैया के मधु गीत !'

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    3. गुरूजी आपका आशीर्वाद मिला और क्या चाहिये! आपकी टिप्पणी से परवीन शाकिर जी का एक शेर याद आ गया:
      इस बाग में एक फूल खिला मेरे लिऐ भी
      ख़ुशबू की कहानी में मेरा नाम तो आया
      आपका हार्दिक धन्यवाद! आभारी हूँ। अब आपके गीत का इंतज़ार है!
      सादर शार्दुला

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  22. आदरणीय पंकज सुबीर जी,
    नमस्कार
    आज 19 जनवरी के आयोजन पर निमंत्रण के लिये धन्यवाद.
    निजी कारणो से सफर करना संभव नही हो सका.
    आज सम्मानित किये जाने वाले सभी साहित्य कारो को हार्दिक बघाई.
    आज लोकार्पित होने वाली सभी पुस्तकों के लेखकों एवं प्रकाशन गृह को भी बधाई एवं शुभ कामनाएँ.
    - मंसूर अली हाशमी, रतलाम

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  23. राधिका और श्याम शार्दूला जी की रचनाओं में अक्सर आते हैं और जब आते हैं तो सहज ही मीरा की याद दिला देते हैं। शे’र दर शे’र इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए शार्दूला जी को बहुत बहुत बधाई।

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    1. धर्मेंद्र जी
      आपका अनुमोदन मिला, बहुत अच्छा लगा, प्रेरणा मिली! आप के साईन्स के कलेवर में लिपटे हुए शेर बहुत याद आते हैं।
      आपका हार्दिक धन्यवाद! आभारी हूँ।
      सादर शार्दुला

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  24. "तीरगी की बाँह पर थी रोशनी सोई हुई" बहुत खूबसूरत शे’र है पूजा जी का। वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही ख़ूबसूरत अश’आर से सजी हुई है और पूरी ग़ज़ल के लिए पूजा जी को बधाई। लेकिन इस शे’र किए लिए अलग से ढेर सारी बधाई।

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  25. डिम्पल जी के अश’आर मुशायरे में चार चाँद लगा रहे हैं। "...भूखी जिन्दगी सोई हुई" बहुत खूबसूरत शे’र है। बहुत बहुत बधाई डिम्पल जी को

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  26. मैं आदरणीय पूजा भाटिया जी को कई मर्तबा लफ्ज़ पर पढ़ चुका हूँ. आप हमेशा ही बेहतरीन लिखती आई हैं. इस तरही में भी आपकी उपस्थिति बेहद उम्दा रही है. तीरगी की बांह में रौशनी के सोने का प्रतिक खास कर पसंद आया मुझे. आपको शत शत बधाइयाँ. बाकी के तीनों रचनाकारों को मैं पहली बार ही पढ़ रहा हूँ और मुझे इसका प्रष्ट आभास हो रहा है की आप लोगों को न पढ़ पाना मेरा व्यक्तिगत दुर्भाग्य है. आदरणीय लावण्या जी का गीत ह्रदय ताल को छू गया. आपको सशत शत नमन एवं बधाईयाँ. आदरणीय शार्दूला नोगाजा जी ने जिस जमीन पर शेर कहे हैं वह एक गंभीर एवं अनुत्तरित प्रश्न्की और इशारा करते मालूम पड़ते हैं. चाहे कपिलवस्तु की नारियों वाला शेर हो, सोती हुई भीलनी वाला शेर हो, या अंतिम शेर जिसमे सोती हुई राधिका पर शेर कहा गया है. ये सभी अशआर उन ऐतिहासिक व् पौराणिक सन्दर्भों की और इंगित करते हैं जिन्हें केवल एक कोण से विश्लेषण कर आदर्श मन गया है. आपको भी शत शत बधाईयाँ. आदरणीय डिम्पल सिरोही जी के अशआर भी काफी पसंद आये मुझे. भूखी जिंदगी वाला शेर तो इतना अच्छा बना है की बार बार पढने को मन कर रहा है. आपको भी ह्रदय ताल से बधाइयाँ...

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    1. ढेरों शुक्रिया आपका Nistej ji ! - ( ya kahna chahiye - Bhai Shri Tejaswi ji )

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    2. निस्तेज जी, आपने ग़ज़ल पढ़ी, और इतनी उदारतापूर्वक उसपे लिखा!
      आपका हार्दिक धन्यवाद! आभारी हूँ।
      सादर शार्दुला

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    3. बहुत शुक्रिया निस्तेज जी
      सादर
      पूजा

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  27. आदरणीया लावण्या जी ने विरह का जो चित्र खींचा है वो सचमुच दुर्लभ है। इस छोटा सा गीत एक अंतरे का होते हुए भी अपने में सम्पूर्ण है। उन्हें बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर गीत के लिए।

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  28. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....
    गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ।

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  29. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....
    गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ।

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  30. इन अत्यंत प्रबुद्ध प्रस्तुतियों पर अपनी उपस्थिति न बना पाने का दुःख है. मैं सोशल नेट जगत में इधर कई कारणों से बहुत सक्रिय नहीं रह पा रहा हूँ. इसका खेद अवश्य है लेकिन कारण भी अपरिहार्य हैं.

    किस शायरा की बातें करूँ ? किस ’कही’ को स्वरबद्ध करूँ. एक-एक बन्द पढ़ता गया हूँ और, अब, मुग्धावस्था में हूँ.
    आदरणीया लावण्याजी का गीत विभोर कर गया. आदरणीया पूजाजी जो पढ़ता रहा हूँ. उसी सम्मान के साथ यहाँ भी पढ़ गया. डिम्पलजी के शेर बार-बार सामने आ रहे हैं.
    लेकिन आदरणीया शार्दुलाजी की ग़ज़ल के शेर.. चौंका-चौंका दे रहे हैं. ओह ! एक बार फिर से आपकी कही हुई सुन लूँ.

    सादर

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    1. आदरणीय सौरभ जी,
      आपका अतिशय धन्यवाद! लिखना सफल हुआ!
      सादर शार्दुला

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