बुधवार, 7 जनवरी 2015

बहुत अच्‍छी ग़ज़लें इस बार तरही में आईं हैं। ते आइये आज इस्‍मत ज़ैदी जी और सौरभ पाण्‍डेय जी के साथ चलते हैं ग़ज़ल गांव में ।

ग़ज़ल में नाज़ुकी का बड़ी महत्‍त्‍व है। उस्‍ताद लोग कहते हैं कि ज़रा भी यदि शब्‍द कठोर उपयोग में ले आये तो ग़ज़ल चटख जाती है, टूट जाती है। इसलिये ग़ज़ल बुनते समय शब्‍दों को पहले उसी प्रकार से परखना चाहिये जिस प्रकार कोई बहुत अच्‍छा रसोइया खाना पकाने से पहले मसालों को अच्‍छी तरह से जांचता है। कोई मूर्तिकार पत्‍थर की जांच करता है । कहा जाता है कि ग़ज़ल में जो शब्‍द आएं उनका वज़न फूलों से, पंखों से भी हलका हो। इतना कि वे ग़ज़ल के प्रवाह में कहीं भी बाधा न बनें। हर काव्‍य के अपने शब्‍द होते हैं। जैसे भक्तिकाल के काव्‍य के अपने शब्‍द थे और छायावाद के अपने। यदि आप भक्ति काल के शब्‍दों को छायावाद में डालेंगे तो काव्‍य ढह जाएगा। इसीलिये पहले उस्‍ताद लोग स्‍पष्‍ट कहते थे कि नहीं भाई ये ग़ज़ल का शब्‍द नहीं है कुछ और लाओ इसके स्‍थान पर । अब न वे उस्‍ताद रहे न उनकी स्‍पष्‍टवादिता रही । याद आते हैं वे सब। जिनके मुंह से एक वाह सुनने के लिये मेरे जैसे शागिर्द तरसते रहते थे, शेर दर शेर, ग़ज़ल दर ग़ज़ल।

Mogara - Jasmine Four

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

इस बार की ग़ज़ल बहुत नफ़ासत मांग रही है क्‍योंकि मिसरा ही ऐसा है। और जब बात नफासत के साथ सलीक़े के साथ बात करने की हो तो इस्‍मत ज़ैदी जी तथा सौरभ पाण्‍डेय जी का नाम तो ज़ेहन में आता ही है। वैसे भी आने वाली 19 जनवरी को इस्‍मत ज़ैदी जी को शिवना सम्‍मान प्रदान किया जाएगा। तो आइये आज इन दोनों रचनाकारों की गज़लें सुनते हैं।

ismat zaidi didi 2

'शिफ़ा’ कजगाँवी

ज़ुल्म की ये इन्तहा और मुंसिफ़ी सोई हुई
गर्म है बाज़ार ए ग़म, लेकिन ख़ुशी सोई हुई

रेशमी बिस्तर प जागी बादशाहत रात भर
पत्थरों के फ़र्श पर है मुफ़लिसी सोई हुई

ख़ुश्बुओं की ओढ़ कर चादर, बिछा कर रौशनी
"मोगरे के फूल पर है चाँदनी सोई हुई "

परचम ए इंसानियत ले कर जो गुज़रे चंद लोग
जाग उट्ठी यक ब यक फिर हर गली सोई हुई

इक सुकूँ चेहरे प नन्हे हाथ माँ के गिर्द हैं
मामता की गोद में है ज़िंदगी सोई हुई

उम्र गुज़री है  तलाश ए रौशनी में आज तक
ऐ 'शिफ़ा’ वो अपने अँदर ही मिली  सोई हुई

मतला ही उस एक कड़वे सत्‍य की ओर इशारा कर रहा है जिससे इस समय पूरी मानवता दो चार हो रही है। ख़ूब कहा। लेकिन गिरह का शेर और उसकी गिरह..... कमाल कमाल। क्‍या विम्‍ब बांधे हैं मिसरे में । खुश्‍बुओं की चादर ओढ़ कर रौशनी को बिछा कर सोना। क्‍या बात है। इक सुकूं चेहरे पे नन्‍नहे हाथ में क्‍या चित्र बनाया है । यदि आंखें बंद कर इस शेर को सुनो तो मानो सब कुछ दिखाई ही देने लगे । उस्‍ताद कहते थे कि जिस शेर का पूरा चित्र सुनने वाले के दिमाग़ में बन जाए उससे अच्‍छा कोई शेर नहीं होता। और फिर मकता, क्‍या कमाल है । सूफियों के तसव्‍वुर को छूता हुआ गुज़रता है। हम सबके अंदर सोई हुई रौशनी का शेर। परचम ए इंसानियत में गली को प्रतीक के रूप में जिस प्रकार से उपयोग किया गया है वाह । कमाल कमाल, वाह वाह वाह।

Saurabh

सौरभ पाण्‍डेय

दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई 
गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई

बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक
काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई

चाँद अलसाया निहारे जा रहा था प्यार से
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोयी हुई

खेलता था मुक्त.. उच्छृंखल प्रवाही धार से
लौट आया वो लिये क्यों हर नदी सोयी हुई

बोलिये किसको सुनायें जागरण के मायने
पत्थरों के देस में है हर गली सोयी हुई

अब नहीं छिड़ता महाभारत कुटिल की चाल पर
अब लिये पासे स्वयं है द्रौपदी सोयी हुई

जा रहा है रोज सूरज पार सरयू के सदा
स्वर्णमृग की सोनहिरनी हो अभी सोयी हुई

सौरभ जी की ग़ज़लों का मुझे इसलिये भी इंतज़ार रहता है क्‍योंकि उनकी ग़जलों में पौराणिक आख्‍यानों से संदर्भित कुछ न कुछ ज़रूर मिलता है। और वो मेरा भी प्रिय विषय है । मेरी सर्वकालिक प्रिय पात्र द्रोपदी पर इस बार जो शेर रचा है वो बहुत गूढ़ार्थ लिये हुए है। अब लिये पासे स्‍वयं है द्रोपदी सोई हुई। वाह वाह। और फिर बात गिरह के शेर की। वाह कमाल की गिरह बांधी है। मिसरा उला ऐसा है मानो इस मिसरा सानी हेतु केवल और केवल यही बना हो। क्‍या कमाल का जोड़ है कि सिलाई दिख तक नहीं रही। कमाल वाह। और मेरे एक और प्रिय विषय पर कहा गया शेर बांधती आगोश में है धुंध की भीनी महक में सोयी हुई भोर का इशारा जिस ओर है वो इशारा जिस सलीक़े से किया गया है इस पर सब कुछ निसार। वाह वाह वाह। क्‍या बात है ।

SHIVNA SAMMAN2

तो सुनते रहिये दोनों ग़ज़लों को और दाद देते रहिये आनंद लेते रहिये। आने वाली 19 जनवरी को इन चारा रचनाकारों का सम्‍मान सीहोर में होना है । आइये आपका स्‍वागत है। मिलते हैं अगले अंक में।

50 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारा मतला है सौरभ जी ,,और उतना ही ख़ूबसूरत गिरह का शेर भी ,,,,द्रौपदी वाला शेर भी बहुत उम्दा है,, कुल मिला कर एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल है
    ऐसी तारीफ़ के लिये बहुत बहुत शुक्रिया पंकज ,, ख़ूब ख़ुश रहो

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  2. दोनों ही ग़ज़लें कमाल की हैं.
    इस्मत जी की ग़ज़ल एक से बढ़ कर एक अशआर से सजी हुई है.. गजब का मतला कहा है और “रेशमी बिस्तरपे जागी बादशाहत..”, “परचम ए इंसानियत को “, “इक सुकू चेहरे पे “, “उम्र गुजरी है..” बहुत ऊंचे पाए के शेर हैं.. और गिरह, वाह कमाल की गिरह लगाईं है. मन खुश हो गया.. इस्मत जी को हार्दिक बधाई और दाद.

    सौरभ जी ने द्रौपदी का काफिया इस्तमाल कर के चौंका दिया. क्या शेर कहा है... बहुत खूबसूरत मतला और गिरह तो ऐसी की जैसे इसी उला के लिए सानी बना हो. “बांधती आगोश में है..”, “खेलता था मुक्त..”, “बोलिए किसको सुनाएँ..”, “जा रहा है रोज़ सूरज..” बेहद उम्दा शेर हुए हैं. दिली दाद और मुबारक बाद.

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  3. जैदी जी का मतला बेहतरीन लगा व सौरभ जी का गिरह का शेर बा-कमाल नजर आ रहा है।

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  4. इस्मत जी ने खूबसूरत शब्दों से एक खूबसूरत ग़ज़ल बुनी है। बहुत बहुत बधाई उन्हें इस नाज़ुक ग़ज़ल के लिए और शिवना सम्मान के लिए।

    सौरभ जी पुराने को नये के साथ मिलाकर एक अलग तरह का विशिष्ट प्रभाव पैदा करते हैं। शायद यही उनकी पहचान है। यही उनकी शैली है। वैसे पुराने को नये के साथ मिलाना इतना आसान नहीं होता मगर सौरभ जी अक्सर अपने इस प्रयास में सफल हो जाते हैं। इस ग़ज़ल के लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  5. "गर्म है बाज़ार ए गम लेकिन ख़ुशी सोई हुई " वाह इस्मत जी क्या खूब कहा आपने । बात कहने का सलीका बेहद प्रभावी है और यहीं आपके ग़ज़ल की खूबसूरती है ।एक से एक बढ़िया शेर कह आपने तरही मुशायरे में चार चाँद लगा दिया ।

    कितने बेहतरीन ढंग से आपने चाँदनी का मानवीयकरण किया "खुशबुओं की ओढ़ कर चादर बिछा कर रोशनी " । कमाल है । आप जैसे श्रेष्ठ शायर से हम युवा रचनाकारों को हौसला मिलता है । शानदार ग़ज़ल के लिए बधाई , ढेर सारी बधाई ।


    सौरभ जी , जैसा की पंकज जी ने कहा है , आप पौराणिक तथ्यों को बेहद प्रभावी तरीके से शेर में कह जाते है , यह आपके लेखन का कमाल है । सरल और प्रभावी शेर पाठक ,श्रोता का मन मोह लेता है , जैसा मै मोहित हूँ ।


    "बोलिए किसको सुनाये जागरण के मायने " आज एक समाज की कड़वाहट पर हकीकत बयां करता है । बोलता हुआ शेर है ।

    "अब लिए पैसे स्वयं है द्रोपदी सोई हुई " वाला शेर तो सीधे दिल में जगह बना रहा है । बहुत जोरदार प्रस्तुति ।ऐसी ग़ज़ल के पढ़वाने लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद और हार्दिक बधाई ।

    सब कुछ पंकज के मेहनत और लगन का प्रतिफल है जो इतना शानदार मुशायरा चल रहा है । आपको बहुत बहुत धन्यवाद और बधाई । हम सभी को आपका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहें । धन्यवाद |

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  6. वाह वाह कमाल की गजलें हुई है. इस्मत जी ने बहुत ही नाजुक सी गजल कही जैसे कोई माँ अपने बच्चे को अपने हाथों से बिस्तर पर रख देती ही . सौरभ जी की गजल में सदा की भाति भावों की गहनता तो है ही प्रस्तुती भी बहुत उम्दा ... हार्दिक बधाइयाँ दोनों को ..

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  7. आजका दिन मेरे लिए शुभ है.
    आदरणीया आपा के साथ अपनी ग़ज़ल को पंगत में बैठे देखना सुखकर है. ऐसे विशेष भाव के लिए हम आदरणीय पंकज भाईजी के प्रति नत हैं. जिनके मुँह से एक वाह सुनने के लिए मेरे जैसे शागिर्द तरसते रहते थे, शेर दर शेर, ग़ज़ल दर ग़ज़ल.. .. भइया, आपने तो हमारी भावनाओं को शब्द दिये हैं. आपसे आज इतना कुछ कर्णप्रिय सुनना अभिभूत कर गया.
    हार्दिक धन्यवाद, भाईजी.

    आदरणीया इस्मत आपा की ग़ज़ल के बारे में इतने तफ़्सील और ऐसे उस्तादाना ढंग से पंकजभाईजी ने कह दिया है कि आगे हर कहे पर बस अनुमोदन में हाथ उठाना रह जाता है.
    मतले के माध्यम से आजका यथार्थ तो शाब्दिक हो ही रहा है, एक छटपटाहट भी साझा हो रही है, कि, काश वो सोयी हुई खुशी जग जाये, अभी की अभी !

    मतले के बाद का शेर आजके समाज की दिखती हुई सहज सच्चाई है. लेकिन वस्तुतः काबिले तारीफ़ है, और जिसको लेकर पंकजभाई ने झूम कर बातें कही हैं, वो है ग़िरह का शेर. रौशनी बिछा कर खुश्बुओं की चादर ओढ़ना.. वाह-वाह ! मिसरा सानी की मुलामियत के अनुरूप सही वज़न ! यानि, तुर्की-ब-तुर्की ! मुग्धकारी है यह शेर.

    इधर जाग उट्ठी यक-ब-यक फिर हर गली सोयी हुई.. . तो इधर, .. पत्थरों के देस में है हर गली सोयी हुई ! .... कमाल है !! .. :-))

    लेकिन वाकई के कमाल हैं इस ग़ज़ल के आखिरी दो शेर.. कहन में जो गहनता है वह मात्र अनुभव कर लगातार अभिभूत होने के लिए है.

    ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाइयाँ, आदरणीया, एवं नये साल की अनेकानेक शुभकामनाएँ.

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  8. वाह! वाह! मज़ा आ गया सारे अशआर पढ़ कर.
    बहुत ही उम्दा! दोनों को सलाम!
    इस्मत जी को बधाई सम्मान के लिए भी!

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  9. दो बेहतरीन ग़ज़लें आज इस दिन का हासिल हैं।

    इस्मत दी क्या खूब मतला कहा है। ये शेर 'रेशमी बिस्तर पे जागी …" बिम्ब के जरिये बहुत कुछ कह रहा है और गिरह भी उम्दा लगी है।
    "परचम-ए-इंसानियत … " और मक़्ता भी लाजवाब हुए हैं। इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए दिली दाद और मुबारकबाद।

    सौरभ जी की ग़ज़लें शब्दों के अद्भुत संयोजन से भरपूर रहती हैं, और ये ग़ज़ल उसी की एक और मिसाल है।
    मतला सलीके से बुना है, गिरह भी बहुत खूबसूरत लगाई है।
    और इस शेर के तो क्या कहने "बोलिए किसको सुनायें …" ज़िंदाबाद शेर।
    खूबसूरत ख़यालों और शेरों से झिलमिलाती इस ग़ज़ल के लिए आप को बधाइयाँ।

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  10. खुशबुओं की ओढ़ कर चादर बिछा कर रौशनी --- अहा हा क्या मिसरा है - वाह वाह वाह !!!! इस्मत बहना ये करिश्मा तुम ही कर सकती हो -- तरही के मिसरे में जान डाल दी है -- जियो जियो। इस्मत जी की पूरी शक्शियत का अंदाज़ा आप उनकी नाजुक नफासत से भरी ग़ज़लें पढ़ कर लगा सकते हैं। मतले से मक्ते तक पूरी ग़ज़ल में बस इस्मत ही इस्मत है। हर शेर एक से बढ़ कर एक है। ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाइयाँ और मासूमियत समेटे। जुल्म और मुंसिफ़ी की बात हो या बादशाहत और मुफलिसी की इस्मत अपनी छाप छोड़ जाती हैं। मकता तो पूरा सूफियाना रंग लिए है। इस्मत के लिए कहना शुरू करो तो रुकने का मन नहीं करता इसलिए नहीं कि वो मेरी छोटी बहन है बल्कि इसलिए की वो एक बहुत बेहतरीन शख्स हैं। मेरे हाथ हमेशा उनके लिए दुआ में उठे रहते हैं।

    सौरभ भाई के बारे में क्या कहूँ ? शब्द कोष जैसे उनकी कलम में बंद हो। भाव ,भाषा और व्याकरण पर उन जैसी पकड़ मैंने बहुत काम लोगों में देखी है। चुंबकीय व्यक्तित्व के स्वामी सौरभ की रचनाएँ भी चुंबकीय हैं। " चाँद के अलसाया हो कर निहारे जाने का प्रयोग अद्भुत है। धुंध की भीनी महक , पत्थरों का देश और स्वर्ण मृग की सोन हिरणी जैसे बिम्ब उनकी काव्य प्रतिभा को प्रदर्शित करते हैं। द्रौपदी वाले शेर पर मेरा उन्हें शत शत नमन।

    बहुत विस्तार से लिखने का मन था लेकिन कुछ ऐसी व्यस्ताएं आन पड़ी हैं कि कम लिखे को ही खूब मानने की प्रार्थना करनी पड़ रही है।

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  11. पंकज जी क्या मेरे द्वारा गयी टिप्पणी वंहा तक पहुंची या मुझे फिर से भेजनी होगी . मैं यंहा नहीं देख प् रही हूँ .

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  12. आदरणीया, आपसे मिला अनुमोदन उत्साहित करता है.
    हार्दिक धन्यवाद

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  13. राजीव भाईजी, आपसे मिली दाद वस्तुतः मुग्धकारी है. आपको ग़ज़ल पसंद आयी, यह मेरे लिए अत्यंत तोषदायी है.
    हार्दिक धन्यवाद

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  14. संजय दानी साहब, एक अरसे बाद मुझे आपसे किसी रचना पर दाद मिली है. हार्दिक धन्यवाद

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  15. धर्मेन्द्रजी, आपकी प्रशंसा सदा से विशिष्ट रही है. सामान्य कथ्य को भी विशिष्ट ढंग से साझा करना आपकी शैली है. :-)))
    बहुत-बहुत धन्यवाद भाईजी.

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  16. विनोद भाई, आपको प्रस्तुति रुचिकर लगी, अर्थात, कि मेरा प्रयास सदिश है. आपसे मिले मुखर अनुमोदन केलिए हृदय तल से धन्यवाद.

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  17. नीरज नीर भाई, आपको इस मंच पर देख कर भला लगा. आपसे मिली प्रशंसा सदा उत्साहित करती है. हार्दिक धन्यवाद

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  18. आदरणीया शार्दुलाजी, आपको प्रयास रुचिकर लगा, यह मेरे लिए भी संतोष की बात है,
    हार्दिक धन्यवाद

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  19. भाई अंकित सफ़र, आपसे मिली दाद मेरे लिए सदा से सम्मान की बात रही है.
    बहुत-बहुत धन्यवाद

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  20. आदरणीय नीरज भाईजी, आपने जिस उदारता से इस प्रस्तुति की प्रशंसा की है वह आपके व्यक्तित्व का अनुकरणीय पक्ष है. आपकी सदाशयता तथा गुणग्राहकता का मैं सदा सम्मान करता हूँ. आपसे मिली दाद मेरे लिए थाती है, भाईजी.
    सादर धन्यवाद..

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  21. जुल्म की ये इंतहा और मुंसिफी सोई हुई ...... सच्चाई का कितना सही बयान ..परचम ए इंसानियत .....काश ऐसे परचम से सभी गलियां जाग जाये .... इक सुकूं चेहरे पे नन्हें हाथ माँ के गिर्द है ............ नतमस्तक हूँ इशमत जी को इस शेर के लिए, इस कमाल के शेर को सभी पसंद करेंगें पर माँ होकर इसे महसूस करना अलग अहसास है .....
    सौरभ जी के लिए नीरज सर ने बहुत सही लिखा है कि " शब्द कोष लगता है उनकी कलम में बंद हो " उनकी टिप्पणी पढ़ना भी उतना ही सुखकर होता है जितना उनकी रचनायें ..समझ नहीं आता पहले उनकी रचना के लिए टिप्पणी करें या टिप्पणी के लिए .
    बांधती आगोश में .......नाजुक शेर बहुत सलीके से कहा गया है ...खेलता था मुक्त ....... वाह कमाल का शेर ..बोलिये किसको सुनाए .. में जागरण के मायने ना समझा पाने की बेबसी साफ़ झलक रही है ...... अब लिए पासे स्वयं है द्रोपदी सोई हुई ......कमाल का शेर ....
    इशमत जी और सौरभ जी को इन खूबसूरत गजलों के लिए बहुत बहुत ..बधाई ..कितनी खूबसूरती से दोनों गजलों में काफिया निभाया गया है और कितना अच्छा शब्द चयन है,बिम्ब हैं ,ये दोनों बाकमाल गजले सिर्फ पढ़ कर लुत्फ़ उठाने के लिए ही नहीं गज़ल कहना सीखने की कोशिश कर रहे मुझ से विद्दार्थी के लिए भी बहुत उपयोगी व ज्ञानवर्धक हैं.

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    1. पारुलजी, आपसे मुक्तकंठ प्रशंसा पा कर मन खुश हो गया है. आपको प्रस्तुति रुचिकर लगी इसके लिए हार्दिक धन्यवाद.
      हमसभी समवेत सीख ही रहे हैं.
      शुभ-शुभ

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  22. सबसे पहले तो बहन इस्मत ज़ैदी जी को शिवना सम्मान की बधाई!! अब बात करुँगी ग़ज़ल की।
    रेशमी बिस्तर प जाएगी बादशाहत रात भर
    और
    खुशबुओं की ओढ़कर चादर, बिछा कर रौशनी
    बहन इस्मत जी ने बढ़िया शे'र कहे हैं।
    और सौरभ भाई ने भी कमाल कर दिया-
    खेलता था मुक्त.…उच्छृंखल
    और
    अब लिए है पासे स्वयं है द्रौपदी
    उम्दा शे'र कहे हैं।
    दोनों ग़ज़लों के वाह क्या बात है.....

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    1. आदरणीया सुधाजी, आपकी गुणग्राहकता को नमन.

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  23. शेर जब कहती हैं इस्मत, दिल कहे ये मरहबा
    क्या करे तारीफ़, रहती लेखनी सोई हुई

    गीत में महके है सौरभ, ये हमें मालूम था
    ये गज़ल कहती कि कब थी शायरी सोई हुई.

    विषेष धन्यवाफ़.

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    1. सादर आभार आदरणीय राजेश भाईजी. आप अवश्य गीतकारों के प्रेरणा-सोत हैं.

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  24. ग़ज़ल लेखन शैली क्या होती है, ये दोनों ग़ज़लों को पढ़ने पर हमें पता चलता है। मतले से लेकर मकते तक श्रोताओं को बाँधने की कला इन आदरणीय से सीखने को दिल चाहता है। वाह वाह वाह .....!! क्या ग़ज़लें हुई हैं ..!! कमाल के मतले, एक दूसरे से बढ़कर शानदार गिरह, सूफियाना सोच, किस - किस अशआर की तारीफ़ करें। वाह .... दोनों को सादर नमन

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    1. भाई दिनेश कुमारजी, ग़ज़ल को पसंद करने केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  25. इस्मत जी और सौरभ जी ने क्या खूब समां बाँधा है,कोई दो राय नहीं की सभी आपकी क़लम के पाश में बंधे और आपके कलाम के तहे दिल से मुरीद हुए जाते हैं।
    सुभानअल्लाह.....दिली दाद क़ुबूल करें।
    इतनी खूबसूरत ग़ज़लों को कहने का शुक्रिया
    सादर

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    1. आदरणीय पूजाजी, ग़ज़ल पसंद आयी, इसकेलिए हार्दिक धन्यवाद.

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  26. खुशबुओं की ओढ़ के चादर ...
    इस लाजवाब गिरह ने बांध के रख लिया ... कितनी नाजुकी और सादगी से अपनी बात को रखा है इस्मत जी ने ... हर शेर पे तालियाँ बजाने का मन करता है .... माँ की गोद का सकून जिसको मिलता है वो समझ सकता है इस शेर की अहमियत .... इस्मत जी का हर शेर सोचने को मजबूर करता है ... सादगी भरे शेरो को मेरा नमन ...

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  27. बांधती आगोश में है ... नाज़ुकी से बंधा शेर अपनी महक बिखेर रहा है ... और गिरह का शेर तो गज़ब ढा रहा है ... सौरभ जी का हर शेर सीधे दिल में उतर रहा है ... उनका शब्द भण्डार और पौराणिक जानकारी शेरों गो गहरे अर्थ दे जाती है ... द्रौपदी वाला शेर बहुत कुछ कहता है ...
    सौरभ जी की बधाई इस लाजवाब ग़ज़ल की ...

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    1. दिगम्बर भाई, आपके मुखर अनुमोदन केलिए हृदयतल से धन्यवाद.

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  28. रेशमी बिस्तर पे जागी बादशाहत रात भर
    पत्थरों के फर्श पर है मुफलिसी सोई हुई
    अगर तरही मुशायरे के पांच उम्दा शेर चुनने के लिए कहा जाए, तो मैं इस्मत साहिबा के इस एक शेर को बिना किसी संकोच के शामिल करना चाहूंगा। यह एक शेर नहीं अफसाना बयान कर दिया है। वैसे हर शेर यकीनन काबिले-दाद है, बहुत बहुत मुबारकबाद..
    और सौरभ पांडेय जी की गजल का हर शेर खुद दाद ले रहा है
    बोलिए किसको सुनाएं जागरण के मायने
    पत्थरों के देस में है हर गली सोई हुई
    क्या खूब कहा है, वाह बहुत बहुत बधाई

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    1. शाहिद भाईसाहब, आपसे मिली दाद मेरे लिए परम संतोष का कारण है.
      हार्दिक धन्यवाद

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  29. पंकज भाई ने बहुत खूबसूरत बात कही कि ''ग़ज़ल में नाज़ुकी का बड़ी महत्‍त्‍व है। उस्‍ताद लोग कहते हैं कि ज़रा भी यदि शब्‍द कठोर उपयोग में ले आये तो ग़ज़ल चटख जाती है, टूट जाती है। इसलिये ग़ज़ल बुनते समय शब्‍दों को पहले उसी प्रकार से परखना चाहिये जिस प्रकार कोई बहुत अच्‍छा रसोइया खाना पकाने से पहले मसालों को अच्‍छी तरह से जांचता है।''
    इस बार ग़ज़ल कहते समय इस बात का अहसास विशेष रूप से हुआ। एक सरल बह्र को रदीफ़ और काफि़या ने मिलकर दायरा बहुत सीमित कर दिया कहने का लेकिन मंच की प्रतिबद्धता ने इस दायरे को दायरा नहीं रहने दिया। अब तक अनूठे शब्दों का प्रयोग इस खूबसूरती से किया गया है कि प्रवाह कहीं भी अवरुद्ध होता नहीं लगा।
    ग़ज़ल ने समय के साथ अपना शब्‍दकोष बढ़ाया है और स्‍पष्‍ट है कि ऐसा करने में उन प्रयोगधर्मियों का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा जिन्‍होंने नये शब्दों के प्रयोग का साहस किया और उन्‍हें इस खूबसूरती से ग़ज़ल में बॉंधा कि ग़ज़ल ने हमेशा के लिये उन्‍हें अपना लिया।
    प्रस्‍तुत ग़ज़लों में किये गये ऐसे अनूठे प्रयोगों के लिये इस्‍मत आपा और सौरभ के लिये कुछ कहना कठिन हो रहा है। हर शेर की खूबसूरती पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। नये-नये शब्दों को प्रवाह सुगम रखते हुए प्रयोग में लाना अद्भुत दृश्‍य उपस्थित कर रहा है।

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    1. आदरणीय, आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया आश्वस्त करती है कि आप सभी के सान्निध्य में प्रारम्भ हुआ रचनाकार्य सदिश है. प्रयोगधर्मिता रचनाकार्य का अन्योन्याश्रय पहलू है. इस पहलू को हर रचनाकार संतुष्ट करता है या करना चाहता है. लेकिन इस प्रयोग की आवृति और दशा क्या हो इसका निर्णय सतत गहन अभ्यास और आवश्यक मार्गदर्शन से ही संभव है. अन्यथा कोई अनगढ़ किन्तु हठी प्रयोग किसी विधा के लिए चिन्ता का ही विषय हुआ करता है. परम्परा निर्वहन और विधाजन्य प्रयोग के मणिकांचन संयोग ही किसी रचना का स्तर ऊँचा उठता है.
      आपके सान्निध्य और मार्गदर्शन की सदा से अपेक्षा रही है. आगे भी अनवरत रहेगी.
      सादर

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  30. सबसे पहले तो शिवना सम्मान के लिए आदरणीय इस्मत आपा को हार्दिक बधाई।
    उनका ख़ूबसूरत और ख़ूबसीरत कलाम इस बात का प्रमाण है की वो इस सम्मान की मुस्तहक़ हैं। मतले से मक़्ते तक ज़बान ज़द हो जाने वाली इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए भी उन्हें बधाई।
    भाई सौरभ पाण्डेय जी की ग़ज़ल के दो शेरो में पौराणिक सन्दर्भों का सुन्दर प्रयोग वर्तमान के विद्रूप को प्रकट करने के लिए हुआ है।बाक़ी शेर भी कम सुन्दर नहीं है।यह टिप्पणी नही है मुझसे पहले की गयी विद्वतापूर्ण टिप्पणियों का हार्दिक अनुमोदन है । बधाई।

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    1. भाई द्विजेन्द्र द्विजजी,
      प्रस्तुति को आपके अनुमोदन ने जो मान दिया है उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.
      शुभ-शुभ

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  31. २ जनवरी से मुसलसल सफर में हूँ मगर तरही मशायरे का लुत्फ भी बराबर ले रहा हूँ. शाहिद मिर्ज़ा जी की 'माँ वंदना' से शुरु सफर में दिगम्बर नासवा जी की अर्थपूर्ण रचना से महज़ूज़ हुआ.
    अंकित जी का यह शेर भी दिल पर रक़म (अंकित) हुवा :

    कोई आहट से खंडर की नींद जब है टूटती  
    यक-ब-यक है जाग उठती इक सदी सोई हुई

    इस्मत ज़ैदी जी का भी हर शेर दाद तलब है
    "उनके हर इक शेर में है नाज़ुकी सोई हुई"

    सौरभ जी का 'कल' को 'आज' से... 'द्रोपदी' के माध्यम से जोड़ना अनोखा प्रयोग है.
    एसी द्रोपदी को दाद दे, तरस खाये कि उस पर शर्मसार हो !
    "अब है 'बिग बॉसो' के घर औ' द्रोपदी हर एक की
    कौरवों और पाण्डवों के मध्य ही सोई हुई. "

    .... इंतेज़ार और अभी, और अभी, और अभी...

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    1. ऐसी द्रौपदी को दाद दें, तरस खायें, कि उस पर शर्मसार हों.. .

      मो. हाशमी साहब, आपने इस शेर से निर्गत हो रही झुंझलाहट को शाब्दिक किया है. यह शेर सुधीजनों तक पहुँच पाया यह मेरे लिए भी तोषदायी है. आपको प्रयास काबिलेतारीफ़ लगा इसके लिए मैं आपका हृदयतल से आभार.
      सादर

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  32. आप सब की तह ए दिल से शुक्रगुज़ार हूँ बहुत मन था कि आप सब को अलग अलग शुक्रिया अदा करूँ लेकिन आजकल कुछ ऐसी मसरूफ़ियात हैं कि मन मारना पड़ रहा है ,, उम्मीद है आप लोग मेरी इस कोताही को मुआफ़ फ़रमाएंगे

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  33. इस्मत जी का रेशमी बिस्तर वाले शेर का कहन क्या खूब है! गिरह का शेर भी बहुत सुंदर! परचमे इन्सानियत वाले शेर के सत्य पे कुर्बान!
    गोद में बच्चे का बिम्ब एक चित्र खींच रहा है!
    भीतरी आभ की बात भी बड़े सलीके से कही हुई! वाह वाह!

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  34. सौरभ जी को पढ़ना सदैव संस्कृति और इल्म के सुंदर संगम में डुबकी लगाने जैसा है। बहुत मज़बूत और ईन्टयूटिव गिरह का शेर!
    द्रौपदी वाला और पत्थरों के शहर वाला शेर बहुत सशक्त जैसा की सभी सुधी जन कह चुके हैं।
    मुझे प्रवाही धार वाला शेर बहुत मनभावन लगा क्योंकि ये पाठक को अर्थ अपने आप विकसित करने की स्वतंत्रता देता है। कई संदर्भों में लागू होने वाले बिम्ब को इतने सुंदर शब्द मिले!
    इसी प्रकार स्वर्ण मृग वाले शेर में मुझे प्रतीत हुई।
    सौरभ जी आपका आभार सोच को नया फ़लक देने के लिये!

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  35. आदरणीया शार्दुलाजी, आपके अनुमोदन तथा आपकी सदाशयता के लिए आभारी हूँ.
    सादर

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