मंगलवार, 13 जनवरी 2015

आइये आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं तीन शायरों श्री तिलक राज कपूर, श्री शाहिद मिर्जा शाहिद और अभिनव शुक्‍ल के साथ

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि इस बार के तरही मुशायरे में ग़ज़लें बहुत कोमल भावों के साथ आ रही हैं। हालांकि सोई हुई रदीफ के साथ बहुत सी बातें कही जा सकती हैं। मगर फिर भी चूंकि मिसरा कोमलकांत है इसलिये ग़ज़लें भी उसी अनुसार आ रही हैं। कोमलता काव्‍य का वो गुण है जो श्रोता के मन में रस की उत्‍पत्ति करता है। श्रोता के अंदर जो कुछ भी मृदुल है कोमल है उसे ये काव्‍य कोमलता अपने रेशम से जाकर छूती है जगाती है। और उसे अपने साथ एक दूसरे संसार में ले जाती है। जहां चारों तरफ मोर के पंख, गुलाब की पंखुरियां, सेमल की रूई के स्‍पर्श को आमंत्रण बिछा होता है। यह आमंत्रण बरबस खींच ले जाता है उस दुनिया में। और जब श्रोता वहां वाह वाह कर रहा होता है तो वो दिमाग से नहीं दिल से कर रहा होता है। उस तो पता ही नहीं होता है कि वो कब वाह वाह कर उठता है। वह सम्‍मोहन में होता है। यह सम्‍मोहन ही किसी कव‍ि की सबसे बड़ी सफलता होती है। यदि कोई कवि अपने शब्‍दों के, अपने भावों के, अपने विचारों के सम्‍मोहन से ( गायन के सम्‍मोहन से नहीं) श्रोता को मंत्रमुग्‍ध कर देता है तो उसकी कविता सफल और सुफल दोनों हो जाती है। जब वो अपनी कविता को बहुत अच्‍छे से गा कर मंत्रमुग्‍ध करता है तो यह समझना मुश्किल होता है कि श्रोता उसकी कविता के रस का आनंद ले रहा है या उसके गले का। मेरे विचार में कविता की परिभाषा कुछ यूं होनी चाहिये ''कविता, 'शब्‍दों' और 'विचारों' के सर्वश्रेष्‍ठ कॉम्बिनेशन से बनी हुई वो इकाई है जो अपनी अभिव्‍यक्ति के लिये अपने रचनाकार की ओर से किसी अतिरिक्‍त भूमिका, प्राक्‍कथन या पुरोवाक् की मांग नहीं करे।''

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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आइये आज मुशायरे को तीन शायरों के साथ मिलकर आगे बढ़ाते हैं। तीनों नाम चिर परिचित नाम हैं । और तीनों ही अपनी विशिष्‍ट शैली और अंदाज़ के कारण जाने जाते हैं और मुशायरे में इनका सबको इंतज़ार भी रहता है। तिलक राज कपूर जी, शाहिद मिर्जा शाहिद जी और अभिनव शुक्‍ल। ये तीनों ही इस मुशायरे और इस ब्‍लॉग के प्रारंभिक समय से इसके साथ हैं। हमने इन्‍हें जी भरकर सुना और सराहा है। आइये आज भी इनकी शानदार ग़ज़लें सुनते हैं।

Tilak Raj Kapoor

तिलक राज कपूर

पैंजनी पहने हुए नाज़ुक कली सोई हुई
मुग्ध मन देखा किया नन्ही परी सोई हुई।

मैं चुनौती बन गया हूँ, जानकर उसने कहा
आओ फिर से हम जगायें दोस्ती  सोई हुई।

मैं जगाने जब अलख निकला तो आया ये समझ
इक चुनौती है जगाना जिन्दगी सोई हुई।

एक परिभाषा नई धारे हुए मजहब मिला
घुप अंधेरे में है जिसके रोशनी सोई हुई।

क्या  हिफ़ाज़त की रखें उम्मीद इस माहौल से
हर तरफ़ देखी है जिसमें चौकसी सोई हुई।

गोप-गोपी आ गये पर, नृत्य कैसे हो शुरू
कृष्ण  के अधरों धरी है बांसुरी सोई हुई।

साथ में पुरुषार्थ लेकर वो सिकंदर हो गया
भाग्य में जिसके लकीरें थीं सभी सोई हुई।

ओस की इक बूँद देखी है अधर पर आपके
डर मुझे है उठ न जाये तिश्नगी सोई हुई

प्रस्फ़ुटित होने लगीं विद्रोह की चिंगारियॉं
कब तलक रहती कहो तुम बेबसी सोई हुई।

ज्यूँ शरद की पूर्णिमा की ओढ़नी हो ताज पर
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई।

मैं चुनौती बन गया हूं जानकर उसने कहा, सबसे पहले बात इसी शेर की हो। कितने सलीके से बात को कहा गया है। ग़ज़ल का एक और सबसे बड़ा गुण सलीक़ा इस शेर में उभर के सामने आ रहा है। वाह क्‍या बात है। और एक और शेर है कृष्‍ण के अधरों पर धरी बांसुरी का सोया होने वाला। यह शेर जाने कहां कहां की यात्रा करता हुआ गुज़र रहा है। वह बांसुरी एक प्रतीक बनकर मानो हर सोए हुए के पीछे के कारण को इंगित कर रही है। वाह वाह । एक बहुत ही कोमल शेर इसमें बना है ओस की इक बूंद वाला शेर, इसकी नफ़ासत और नाज़ुकी पर निसार होने को जी चाह रहा है। कमाल का बिम्‍ब रचा है । प्रेम के सातवें आसमान का बिम्‍ब। और उसी अनुसार रचा गया है आखिरी का गिरह का शेर । ताजमहल को मोगरे के फूल के समानांतर स्‍थापित कर सुंदर प्रयोग किया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

shahid-11

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

दर्द ए दिल जागा हुआ और हर ख़ुशी सोई हुई
गोद में हालात के है ज़िंदगी सोई हुई

अब जहां बारूद है मासूम खेतों में वहां
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

देखकर मंज़र अंधेरे भी बहुत हैरान हैं
इस चरागों के नगर में रोशनी सोई हुई

ऐ घटा उम्मीद की, अबके बरस कुछ तो बरस
सूखे दरिया में जगा दे तश्नगी सोई हुई

धुंध में मायू्सियों की क्या करे सूरज भला
रोशनी की है यहां उम्मीद भी सोई हुई

आज भी ’वो तोड़ती पत्थर’ अजब तकदीर है
उसकी मंज़िल थम गई है, राह भी सोई हुई

रंग पल-पल में बदलती रहती है ये उम्र भर
है अभी जागी हुई क़िस्मत अभी सोई हुई

गर्मजोशी की ज़रूरत जब हुई शाहिद मुझे
सर्द रिश्तों सी मिली है दोस्ती सोई हुई

सबसे पहले बात करते हैं गिरह के शेर की । बिल्‍कुल अलग तरह से गिरह लगाई गई है। अलग भावों के साथ। इसे ही कहते हैं कन्‍ट्रास्‍ट गिरह। मोगरे के फूल और चांदनी के बीच भी सामाजिक सरोकारों को याद रखने के कवि धर्म को निभाया गया है। बहुत खूब। और अगले ही शेर में अंधेरों की हैरानगी की बात बहुत उम्‍दा तरीके से कही गई है। और कोई नहीं स्‍वयं अंधेरे ही हैरान हैं रोशनी के सोए होने पर । वाह क्‍या बात है। जब भी कोई रचनाकार अपने पूर्वज रचनाकार के यहां से कोई बिम्‍ब उठाता है तो उसके ऊपर बड़ा दबाव होता है जैसा कि शाहिद जी ने निराला जी की तोड़ती पत्‍थर से बिम्‍ब लेकर किया है। लेकिन बहुत कुशलता से उस दायित्‍व को निभा भी दिया है। और मकते को शेर भी अलग मिज़ाज का शेर है। आज की दोस्‍ती को परिभाषित करता। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

abhinav

अभिनव शुक्‍ल

आशिकी की बांह थामे शायरी सोई हुयी,
मैंने अपने घर में देखी रोशनी सोई हुयी,

कर के पोंछा और बासन, चूल्हा चौका पाट के,
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुयी,

रतजगा था जुगनुओं की भीड़ में जागा हुआ,
यामिनी की गोद में थी दामिनी सोई हुयी,

एक लोरी गुनगुनाई थी कभी उसने इधर,
इस गली में है अभी तक रागिनी सोई हुयी,

धीरे बोलो, कोई खटका  मत करो तुम इस तरफ,
देर तक जागी थी मेरी ज़िन्दगी सोई हुयी।

सबसे पहले तो यह कि अभिनव को बधाई, उसके आने वाले कविता संग्रह हेतु जो कि शिवना प्रकाशन से विश्‍व पुस्‍तक में लांच होने जा रहा है। काव्‍य संग्रह का नाम है ''हम भी वापस जाएंगे'' । कर के पोंछा और बासन, चूल्‍हा चौका पाट के, में ज़बरदस्‍त गिरह लगी है, कमाल की गिरह, स्‍तब्‍ध कर देने वाली गिरह। मैं बहुत देर तक बिम्‍ब को अपने दिमाग में रचता रहा मिटाता रहा । मोगरे का फूल कौन और चांदनी कौन है। बहुत खोलना नहीं चाहता लेकिन जब आप भी उस विचार तक पहुंचेंगे तो आपको भी आनंद आएगा। कमाल की गिरह है। क्‍या इस तरीके से भी गिरह लगाई जा सकती है। वाह क्‍या बात है। मैं वैसे तो गिरह के शेर के अलावा किसी और शेर की बात करना ही नहीं चाहता। लेकिन लोरी गा कर गली की रागिनी के सोने का शेर भी सुंदर बन पड़ा है। वाह वाह क्‍या बात है। कमाल की गिरह कमाल की ग़ज़ल ।

तो आनंद लेते रहिये इन तीनों ग़ज़लों का और दाद देते रहिये । तीनों शानदार ग़ज़लों का । मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

52 टिप्‍पणियां:

  1. शायर का कलाम कैसा भी हो, उस कलाम की प्रस्‍तावना वह ज़मीन देती है जिस पर खड़ा हो कर कलाम श्रोता‍ पाठक तक पहुँचता है और अस मंच से जुड़ा हुआ कोई भी व्‍यक्ति इस बात की पुष्टि करेगा कि पंकज जी में कलाम और शायर को प्रस्‍तुत करने की अद्भुत क्षमता है। आभारी हूँ पंकज भाई।
    शाहिद भाई और अभिनव जी ने जिस तरह गिरह लगाई है वह ग़ज़ल पुस्‍तकों में उदाहरण के रूप में ली जा सकती है कि गिरह क्‍या होती है। शाहिद भाई को पढ़ते-पढ़ते अब ग़ज़लिया अंतरंगता हो गई है, इनकी शायरी बोलती है कि ये स्‍वयं कैसे इंसान हैं और इनकी सोच में कैसे-कैसे विषय समाये रहते हैं। अभिनव जी से पूर्व परिचय तो नहीं लेकिन इनकी ग़ज़ल की सरलता और सहजता कह रही है कि 'मिलना चाहिये भाई' ।

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    1. आप खुद अच्छे इंसान हैं तिलकराज जी, भला दूसरे को अच्छा कैसे नहीं मानेंगे
      आपकी मुहब्बतों का शुक्रिया

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  2. पंकज भाई जी, आज इन तीन विशिष्ट शायरों को अपने इन शब्दों के साथ प्रस्तुत करने के लिए हृदयतल से बधाइयाँ लीजिये.

    आदरणीय तिलकराजजी को हम शिद्दत से सुनते रहे हैं. आप आत्मीय तथा सहृदय व्यक्तित्व के स्वामी हैं. आपकी ग़ज़लों का व्याकरण कभी क्लिष्ट नहीं रहा. सामान्य शब्दों में बहुत ही ऊँची बात कहने का जो हुनर ग़ज़ल के लिहाज से अत्यंत आवश्यक हुआ करता है, आपके लेखन की विशीष्टता है. ऐसे में आपके लिए आगे कुछ अधिक कहने को कुछ रह नहीं जाता.
    आपकी इस ग़ज़ल के शेर भी इस मत की पुष्टि कर रहे हैं. मुलायम, मधुर, सोंधे अहसास की सुगंध साझा करते ये शेर निहाल कर रहे हैं. हृदयतल से बधाएइयाँ और ढेरम्ढेर शुभकामनाएँ, आदरणीय तिलकराजजी.
    हाँ, ग़िरह के शेर के साथ-साथ मैं चुनौती बन गया हूँ .. तथा ओस की इक बूँद देखी है अधर पर आपके..वाले शेर पर मन बार-बार अदबदाया जा रहा है. वाह-वाह-वाह !


    आज के दूसरे शायर शाहिद मिर्ज़ा साहब हैं. आप की ग़ज़ल एक अलग पाये ग़ज़ल हुई है. जिस मुलामियत के साथ आपके शेर आधुनिक समय की विभिन्न विसंगतियों को सामने रख रहे हैं, वही आपकी इस ग़ज़ल को ख़ास बना रहे हैं. आपकी ग़ज़ल बता रही है कि आज की ग़ज़ल का लिहाज होना क्या चाहिये ! ग़िरह का शेर यों हे नहीं हो गया है. ग़िरह का शेर एक उत्तरदायी सोच का परिणाम है. मैं आपके हर शेर में देरतक डूब रहा हूँ. लेकिन स्पेसिफिक रूप से जिस शेर को उद्धृत करना चाहता हूँ -
    देख कर मंजर अंधेरे भी बहुत हैरान हैं
    इस् चिराग़ों के नगर में रोशनी सोयी हुई

    अद्भुत ! वाह-वाह ! कमाल !

    दिल से दाद कुबूल कीजिये मो. शाहिद मिर्ज़ा साहब.


    आजके तीसरे शायर अभिनव के शेरों की रवानी और उनकी कहन पर तो बस निसार हो जाने को जी चहता है. ग़िरह के शेर से जो कुछ उद्धृत हो रहा है, वह असीम प्रेम का सरस बहाव है. यों पंकजभाई ने इस शेर पर जो कुछ कहा है, वह उनकी खोजी पत्रकारिता वाले रूप के कारण संभव हुआ है. वर्ना मैं तो बस अपनी सीधी-सादी समझ के अनुरूप सारा कुछ समझना चाहता हूँ ! .. :-))
    अभिनवजी ने दिल खोल कर उन्मुक्त ढंग से अपनी भावनाओं को शाब्दिक किया है.
    हार्दिक शुभकामनाएँ और अशेष बधाइयाँ.

    आज मन प्रसन्न है, आदरणीय पंकजभाई..
    सादर

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    1. आप जैसे वरिष्ठजनों के शब्द प्रेरणा देते हैं सौरभ जी।
      बहुत बहुत शुक्रिया

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  3. आदरणीय तिलकराज साहब की पूरी गज़ल गुनगुना कर देखी तो लगा यह इतनी परफेक्ट है कि मेरे जैसा व्यक्ति भी गाने लग जाए।
    फिर एक एक शेर खूबसूरत।
    पैंजनी पहने हुए नाजुक कली सोई हुई
    मैं चुनौती
    और अलख जगाने वाले शेर
    बहुत पसन्द आए।

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    1. आपसे पूरी तरह सहमत प्रकाश जी,
      वाकई तिलकराज जी के कलाम से आगे बढ़ना आसान नहीं होता।

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  4. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-01-2015) को अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये..; चर्चा मंच 1857 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    उल्लास और उमंग के पर्व
    लोहड़ी और मकरसंक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. लोहिड़ी के शुभ अवसर पर पंकज जी ने जो रेवड़ी स्वरुप मीठी ग़ज़लें बांटी है। देर तक ज़हन में मिठास बनी रही।
    तीनो कलमकारों को उम्दा कहन के लिए दिली दाद।
    सादगी,सच्चाई,सहजता से भरी तीनों ग़ज़लें साथ लिए जा रही हूँ।
    पुनः ढेरों दाद क़ुबूल करें
    सादर
    पूजा भाटिया

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  6. तीनों ही ग़ज़लें दिलो दिमाग पर असर छोड़ने में सफल हुई हैं। हार्दिक बधाई। आदरणीय तिलक सर जी का यह कहना 'मैं चुनौती ' शाानदार शे'र हुआ है। गिरह बाकमाल है। फूल और ताज की सार्थक एकरूपता। वाह वाह ...!! इसी क्रम में अन्य दोनों गिरह भी लाजवाब हुई हैं। आ. पंकज जी सही कहते हैं कि शाहिद साहब की ग़ज़ल का गिरह भी अलग किस्म का है पर उम्दा है। और इस के लिए अभिनव जी को विशेष सराहना --कर के पोंछा और बासन, चूल्हा चौका पाट के,
    मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुयी,।

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  7. आज लोहड़ी के पावन पर्व पर उस्ताद शायरों की ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं , बताइये और क्या चाहिए ? भाई तिलक राज कपूर साहब और शाहिद मिर्ज़ा साहिब के बीच ताल ठोक कर मैदान में उतरे भाई अभिनव शुक्ल पढ़ कर आनंद आ गया।

    भाई तिलक राज जी के लिए इस तरही में ग़ज़ल कहना मुश्किल नहीं था , वैसे तो उन्हें कहीं भी कभी भी ग़ज़ल कहने में मुश्किल नहीं आती लेकिन इस बार की तरही क्यों की कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए सर्व श्रेष्ठ थी और चूँकि तिलक जी तो स्वयं कोमलता की मूर्ती है याने अपनी सोच ,कहन और व्यवहार में सो उसी के अनुरूप उन्होंने अपनी ग़ज़ल के शेर तराशे हैं। " मैं चुनौती बन गया ---", एक परिभाषा नए धारे ---" "गोप गोपी आ गए ---" "ओस की एक बूँद ---", "जैसे कोमल और खूबसूरत शेर तिलक जी जैसे इंसान ही कह सकते हैं। गिरह का शेर तो सिर्फ और सिर्फ उनका हस्ताक्षर लिए हुए है। गज़ब की सोच -- ताज महल परपूर्णिमा की ओढ़नी ---अहा हा लाजवाब। आप के चरण कहाँ हैं मित्र ?

    शाहिद भाई बहुत संवेदन शील इंसान हैं। सामाजिक मूल्यों के गिरते स्तर और बदलती इंसानी फितरत से वो बहुत चिंतित और आहत होते हैं। उनकी ग़ज़लों में ये भाव बहुत स्पष्ट नज़र आते हैं। " देख कर मंज़र अँधेरे भी बहुत हैरान हैं ---" जबरदस्त शेर है , "ऐ घटा उम्मीद की ---", "धुंध में मायूसियों ---", "रंग पल पल में ---" जैसे शेर एक बार पढ़ने के बाद हाथ पकड़ कर आपके साथ चलने लगते हैं। " आज भी वो तोड़ती पत्थर --" जैसा शेर यादगार श्रेणी का शेर है जो बहुत कम पढ़ने में आता है , ऐसे शेर रोज रोज नहीं होते सीधे ऊपर से उतरते हैं और हैरान कर देते हैं। पूरी ग़ज़ल में तरही का शेर एक डैम अलग और बेजोड़ है। शब्दों में ऐसा कंट्रास्ट शेर कहना बहुत बड़े हुनर का काम है। जियो शाहिद भाई ---आपके लिए ढेरों दाद।

    अभिनव को कम पढ़ा है लेकिन जब पढ़ा है वो अपनी छाप छोड़ गए हैं। कुल जमा पाँच शेर हैं उनकी ग़ज़ल में और उनमें से एक " कर के पौंछा और बासन ---" जैसा कालजयी शेर भी है। हतप्रभ कर गया गिरह लगाने का ये नायाब तरीका। वाह वाह वाह कमाल कमाल कमाल। भाई बोलती बंद कर दी अभिनव आपके इस अभिनव प्रयोग ने। आपके लिए तालियां बजा रहा हूँ --- सुन पा रहे हैं न। बेहतरीन ग़ज़ल कही है दाद कबूलें।

    इस तरही में चार चाँद लगा रही है गुरुदेव की प्रस्तुति , ये काम बहुत मुश्किल है। बिना उच्च लेखकीय क्षमता के इसतरह की प्रस्तावना लिखना आसान नहीं। जय गुरुदेव।

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    1. नीरज गोस्वामी जी, मुझे एक नाम वो बताइए जो आपसे बातों की खूबसूरती में जीत पाया हो। आप इस अंदाज से दाद देते हैं, कि अपने शेर खुद को भी अच्छे लग बैठते हैं।
      सचमुच आप बहुत अच्छे इंसान हैं, और इतने ही अच्छे शायर भी। अब देखिए न पंकज सुबीर जी ने इस बार तो महफिल भी आपके ही सदके यानी मोगरे के फूल को लेकर सजा रखी है। जिसमें निसंदेह एक से बढ़कर एक फूल खिल रहे हैं। अब हमें मोगरे की डाली का इंतजार है।

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  8. शाहिद साहव की गज़ल बहुत पसंद आई।
    तीन शेर बहुत शानदार लगे
    देख मंजर अँधेरे भी बहुत हैरान है
    ऐ घटा उम्मीद की
    धुंध में मायूसियों की
    शेर बेहतरीन लगे।
    बेहतरीन सृजन।
    बधाई।

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  9. यहाँ बेइंतिहा ठण्ड है और बाहर वर्षा का तूफ़ान। फ़ायर प्लेस जल रहा है और उसी को लोहड़ी का अलाव मान कर हम आन्नदित हो रहे हैं। ऐसे में तीन ग़ज़लें पढ़ने को मिलीं। आनंद चरम सीमा पर पहुँच गया। एक तो मिसरा ही इतना लुभावना-मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई। उस पर तीन ग़ज़लें एक के बाद एक बढ़कर।
    हमेशा की तरह तिलक राज कपूर जी की बढ़िया ग़ज़ल। खासकर इन शे'रों ने तो कमाल कर दिया -
    मैं चुनौती बन गया हूँ, जानकार उसने कहा
    मैं जगाने जब अलख निकला
    कृष्ण के अधरों पर धरी
    ओस की इक बूँद देखी है
    मुँह से वाह…वाह निकल रहा है।
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद जी की ग़ज़ल अलग तेवर लिए है। ये तेवर बहुत भाए।
    इनके शे'र -
    अब जहाँ बारूद है
    धुंध में मायूसियों की क्या
    गर्मजोशी की ज़रूरत
    बहुत बढ़िया कहें है। वाह… वा, बस वाह...वा यही कह रही हूँ।
    अभिनव को क्या कहूँ…
    उसके इस शे'र ने तो मार ही डाला--
    करके पोंछा और बासन, चूल्हा चौका पाट के
    कहाँ कल्पना को उतारा है, वाह.....
    और एक लोरी गुनगुनाई थी कभी
    बहुत सुन्दर कहा है।
    तीनों ग़ज़लकारों को दिल से बधाई!!!

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  10. "कविता,'शब्दों' और 'विचारों' के सर्वश्रेष्ठ काम्बिनेशन से बनी हुई वो इकाई है जो अपनी अभिव्यक्ति के लिये अपने रचनाकार की और से किसी अतिरिक्त भूमिका ,प्राक्कथन या पुरोवाक कि मांग न करे|" 'परिभाषा' और 'इकाई' शब्द आते ही अब भी एक बार को तो मन ही मन याद करना शुरू हो जाता है लेकिन ये सटीक परिभाषा याद करने की नहीं आत्मसात करने की है | बहुत सच्ची बात, इसी लिये कुछ लेखकों को अपनी किताब के लिए किसी भूमिका ,प्राक्कथन या पुरोवाक की आवश्यकता नहीं होती|
    "उसे तो पता ही नहीं होता की वो कब वाह वाह कर उठता है" ....सच है मालूम ही नहीं पड़ा इन तीनो गजलो को पढ़ कर कि कब इन्हें कई कई बार पढ़ डाला | फिर वो चाहे तिलक जी का नाजुक सा "पैंजनी पहने हुए नाजुक कली सोयी हुई " शेर हो या शाहिद जी का आज के सच को बयाँ करता "अब जंहा बारूद है मासूम खेतों में वंहा " शेर या अभिनव साहब का " कर के पोंछा और बासन ,चूल्हा चौका पाट के" शेर हो सभी शेरो के लिए वाह ही नहीं दुआ भी खुद बा खुद जुबां पर आ जाती हैं | अभिनव जी की पूरी गजल ही कमाल है| लेकिन मुझे ये लगता है अगर इन्होंने सिर्फ एक ही शेर कहा होता "कर के पोंछा ....." तो भी ये एक मुक्कमल गज़ल ही होता | वाह कमाल शेर |
    "एक परिभाषा नई ......" , "साथ में पुरुषार्थ ...." "कब तलक रहती ....." शेर कमाल के शेर हैं और "ज्यूँ शरद की ....." शेर में तो जैसे साक्षात् ताज पर शरद की पूर्णिमा की ओढ़नी देख पा रहें हों |
    शाहिद जी का चरागों के नगर में अंधेरो के भी हैरान होने का शेर वाकई हैरान करता है | और "धुंध में मायूसियों .." शेर सोचने पर मजबूर करता है कि कितनी गहरी धुंध है मायूसियो की जो सूरज भी लाचार है | सभी बेहतरीन गजलों के लिए तिलक राज जी,शाहिद जी, और अभिनव जी, को बहुत बहुत बधाई | और अभिनव जी को उनके काव्य संग्रह के लिए अग्रिम शुभकामनायें |


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  11. हाथ आटे में सने और गाल पे हल्दी लगी

    हालते अभिनव निरख, जागी हंसी सोई हुई



    जब ग़ज़ल करते अदा आकर तिलक जी मंच पर

    हर हरफ में रक्स करती नाजुकी सोई हुई



    वाह कलामे शाहिदाना क्या गज़ब है क्या गज़ब

    भर गई है महको गुल से बेदिली सोई हुई.

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    1. आपने राकेश जी दी दाद इस अंदाज से
      गौर से सुनने की ख्वाहिश जाग उठी सोई हुई

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  12. कपूर जी के ग़ज़लों का मै बहुत बड़ा फैन हूँ । इंतज़ार कर रहा था । आप आये और क्या खूब आये । बेहद खूबसूरत अशआर । "मै जगाने जब अलख " वाला शेर तो गज़ब हो गया है । कृष्ण और बाँसुरी वाला शेर भी लाजवाब । वाह वाह , कपूर जी मजा आ गया । इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद और आपको ढेर सारी बधाई ।

    शाहिद जी , कमाल है आपका ,हर शेर क्या खूब आये हैं । "देखकर मंजर अँधेरे" शायदा आज के समाज से कुछ मेल खाता हुआ हुआ है । बहुत सुन्दर ग़ज़ल । हम आभारी है आपके जो इतने अच्छे -अच्छे शेर से रूबरू कराया आपने । बधाई

    "आशिकी की बाँह थामे शायरी सोई हुई " , वाह , वाह अभिनव जी । खूबसूरत अंदाज । मजा आ गया । "एक लोरी " वाला शेर भी इक नई बात कह रही है । अच्छा अंदाज है ,और नयापन भी । हार्दिक बधाई ।

    पंकज जी , प्रणाम । वैसे तो हर बार का मुशायरा शानदार होता रहा पर शायद इस बार मिसरे का कुछ कमाल है , बेहद खूबसूरत और नाजुक शेर आ रहे हैं । एक सफल आयोेजन के लिए पंकज जी और सभी शायरों को हार्दिक बधाई ।

    सभी को मकर संक्रांति की ढेर सारी बधाइयाँ और शुभकामनायें ।

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  13. तीन बेहतरीन ग़ज़ले पढ़ने मिली आज, मुशायरा अपने उरूज पर पहुंच रहा है.
    तिलक राज कपूर :
    ===========
    6 यथार्थ परक शेर, शायरी बराए ज़िंदगी तो ग़ज़ल के रंग में डूबे 4 शेर भी अति सुंदर .
    "ओस की इक बूँद देखी है अधर पर आपके 
    डर मुझे है उठ न जाये तिश्नगी सोई हुई"

    (क्यूँ तकल्लुफ कर रहे हैं 'राज' जी ये आप भी?
    आगे बढ़ कर के बुझा ले तश्नगी सोई हुई!)

    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद :
    ============
    मायूसियत के आलम को दिल की गहराई से बयान करते अशआर.
    एसे में उनके इस आह्वान पर.....
    "ऐ घटा उम्मीद की, अबके बरस कुछ तो बरस
    सूखे दरिया में जगा दे तश्नगी सोई हुई"

    ''लब्बेक और आमीन "

    अभिनव शुक्ल:
    ==========
    "कर के पोंछा और बासन, चूल्हा चौका पाट के, 
    मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुयी"

    सच कहा Parul Singh ने यह शेर एक मुकम्मल ग़ज़ल भी है बल्कि भारतीय संस्कृति का एक सुनहरा अध्याय भी.

    मगर कहीं एसा भी होता है -
    (कर के मेक'प, सज-सजा के घर से चल दी मेम सा'
    रात लौटी देर से अब तक पड़ी सोई हुई)

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    1. आपकी दुआओं का शुक्रगुजार हूं हाशमी साहब

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  14. मंत्र मुग्ध करके रखने वाले मुशायरे की इस कड़ी में शामिल शायरों ने हमेशा की तरह अपने अपने शुभनामों को सार्थक करते हुए बेहतरीन शायरी से हमें नवाज़ा है। भाई तिलक राज कपूर एक तो शायरी के तिलक हैं ही और फिर वे कपूर भी हैं जिनके कलाम की सुगंध ज़ेह्नो दिल में बसी रहती है।शायरी की चुनौती और सीमाओं को पहचानते हुए जबी वे शेर कहते हैं तो देखते ही बनते हैं ।परिणाम हमारे समक्ष है। उन्हें बधाई।

    भाई शाहिद मिर्ज़ा शाहिद जैसा आपका नाम है वैसा ही कलाम है।शाहिद अर्थात श्रेष्ठ , उत्तम ,उम्दा। मुशायरे में आपकी दूसरी प्रस्तुति से रूबरू हूँ।और इस बार भी उम्मीद की घटा जम कर बरसी है आपकी ग़ज़ल में। हार्दिक बधाई।

    भाई अभिनव शुक्ल जी आपकी ग़ज़ल के शेरो में आपके प्रयोग भी आपके नाम के अनुरूप अभिनव हैं इसलिए मेरे साथ रहेंगे। संकलन के लिए बधाई।
    और प्रस्तुतकर्ता के लिए क्या कहूँ? बस तना ही कहना चाहूँगा: हैट्स ऑफ़ टु यू सर! बेहतरीन प्रस्तुति के लिए , समीक्षा और विवेचन के लिए

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    1. जबी को जब तथा तना को इतना पढ़ें।

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    2. शुक्रिया द्विज साहब, आपके शब्द प्रेरणा देते हैं।

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  15. सुबीर संवाद सच माने में साहित्य के ऊंचे माप-दंड तय करता हुआ साहित्य सेवा में सलग्न ब्लॉग है ... ऐसे मंच से जुड़ना गौरव की बात है ... कविता की व्याख्या इसी बात को इंगित कर रही है ...

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  16. माननीय तिलक राज जी के ग़ज़लें लम्बे समय से पढ़ रहे हैं और उनसे सीख रहे हैं ग़ज़ल कहने की कला ... मतले के शेर में ही ग़ज़ल की नाज़ुकी का अंदाज़ हो जाता है ... एक परिभाषा ... इस शेर में आज का कडुआ सच बाखूबी लिखा है ... और बांसुरी वाला शेर तो दिल में उतर जाता है ... ओस की इक बूँद तो जैसे परें की ऊंचाहियों को नाम रही है ... ये मंच ही लैसी लाजवाब ग़ज़लें निकलवा रहा है ...बहुत लाजवाब ...

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  17. शाहिद साहब ने बिलकुल हट के जमीनी हकीकत के शेर कहे हैं ...
    गिरह का शेर तो बहुत ही कमाल का है ... बहुत ही गहरा दूर तक जाने वाला ....
    ए घटा उम्मीद की और धुंध में मायूसियों की ... दोनों ही शेर दिल को छूते हैं ... और आखरी शेर भी दोस्ती की हकीकत बयान करता है ...
    कमाल की ग़ज़ल ... बहुत लाजवाब ...

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    1. शुक्रिया नासवा जी, आप खुद अच्छा कलाम कहते हैं, और हमें उसका इंतजार रहता है।

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  18. अभिनव जी को पुस्तक प्रकाशन की बधाई ...
    गिरह का शेर सच में कमाल का है ... कम शेर लेकिन धमाकेदार शेर कहे हैं सब ... बेहतरीन गजल ...
    मकर संक्रांति की बधाई और शुभकामनायें सभी को ...

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  19. जिस आत्‍मीयता से आप सभी ने सराहा है प्रस्‍तुत ग़ज़लों को, उस से लगता है कि ग़ज़ल कहीं पीछे छूट गयी हैं। आत्‍मविभोर हूँ और हृदय से आभारी हूँ, ऋणी हूँ आपकी इस मोहब्‍बत का।

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  20. आदरणीय तिलक राज कपूर की जितनी भी ग़ज़लें मैंने पढ़ी हैं वो सभी मेरे लिए किसी सबक से कम नहीं है. इस ग़ज़ल के हर शेर को मैं बारीकी से पढ़ रहा हूँ. आदरणीय शहीद मिर्ज़ा साहब ने तो गिरह के शेर से ही लूट लिया लगता है. और आदरणीय अभिनव साहब के गिरह में जो नवीनता है वो तो कहते ही बनती है.

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    1. गिरह पसंद करने के लिए शुक्रिया निस्तेज जी

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  21. वाह वाह वाह .... बेहतरीन गजलों का गुलदस्ता हो जैसे.. एक से बढ़ कर एक. बहुत ही उत्कृष्ट . तिलक राज साहब तो उस्ताद ही है. मैं चुनौती बन गया हूँ .... क्या जबरदस्त भाव है... एक कटु यथार्थ को बहुत ही सलीके से रखा गया है ..... बाकी के दोनों ग़ज़लकारों ने भी खूब गज़लें कही ..... ऐ घटा उम्मीद की में शहीद साहब ने निराशा के वातावरण में आशा की ऐसी किरण छिटकाई है जिससे पूरे हयात में रौशनी भर जाये ... बहुत खूब ... और अभिनव साहब के गिरह के शेर में जो अंदाज और भावों का जो सम्प्रेषण है वह बहुत ही स्तुत्य है... बहुत ही सार्थक एवं सराहनीय योगदान इन तीनो ग़ज़लकारों का . तीनो को हार्दिक बधाई और आपको भी जनाब ... आपके माध्यम से हमें इतनी अच्छी और उच्चे मेयार की गज़ले पढने को मिल रही है ...

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  22. हर ग़ज़ल ख़ुद को पढ़वाने में सक्षम है बेहद खूब्सूरत और नाज़ुक गिरह है तिलक राज जी की वाह वाह
    लेकिन शाहिद मिर्ज़ा साहब ने तो मंज़र ही बदल दिया ,,बड़े ही मुनफ़रिद अंदाज़ में गिरह लगाई है ,बहुत ख़ूब ,,,,रंग पल पल में,,,, और मक़ता भी उम्दा है
    अभिनव शुक्ल जी भी मुबारकबाद के हक़दार हैं

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    1. इस्मत साहिबा आपको कलाम पसंद आया, शुक्रिया
      मुझे तो आपका शेर बार बार याद आता है-
      रेशमी बिस्तर पे जागी बादशाहत रात भर
      पत्थरों के फर्श पर थी मुफलिसी सोई हुई

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  23. मन के-मनके के माध्यम से बहुत ही तुच्छ सा कह पा रही हूं.
    शायरी की विधा क्या है---ऐसा मेरा सौभाग्य नहीं रहा कि—इस विधा
    में कदम भी रख पाऊं.
    निःसंदेह आपके ब्लोग के माध्यम से---शायराना मुलाकात
    हुई---धन्यवाद.
    कुछ कहना-सुनना---छोटे मुंह बडी बात होगी.
    भविष्य में ऐसे अवसरों को सुअवसर बनाने का प्रयास
    अवश्य करूंगी.

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    1. मन में विचारों को शायरी के रूप में पेश करने के लिए ऐसी महफिलें जरूरी होती हैं

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  24. पैंजनी पहने हुए नाजुक कली सोई हुई
    मुग्ध मन देखा किया नन्ही परी सोई हुई
    तिलकराज कपूर साहब क्या मतला कहा है..वाह वाह वाह
    मैं चुनौती बन गया हूं..और चौकसी सोई हुई..गिरह लाजवाब..
    किस शेर को कोट करें..हर शेर बेहतरीन..मुकम्मल गजल है।
    अभिनव शुक्ल जी ने पुख्ता अशआर पेश किए हैं। मतला उम्दा है।
    गिरह को लेकर सभी कह चुके हैं, उनसे सहमति रखते हुए
    बस आखिरी शेर के पहले मिसरे के बारे में कुछ कहना चाहता हूं।
    जहां न का प्रयोग किया गया है वहां ना का वज्न आ रहा है। हिन्दी में हालांकि यह गलत नहीं माना जाता। लेकिन उर्दू शायरी के नजरिये से इस स्थान पर न के बजाय मत का वज्न चाहिए। मेरे विचार से शायद पंकज सुबीर जी भी सहमत होंगे। पुस्तक प्रकाशन की शुभकामनाओं के साथ।

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  25. आदरणीय तिलक जी ने तो मलते से ही बाँध लिया। उसके बाद एक से बढ़कर एक शे’र। ओस की इक बूँद....... वाले शेर ने लूट लिया। बारंबार बधाई आदरणीय तिलक जी को।

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  26. शाहिद साहब ने शानदार शे’र कहे हैं। हासिल-ए-ग़ज़ल शे’र है "ऐ घटा उम्मीद की.........."। इस शानदार ग़ज़ल के लिए शाहिद साहब को बहुत बहुत बधाई।

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  27. अभिनव जी ने इतनी शानदार गिरह लगाई है कि ये गिरह ही कई ग़ज़लों पर भारी है। बहुत बहुत बधाई अभिनव जी को इस शानदार ग़ज़ल के लिए।

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  28. तिलक जी के दोस्ती , चौकसी और सिकन्दर वाले शेर सुभान अल्लाह!
    तिश्नगी वाले शेर की नज़ाकत का क्या कहिये!
    ताज वाले शेर को पढ़ के मज़ा आ गया!

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  29. शाहिद साहब की हकीकत से रूबरू गिरह के आगे कई गज़लें कुर्बान!
    अब के बरस कुछ तो बरस... के कहन का क्या कहना!

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  30. अभिनव को नई किताब के लिये बधाई! कमाल की पुख़्ता गिरह और बेहतरीन शेर ज़िंदगी के सोने वाला!
    आईरनी पे मज़बूत पकड़!

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