गुरुवार, 15 जनवरी 2015

19 के कार्यक्रम की व्‍यस्‍तता के बीच आज तरही का सिलसिला कुछ और आगे बढ़ता है नकुल गौतम, दिनेश कुमार और प्रकाश पाखी के साथ।

मित्रों कई बार लगता है कि आयोजन और उत्‍सव क्‍यों हों। मगर फिर लगता है कि होने ही चाहिये। कारण कि साहित्यिक आयोजन किसी भी शहर और समाज की चेतना को जगाए रखने का कार्य करते हैं। हम जो साहित्यिक लोग हैं हम केवल लिखने के लिये नहीं हैं। हमें अपने शहर और समाज की चेतना का भी ध्‍यान रखना है। हम जहां भी रहें वहां पर कुछ न कुछ ऐसा करते रहें कि लोगों को लगता रहे कि सब कुछ अभी समाप्‍त नहीं हुआ है। और इस कुछ करने में साहित्यिक आयोजन भी आते हैं। आप जहां हों वहीं कुछ न कुछ करें। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो आयोजन कहां हो रहा है।  यदि आपके कारण शहर के दस लोगों में भी साहित्यिक चेतना जागती है तो आप का कार्य पूरा हुआ। मेरे गुरू कहते थे कि पंकज मत देखो कि तुम्‍हारे आयोजन में कितने लोग आ रहे हैं, तुम्‍हारा सभाकक्ष छोटा है, उसमें श्रोता भी कम हैं। वो कहते थे कि अच्‍छे कार्य के लिए लोग बहुत मुश्किल से साथ आ पाते है। तुम बस ये जानो कि जो आ गये हैं वो ही तुम्‍हारे लिए महत्‍त्‍वपूर्ण हैं। जो आ गये हैं उनका ध्‍यान रखो, बाकी सब भूल जाओ। सीहोर जैसे छोटे शहर में जब हम कुछ मुट्ठी भर लोग मिलकर आयोजन करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन क्‍या हैं, हमारे साथ कौन है। हम बस कुछ करना चाहते  हैं।खुशी ये है कि कुछ युवा साथ जुड़े हैं कुछ कार्य आगे बढा है। जैसे 19 जनवरी का ये आयोजन जो पिछले लगभग 40 सालों से लगातार इसी तारीख का आयोजित होता आ रहा है। मुश्किलें आती हैं, परेशानी होती है लेकिर हम जुट जाते हैं इसको आयोजित करने में। एक छोटा सा हमारा सभाकक्ष, जो हमारे ही एक साथी के स्‍कूल का सभाकक्ष है, उसमें जुटे शहर के प्रबुद्धजन और हमारे अतिथि, हम किसी चेतना को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं मिलकर। आइये आप सब भी भागीदारी करें। 19 जनवरी को।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

आइये आज तरही के क्रम को आगे बढ़ाते ह‍ैं तीन रचनाकारों के साथ । नकुल गौतम, दिनेश कुमार और प्रकाश पाखी जैसे गुणी युवा रचनाकारों के साथ। 

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दिनेश कुमार

बुजदिलों के शह्र में मर्दानगी सोई हुई
जुल्मतों की शब मुसलसल, रोशनी सोई हुई

बच्चियों पर बढ़ रहे अपराध सीना तानते
हर किसी की आँखों में शरमिन्दगी सोई हुई

शह्र के फुटपाथ पर रातों का मंजर खौफनाक
मुफलिसी की ओढ़ चादर जिन्दगी सोई हुई

मुज़रिमों का हौसला अब दिन-ब-दिन बढ़ता हुआ
मुल्क के सब मुन्सिफ़ों की लेखनी सोई हुई

चाँद सूरज फूल कलियाँ इन पे मैं लिक्खूँ ग़ज़ल?
एक मुद्दत से मिरी तो शायरी सोई हुई

तरही मिसरा ये रहा जिस पर मेरे अश'आर थे
"मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई"

दिनेश जी कैथल हरयाणा से हैं और शायद पहली बार तरही में आए हैं। बहुत अच्‍छी ग़ज़ल लेकर इन्‍होंने इण्‍ट्री की है। पूरी की पूरी ग़ज़ल सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई ग़ज़ल है । याद आ रहे हैं रामधारी सिंह दिनकर जो कहते थे कविता को समाज की ओर देखना ही होगा। बच्चियों पर बढ़ रहे अपराध शेर सम सामयिक है और बहुत प्रभावी तरीके से बात को रख रहा है। उसी प्रकार का शेर है मुन्सिफों की लेखनी के सोए हुए होने का। असल में ये हौसला केवल कवि ही कर सकता है कि वो हर किसी पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगाए और चेतना को जगाए जिसकी बात आज मैंने भूमिका में की है।  और हां एक सर्वथा भिन्‍न तरीके से लगाई हुई गिरह । क्‍या अनूठे तरीके से गिरह लगाई है । वाह वाह वाह।

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प्रकाश पाखी

दर्द बिखरा है यहाँ पर, है हंसी सोई हुई
चैन किसको, हर जगह जब बेबसी सोई हुई 

उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया
आज है ताबूत में इक वापसी सोई हुई

बाग़ था खामोश बिलकुल रात रोई रात भर
वहशियों ने जब कुचल दी हर कली सोई हुई

चाँद से आई उतर कर डालियों पर झूलकर
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

जब से जानी ग़म की फितरत फ़िक्र मैं करता नहीं
पास में हर ग़म के जो थी इक ख़ुशी सोई हुई

सबसे पहले बात उस शेर की जो अंदर तक उतर गया है। ये दुनिया भर के हर सैनिक के पिता का दर्द है। उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया । क्‍या बात है। क्‍या मार्मिक दृश्‍य उतारा है शेर में । आज है ताबूत में इक वापसी सोई हुई। कमाल। बाग़ था ख़ामोश बिल्‍कुल में भी उतने ही मार्मिक तरीके से दृश्‍य उतारा गया है। जिस प्रकार से ऊपर की ग़ज़ल में दिनेश कुमार ने सामाजिक सरोकारों को याद रखते हुए ग़ज़ल कही थी उसी प्रकार से प्रकाश पाखी ने भी शेर निकाले हैं । और उसी प्रकार से सुदंर तरीके से गिरह भी लगाई हे मिसरे पर, पूरा का पूरा एक सजीव चित्रण हो गया है उस शेर में चांदनी के उतर आने का । कामल की ग़ज़ल बहुत खूबत्र वाह वाह वाह।

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नकुल गौतम

देर कल दफ्तर से निकला, थी गली सोई हुई
याद फिर से आ गयी आवारगी सोई हुई

इक पुराना बक्स खोला, वक़्त मुस्काने लगा
चल पड़ी यादों की चाबी से घड़ी सोई हुई

रात भर ठंडी हवा से खिड़कियां हिलती रहीं,
कुछ वरक़ पलटे तो रो दी डायरी सोई हुई

हाथ हाथों में लिए अलफ़ाज़ ने एहसास के,
मुस्कुराने फिर लगी ये शायरी सोई हुई

ओढ़ कर शबनम की चादर, जनवरी की रात में
"मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई"

गर छपी होती न वो झूठी ख़बर अख़बार में
यूँ नहीं इंसानियत दिखती कभी सोई हुई

कम्बलों की इक दुकां है आज जिस फुटपाथ पर
ठण्ड में कल इक  भिखारन मर गयी सोई हुई

रूह को जाते हुए देखा नहीं जन्नत कभी
हाँ मगर हो चैन से मिट्टी मेरी सोई हुई

नकुल की ग़ज़ल ने एक और कमबख्‍़त गौतम की याद दिला दी। सबसे पहले बात गिरह की । वाह वाह वाह। क्‍या गिरह बांधी है । उसमें भी जनवरी की रात के तो क्‍या कहने। और हां शबनमी चादर भी, कमाल है । आंखें बंद करके ज़रा इस शेर को सोचिए और आनंद लीजिए पूरे के पूरे दृश्‍य का। उसके बाद बात की जाए मतले की । वाह क्‍या मतला है । मतले के दोनों काफिये क्‍या ग़ज़ब का कॉम्बिनेशन पैदा कर रहे हैं। गली और आवारगी का तो पूराना रिश्‍ता है। दफ़्तर शब्‍द खूब आया है मिसरे में, सौंदर्य को दोगुना करता हुआ। मतले के बाद के दो शेर तो डाउन मेमोरी लेन के शेर हैं। दोनों बस महसूसे जाने के शेर हैं और महससूते समय यदि आपकी आंखों की कोर से कुछ पनीला सा बह निकले तो उसमें शायर का क्‍या दोष। वाह नकुल क्‍या कमाल की ग़ज़ल कही है। कमाल की ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

तो दाद देते रहिये और आनंद लेते रहिये । और हां ये आमंत्रण पत्र आपके लिए, आप आ रहे हैं ना.....?

INVITATION CARD 19 JAN UARY

49 टिप्‍पणियां:

  1. आज की प्रस्‍तुति में प्रकाश पाखी तो इस मंच के जाने-माने पूर्व सदस्‍य हैं, दिनेश कुमार और नकुल गौतम नई आमद हैं जिनका हृदय से स्‍वागत है। तीनों आज की नौजवां पीढ़ी के हैं और इनके सरोकार जहॉं तक गये हैं वह कह रहे हैं कि आज की पीढ़ी ने पूरी गंभीरता से संज्ञान लिया है सामाजिक सरोकारों का। यह आश्‍वस्‍त करता है कि हालात् बदल कर रहेगी यह पीढ़ी।
    तरही का रदीफ़ भले ही 'सोई हुई' है लेकिन इस पर कही गयी तीनों ग़ज़ल आश्‍वस्‍त करती हैं कि आज की पीढ़ी 'जागी हुई' है। यह जागृत चेतना वंदनीय है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तिलकराज सर जी।

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    2. आदरणीय तिलक राज साहब आपके शब्दों से हमेशा प्रेरणा मिलती रही है।आपका तो मैं प्रशंसक हूँ।बता नही सकता कितना अच्छा महसूस हो रहा है।बहुत बहत आभार।

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  2. तीनो ही शायरों के कमाल की ग़ज़लें कही हैं. दिनेश जी और नकुल जी को पहली बार पढ़ रहा हूँ. ग़ज़लें कह रही हैं की बहुत मंझे हुए शायर हैं. प्रकाश जी ने हमेशा की तरह बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है. बधाई.

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  3. आदरणीय पंकज जी,
    मेरी ग़ज़ल को अपने ब्लॉग पर स्थान देने के लिए मैं आपका आभारी हूँ.

    प्रकाश पाखी जी की ग़ज़लें पढता रहा हूँ. आपके साथ मेरी ग़ज़ल देख कर बहुत प्रसन्न हूँ|

    दिनेश जी की ग़ज़लों से भी फेसबुक पर जुड़ा हुआ हूँ.
    हमेशा की तरह आपकी ग़ज़ल इस बार भी सामाजिक मुद्दों से जुडी हुई है.
    बहुत खूब बयानगी है.

    आप दोनों शायरों को कामयाब ग़ज़लों के लिए बहुत बहुत बधाई

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    1. शुक्रिया नकुल भाई।आपके शब्दों से सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।

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  4. आदरणीय तिलक जी और राजीव जी का हौंसला बढ़ाने के लिए आभारी हूँ.
    आप लोगों ने मेरी ग़ज़ल पढ़ी, यह जान कर ही स्वयं को धन्य मानता हूँ |

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  5. आप की व्यस्तता का अंदाज़ा मैं बखूबी लगा सकता हूँ। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि जिस सलीके से आप इस कार्यक्रम का आयोजन करते हैं वो इसमें शिरकत कर के ही महसूस किया सकता है , इतना अपना पन होता है कि हर एक को ये कार्यक्रम स्वयं का लगता है। आप और आपकी पूरी टीम की जितनी प्रशंशा की जाय कम है.

    जिस किसी को भी ग़ज़ल के उज्जवल भविष्य के बारे में थोड़ा सा भी संदेह हो उसे आज तरही की तीनो ग़ज़लें पढ़नी चाहियें। तीनो युवा शायरों ने जिस तरह की ग़ज़लें कहीं हैं उसे पढ़ कर मारे ख़ुशी के दिल गदगद हो गया।

    दिनेश जी को शायद पहली बार पढ़ रहा हूँ अपनी ग़ज़ल में उन्होंने जो मुद्दे उठाये हैं वो ज्वलंत हैं और हम सब से जवाब मांगते हैं। "बुजदिलों के शहर में मर्दानगी सोयी हुई " नींद में सोये लोगों को झिंझोड़ कर जगाने वाला मिसरा है। बच्चियों पर हो रहे अत्याचार हों , फुटपाथ पर रहने की मजबूरी हो या मुजरिमों के बढ़ते हौंसले हों सभी मुद्दे हम से सीधे जुड़े हैं शायर इन की बात उठा कर समाज को चेता रहा है। उनका अंदाज़ कबीले गौर और अनुकरणीय है। गिरह भी कमाल की लगायी है। दिनेश भाई मेरी दिली दाद कबूलें।

    पाखी गुरुकुल के पुराने साथी हैं और उनकी ग़ज़लें हमेशा खूबसूरत अर्थ लिए होती हैं। "उस पिता का दर्द देखो ---" शेर अंदर तक हिला जाता है , कितनी पीड़ा छुपी है इस एक शेर में उफ्फ्फ -जबरदस्त। " बाग़ था खामोश और तरही की गिरह वाला शेर भी कमाल के हैं। वाह पाखी भाई वाह - जियो।

    नकुल को शायद एक बार फेसबुक पे पढ़ा था और मैं उसका बहुत बड़ा फैन हो गया। नकुल में बड़े शायर बनने के सभी गुण नजर आते हैं। उसके पास भाषा है व्याकरण है और अलग ढंग से कहने और सोचने का हुनर है। इस उम्र में ये तेवर हैं तो आगे क्या होगा सोच कर दिल बल्लियों उछलने लगता है। गली और आवारगी से शुरुआत करते हुए उनकी ग़ज़ल दफ्तर ,पुराने बक्स, डायरी, कम्बलों की दुकान, सोयी मिटटी के सफर से होती हुई जब शबनम तक पहुँचती है तब तक पाठक न जाने कितनी बार वाह वाह कह उठता है।

    तीनो युवाओं के लिए दिल से दुआ निकल रही है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नीरज सर जी। सार्थक हौसला अफ्जाई से उत्साह बढ़ा है।

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    2. आदरणीय नीरज भाई,आप तो अपने शब्दों से हौसलों में जान डाल देते हो।शुक्रिया आपका।

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  6. मकर संक्रान्ति की मंगलकामनाएँ

    सिहोर की आत्मीय स्मृतियों की भीनी फुहार से मैं आजतक भीगा हुआ हूँ. वहाँ के अपनत्व भरे वातावरण को भूलना किसी मनुष्य के लिए तो संभव नहीं है. उन यादों को संजोये आजतक मैं सिहोरी-भोपाली बना बैठा हूँ.
    इस बार मेरा वहाँ न होना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है. लेकिन जिस पारिवारिक उत्तरदायित्व के कारण मैं अनुपस्थित रहूँगा, वह दायित्व हृदय से अपनाया हुआ, भाव भरा दायित्व है, जिसकी अनदेखी एक ’भाई’ नहीं कर सकता.

    मुझे सिहोर के एक-एक कर सभी वो लोग याद आ रहे हैं जिनसे पंकजभाई ने बड़े भाव से मेरा परिचय करवाया था. मेरी ओर से सभी को हार्दिक नमस्कार कहियेगा, पंकज भाईजी.
    आयोजन की महती सफलता के लिए मेरी अशेष शुभकामनाएँ.


    आजके मुशायरे के तीनों शायर गठी हुई सोच, सुगढ़ व्याकरण तथा सक्षम शब्दावलियों के शायर हैं.
    दिनेश कुमारजी को मैं कुछ दिनों से पढ़ रहा हूँ. प्रकाश पाखी से परिचय हो रहा है. तथा नकुल भाई ने तो अगूत आशान्वित किया है.
    आप तीनों की ग़ज़लें युवा फिक्र से लबरेज़ हैं.
    ग़ज़ल रूपी अदहन से बानग़ी के तौर पर मैं चावल सदृश एक-एक शेर लूँ तो मैं इन शेरों को उद्धृत करना चाहूँगा -

    बच्चियों पर बढ़ रहे अपराध सीना तानते
    हर किसी की आँखों में शरमिन्दग़ी सोयी हुई

    कमाल - कमाल !

    उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया
    आज है ताबूत में इक वापसी सोयी हुई

    यह महज़ एक शेर नहीं, हृदय क्रोड़ की खौलती हुई भावनाओं का बहता हुआ लावा है !

    देर कल दफ़्तर से निकला, थी गली सोयी हुई
    याद फिर से आ गयी आवारग़ी सोयी हुई

    किस महीनी से क्या नहीं कह गये भाई नकुल ! ज़िन्दाबाद !

    ये तीनों शायर युवा हैं. तीनो सामाजिक तौर पर जागरुक हैं. तीनों के विचार समस्याओं से आँखें मिलाते हुए शाब्दिक हुए हैं. आने वाले समय के लिए आप तीनों घनी उम्मीद बन कर प्रस्तुत हुए हैं.

    हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ.

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    1. आदरणीय सौरभ जी
      बहुत बहुत आभार. आगे और बेहतर करने का प्रयास करूँगा

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ सर जी। अच्छा करने की प्रेरणा मिली है।

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    3. सौरभ जी, बहुत आभार आपके शब्दों ने मनोबल बढ़ा दिया ।जर्रा नवाजी का शुक्रिया।

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  7. पंकज जी, यकीनन आपका यह आयोजन वर्तमान में न केवल पुराने रचनाकारों को साथ जोड़कर उम्दा कलाम कहलाने का माध्यम है। बल्कि नए रचनाकारों को भी ऊर्जा और प्रेरणा देता है। दिनेश कुमार जी के मतले से लेकर गिरह के शेर तक सभी में उनकी गहरी सोच साफ झलक रही है। प्रकाश पाखी जी, आपका हर शेर उम्दा है, लेकिन पिता का दर्द वाला शेर बहुत दिनों तक जेहन में रहने वाला है। नकुल गौतम जी की शायरी भी उनके उज्जवल भविष्य का संकेत दे रही है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शाहिद साहब।

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    2. बहुत आभार शाहिद साहब।

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  8. आदरणीय पंकज जी, अपने तरही मुशायरे में मुझे स्थान देकर आपने अनुगृहीत किया है। बहुत बहुत शुक्रिया सर जी। गूगल सर्च के दौरान अक्तूबर में आप का ब्लॉग पहली बार देखा। पिछली कई पोस्ट पढ़ी। आनंद आ गया। तब दीपावली का तरही चल रहा था। तब से इस ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ। बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
    आप सब उस्ताद शायरों व सम्मानित सज्जनों ने मेरी रचना पढ़ी, यह जान कर अच्छा लगा। छोटे से प्रयास को भी आप ने मेरा उत्साह व हौसला बढ़ाने के लिए खुले दिल से सराहा, बहुत बहुत आभारी हूँ। आगे और अच्छा करने की प्रेरणा मिली है।

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  9. वाह दिनेश जी । बेहतरीन ग़ज़ल । सामाजिक सरोकार की बात को रखते हुए आपने बड़े सुन्दर शेर कहें । पढ़कर बहुत अच्छा लगा । ढेर सारी बधाई और शुभकामनायें ।

    हर जगह बेबसी सोई हुई , क्या खूब कहा आपने प्रकाश जी । गम की फितरत पर आपने तो लाजवाब शेर गढ़ दिया । वाह वाह वाह ,सभी शेर कमाल के है । बधाई स्वीकारें ।

    नकुल जी , आपने इंसानियत को दिखने वाली शेर में जान डाल दी । समाज का चित्रण ,भिखारी ,कम्बल ,वाह क्या चित्र उकेरें हैं आपने ।एकदम आज की दुनिया के आस-पास रोशनी डालती हुई एक बेहतरीन ग़ज़ल । बधाई और ढेर सारी शुभकामनायें ।

    पंकज जी का जितना शुक्रिया अदा करूँ ,कम है ,इतने व्यस्तता के बावजूद भी कार्यक्रम निरंतर बड़े ही सुन्दर और सुनियोजित तरीके से चल रहा है । आपके जज्बे को सलाम करता हूँ । हम सभी के प्रति आपका प्रेम देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है । आज की प्रस्तुति भी लाजवाब थी । पुराने शायरों के साथ नए शायरों को एक प्लेटफार्म पर मौका देकर आप उनका हौसला बढ़ाते है । याद सराहनीय और अनुकरणीय भी है । आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला है । ऐसे ही स्नेह बना रहे। आगामी कार्यक्रम के सफलता के लिए अग्रिम बधाई और शुभकामनायें । प्रणाम ।

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    1. आदरणीय विनोद जी
      बहुत बहुत आभार.

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    2. शुक्रिया विनोद जी।आप की पसन्दगी मुझे बहुत प्रेरणा देगी।

      हटाएं
  10. अपनी बात पंकज जी को धन्यवाद देने के साथ शुरू करती हूँ। क्या ही सुन्दर तरीके से शायरों के कलाम से पाठकों को रूबरू करवाया है।भई वाह....
    तीनो ही कलमकारों ने खूब मंजर उकेरे हैं।
    दिनेश जी की नायाब गिरह हो,शायरी के सोने का दर्द हो की हो रहे अपराधों हेतु दरिंदगी खूब वस्तविक चित्रण है आपके कहन का, दाद क़ुबूल करें
    प्रकाशजी ने पिता के दर्द को इस खूबी से बयाँ किया है की बरबस मन भर आता है,गम और ख़ुशी का साथ होना सिक्के के दो पहलुओं को दिखा गया बहुत अछि ग़ज़ल हुई है प्रकाश जी। मुबारकबाद क़ुबूल करें

    नकुल जी की ग़ज़ल के कुछ शेर पुराने दिनों की सैरकरवाते हैं वो सोती हुई डायरी,पुराना बॉक्स....हम भी लंबा चक्कर लगा आये इन शेरों के साथ।
    बतौरे ख़ास चैन से मिटटी के सोने की दुआ करना वाह .....उम्दा बहुत उम्दा कहा आपने
    दिली दाद क़ुबूल फरमायें गौतम साहब

    सादर
    पूजा भाटिया

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    1. पूजा जी,

      आपकी ग़ज़लें अक्सर पढता रहा हूँ.
      आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी, और पसंद की, ये पढ़ कर आश्वस्त महसूस करता हूँ.
      आगे और बेहतर करने की कोशिश करूँगा

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    2. बहुत आभार पूजा जी,आप ने उन भावों को महसूस किया जो लिखे समय मेरे जेहन में आये थे।

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  11. तीनों शायर एक से बढ़कर एक अश’आर कह गये। सामाजिक सारोकारों से जुड़े शे’र कहना कठिन इसलिए है कि हमें ख़ूबसूरत और नाज़ुक शब्दों को त्यागकर ज्यादातर कठोर और बदसूरत कहे जाने वाले शब्द इस्तेमाल में लाने पड़ते हैं। ऐसे शब्दों का परंपरागत रूप से ग़ज़ल में इस्तेमाल कम ही होता है। ऐसे शब्दों के सहारे एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल तो छोड़िये एक ख़ूबसूरत मिसरा भी कहना कठिन होता है। इन युवा शायरों की ये ग़ज़लें इस दॄष्टि से बारंबार सराहने योग्य हैं। मैं दिनेश कुमार जी, प्रकाश पाखी जी और नकुल गौतम जी को बारंबार बधाई देता हूँ।

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    1. आदरणीय सज्जन जी
      बहुत बहुत आभार. आगे और बेहतर करने का प्रयास करूँगा

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    2. शुक्रिया धर्मेन्द्र जी।आपकी हौसलाफजाई मुझे प्रेरणा देगी।आभार।

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  12. आदरणीय नीरज जी
    मेरा हौंसला बढ़ने के लिए मैं अपपका आभारी हूँ. मैं हमेशा कोशिश करूँगा की आपकी उम्मीदों पर खरा उतरुँ

    उत्तर देंहटाएं
  13. आप सभी का हौसलाअफजाई करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया।गुरुदेव सुबीर जी और गुरुकुल के साथीयों के कारण गज़ल से मोहब्ब्त हो गयी।बस इसलिए सुबीर संवाद का गहरा प्रशंसक हूँ।एक कम समझ पाठक से बढ़कर कुछ नहीं हूँ।नीरज जी।,तिलकराज साहब,शाहिद साहब,नकुल भाई.धर्मेन्द्र साहब,सौरभ जी,विनोद जी,पूजा जी आपकी और इस ब्लॉग के रचनाकारों के लेखन की सुंदरता हमेशा मुझे मोहित करती रही है।
    आप सभी का आभार।
    गुरुदेव आप कितनी सादगी और सरलता से मुशायरे को सहज ही उस ऊंचाई पर ले जाते है।यह आपकी मेहनत प्रतिभा और नव रचनाकारों को प्रोत्साहित करने का भागीरथी प्रयास है।निश्चित ही इसके परिणाम उत्साहवर्धक रहेंगे।
    आपका ब्लॉग अब साहित्य का संदर्भ ब्लॉग बन चुका है।इसको पढ़कर कोई भी नया पाठक अपनी ग़ज़ल की समझ को बढ़ा सकता है।
    आपका ह्रदय से आभार।
    सुबीर सम्वाद की गंगा अविरल बहती रहे।
    नकुल भाई ग़ज़ल तो आपने रची है।गौतम भाई इतने बारीक़ भाव उकेरते है बस उनकी रचनाओं की याद ताजा कर दी।आवारगी और पुराना बक्स डायरी और शायरी बेहद छू लेने वाले अल्फाज ।बधाई क़ुबूल करें।
    दिनेश भाई आप तो मंझे हुए शायर है।
    मर्दानगी सोई हुई
    जिंदगी और मुफलिसी वाले शेर बहुत पसन्द आये।

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    1. प्रकाश जी,
      तहे दिल से शुक्रिया

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  14. सब आलिमो फ़ाज़िल हैं सभी अहले नज़र हैं
    इस बज्म-ए- अदब में ना कोई छोटा बड़ा है
    तरही मुशायरे में आए सभी शायर अपने अपने अलग तरह के कहन,सोच और अदायगी के साथ अपनी शानदार हाजिरी दर्ज कर रहें हैं,इसमें फिर कोई क़ैद नहीं कि कोई नया है या पुराना है,इसी सिलसिले पर हस्ताक्षर हैं दिनेश कुमार प्रकाश पाखी और नकुल गौतम जी की गजलें |
    श्रृंगार पर कदाचित् सिर्फ लिखने के लिए कल्पना मात्र से शायद कोई लिख भी दे पर समाज में हो रहे किसी भी तरह के अन्याय या विचलित करने वाले हालत पर तब ही लिखा जा सकता है जब दूसरे का दर्द लहू बन कर रगों में फ़ैल जाये और उसका ज़ोर दिल थाम लेने को मजबूर कर दें | इसी मज़बूरी की नुमाइंदगी है शेर...... "बच्चियो पर बढ़ रहे ........" "शहर के हालत ........"
    "मुजरिमों का हौसला .........." "दर्द बिखरा है ......." "उस पिता का दर्द ........." "बाग़ था ख़ामोश बिलकुल ......". गर छापी होती न वो ......" कंबलो की इक दुका ....."
    सहर के फुटपाथ पर और कंबलो की इक दुका शेर पढ़ कर आगे बढ़ने नहीं देते बांह थम लेते हैं ,महसूस करवाते हैं मुफलिसी की कई तरह की चादरे ..ओह.. कम्बल और फुटपाथ एक बार को अहसास दे देते हैं हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड का |
    उस पिता का दर्द मुझे शहीद सैनिकों के पिता का ही नहीं एक और भी हालिया दर्द का अनुभव करा रहा है सच कहूँ तो अंतर्मन को कंचोट रहा है जो हमने हाल ही में छोटे और सबसे भारी कहे जाने वाले ताबूतो की सूरत में देखा |
    जिंदगी की काली हकीक़त का बयान इतने नाजुक से तरही मिसरे के चलते भी करा देने वाले इन तीनों लाज़वाब शायरों को बहुत बहुत सलाम |
    दिनेश जी के शेर "बुजदिलों के शहर में मर्दानगी सोई हुई ....." में मर्दानगी के मायने बड़े विस्तार में देखते हुए मैं इस शेर की तारीफ़ करती हूँ | दिनेश जी ने गिरह में तरही मिसरे को निराले अंदाज में पेश कर मन मोह लिया |
    "चाँद से आई उतर कर डालियों पर झूल कर ......." वाह वाह वाह क्या मिसरा है ......मुझे तो ताजमहल मूवी के बीना राय याद आ गयी, जब "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा....." गाने के सेकंड वर्शन में वो चाँद से धरती तक आने वाली सीडियो से होती हुई आती हैं और हर क़दम के साथ पोड़ी पर चराग रोशन हो जाता है |
    "जब से जानी गम की फितरत फ़िक्र मैं करता नहीं ..." कमाल की बात कही है प्रकाश जी ने | देखें तो जिन्दादिली का पूरा फ़लसफ़ा है ये शेर |
    रूह को जाते हुए देखा नहीं जन्नत कभी...." क्या ही बढ़िया बात कही गौतम जी ,ग़ालिब ने भी तो कहा है " हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त ............."
    सभी बेहतरीन गजलों के लिए शायरों को बहुत बहुत बधाईयाँ | ढ़ेरों तालियां |
    सीहोर के इतने मनोहारी,अपनेपन ,और साहित्यपन के चर्चे हो गए हैं कि जिज्ञासा बढ़ गयी है , अब एक पोस्ट सीहोर पर बनती हैं |जा नहीं सकते अभी पर यंही से देख सकते हैं लफ्जों के आईने में |

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    1. बहुत बहुत बहुत शुक्रिया पारुल जी
      ग़ज़ल को इतना गहरा तो उसका रचनाकार भी नहीं पढता।अगर आप किसी की ग़ज़ल को अपना समय दे देते है तो उसकी ग़ज़ल सार्थक हो जाती है।भावों की गहराई समझकर आपने जो हौसलाअफजाई की है उससे अभिभूत हूँ।आपका ह्रदय से आभारी हूँ ।आपकी नजरे इनायत नाचीज पर बनी रहे।

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया पारुल जी

      आपने ग़ज़ल पढ़ी यह जान कर अति प्रसन्न हूँ
      मेरे शेर से आपको ग़ालिब जी का मिश्रा याद आया. बहुत धन्य हो गया

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  15. प्रस्तुति पर मुग्ध हूँ।तीनों युवा शायरों को बेहतरीन ग़ज़लों के लिए हार्दिक बधाई।बहुत सहजता से बहुत खूबसूरत ग़ज़लें रची गयी हैं यह ग़ज़ल के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। टिप्पणी नहीं कर रहा बाकी सुन्दर और सटीक टिप्पणियों के साथ सहमत हूँ।

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    1. शुक्रिया द्विजेन्द्र साहब,आप जैसे गुणी व्यक्ति के दो शब्द भी हमारे जैसे नौसिखियों के लिए प्रेरणास्पद है।

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    2. शुक्रिया Sir
      आशीर्वाद बना रहे

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  16. दिनेश ने जिस तरह तरही को समाजिक सरोकार का जामा पहनाया है, वह युवा तेवर मन को आश्वस्त करता है! पुख़्ता शेर, तैश, और सम्वेदना से प्रभावित करते हुए! अनूठी गिरह! मन खुश हुआ! जीते रहिए!

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  17. वापसी का यूँ चिर निंद्रा में सो रहना - स्तब्ध करने वाला बिम्ब!
    बाग था खामोश... बहुत ज़रूरी शेर!
    गिरह तो जैसे एक्शन रिप्ले कर रहा हो चाँदनी की यात्रा का! सुभानअल्लाह!
    गम की फितरत वाला मिसरा बहुत खूब!

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    1. आदरणीय शार्दूला दीदी आपका शुक्रिया,
      बहन को भाई की हर चीज अच्छी ही लगती है।हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

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  18. गौतम के रुमानी शेर बड़ी नज़ाकत से कहे हुए! हौले से ज़हन में उतर के नए नक्श खींचने वाले, अच्छी कहन वाले! हाँ अपने फ़ौज़ी की याद दिलाने वाले भी!

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  19. युवा शायर दिनेश कुमार का सामाजिक समस्याओं से सरोकार आश्वस्त करता है , आशा जगाता है कि यह पीढ़ी जो सामाजिक अन्याय के प्रति सजग है अवश्य ही सुखद बदलाव लाएगी. ऐसी सोचों को अभिव्यक्त करने के लिए जो सशक्त प्लेटफार्म आप मुहैया कर रहे है उसके लिए समाज और साहित्य पंकज जी आपके लिए कृतज्ञ रहेगा. .

    प्रकाश पाखी:
    ========

    पाखी जी के सभी शेर उम्दा है।
    चाँद से आई उतर कर डालियों पर झूलकर
    मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई
    इस चित्रण ने तो मोगरे की डाली पर झूला ही झुला दिया है.

    नकुल गौतम:
    =========
    इक पुराना बक्स खोला, वक़्त मुस्काने लगा
    चल पड़ी यादों की चाबी से घड़ी सोई हुई
    यही तो शायरी है की यादो की चाबी से माज़ी का दरीचां खोल दिया , बहुत खूब.

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    1. आदरणीय मंसूर अली साहब,बहुत बहुत शुक्रिया।आपकी ये तारीफ़ और पसन्दगी मेरे लिए बेशकीमती है।आभार।

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    2. आदरणीय मंसूर अली साहेब,
      तहे दिल से शुक्रिया |

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  20. तीनों शायरों की गजलें कमाल कर रही हैं ...
    दिनेश जी का हर शेर आज की कडवी सच्चाई से रूबरू करा रहा है ... ग़ज़ल के माध्यम से समाज को आइना दिखाती हुयी ग़ज़ल की ढेरों बधाई ... स्वागत है दिनेश जी का इस मंच पर ...
    पाखी जी ने बहुत ही कमाल के शेर लिखे हैं ... उस पिता का दर्द देखो ... आँखें नम कर जाता है ये शेर ... और आखरी शेर भी दिल में सीधे उतर जाता है ...
    नकुल जी का तो हर शेर कितने ही बिम्ब खड़े कर जाता है आँखों के सामने ... मतला ही इतना लाजवाब है की सहज ही खींच लेता है अपनी तरफ ... गिरह भी कमाल की लगाई है ... कंबलों की इक दुकां ... ये शेर भी दिल को बहुत छूता है ... स्वागत है नकुल जी इस मंच पर ...

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    1. शुक्रिया दिगम्बर साहब।आभार।

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    2. शुक्रिया दिगम्बर साहब।आभार।

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    3. आदरणीय दिगंबर जी
      बहुत बहुत आभार

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