शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

आइये आज कुछ और आगे चलते हैं तीन शायरों के साथ श्री राजेन्‍द्र तिवारी, श्री सत्‍यप्रकाश शर्मा और श्री नीरज गोस्‍वामी जी के साथ।

मित्रो बहुत अच्‍छे तरह से कोई कार्य हो जाए तो उस कार्य के पश्‍चात जो थकान होती है वो भी मीठी लगती है। शिवना प्रकाशन का आयोजन बावजूद इसके कि फूफाजी नहीं पहुंच पाए, अच्‍छी तरह से हो गया। आप हैरत में होंगे कि ये कौन से फूफाजी हैं। असल में हर विवाह में सबसे ज्‍यादा ध्‍यान फूफाजी का ही रखा जाता है और यदि किसी कारण वश फूफाजी किसी शादी में नहीं आ पाएं तो सबसे ज्‍यादा प्रश्‍न भी फूफाजी के ही बारे में पूछे जाते हैं कि क्‍या हो गया, कुछ नाराज़गी है क्‍या। किस बात पर क्‍या हो गया। आदि आदि। शिवना प्रकाशन के आयोजन में भी यही हालत श्री नीरज गोस्‍वामी जी की है। वे नहीं आएं तो हर व्‍यक्ति उनके बारे में पूछता है कि वे क्‍यों नहीं आए। काय कछु नाराजगी तो नइ है फूफाजी को। तो बस ये कि फूफाजी नहीं आ पाए मगर कार्यक्रम ठीक से हो गया। फूफाजी की कमी बनी रही। सब पूछते रहे। तो फूफाजी के न आने का गम आज उनकी ग़जल सुन कर दूर करते हैं। आज तीन शायर हैं। इनमें से एक तो फूफाजी ही हैं और बाकी के दोनों पहली बार आ रहे हैं। हालांकि आ ये फूफाजी के साथ ही रहे हैं मतलब ये नीरज जी के मित्र हैं तथा उनके ही द्वारा इस ब्‍लॉग का बताने पर यहां अपनी रचनाएं लेकर पहली बार आए हैं । तो इनका स्‍वागत है। पहले एक पारिवारिक चित्र जो कि 19 जनवरी को श्री बब्‍बल गुरू द्वारा लिया गया।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

rajendra tiwari

राजेन्‍द्र तिवारी

राजेंद्र जी कानपुर से हैं तथा आपका एक ग़ज़ल संग्रह 'संभाल कर रखना' प्रकाशित हो चुका है। देश भर की प्रमुख पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें प्रकाशित होती रहती हैं। आप अपनी अनूठी शैली की ग़ज़लों के लिए जाने जाते हैं। इस मुशायरे में पहली बार आ रहे हैं सो आपका स्‍वागत है ।

चाँद की बाहों में, जैसे हो नदी सोई हुई
मोगरे के फूल पर, थी चाँदनी सोई हुई

नींद को बेचैन थीं रातें हवेली की, मगर
चैन से फुटपाथ पर थी ज़िंदगी सोई हुई

ताज की सूरत में थी यमुना किनारे रात में
चाँदनी ओढ़े हुए..... कारीगरी सोई हुई

कह रही थी रात तुम इनको जगाते क्यों नहीं
हैं दिये ख़ामोश, क्यों है रौशनी सोई हुई

'कृष्ण' ने यह भी बताया है कि 'नीरो' मत बनो
शंख गूंजे वक़्त पर हो 'बांसुरी' सोई हुई

ये तो हम पर है कि हम चाहे जिसे आवाज़ दें,
हर किसी के दिल में है नेकी-बदी सोई हुई

वक़्त हर दम एक सा ''राजेन्द्र'' रहता ही नहीं,
जाग सकती है तेरी क़िस्मत कभी सोई हुई

वाह वाह वाह, क्‍या शेर कहे हैं। एक से बढ़कर एक शेर। मेरे लिए तो छांटना ही मुश्किल हो रहा है कि किसकी बात करूं।  फिर भी बात मतले से ही की जाए जिसमें दो दो उपमाएं एक दूसरे में गुंथ कर अनूठा रंग संयोजन प्रस्‍तुत कर रही हैं। नदी और चांद तथा मोगरा और चांदनी। वाह क्‍या बांधा है। और उसके ठीक बाद के शेर में दृश्‍य एकदम भिन्‍न हो गया है। नींद को बेचैन थी रातें हवेली की में फुटपाथ पर सोती जिंदगी का कमाल का चित्रण है। खूब । और फिर उसके बाद ही अगले शेर में चौंकाने वाला काफिया लगाया गया है। कारीगरी के सोने की बात और उसके पहले मिसरा उला में ताज और यमुनना का बिम्‍ब बहुत सुदंर बना है। कृष्‍ण का शेर बहुत गहरा अर्थ लिए हुए है। बहुत गहरा कब बांसुरी बजानी है और कब शंख फूंकना है ये पता होना चाहिये। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है वाह वाह वाह।

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सत्‍यप्रकाश शर्मा

सत्‍य प्रकाश जी भी कानपुर से ही हैं। आपका भी एक ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी महकती है' प्रकाशित हो चुका है। आप जाने माने शायर हैं। देश भर की पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें प्रकाशित हो चुकी हैं । आप कानपुर में भारतीय स्‍टेट बैंक में उप प्रबंधक के रूप में पदस्‍थ हैं ।

जागती थी एक ख़ुश्‍बू दूसरी सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

थी फ़िज़ा के नर्म बिस्तर पर नमी सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

जागते ही इसके गुलशन जाग जाएगा, मगर
ये चमन की राजरानी है अभी सोई हुई

मुफ़लिसों के वास्ते सूरज कभी उगता नहीं
उनके हाथों की लकीरें आज भी सोई हुई

हादसों से इसने कोई भी सबक सीखा नहीं
जाने कब बेदार होगी ये सदी सोई हुई

वाह वाह वाह क्‍या मतला कहा है । मिसरे पर क्‍या गिरह लगाई है। जागती थी एक खुश्‍बू दूसरी सोई हुई। वाह वाह वाह। और दो शेरों में गिरह लगाई है। मतलब दो दो मतले हैं। दूसरे में भी उतना ही कमाल रचा है। जागते ही इसके गुलशन जाग जाएगा में राजरानी काफिये की क्‍या कही जाए। कमाल का काफिया लिया है। राजरानी । वाह वाह। सच में ग़ज़ल काफिये का ही खेल है। उस्‍ताद कहते थे कि बेटा ग़ज़ल की जान काफिया होता है। इसके बाद के दोनों शेर सामाजिक सरोकारों के प्रति युग चेतना को जगाने का कार्य कर रहे हैं और बखूबी कर रहे हैं। मुफलिसों के वास्‍ते में सूरज के नहीं उगने तथा हाथों की लकीरों के सोने का दृश्‍य बहुत मार्मिक है। और उसके बाद के शेर में सदी के सोए हुए होने में पूरे समय को खूब उठाया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । वाह वाह वाह। कमाल ।

Copy of neeraj ji

नीरज गोस्‍वामी

आप वे फूफाजी हैं जो इस बार शिवना प्रकाशन के कार्यक्रम में नहीं आए और जिनके बारे में हर कोई पूछता रहा।

देख कर आँखे किसी की मदभरी सोई हुई
जागती हैं ख्वाइशें सारी दबी सोई हुई
 

मत उतरना यूँ बिना सोचे हुए इसमें कभी
याद रख होती बहुत गहरी नदी सोई हुई

नफरतों में डूब कर सब भूल बैठे नाचना
आ बजा फिर से मुरारी बाँसुरी सोई हुई
   

बे-कसूरों को सजा ये क्यूँ कि गुज़रो आग से
पूछती सब से जमीं में जानकी सोई हुई

ग़र तुझे दिखता नहीं सबमें 'वही' तो मान ले
है तेरी पूजा इबादत बन्दगी सोई हुई

जागने से टूट कर बिखरे जो सारे ख़्वाब, वो
देख कर फिर से हँसी है बावरी सोई हुई

चाँद ने देखा उसे तो देखता ही रह गया
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

लफ़्ज़ ही मिलते नहीं कैसे बयां मंज़र करूँ
मेरे पहलू में थी जब तू अध-जगी सोई हुई

ख्वाब में नीरज किसी ने छू लिए होंगे तभी
सुब्‍ह तक है इन लबों पर चाशनी सोई हुई

अहा मतले में क्‍या खूब कमाल कर दिया है । मन कर रहा है कि मतले से आगे ही नहीं बढ़ा जाए। देख कर आंखें किसी की मदभरी सोई हुई में अगला मिसरा ख्‍वाहिशों के जागने का जादू जगा रहा है। वाह वाह। और उसके ठीक बाद का शेर नदी के गहरे और सोए होने की बात को क्‍या सुंदर तरीके से कह रहा है। और एक शेर में ऐसा ही जादू जगा दिया है वो शेर है गर तुझे दिखता नहीं सबमें वही, में पूजा इबादत और बंदगी के सोए हुए होने की बात क्‍या सलीके से कह दी है। वाह वाह । और एक अनूठा दृश्‍य रचा गया है मिसरा ए तरह पर गिरह लगाने में । चांद ने देखा उसे तो देखता ही रह गया, वाह क्‍या सुंदर तरीके से गिरह का मिसरा रचा है। देखता ही रह गया की तो बात ही निराली है । और एक चित्र अगले शेर में अधजगी सोई के माध्‍यम से बहुत ही सुंदर बनाया है। ऐसा लग रहा है कि पूरा का पूरा दृश्‍य शब्‍दों से बना दिया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है नीरज जी ने । क्‍या बात वाह वाह वाह।

तो इन तीनों शायरों की ग़ज़लों का आनंद लीजिए और दाद देते रहिए। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

27 टिप्‍पणियां:

  1. तीनों शायरों को बेहतरीन गजलों के लिये मेरा सलाम।

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  2. वाकई बेहतरीन ग़ज़लें हुई हैं... अपनी ही कही हुई ग़ज़ल के मिसरे के इर गिर्द फिर से एक ग़ज़ल कहना .... यह कैसा अनुभव होगा ... नीरज गोस्वामी जी से बेहतर भला किसे एहसास होगा ... बाकी दोनों शायरों की गज़लें भी बहुत अच्छी लगी..

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  3. राजेन्द्र साहब ने बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है। एक से बढ़कर एक शे’र हैं। कोई एक कोट करना मुश्किल हो रहा है। बहुत बहुत बधाई राजेन्द्र साहब को इस ग़ज़ल के लिए।

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  4. नीरज जी हमेशा ख़ूबसूरत ग़ज़ल कहते हैं। उनके अश’आर का अलग ही अंदाज है बिल्कुल मोगरे के फूलों की तरह। बहुत बहुत बधाई उन्हें इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए।

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  5. सत्यप्रकाश साहब के अश’आर भी बहुत ख़ूबसूरत हैं। उन्हें बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल के लिए।

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  6. बिना फूफाजी के भी कार्यक्रम सफलता पूर्वक सम्पन्न करने के लिए सुबीर जी को बारंबार बधाई। :)))

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  7. भई वाह क्या खूब मंजर बाँधा है आप तीनों ने ग़ज़लों में की पूरी तरह तर हुए जा रहे हैं। राजेन्द्र जी के यमुना ताज और कारीगरी वाले शेर ने तो कमाल ही कर दिया राजेंद्र जी ढेरों दाद क़ुबूल फरमायें इस खूबसूरत ग़ज़ल के नाम।
    सत्य प्रकाश जी ने एक नहीं दो दो गिरहें लगायी है और कमाल लगायी है। भई बहुत उम्दा। सुन्दर ग़ज़ल। बधाई
    नीरज जी के बारे में क्या कहूँ ?छोटा मुंह बड़ी बात....
    जीतने खूबसूरत दिल के आप मालिक हैं आपकी ग़ज़ल भी उतनी ही पुरअसर है।
    ज़हन पर अपनी छाप छोड़ती हुई। ईश्वर से प्रार्थना है की आपके क़लम और कलाम को यूं ही खूबसूरती से नवाज़े।
    आज के शायरों के लिए एक सुर में एक ही बात.....
    आज के आनंद की जय....दाद ही दाद
    पंकज जी ,आपका शुक्रिया कि एक ही मंच पर इतनी विविधताओं से पूर्ण ग़ज़लें लाने का । हम सीखने वालों की लॉटरी ही लग गयी। धन्यवाद
    सादर
    पूजा

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  8. फूफाजी कब फूँ-फॉं जी हो जायें, पता नहीं इसलिये उनसे डर ही लगता है लेकिन ये फूफाजी नाज़ुक मिज़ाज़ हैं, नफ़ासत वाले हैं इसलिये माना जा सकता है कि ' कुछ तो मजबूरियॉं रही होंगी, वरना फूफा न क्‍यूँ यहॉं होता' ।
    राजेन्‍द्र तिवारी जी और सत्‍य प्रकाश शर्मा जी को पहली बार पढ़ रहा हूँ शायद, प्रभावित हूँ। मैं चाशनी को बॉंधने के प्रयास में दो दिन रहा फिर आत्‍मसमर्पण कर दिया लेकिन नीरज जी ने जिस खूबसूरती से इसे बॉंधा वह देखने काबिल है।
    आज कोई ऐसा शेर नहीं दिख रहा जिसे छोड़ा जा सके और कट कापी पेस्‍ट न होने से सभी पर कुछ कहना कठिन लग रहा है।
    एक आध हफ़्ते में भभ्‍भड़ कवि की आमद की संभावना बनती दिख रही है।

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  9. यूं तो राजेंद्र जी की पूरी ग़ज़ल लाजवाब है पर नींद को बेचैन थी रातें हवेली की..... एक अमर शेर हो गया है जिसके लिए आपको बहुत बधाई। सत्यप्रकाश जी की ग़ज़ल के आखिरी दो शेर गागर में सागर की तरह हैं.… बहुत उम्दा ।

    नीरज जी का तो कहना ही क्या । हर एक शेर अपने आप में नगीना है । सोई हुई गहरी नदी और सब भूल बैठे नाचना का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया है । नीरज जी जैसा ज़िंदादिल, खुशमिजाज और सकारात्मक इंसान ही ऐसी बात कह सकता है। इबादत वाला शेर भी बहुत गहरा है और ज़िन्दगी की असलियत बयां करता है। आखिरी शेर ने तो गज़ब ही ढा दिया है नीरज जी, लबों पर चाशनी क्या बात क्या बात

    उम्दा ग़ज़ल के लिए एक बार फिर आपको ढेरों बधाईआं

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  10. फूफाजी की इत्ती तारीफ़ पढ़ के बुआजी नाराज हो गयीं हैंगी

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. इसलिये ही आ न पाये जश्न में फ़ूफ़ा वहाँ
    थीं भुआजी कुछ खफ़ा वे रह गई सोई हुई

    जनवरी उन्नीस की उस शाम को सीहोर में
    मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

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  13. जिससे आत्मीयता होनी हो उस से जरूरी नहीं कि रूबरू मिला जाय और न होनी हो तो साहब बरसों का साथ भी बेमानी होता है। राजेंद्र जी से मैं कभी मिला नहीं सिर्फ मोबाईल पर ही बात होती है और जब होती है तो ऐसा लगता है जैसे हम लोग आमने सामने बैठे बेतकल्लुफी से बतिया रहे हों। ये ही बात मेरे और बहुत से मित्रों पर भी लागू होती है। इसी कड़ी में शाहिद मिर्ज़ा साहब का नाम भी मैं खास तौर पर लेना चाहूंगा।

    अब बात ग़ज़लों की , भाई राजेंद्र जी की ग़ज़लों से मेरा परिचय उनकी किताब "संभाल कर रखना " के माध्यम से हुआ था, जिसकी चर्चा मैंने अपने ब्लॉग पर चल रही "किताबों की दुनिया " श्रृंखला में भी की है । वो उस्ताद शायर हैं उन्होंने मेरे आग्रह पर न केवल खुद शिरकत की बल्कि अपने साथ अपने मित्र उस्ताद शायर सत्य प्रकाश जी को भी ले आये। मैं इन दोनों का तहेदिल से शुक्र गुज़ार हूँ। "बेमिसाल गिरह वाले शेर के साथ उन्होंने अपनी ग़ज़ल का आगाज़ किया है चाँद नदी मोगरे फूल और चांदनी का मनमोहक दृश्य जीवंत कर दिया " ताज की चांदनी रात में ख़ूबसूरती का क्या खूब मंज़र खींचा है , कृष्ण के गीत ज्ञान को अद्भुत ढंग से शेर में बाँधा है ऐसा चमत्कार सिद्धहस्त शायर ही कर सकता है। आपकी लेखनी को प्रणाम करता हूँ राजेंद्र जी।

    सत्यप्रकाश जी किताब "रौशनी महकती है " पढ़ कर मुझे पता चला वो किस कदर खूबसूरत शायरी करने वाले शायर हैं। इस किताब का जिक्र भी आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं। चांदनी में सोयी हुई खुशबू का जिक्र चमत्कारी है.क्या लाजवाब गिरह शेर कहा है वाह वाह वाह वाह , राजरानी वाला काफ़िया तो मास्टर स्ट्रोक है इस ग़ज़ल का । सामाजिक सरोकार से ओतप्रोत बाकि के शेर ढेरों दाद लायक है। क्या बात है सत्य प्रकाश भाई वाह वाह वाह - शायरी।

    ऐसे दिग्गज शायरों के बीच खुद को पा कर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ प्रभु।

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    1. आपने याद रखा नीरज जी, बहुत बहुत बहुत शुक्रिया।

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  14. आदरणीय पंकजभाईजी, नीरज भइयाजी फूँ.. फाँ... कब्बो नई करते. चाह्ं तो अंगूठा टिपा लें.. सो, आपके जंगा नई आए तो कउनी बैताली कारन रहा हैगा.. कोन ठेकाना ऊ ’मोगरिया’ की नाजुक डढ़िया पर झुलुआ डारे कजरी गाय रिये हों.. सावन से पहिलहीं.. :-)))
    हा हा हा.. .

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  15. “शंख गूँजे वक्त पर हो बाँसुरी सोई हुई” से चल कर “ मुफ़ैसों के वास्ते सूरज कभी उअगता नहीं”
    तक के अशआरों न बताया कि कितनी खूबसूरती से सहज बात को बयाँ किया जा सकता है.सत्यप्रकाशजी और राजेन्द्रजी की सुन्दर गज़लों के लिये आपको धन्यावाद.

    भाई नीरज जी—जो बात मैने कहनी थी वो आपने अपनी गज़ल में पिरो दी.

    “लफ़्ज़ ही मिलते नहीं” कैसे करूँ तारीफ़ मैं
    आपके हर शेर में है ताजगी सोई हुई.

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  16. खूबसूरत पारिवारिक चित्र बहुत सी दुआएं।
    चाँद की बाँहो में जैसे हो नदी सोयी हुई
    मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोयी हुई …… मान ही लें अगर चाँद के बाँहे हैं और उन में नदी सो रही है वाह वाह क्या अद्भुत नज़ारा हो। कमाल कल्पना राजेन्द्र जी को बहुत बहुत बधाई इस शेर के लिए
    "ताज की सूरत में ……………" "ये तो हम पर है.......... बहुत ही खूबसूरत शेर पूरी की पूरी ग़ज़ल ही अपने कहन ,बिम्बों , रवानगी में कसी हुई। राजेन्द्र जी को बहुत शुभकामनाएं।
    जागती थी एक खुश्बू दूसरी सोयी हुई। … वाह वाह क्या बात है ,,,, थी फ़िजा के नरम बिस्तर पर। …… किसी एक शेर की बात नहीं कही जा सकती सत्यप्रकाश जी की पूरी गजल ही नरमाहट लिए है मज़ाल जो एक भी लफ्ज़ पढ़ने में जुबान मुड़ी हो के जरा भी कर्कश कोई लफ्ज हो। क्या बात है ये तो ग़ज़ल के जानकर ही बताएंगे पर ये ग़ज़ल बहुत नरम रवानगी लिए हैं जाने क्यूँ ,नामालूम।
    हर शेर बाकमाल बहुत बहुत शुभकामनाए और धन्यवाद सत्यप्रकाश जी को इतनी खूबसूरत ग़ज़ल पढ़वाने के लिए।

    सर के लिए क्या कहें ….......... "तेरे होते हुए महफ़िल में चराग जलाते हैं
    कितने सदा लोग हैं सूरज को दिया दिखाते हैं "
    नीरज सर के लिए कुछ कहने की हैसियत ही नहीं। अच्छा, और अच्छा ,सबसे अच्छा तो वंहा ढूंढेंगे आप जंहा संशय होंगे । और गुरु के लिए संशय नहीं होते, गर होते हैं तो आप शिष्य नहीं होते।
    पर क्यूंकि मैं बहुत दुष्ट और उदण्ड छात्र हूँ। और आदत सी पड़ गई है यंहा टिप्पणी करने की सो ,.... लो एक शेर सर का याद आ गया "पड़ गयी तेरी आदत सी अब तो मुझे , और आदत कंही छूटती है प्रिये "
    सो आदतन सर की अनुमति के साथ मतले का जिक्र करती हूँ …नीरज सर की ग़ज़ल देखते ही आप जो ढूंढने लगते हैं वो मतले में ही आपको मिल गया बहुत ही नाजुक शेर वाह वाह। "मत उतारना ....... " बहुत गहरा और बहुत सीख लिए शेर.. जिंदगी से जुडी गहरी सीख ये वो खासियत है जिसके सिवा नीरज सर की कोई ग़ज़ल मैंने तो नहीं पढ़ी। "आ बजा फिर से मुरारी। … वाह पूरा रास का नज़ारा ही सामने आ गया हो ज्यूं। "बे कसुरो को सज़ा क्यूँ …………रुला देने वाला शेर,गुस्सा देने वाला शेर ,इतिहास पढ़ कर सबसे ज्यादा बेबसी देने वाला शेर और जानकी पूछ भी जमीं से रही है उफ्फ उफ़्फ़।
    चाँद का ख़ुद चांदनी को देखना, लफ्जों का न मिलना ,और चासनी क्या खूब सब अशआर हैं ,किसे रखें,किसे नहीं कल एक शेर ले कर जाना सीखा था आज पूरी ग़ज़ल ले जा रही हूँ। बहुत बहुत सुन्दर, बावरी की हसी से भी सुन्दर ग़ज़ल।

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  17. वाह वाह वाह,आज की प्रस्तुति भी बेहद कमाल की ।
    राजेंद्र जी , आपका कितना शुक्रिया अदा करूँ ,क्या खूबसूरत शेर आपने पढ़वाया हमें । बेहद शालीन और प्रभावी शेर । खास कर "नींद को बेचैन " और "ये तो हम पर है " दिल में बस गया । बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें ।

    दो मतलों के साथ एक शानदार प्रस्तुति , सत्यप्रकाश जी आपको बहुत बहुत बधाई । "हादसों " वाले शेर को बहुत बहुत बहुत कमाल के , वैसे सभी शेर लाजवाब । शुभकामनायें ।

    नीरज जी के ग़ज़ल का मै शुरू से इंतज़ार कर रहा हूँ ।आज पढने को मिला ,कुछ अच्छा महसूस कर रहा हूँ । शायद आपका व्यक्तित्व है जो कार्यक्रम में आपको सब पूछ रहें थे ।

    ग़ज़ल की बात करूँ तो वही पुरानी किन्तु ईमानदार बात करूँगा कि लाजवाब शेर बन पड़े हैं । पूरी ग़ज़ल शानदार है । मतले में आपने जो ख्वाइशें जगाया हैं वही से ग़ज़ल की सुंदरता समझ में आ रही है । "बेकसूरों ", "जागने से टूट कर " कुछ शेर हैं जो याद रह जायेंगे । प्रस्तुति कमाल की । आपको हार्दिक बधाई ।

    मुशायरा शत प्रतिशत से अधिक सफल है , पंकज जी को बहुत बहुत बधाई । प्रणाम ।

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  18. परिवार जिस कार्यक्रम से जुड़ जाता है उसमें चार चाँद लग जाते हैं ... जैसे की इस तरही में गुरुकुल के परिवार का मिलना ...
    राजेन्द्र जी का स्वागत है इस तरही में ... कमाल के शेर हैं सभी ... नींद को बेचैन थी ... बहुत ही लाजवाब और सचाई भरा शेर है ... ताज की सूरत के साथ कारीगरी ... सुभान अल्ला ... दिली दाद इस शेर पर ...और आखरी शेर भी बहुत ही उम्दा ... किस्मत के सच को बयान करता हुआ ....
    सत्य प्रकाश जी का भी स्वागत है ... लाजवाब ग़ज़ल से आगाज़ लिया है ... सच ही लिखा है की मुफलिसों के हाथों की लकीरें देर तक सोई रहती हैं ... और आखरी शेर तो सदी की कहानी कर रहा है ... इंसान सदा ही सोया रहता है ...
    नीरज जी के बारे में कुछ कहना तो बस में नहीं है ... मतले के शेर ने गज़ब ढा दिया ... मदभरी आँखों से ख्वाईशें का जगना ... सुभान अल्ला ... फिर सोई नदी का गहरापन ... बहुत लाजवाब ... इस सच को भी बाखूबी लिखा है ... बंदगी हो तो सब जगह वो ही दिखाई देता है ... गिरह भी बहुत लाजवाज बाँधी है ... और आखरी शेर तो बस अभी भी होठों पे चाशनी का आभास करा रहा है ...
    इस तरही का मज़ा बढ़ता ही जा रहा है ... तिश्नगी बुझ नहीं रही ...

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  19. तीनों ही ग़ज़लें अनुपम है। मुक्त कंठ से प्रशंसा करने की कला में मैं पारंगत नहीं हूँ। इतना ही कहूँगा कि कल से ही कईं बार ये ग़ज़लें पढ़ी हैं और हर बार नया आनंद मिला है। वाह

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  20. राजेंद्र तिवारी जी के सारे शेर काबिले दाद है, सुभानल्लाह.

    मतलेके दोनों शेरो में खूब गिरह बांधी है सत्य प्रकाश जी ने...
    थी फ़िज़ा के नर्म बिस्तर पर नमी सोई हुई
    मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

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  21. नीरज जी
    -------
    गर तुझे दिखता नही सब में 'वही' तो मान ले
    है तेरी पूजा, इबादत, बंदगी सोई हुई.

    नीरज जी ख़ालिस अपने ही रंग मे है.

    'नीरज़-ओ-पंकज' खिले है ताल में बन कर ग़ज़ल
    मोगरे के फूल पर हैं चांदनी सोई हुई

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  22. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  23. सबसे पहले पोस्ट पढ़ने के बावजूद कमेंट में इतना विलंब होगा, ये तो सोचा तक नहीं था। खैर कुछ तो मजबूरियां रही होंगी..
    सबसे पहले बात राजेन्द्र तिवारी जी की, नीरज गोस्वामी जी की मेहरबानी से इनकी पुस्तक संभालकर रखना.. की समीक्षा लिखने का मौका मिला। और फोन पर बात भी हुई। राजेन्द्र तिवारी जी की गजल उम्दा की हद से काफी आगे है। हर शेर खुद-बखुद दाद ले रहा है। बधाई राजेन्द्र तिवारी जी।
    सिलसिला जुड़ा तो देखिए सत्यप्रकाश शर्मा जी जैसी शख्सियत से मुलाकात भी इस मंच पर हो गई। अलग अलग अंदाज में लगाई गई गिरह, हर शेर दाद का हकदार है। मुफलिसी वाला शेर कमाल है। उम्मीद है आइंदा भी शर्मा जी की रचनाओं से रूबरू होने का मौका मिलता रहेगा।
    अब बात नीरज गोस्वामी जी की। उनके कार्यक्रम में शामिल न होने के बारे में पंकज जी काफी कुछ लिख चुके हैं। वैसे इसी सिलसिले से हमारे एक साथी शायर डा. सईद परवाना की गजल का मकता याद आ गया-
    कल बज्मे-चरागां में अजब बात हुई थी
    हर शमा से ये कहती थी कि परवाना किधर है..
    ये नीरज जी की शख्सियत की कशिश है, जो हर किसी को अपनी तरफ खींच लेती है। नीरज जी हर बात ये साबित करने में कोई कसर नहीं रखते कि वे जितने अच्छे इंसान हैं, उतने ही अच्छे शायर भी हैं।
    देखकर आंखें किसी की जैसा शेर दिल को छू जाता है। बेकसूरों को सजा..जैसे शेर में एक बड़ा सवाल खड़ा कर देते हैं। गर तुझे दिखता नहीं..जैसे शेर मानवता का कितना बड़ा संदेश है। ये कमाल नीरज जी की लेखनी और व्यक्तित्व का मिश्रण है।
    एक बार फिर से तीनों शायरों को बधाई, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  24. शाहिद भाई जो ख़ुद अच्छा होता है उसे पूरी दुनिया अच्छी नज़र आती है । मुझ जैसे साधारण शायर की प्रशंसा में आपका प्यार झलक रहा है । शुक्रिया ।

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