शुक्रवार, 15 मार्च 2013

आइये आज तीन और रचनाकारों की ग़ज़लें सुनते हैं, सुलभ जायसवाल, रजनी नैयर मल्‍होत्रा और विनोद पाण्‍डये की ग़ज़लें ।

आज मन बहुत भारी है । कुछ ही देर पूर्व एक वाहन शहर में आया है जिसमें काश्‍मीर के आतंकी हमले में मारे गये सैनिक ओमप्रकाश का पार्थिव शरीर था । मन में एक प्रकार का  सूनापन आ गया उस ताबूत को देखकर जिसमें ओमप्रकाश सोया हुआ है । ओमप्रकाश जो कुछ ही दिन पहले गांव आया था ।  अपनी छोटी सी बेटी को एक गुडिया और बेटे को सायकल दिलवा कर गया था । वो मासूम बेटी आज भी उस गुडि़या से खेल रही है । उसे नहीं पता कि गुडि़या दिलवाने वाला तो चला गया । मेरी मुट्ठी में एक पसीजा हुआ गुलाब का फूल था जो मैंने चुपचाप से उस वाहन पर उछाल दिया । और मैं करभी क्‍या सकता था । और हम कर भी क्‍या सकते हैं । हमारे हाथ में कुछ भी तो नहीं है । हम तो इतने संवेदनहीन हैं कि जब देर रात उस   शहीद के परिजन सूचना पाकर बीमार होकर अस्‍पताल पहुंचते हैं तो उन्‍हें धक्‍के देकर गार्ड हस्‍पताल से   निकाल देता है । नर्स उन्‍हें देखने से मना कर देती है । टीवी का पत्रकार उस छोटे से बच्‍चे को गोद में लेकर पूछता है उसके पिता के बारे में । और बेशर्मों की तरह उस वाहन पर फूल चढ़ाने हम सब एकत्र भी हो जाते हैं । वो भी गुट में बंटे हुए  कि उधर कांग्रेसी खड़े हैं तो भाजपाई इधर खड़े होंगे। मन दुखी है ।

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ये कैदे बामशक्‍कत जो तूने की अता है

आज की तरही शहीद ओमप्रकाश और काश्‍मीर हमले में मारे गये सैनिकों को समर्पित । आज मैं छोटे छोटे नोट लगा रहा हूं हर ग़ज़ल के बाद ।

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सुलभ जायसवाल

क्या आपने सुना है, क्या आपको पता है
ये बातें इनकलाबी जम्हूर में सज़ा है

माना वजीरे आज़म विद्वान और भला है 
ताला जुबान पर ये फिर किसलिए चढ़ा है 

मुखिया मिला जो अच्छा उम्मीद फिर जगी है 
टूटा प्रदेश था अब फिर से सँवर रहा है

कल हो गई शहादत नींबू का पेड़ की भी
छोटा सा घर था जिसमे गैराज आ घुसा है

बरसों बरस हैं लगते परिवर्तनों में यारो 
गूगल औ’ फेसबुक तो छोटा सा आंकड़ा है

दिलवालों की है दिल्ली, आया था सुन के बच्चा
राजा न राजधानी, बन में भटक गया है

सपनो को कल्पनाओं में जी के काटता हूं
'ये कैदे बामशक्कत जो तूने की अता है'

कुछ हाले-दिल 'सुलभ' तुम अपना भी गुनगुनाओ
जो वस्ल ने बुना था, जो हिज्र ने रचा है

मतला बहुत प्रभावशाली है । और उससे प्रभावशाली हुस्‍ने मतला है । दिलवालों की दिल्‍ली पर गहरा कटाक्ष किया है । इंटरनेट की दुनिया पर गूगल फेसबुक के माध्‍यम से गहरा व्‍यंग्‍य कसा है । अच्‍छी ग़ज़ल ।

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रजनी मल्होत्रा नैय्यर

ऐ ज़ीस्त देने वाले किस बात की सज़ा है
ये क़ैदे बामुशक्कत जो तूने की अता है

बिकते हैं बोलियों में खादी पहनने वाले
ये राज़ अंदरूनी सबको यहाँ पता  है

कल तक जो रास्तों  पर पाकेट मारता था
वो बन गया मिनिस्टर अख़बार में छपा है

सहरा को छान देखा, बस्ती-नगर में ढूंढा
अपने ही दिल के अन्दर हर एक सुख मिला है

मौसम था खुश्के जब तो, छत से थे देखे तारे
सावन में सारे घर में पानी टपक रहा है

महफ़िल में तेरी "रजनी" है छा गयी वीरानी
है हर तरफ ख़मोशी ये कैसा मयकदा है

खादी पहनने वालों की नीलामी का मंज़र ठीक उभरा है । पाकेटमार के मंत्री बनने का व्‍यंग्‍य भी सटीक है । और कबीर की तरह सुख को अपने ही अंदर तलाशने का  मंत्र शेर में बंधकर प्रभावशाली हुअ है ।

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विनोद पाण्डेय  

कच्चे घड़े है बच्चे, उनकी खता ही क्या  है।
है संस्कार क्या ये माँ बाप को पता है। 

सुनसान हो डगर तो चलना संभल संभल के
इंसान आज कल कुछ ज्यादा बदल गया है

सूरज की रोशनी से जग का मिटे अँधेरा
मन का मिटे अँधेरा सूरज किधर छुपा है

जनतंत्र लग रहा है कंकाल तंत्र जैसा
शासन से सुरक्षा के बदले में भय मिला है

पतझड़ के बाद मौसम कुछ इस कदर से  बदला
आया बसंत कब और कब ये चला गया है

जिनको गले लगाया वो पड़ गए गले ही
तब प्यार बांटना भी लगने लगी खता है।
 

कहने को साथ अपने है कायनात सारी
फिर भी  पता नहीं क्यों ये मन जुदा जुदा है

मतला एक बड़ी समस्‍या को लेकर सामने आया है । सूरज की रौशनी का प्रतीक बना कर बड़ी बात कह दी गई है । पतझड़ के बाद वसंत का न आना कई कई इशारों को समेटे है । आखिरी शेर में कायनात का साथ होना और मन का जुदा होना शेर का ऊंचाइयां दे रहा है ।

28 टिप्‍पणियां:

  1. तीनो ही गजले बहुत अच्छी है . आदरणीय सुलभ जी , आदरणीय रजनी जी और आदरणीय विनोदजी को इस खुबसूरत गजल के लीये बधाई

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  2. देश पर मर-मिटने वाले बनाये नहीं जाते. राष्ट्रभक्ति की शिक्षा नहीं दी जाती. ये संस्कार वातावरणजनित होते हैं. यही वातावरण ’देश की नींव’ आम जनों में नैतिकता के बीज बोता है. कृतज्ञ पुत्रों द्वारा अपने राष्ट्र के प्रति आत्मोत्सर्ग करना इसी वातावरण का नतीज़ा होता है. यही वह जज़्बा होता है जिस कारण एक सामान्य-सी दिखती ’माँ’ गोर्की को प्रभावित कर जाती है. एक लेखक ’उसकी माँ’ लिख जाता है.. .

    दुख यही है कि इस वातावरण में जीने वालों को ’शिक्षित’ करने का कुत्सित प्रयास पहले की अपेक्षा अब तेजी से चालू है. राष्ट्र की अवधारणा को ही तिरोहित करने का कुचक्र रचता एक विशेष ’वाद’ आज अग्रसोच तथा प्रगतिशीलता का परिचायक माना जा रहा है. पंकज भाईजी, आप खूब समझ रहे होंगे मैं कहाँ और किनकी कह रहा हूँ. यह इन्हीं विचारों का ही प्रतिफल है कि हार्दिक एवं पवित्र भावनाओं को लाभ और आमद के बराबर पलड़ों पर रखा जाता है. यह इन्हीं विचारों का प्रतिफल है कि देशभक्तों और सेनानियों के परिवारों को तिल-तिल झींकना व झेलना पड़ता है.

    भाईजी, हम मूर्ख ही सही, हम भावुकता के ’हास्यास्पद पुलिंदे’ ही सही. हमें ’शिक्षित’ नहीं होना. हम आह भरते हुए आँखें भिगोने को और प्रसन्नता में दिलखोल कर हँसने को असभ्यता नहीं समझते. यह हमारा नैसर्गिक संप्रेषण है. पंकजभाईजी, आपके शहर के पुत्रों में अदम्य विश्वास बना रहे कि शहीद ओमप्रकाश की पत्नी और बच्चों तथा अन्यान्य पारिवारिक सदस्यों को दवाओं के लिए हस्पतालों से या आवश्यक कार्यों के लिए कार्यालयों से हकाला न जाये.

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  3. भाई सुलभ को सुनता रहा हूँ. सीखने और अभ्यास के प्रति उनका खुला होना उन्हें सर्वप्रिय बनाया है. उनकी प्रस्तुत ग़ज़ल के अश’आर प्रभावित करते हैं.
    ’कल हो गयी शहादत..’ में जो इंगित है उसकी तासीर बड़ी कचोटती सी है. यों प्रतीत होता है कि इस शेर में ’नींबू का पेड़’ को ’नींबू के पेड़’ होना सम्यक था.
    उसी तरह मक्ता भी बढिया बन पड़ा है.
    लेकिन जिस शेर ने अपने सामयिक होने का गलाफाड़ ऐलान किया है वह है ’माना वज़ीरेआदम विद्वान औ’ भला है’.. .

    बहुत-बहुत बधाई, सुलभ भाई.

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  4. रजनी जी की ग़ज़ल ने अपनी राह बखूबी तय की है. आपने ’राज़ अन्दरुनी’ के पता होने यानि ’ओपेन सेक्रेट’ के मुहावरे को कितनी आसानी से बांधा है. वाह-वाह !
    इसी तरह, ’कल तक जो रास्तों पर..’ शेर हुआ है. यह तंज सुकूं पहुँचाता हुआ भी लगा है.
    रजनीजी को मेरी हार्दिक बधाइयाँ.

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  5. भाई विनोदजी क्या मतला ले कर उपस्थित हुए हैं ! वाह-वाह !
    ’सूरज की रोशनी से.. .’ में इसी तरह से दार्शनिकता को सुन्दर तरीके से बांधा गया है.
    लेकिन जिस शेर ने सबसे अधिक प्रभावित किया है वह है भाई विनोदजी का आखिरी शेर. आज के मानवीय संबंधों की पीड़ा को परिपक्व स्वर मिला है.
    भाई विनोदजी को हार्दिक बह्दाइयाँ.

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  6. शहीदों पर कुछ ना कहना ही अच्छा है और मेरे हिसाब से यही बेहतर श्रधांजलि है ! वरना सत्तासीनो पर @@### की बातें निकलती है ! सच तो यह है कि हम सब को अपना अपना काम करना है और धर्म निभाते हुए लौट जाना है इस जहां से ! खैर ये बाते लम्बी बहस के लिए उकसाती हैं सो यही रोकता हूँ !

    सुलभ ने जो मतला लिखा है वो इन सभी बातो का नोचोड समझिये ! क्या मज़बूत मतला लिखा है वाह भाई वाह लाजवाब !
    मतले के बाद सबसे ज्याद पसंद निम्बू वाला शे'र आया ! एक टीस उठती है इस शे'र को पढ़ कर ! और गिरह भी खूब है वाह सपनों की कल्पनाओं वाह जीओ भाई !

    रजनी जी की ग़ज़ल भी अच्छी हुई है ! कुछ बाते बहुत कठोर लहजे में हैं और यही क़ाबलियत है इनकी ! वाह वाह ! बरसात वाला शे'र भी अच्छा लगा ! बहुत बधाई रजनी जी !

    विनोद जी का मतला क्या ही खुबसूरत मतला है वाह कहने को जी चाहता है ! बहुत बधाई विनोद जी इस ख़ास मतले के लिए !सूरज की रौशनी वाला शे'र भी जबर्दस्त है !और आखिर का शे'र लाजवाब ! बहुत बधाई इस खुबसूरत ग़ज़ल के लिए विनोद जी !

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  7. अनोखे अंदाज़ के अश'आर निकाले है तीनो शायरों ने . दिली दाद और मुबारकबादें , सुलभ जी, रजनी मल्होत्रा नैय्यर जी और विनोद पाण्डेय जी को . हर एक के एक-एक शे'र पर प्रतिक्रिया दी है , क्षमा याचना के साथ कि प्रतिक्रियाएं कुछ 'होलीमय' हुई जा रही है !!

    सुलभ जायसवाल:
    ----------------

    "क्या आपने सुना है, क्या आपको पता है

    ये बातें इनकलाबी जम्हूर में सज़ा है"

    [सुन भी रखा है मैंने, मुझको पता यक़ीनन

    'क्रांति' है बे असर अब, 'जम्हूर' में मज़ा है !]

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    रजनी मल्होत्रा नैय्यर:
    -----------------


    "बिकते हैं बोलियों में खादी पहनने वाले

    ये राज़ अंदरूनी सबको यहाँ पता है"


    ['चित' चार को करे औ', 'चित' ले चुरा किसी का
    है राज़ अंदरूनी, V I P पहनता है !]
    -------------------------------------------

    विनोद पाण्डेय :
    ------------------

    "जिनको गले लगाया वो पड़ गए गले ही

    तब प्यार बांटना भी लगने लगी खता है।"

    ए क़ाश ! कोई पड़ती अपने गले भी भाई
    जब-जब भी मौक़ा आया, जूता ही बस पड़ा है!

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  10. हम किस घटना को किस रूप में लेते हैं यह हमारी सोच का परिचायक होता है। शहीद ओमप्रकाश मुर्दानिया के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ एक तरही शेर प्रस्‍तुत है:
    जांबाज़ काटते हैं, कैसी अदा से यारब
    ‘ये कैद-ए-बामशक्कत जो तूने की अता है।‘
    और इस दु:ख में शामिल होने वालों के लिए चार पंक्तियॉं विशेष रूप से:
    जांबाज़ सरहदों पर कुर्बान हो रहे हैं
    वो भी तो कम नहीं हैं जो उनको खो रहे हैं
    नाकाम हो न जाये, उनकी शहादतें ये
    रक्खें वो याद जो भी पलकें भिगो रहे हैं।

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  11. सुलभ ने मत्ले के शेर में ही स्वंर्गीय दुष्यन्त का अंदाज़ स्पष्ट कर दिया जो शेर-दर-शेर पुष्ट होता गया है। भाई कमाल की ग़ज़ल कही है। बहुत खूबसूरत। विश्वास नहीं हो रहा कि ये वही दो साल पुराना सुलभ है। दिली मुबारकबाद।
    रजनी जी ने भी कसी हुई ग़ज़ल कही है। अच्छे कटाक्ष प्रस्तुत किये हैं। बधाई।
    विनोद जी ने अपनी बात सीधे-सीधे खुलकर प्रस्तुत कर अपने आस-पास के वातावरण का अच्छा चित्रण किया है। बधाई।

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  12. तीनों ग़ज़ल एक से बढ कर एक हैं।

    सुलभ जी-- कल हो गई शहादत नीबू के पेड़ की---लाजवाब

    रजनी जी --सहरा को छान देखा---- बेमिसाल्।
    विनोद जी -- का मक्ता बेहतरीन् बना है।

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  13. सबसे पहले पंकज जी को आदाब जिनसे हमसभी को ये मंच मिला है |

    तपन जी ....... तहेदिल से शुक्रिया |
    सौरभ जी...... आभारी हूँ इस स्नेह के लिए |
    हासमी जी ....... हौसला अफजाई का शुक्रिया |
    तिलक राज़ जी .......आपका स्नेह यूँ ही बना रहे ........

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  14. आदरणीय पंकज जी, प्रणाम

    जब पहली बार मुशायरे में शामिल हुआ था तो बड़ा डर था कि इतने बड़े बड़े शायरों के बीच में मैं एक नया शायर कहाँ ठहर पाउँगा ..मगर मैंने निरंतरता बनाये रखी ..साथ साथ में यहाँ पर उपस्थित रहने वाले सभी मित्रों का प्यार मिलता रहा, सभी दोस्तों की हौसलाआफजाई और उसके साथ आपका आशीर्वाद जिन सब वजह से आज मुझे इतना प्यार मिला। वाकई यह पल बहुत सुखद है की कई नामचीन शायरों के साथ मैं भी इस बेमिशाल तरही मुशायरा का हिस्सा हूँ ।

    सुलभ जी, मेरे खास मित्र है हर बार की तरह आज भी उन्होंने बेहतरीन ग़ज़ल प्रस्तुत पढ़ी है।।। बहुत बहुत हार्दिक बधाई

    रजनी जी ने राजनेताओं पर जो कमेन्ट लिखे है वो कटाक्ष बहुत सुन्दर बन पड़े है ..बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ

    आप लोग के साथ मेरी रचना शामिल की गई यह भी एक सुखद पल है ..धन्यवाद पंकज जी, सादर प्रणाम

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  15. कल रेडियो प्रसारण में मैंने आधे अधूरे न्यूज़ को सुना था , "मध्य प्रदेश सरकार, राजकीय सम्मान, शहीद ओमप्रकाश मुर्दानिया, सीहोर...." और आज आपके पोस्ट से डीटेल खबर मिली है. ऐसे समय में मेरा आक्रोश और मेरी संवेदनाएं... क्या कहूँ। खबरे सिर्फ खबर न रह जाये। श्रद्धांजलि और न्याय समुचित मिले।

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  16. शहीदों पर तो क्या कहा जाय बस इतना ही कहा जा सकता है
    शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
    वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।

    बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है तीनों ही शायरों ने।

    सुलभ जी का हुस्न-ए-मत्ला लाजवाब है। बाकी के शे’र भी अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे हैं। बहुत बहुत बधाई उन्हें इस शानदार ग़ज़ल के लिए।
    रजनी जी ने भी खूबसरत ग़ज़ल कही है। उन्हें भी ढेरों दाद इन शानदार अश’आर के लिए।
    विनोद जी के तो क्या कहने। मत्ला खूबसूरत। सुनसान हो डगर....बेहद खूबसूरत। बाकी के अश’आर भी शानदार। उन्हें बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल के लिए।

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  17. कमेन्ट देने में देरी हुई। आपकी भूमिका से मन उदास हो गया उसे संयत करने में वक्त लगा इसलिए देर से आया हूँ। आपने जो लिखा है वो कटु सत्य है, सबसे बड़ा सत्य ये है के हम आत्म केन्द्रित हो गए हैं सामाजिक नहीं रहे और इसी का खामियाजा भुगत रहे हैं। संगठन में शक्ति है का पाठ बदमाशों ने रट लिया और वो अब असंगठित शरीफों पर मन चाहा अत्याचार कर रहे हैं।

    अब बातें ग़ज़लों पर :-
    सुलभ से सीहोर में मुलाकात हुई थी, उस से मिल कर मुझे आभास हो गया था की ये साधारण सा दिखने वाला युवक असाधारण प्रतिभा वाला है। उसकी सोच आज के युवाओं की सोच से बहुत अलग है, वो समाज के मूल्यों और देश में हो रही गिरावट से चिंतित ही नहीं है उसे रोकने के प्रयास में भी जुटा है।
    "ये बातें इंकलाबी----" माना वजीरे आज़म---" "कल हो गयी शहादत---" जैसे शेर मेरी बात की ताकीद करते हैं। मेरी दिली दाद इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए। सुलभ मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।

    रजनी जी ने अपनी ग़ज़ल में आज के हालात की बखिया उधेड़ कर रख दी। हर शेर मारक है और सही ठिकाने पे वार करता है। "बिकते हैं बोलियों में---", "कल तक जो रास्तों में--", सहरा को छन देखा---" जैसे शेर इस बात की गवाही दे रहे हैं। रजनी जी के पास समाज में चल रही हर गतिविधि को देखने परखने की दृष्टि है जिसे वो अपने शेरोन के माध्यम से उजागर करती हैं। बहुत अच्छी ग़ज़ल--वाह।

    विनोद जी को पढना एक सुखद अनुभव से गुजरने जैसा है। मतले ने ही ऐसा बंधा के आगे बढ़ने में वक्त लग गया। कमाल का मतला .सामाजिक सरोकार से रची बसी उनकी ये ग़ज़ल विलक्षण है। मतले के अलावा "सूरज की रौशनी--", "जनतंत्र लग रहा है---", "जिनको गले लगाया--" "कहने को साथ अपने--" बहुत प्रभावशाली शेर बन पड़े हैं।

    इस बार भी हर बार की तरह, तरही में निर्मल आनंद की अखंड धारा बह रही है .

    नीरज

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    1. सर, आपसे सीहोर की वो यादगार मुलाक़ात ऐसी है कि दुबारा उसी दिसंबर की गुलाबी सुबह का कोई मुझे लालच दे तो मैं इन्तजार में एक सदी आसानी से काट सकता हूँ। आपके शब्दों और आशीर्वाद के बदले फिलहाल कुछ नहीं है देने के लिए मेरे पास। ये साथ बना रहे। बस यही कामना है।

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  18. सुलभ भाई
    नीम्बू के पेड़ की शहादत ,,,
    गिरह का शेर
    और मक्ता

    इन् तीन अशआर के लिए ढेरो ढेर दाद

    आपने तो चौंका ही दिया
    भाई क्या कहने वाह वा

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  19. रजनी जी की ग़ज़ल भी खूब पसंद आई,
    आख़िरी के दो अशआर के लिए ढेरों दाद.. गिरह भी खूबसूरत बांधी है

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  20. विनोद जी की ग़ज़ल के कई अशआर पसंद आए
    तेवर और तंज़, प्रश्न और उत्तर सब कुछ समेटे हुए ....

    जनतंत्र लग रहा है ......
    जिनको गले लगाया ...
    भाई वाह वा ....
    बहुत खूब

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  21. सुलभ जी हमेशा ही अपनी मुखर बातों से प्रभावित करते हैं ...
    मतले के शेर में ही हकीकत की कडुवी सचाई डाली हुई है ...
    नीम्बू के पड़ की शहादत के साथ महानगरीय सिकुड़ते जीवन को प्रभावी तरीके से रक्खा है ...
    दिल्ली की सचाई को भी बाखूबी कह रही गज़ल ...
    गूगल ओर फेसबुक का प्रयोब बाखूबी किया है सुलभ जी ...
    पूरी गज़ल लाजवाब है ...

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    1. @दिगंबर जी, आप सब के बीच आप सब के साथ चलने का जो मजा है इसे शब्दों में ब्यान नहीं कर सकता। बहुत शुक्रिया आपका !!

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  22. रजनी जी के शेर सीधे कटाक्ष हैं आज की राजनीति पे ...
    सहरा को छान देखा ... एक ऐसी सचाई को पेश करता है जो हर किसी को मालुम तो है पर निभती नहीं ...
    सावन वाला शेर भी खूबसूरत बन पड़ा है ...
    पूरी गज़ल कामयाब है अपने मकसद में ...

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  23. विनोद जी ने तो मतले के साथ ही आज के दौर का सच बयां कर दिया ...
    जनतंत्र ओर कंकाल तंत्र ... क्या लाजवाब तारतम्य बैठाया है इस हकीकत से ...
    पतझड़ के बाद सावन का न आना ... कैसा भयानक संकेत है ...
    ओर प्यार बांटा सच में कई बार खता लगने लगती है ...
    वाह विनोद जी .. कमाल कर दिया इस गज़ल में ... बधाई ...

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  24. ग़ज़ल सराहना के लिए, सभी पाठको का तहे दिल से शुक्रिया !!

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  25. आज की पोस्ट पर किन्हीं कारणों से देर से आ पाया! विडियो देख कर और भूमिका से गुजरने के बाद मन बहुत बोझिल है! ग़ज़लें तीनों अच्छी हैं और सुलभ भाई बहुत तेज़ी से कहाँ की एक अपनी शैली विकसित कर रहे हैं!रजनी मल्होत्रा जी और विनोद पाण्डेय जी ने भी कामयाब ग़ज़लें कही हैं! आप सब को बधाई!

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  26. दिलवालों की दिल्ली .....कुछ हाले दिल ...बहुत अच्छे शेर सुलभ जी को गजल के लिए बधाई

    सहरा को छान देखा ...मौसम था खुश्क ..शेर लाजवाब है रजनी जी को बहुत शुभकामनाए

    विनोद जी की गजल दिल को छू गयी हर एक शेर कमाल तहे दिल से शायर को शुभकामनाए

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